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श्रम का स्वाद - लघुकथाएँ - तनु श्रीवास्तव

लघुकथा एक

              

       श्रम का स्वाद

  "का टेम हुआ है  बदलू काका?"

"आज बार-बार टेम पूछत है का है रे  सुखिया।"
  "अरे! तुम्हरें  नाकी में छोला पूरी की खुशबू नहीं जात है काका।"
  "अरे! काका तो खाली कामै की खुशबू जानत है रे पलटू।"
  " चलो- चलो टाइम हो गया।" 

"दुई मिनट रुक जाओ सभैई आखिरी बल्ली बची है निकलवाए लेयो कहि मालिक या कौनो ना जान पाय और चोट वोट न लग जाय।" 

" काका तुमहू ना  कुछ न होई  चलो अब  नहीं तो हो छोलापुरी खत्म हो जाई।"

"कहां छोलापूरी  छोलापूरी करत हो सब सबेरवे से।" 

" देखो सामने चौराहे पर  भंडारा लाग है सबहीं के खातिर  आज  पेट भर खाओ काका वुहो मुफ्त में  कौनो पैसा ना लागि ।"

  " तो ई बात है।"  "और  और जो हम सबहैं रोटी लाइन हैं   एका का होई?"

  " अरे काका तुम चलिहौ बहुतै सोचत  हो। हमारे पिछे - पिछे चले आओ।"

उसको जाता देख अपनी रोटी की पोटली को कस के हाथ में पकड़ लाइन में खड़े मजदूरों को भीड़ में खाने के लिए  हाथ फैलाए देखता है।
   "हूँ...  हमरी बिदियाँ के चूल्हे का धुआं और पसीने की बूंद से बनी है ई रोटी  ई शहरी भंडारे से ज्यादा स्वाद है इमा और फिर हम काहे हाथ फैलाई दूसर के आगे।" कह बेपरवाही से सर हिलाता हुआ छांव में बैठ कर अपनी मेहतन की  रोटी और प्याज खाने  लगा। 

तभी  इंजीनियर साहब उसे एक दोना छोला पूड़ी देते हुए विनम्र स्वर में शिकायत भरे लहजे में बोले -
"अरे बदलू काका  अपनी रोटी तो तू मुझे खिलायेगा नहीं कम से कम मेरे शहर की  पूड़ी तो खाके बता।" और मन ही मन उसके स्वाभिमान और कर्मठता को सेल्यूट कर दिया।

तनु श्रीवस्तव
  ( लखनऊ)

                
  

   दबाव

निर्माणाधीन भवन के अर्धनिर्मित कमरे में बैठा लक्ष्य, अपने लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा
    वहीं वहीं पास पड़े औजार छेनी,रेती,फावड़ा,तसला,पटरा,लैपटॉप को आश्चर्य से देख खुद को छिपाने के लिए एकदूसरे के ऊपर लदे जा रहे थे।  

काम के बीच ही किसी का फ़ोन आने से लक्ष्य उठकर बाहर आ बात करने लगा।

तभी लैपटॉप को देख छोटी छैनी धीरे से बोल उठी -  "लैपटॉप भैया आप कितने किस्मत वाले हैं कितने प्यार से आपको उपयोग करते हैं आपके मालिक और कितने साफ सुथरे हैं आप।"

"और एक हम और हमारे मालिक।दिन भर धूल मिट्टी और कठोर काम। थोड़ी देर भी हाथ रुक जाय तो मालिक की डांट मिलती है। और पैसे भी बहुत कम ही मिलते है हमारे मालिक को।"

"अपनों से दूर दर्द भरा जीवन है । और आप,,,।"

ऐसा नहीं है रे छोटी है वह हंस कर बोल ही रहा था कि परेशान और झुंझलाता हुआ लक्ष्य वापस आ गया।

उसकी उंगलियां और तेज़ी से चलने लगी थी ।

अब तो रात भी गहराने लगी थी और लक्ष्य कभी पेन-कागज,कभी लैपटॉप और फोन पर ही उलझा 'जी सर ' 'यस सर ' अभी पूरा हो जाएगा सर ' कहता लगातार काम करते जा रहा था।

छोटी छैनी बीच- बीच में उसको आँख खोल कर देख लेती थी और लैपटॉप को देख इशारा करती, थके नहीं।

अभी वह जवाब देता कि फोन् बज उठा-- हेलो बोलते ही आवाज़ आई , "बेटा हुआ है पर पत्नी की हालत गम्भीर है आ सको तो जल्दी आ जाओ।"
 
नहीं नहीं..., मैं तुम दोनों के लिए ही तो काम कर रहा हूँ कुछ नहीं होगा तुम्हें फफक कर रोते हुए कह,
वह तेजी से निकल पड़ा घर की ओर।

और लैपटॉप निरीह दृष्टि से छेनी को देख रहा था ,मानो कह रहा हो दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

तनु श्रीवास्तव
लखनऊ
          

मुझे बचा लो।"

"सुनो किसान! मुझे मत ले जाओ बाज़ार ।"

" अरे नहीं ले जाऊंगा तो अपने बच्चो की शिक्षा , विवाह आदि की व्यवस्था कैसे करुंगा।"

"हां वो तो है भाई। पर मेरा दर्द भी तो समझो।"

" मैं जानता हूँ ,तुम बहुत मेहनत करते हो, मुझे
उगाने में, मिल मालिक मुझे संरक्षित करने में,दुकानदार मुझे बेचने में ।"

"अरे, वाह,तुम तो बहुतों का भला करते हो ,रोजगार देते हो कितनों को। तब क्यों विचलित हो। पकने से डरते हो लगता है ।हा हा हा"
" नहीं नहीं किसान भाई,गृहणियां नए- नए प्रयोग कर कितना  स्वादिष्ट बनाती है मुझें , मैं लोगों की आत्मा और उदर तृप्त कर बहुत आह्लादित होता हूँ। इसीलिए ही तो मेरा जन्म हुआ है।"

  "तब क्या बात है यार।"

"मैं s मैं s डरता हूँ  ,जो  उन उदर ज्वाला से पीड़ित निरीह भाव से निहारती अँखियों से ,जो मुझे जूठी थाली से नाली में बहते और माटी में मिलते देखती भूख से मचल उठती है।"

मैं बहुत तेज चीखता  चिल्लाता हूँ खुद को बचाने को । उन सब के लिए,,, पर,, उफ्फ कहीं वो हमें ,, पक्षपाती ना समझें,,, हे ईश्वर हमें इस  पाप ,,, मुझे बचा लो अन्नदाता,, मुझे उनके लिए बख्श दो कहते कहते फफक पड़ा अन्न।

ओहह भगवान,,,मुझे माफ़ करना,,कह रोते  हुए कृषक के कदम मलिन बस्ती की ओर  मुड़ गएl


तनु श्रीवास्तव
  लखनऊ

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