आत्माराम यादव पीव की रचनाएँ

SHARE:

मेरे अंगना खेले बांके बिहारी रूनझुन रूनझुन बाजे पैजनिया खेले है कान्हा आज मेरे आगनियाँ । झुनक झुनक झुन बाजे करधनिया झोली खुशी से भर गयी ओ सा...

मेरे अंगना खेले बांके बिहारी

रूनझुन रूनझुन बाजे पैजनिया

खेले है कान्हा आज मेरे आगनियाँ ।

झुनक झुनक झुन बाजे करधनिया

झोली खुशी से भर गयी ओ साजनिया।।

उठता-गिरता कान्हा मुस्कुराता है

पैजनिया की रूनझुन से जी वो चुराता है।

लार टपकाता जग खजाना लुटाता है

रोने का बहाना कर खुद लूट जाता है।।

तिरछी सी चितवन से वह ठग लेता है

पीव गूंजती रून-झुन से जी भर देता है।

विश्व के रचयिता की लीला है न्यारी

मेरे अंगना खेले वह बांके बिहारी ।।

(2)

गजब का यह शौक

माना कि मिट्टी का बदन है,

मैं रहता हॅू उसमें सिमट कर ।

आया था खूब हंगामा हुआ,

जाऊॅगा खूब हंगामा कर।

इस जिस्म का क्या कहें,

यह भीड़ का साया हुआ।

हर पल सूरतें बदलती रही,

देखकर शर्मसार आईना हुआ।।

पागल है यह परिन्दा

जो तूफानों से लड़ रहा

देखकर साहस उसका

तूफानों ने रास्ता बदल लिया।

राह ऐसी कोई बनी नहीं,

जो खुदा के घर पहुचें

भीड़ के साथ चलकर,

हरेक दलदल में पहुंचे।

सर पटकते है नादान,

जानसका वह मौजी कोई

समन्दर उसकी मुट्ठी में,

भरमा सका न उसे कोई।।

पीव मिटकर भी इसलिये जिंदा है

जो गिर रहे थे उन्हें हमने संभाला है।

खून के आंसू पीना मरने को जीना

गजब का यह शौक हमने पाला है।।

(3)

नर्मदा की गोद

माँ के अमृतमयी जल से

पावनता पाकर

मैंने अपने जीवन में

सदा ही पायी है जय।

अब यह देह

माँ की गोद में रहकर तृप्त है

पीव आकांक्षी है

मिले माँ नर्मदा की गोद

जहाँ सभी को प्राप्त है

परम शांति साथ

चिरस्थायी विश्राम।।


दूरियां कौन मिटायेगा

मुझसे दूर रहकर, बेटे

तुझे चैन कैसे मिलता है

हरपल मुझसे दूर हो पर

मेरा ध्यान तुझी पर लगा रहता है।

हम अकेले बैचेन है सुखी नहीं

तू अकेले कैसे सुखी रहता है।

तुझे पाला-पोसा गोद में खिलाया

बगिया बसाई जहाँ तू रहता है।

हम बूढ़े है, बेबश है और बेसुध भी

खबर तुझे भी पर क्यों नहीं सुनता है।

बिधे हुये हो हृदय में अंदर तक

आशान्वित हॅू आओगे मन दिलाशा देता है।

मेरे देह की पहली प्रतिकृति तुम

आँखों में समाये दिल में तुम मेरे रहते हो।

पीव प्रतीक्षा की इंतहा कब होगी खत्म

देखें दूर रहते हुये, दूरियां कौन मिटाता है।


डाक्टरों के शोधप्रयोगों से रोगी मर जाता

सुन जमूरे आज भारत का,

हर इंसान चाहता है स्वस्थ्य काया

हो स्वस्थ्य जीवन हर व्यक्ति का,

न हो किसी बीमारी का साया।

सुरसा के मुख सा फैला हृदय रोग,

हर कोई इससे पीड़ित है

आहार प्रयोग विधि से सब रोग मिटे,

यह डाक्टर को विदित है।

रोग की गंभीरता और ब्लाकेज रोकना

है चिकित्सक का धर्म

पर पूर्ण स्वास्थ्य दे देगा तो

व्यवसाय चिकित्सक का होगा नर्म।

बीमारों की लम्बी लाईन लगाना

अब डाक्टरों का है काम

गंभीर बीमारी बतलाकर

यह खुशियां छीने तमाम।।

आज जमूरा खोलेगा,

डाक्टरों का कैसा है गोरखधंधा

कैसे शोषण होता है रोगी का

और कैसे चलता है मेडीकल धंधा।

ब्लाकेज रोकने का इलाज नहीं करते,

ये रोगी को मौत से डराते है

षड़यंत्री हुये अधिकांश हृदयविशेषज्ञ,

ये चीरफाड़ से ज्यादा कमाते है

कोई भी मरीज नहीं चाहेगा,

हृदयगति रूकने से हो उसकी मौत

पर हृदयगति पर रोक लगे कैसे ,

जानते डाक्टर ब्लाकेज रोकने का स़्त्रोत।।

कहता है जमूरा, सुन मेरे भाई,

हार्ट अस्पतालों का आंखो देखा हाल

सीने में दर्द उठते ही जब

रोगी हृदयविशेषज्ञ के पास जाता

तमाम जांच-परख के बाद

चिकित्सक यह फरमान सुनाता

एक मिनिट लेट हो जाते तो

मरीज को बचाना मुश्किल होता

मुहॅमागी फीस जमाकरवाने का

डाक्टर का चल जाता है यह मंत्र

हार्ट के आपरेशनफार्म की सहमति

डरे हुये सगे-संबंधी दे देते है तुरन्त

मरीज जाल में फॅस जाता है

सि़द्ध हुआ डाक्टर का अनैतिक षडंयंत्र

आपरेशन के बाद कितने साल जियेगा रोगी

कभी खोलता नहीं है डाक्टर यह रहस्य।

जमूरा कहता है जब तक सोती रहेगी सरकारें

तब तक नहीं होगी कभी भी इसपर बहस।

हृदय में छोटे से छोटे ब्लाकेज की,

क्यों की जाती है बाईपास सर्जरी

डाक्टर कहता जानलेवा ईलाज है,

फिर जान से क्यों खेल करें सर्जरी।।

सर्जरीकर डाक्टर मुनाफा कमाता,

और रोगी के प्राणों से खेल जाता

शोध-प्रयोग दवाओं के वह करता

पीव दुष्परिणामों से भले रोगी मर जाता।।

पलकों में आँसू छिपाकर

मुस्कुराना मुझे आ ही गया

गीत सुनने की चाहत न थी

सुनकर गीत गाना आ ही गया।

आंखो के आँसू धोकर

खुशी से मुस्कुराना आ ही गया।

भाई बहिन जैसे दो चुम्बकीय ध्रुव

हम सगे भाई-बहिन

कई सालों से

ऐसे रहते है

जैसे

जिन्दगी और मौत ।

जैसे ये दोनों

न अलग है

न ही मिल सके

ठीक वैसे ही जैसे

नदी के दो किनारें हो

या आकाश का छोर हो

पीव हम सगे भाई-बहिन के सम्बन्ध

दो चुम्बकीय ध्रुव की तरह

होकर रह गये हैं ?

मोहल्ले की रौनक आवारा कुत्ते

जैसे शहर के हर मोहल्ले में

मोहल्ले की हर गली में

और हर गली के

किसी सुनसान घर में

रहते हुये मिल जाता है

बीमार मरियल से कुत्ता

कुतिया और उसकी पलटन।

दिनभर गली के एक कोने से

दूसरे कौने में भागता रहता है

भूखा-प्योसा वह कुत्ता।

रोज रात गहराते ही

सबके सोने के बाद

वे न जाने क्या सुन लेते है

उन्हें क्या दिख जाता है

वे क्या सूंघ लेते है

भौंकते रहते हैं

किसी को सोने नहीं देते हैं।

मन करता है

इन कुत्ते का काम तमाम कर दू

और इत्मीनान से गहरी नींद सोऊ।

कभी कभी एक साथ

कई कुत्तों के भोंकने

और झगड़ने की आवाजें

बेचैन कर देती है

सभी को

फिर ख्याल आता है

छोड़ो उसे

जिसे एक रोटी भी नहीं खिलाई

फिर भी मोहल्ले में

रहने का फर्ज निभा रहे है

किसी अंजान कुत्ते ही नहीं

व्यक्ति के आने की सूचना

भौंककर सतर्क करते है

और कभी कभार

मोहल्लेवालों के लिये

लड़ पड़ते है अपने से बड़े कुत्ते से

और घायल होकर

काऊ-काऊ कर जख्मी हो जाते है

कोई भी उन बीमार कुत्ते का

इलाज नहीं कराता है

नींद में दखल देने के लिये

कुत्ते को मारना तो

सभी चाहते है पीव।

फिर छोड़ देते है यह कहकर

बिचारे मर जायेगे

तो इस मॅहगाई में

मुफ्त के चैकीदार कहा मिलेंगे

अपने ही स्वार्थ के रहते

हम सह जाते है इन कुत्तों का जुर्म

यह इत्मीनान करके

चलो इन कुत्तों को जिंदा रखें

ताकि पीव मोहल्ले की रौनक बनी रहे।


हम जो छले, छलते ही गये

15 अगस्त की वह सुबह तो आयी थी
जब विदेशी आंक्रान्ताओं से हमें
शेष भारत की बागड़ोर मिली
हम गुलाम थे, आजाद हुये
आजादी के समय भी हम छले गये थे
आज भी हम अपनों के हाथों छले जा रहे है।
भले आज हम आजादी में साँसे ले रहे है
पर यह कैसी आधी अधूरी आजादी ?
पहले अंगे्रेजों के जड़ाऊ महल बनाते थे
अब अपने ही तथाकथित नेताओं के
पिछलग्गू बने सैकड़ों हाथ मजदूर ही तो है?
तुम खुश हो विदेशियों की गुलामी से
तुम्हारें पूर्वज मुक्त हो गये है और
भारत आजाद देश हो गया है
पर यह भूल गये तुम्हारे पूर्वज गुलाम थे अंग्रेजों के
तुम भी गुलाम हो, अपनों के
तुम उन लोगों में हो जो कभी आजाद नहीं होते
तुम उन लोगों में हो जो गुलाम होकर भी नहीं होते
तुम्हारे तथाकथित अपनों ने
हजारों हाथों को तोड़ा है
हजारों कंधें इन्होंने उखाड़कर फैंके हैं
तुम सिर्फ मजदूर हो,मजबूर ही मरोंगे।।
तुम्हारे दादा मजदूर थे, तुम मजदूर हो
तुमने अपने माँ-बाप के साथ मजदूरी शुरू की
घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, गाँव छोड़ा
शहर की चकियाचैध में तुम बना रहे हो अटटालिका
तुम्हारी बेटी कब जवान हो जाती है
तुम्हारे बच्चे सड़कों पर, कचरेघरों में
तलाशते है अपना भविष्य।
टूट जाते है वे दो जून की रोटी के लिये
सड़कां के किनारें, बसस्टेण्ड या
रेल्वेस्टेशनों के कौने-कुचेरे में होता है
तुम्हारा बिस्तर,
तुम्हारी गुदड़ी में आवारा कुत्ते भी
हाड़ कपा देने वाली ठण्ड से बच जाते है।
कोई एक दो नहीं तुम करोड़ों में हो
जिनका कोई भविष्य नहीं है
तुम्हें 15 अगस्त की आजादी का पता नहीं
तुमने कभी नहीं देखी परेड़
तुम्हें कोई भी नहीं खिलाता मिठाई
तुम 15 अगस्त 26 जनवरी को भी
चहकते मिल जाते हो,सिर्फ इसलिये
उस दिन तुम तिरंगा बेचकर
दो जून की रोटी का जुगाड़करके
पीव समर्पित हो जाते हो बेगारी के लिये।।

(2)

***अंतरिक्ष में दफन होते शब्द****
रात की काली पलकें
जैसे आकाश ने मून्दी हो अलकें
भयाभय घनघोर काली है
मानों सारी अराजकता को समेटे
वसुन्धरा के लघुत्तम जीव से
सभी प्राणियों-वनस्पतियों के
उच्चारित शब्दों को
हृदय के भावों-पीड़ाओं कोे
अंतरिक्ष में दफन कर रही है।
ये शब्द इस धरा के
हर प्राणी के मुख से
सोते-जागते स्पन्दित है
एक चींटी की फुस्फुसाहट चीख से लेकर
एक भयाभय विशाल प्राणी की संवेदनाओं तक
अंकन करता है यह परमव्योम।
छोटी सी घास के तिनके या
लघुत्तम पौधे या पेड़ के पत्ते
अपनी टहनी से जब नोचे जाते है
तब घास और पौधे के भीषण दर्द को
वायु संवाहक बनकर
पहुंचाती है व्योम को
और यम के लेखे में
दर्ज होती है सबकी करनी।
धरती के प्रथम जीव,वनस्पति से लेकर
कोटिशः मानवों की तबसे
आज तक की संतति तक
यानि आपकी सभी पीड़ियों से आप तक
सभी की करूणा,दया,वेदना
प्रार्थना,दुआ-बददुआ या
दर्दभरी चीख की संवेदनाओं की सिसकिया
अंतरिक्ष में हुंकार मार रही है।
अंतरिक्ष का यह मायाजाल
अपनी संप्रभुता के साथ
सदियों से हर मनुष्य,प्राणी वनस्पति के
एक-एक स्वर,शब्द और वाणी का
संग्राहालय बना हुआ है
और उसके जन्म से मृत्यु तक के
एक-एक पल, एक एक क्षण की
गुंजित हर ध्वनि,किये गये
कर्म-अकर्म और विकर्म का साक्षी है
और पराजगत का प्रमाणित दस्तावेज।
आकाश के इन अमिट दस्तावेजों को
समय की परिधि से निकालकर
पुर्नजीवित करने का अज्ञेय ज्ञान
कभी प्रगट कर सकेगा इंसान
यह समय के चक्रपातों में उलझे
उसके विवेक के लिये पीव
काला अक्षर भैस के बराबर ही है।
शरीर मरता है ंशब्द नहीं मरते
खुद को जीवित रखने के लिये
कन्दराओं-पहाड़ों के शिखर पर
इंसान उकेर आता है
अपने नाम के शब्द और लकीरें
शब्द वैसे ही जीवित रहते है
जैसे जिस भाव से उपजते है
शब्द गाना,गाली,रोने धोने वाले
आर्तनाद, सिंहनाद लिये होते है।
जिसके मुख से ये शब्द निकले
शब्द निकालने वाला
उन शब्दों का पिता होता है।
मुख से शब्द निकलने पर
वैमनस्यी गाली-गलौच से लबरेज शब्द
परछाई की तरह अपने पिता के
पीछे अंतरिक्ष में मंडराते है
मरने के बाद भी वे अपने पिता को
खोजकर उनके सहचरी हो जाते है।
जो सार्थक प्रार्थनामयी शब्द होते है
वे शब्द अपने जन्मदाता को
चिर-परिचित आत्मीयता का
आभास कराते है
मानो आने वाले कल की संरचना
और दुनिया के निर्माण में
इन्हीं शब्दों की निधियाँ इनसे
पीव जगत संचालित करायेगी।


(3)

’’आदमी कौन है’’’
मैं भी हॅू आदमी,
तू भी है आदमी
आदमी आदमी है,
आदमी के लिये।
आदमी तब आदमी नहीं,
जब आदमी न हो
आदमी के लिये।
यह भी है आदमी
वह भी है आदमी
सभी है आदमी कहने के लिये।
आदमी की रात बीतती नहीं
आदमी की बात बीतती नहीं
आदमी है कमाल
कमाल का है आदमी।
बडा प्यासा है आदमी
बड़ा उदासा है आदमी
एकता से डरता आदमी
रंग देख ढंग बदलता आदमी
आदमी है चाटुकार
चाटुकार का है आदमी।
युग की पुकार है
आदमी से गुहार है
पीव जीवन का रस बहे
दुनिया में रहे ऐसे ही आदमी।

(4)
**वे अपने घर लौट आते है***
दिन उगता है रात उगती है
दिन ढ़लता है रात ढ़लती है
रात के हिस्से में अंधकार है
दिन के हिस्से में प्रकाश है
दिन और रात तय समय पर
रोज अपने घर लौट आते है।
सूरज उगता है सूरज ढलता है
पर चान्द न उगता है न ढ़लता है
चान्द घटता है और बढ़ता है
धरती प्रदक्षिणा करती है सूर्य की
चान्द प्रदक्षिणा करता है धरती की
धरती,सूर्य और चन्द्रमा तय समय पर
अपने परिवार से मिलने के लिये
वे अपने घर लौट आते है।
चान्द,सूर्य और धरती के कर्तव्यमार्ग पर
नियत समय पर अपने रिश्ते निभाना
पीव प्रकृति का एक पर्वोत्सव हो गया।

(5)

***बिना कहे सुने को झगड़ा***
न कुछ दिये
न कुछ लिये
आपस में भिड़़ लिये।
न कोई बात
न कोई मुलाकात
कानाफूँसी हुईं कान भर लिये।
न आपस में सोचा
न आपस में विचारा
घर की बात थी
कर लिया घर से किनारा।
डरते नहीं जान ले लेंगे
डरते नहीं जान दे देंगे
भाईयों के रक्त के प्यासे
पीव ये भाई है कैसे ?
जंगली जानवर हो जैसे ॥

(6)

यहाँ है सारे उत्कृष्ट गधे’’’
पुण्य सलिला के तट बसा, नगर होशंगाबाद
हितेश थुदगल बता रहे, है गधों से यह आबाद
बडे सहनशील सधे हुये, है यहाँ के सारे गधे
नपाध्यक्ष *खिलेश भले, कामों में ये रधे -सधे
उत्कृष्ट *खिलेशराज में, राज करें सभी गधे
वार्ड दो तीन हो या कोईभी, मौज करते यहाँ गधे
मारो-पीटो और सताओ, नहीं करते विरोध गधे
लोग धृष्टता करते है, पर शिष्टाचारी है गधे।
निकृष्ट न समझो थुदगल, यहाँ है सारे उत्कृष्ट गधे
पीव जगत गुण गाता,प्रशंसनीय है होशंगाबादी गधे।

(7)

’’’ ईश्वर को नौकर रख सकता है इंसान ’’
जिस दिन ईश्वर ने अपना वसीयतनामा
इंसान के नाम लिख दिया
इंसान ने खोद डाली सारी खदानें
सोना,चान्दी, हीरे-मौती
निकाल कर अपनी तिजौरी भर ली।
धरती की सारी सुरंगे
स्वार्थी इंसान ने खोज ली
और सारी तिजौरियों को
बहुमूल्य रत्न भण्डारों से भर ली।
उसने पहले नदियों के पानी को बेचा
नदियों के किनारों की रेत मिटटी को बेचा
वह अब जमीन के टुकड़े-टुकड़े बेच रहा है
वह हरे भरे पेड़-पौधों को बेच रहा है
वह जंगल-पहाड़ बेच रहा है
वह जिंदगी-मौत बेच रहा है
भगवान के मुफ्त दिये सारे उपहार
यह इंसान बेखौफ बेच रहा है।
ईश्वर की वसीयत इंसान को क्या मिली-
वह भूल गया है सारी इंसानियत
और सभी नदियों में सभी समुद्रों में
खुदकी नाव-जहाजें चलवाकर कमा रहा है।
आकाश में उड़ रहे है उसके विमान
वह कर रहा है देश का नेतृत्व
और उसके देश
प्रक्षेपात्र भेज रहे है अंतरिक्ष में।
इंसान इंसान ता न बन सका
पर वह व्यापारी बन गया है
और बेच रहा है
इस सृष्टि की सम्पूर्ण सम्पदा-
धरती,पहाड़ और आकाश
चन्द्रमा,सूर्य और प्रकाश
पद,प्रतिष्ठा और पदवी
मुक्ति,भोग और सादगी
इंसान ने धरती को
अपने कदमों में झुका लिया है।
ईश्वर की वसीयत पाकर
इंसान खुद को विलक्षण मान बैठा है
वह अपने मन में ईश्वर की
करूणा का अन्वेषण किये बिना
पीव अहंकार से भरा हुआ है
कि वह वसीयतकर्ता ईश्वर को
अब अपना नौकर रख सकता है।

(8)

छेदवाली नाव पर सवार पत्रकार’’’
मुद्दत से चली आ रही
पत्रकारिता की पुरानी
कई छिद्रवाली नाव पर
सवार है
मेरे शहर के तमाम पत्रकार
इस पुरानी नाव में
कुछ छेद
पार कर चुके लोगों ने
तो कुछ छेद
इस नाव पर सवार लोगों ने किये हैं।
इस पुरानी नाव को
चट्टानों के बीच
भयंकर तूफानों को
भी झेलना होता है
नदी का पानी तेजी से
मौत के रूप में नाव में घुस रहा है
और पत्रकार निश्चिंतता से
चैन की बंशी बजा रहे हैं।
इनका आचरण
स्वयं मृत्युवरण का है
पर दुनियावालों को
नाव पर सवार ये सभी पत्रकार
स्थिरता,निर्बाधता,शांति और संघर्ष की
पतवार खेते
नदी पार करते नजर आते हैं।
नाव पर सवार प्रायः अधिकांश पत्रकार
संकीर्णताओं में जकड़े स्वार्थ में अकड़े
खुदको सर्वोच्चता के
उच्चतम शिखर पर देख रहे हैं।
पत्रकारिता की सेकड़ों छिद्रवाली
पुरानी नौका को
अपनी बपौती समझने वाले लोग
अपने नये साथी को देखकर चैकते हैं
जैसे अचानक
गाँव का साँड
शहर में आ घुसा हो।
ये हर तरह से
अपने पैने नुकीले सींगें को
दिमाग के घटिया
षड़यंत्रों के कुतर्को को
अपने भारीभरकम
अनुभवों व दैत्याकार शरीर को
हथियार बनाकर निरूत्तर
कर देते है नवागतों को
नाव पर सवार सभी
गहरे जानी दुश्मन की तरह बैठे हुये है।
ग्रीष्म चूसकर जैसे
ऊर्जा को दग्ध कर देता है
कमजोर वृक्षों को जैसे
अंधड़ उखाड़ देता है
पौथीधारी ये अपने घर के
नबाव से जमे जकड़े है
दुनिया जाये भाड़ में
ये शराब कबाब पाकर अकड़े है
पीव सदा के लिये डूब जाये
यह नाव हमारी बला से
हम तो किनारे आ गये,
तुम मरो हमारी दुआ से।।

(9)

** ब्रज नहीं बचो कान्हा के समय जैसों***

(ब्रजदर्शन के बाद )
जे वृन्दावन धाम नहीं है वैसो,
कान्हा के समय रहो थो जैसो
समय बदलते सब बदले हाल
वृन्दावन हुओ अब बेहाल।
कान्हा ग्वालो संग गईया चराई,
वो जंगल अब रहो नहीं भाई
निधि वन सेवाकुंज बचो है,
राधाकृष्ण ने जहाँ रास रचो है।
खो गयी गलियाँ खो गये द्वारे,
नन्दगाँव की पीर कौन बिचारे
सघनकुंज की छाया को सब तरसे,
बृजवासी ही बृजभाषा को अब बिसरें
बृज की पीव सब गलिया खो गई,
बृजमण्डल में यमुना जी रो रर्ही
मलमूत गटर सब जामे मिल रहो
यमना की अकुलाहट न कोई सुन रहो ॥


(10)

***मैं हूँ इस देह की आत्मा **
न में शरीर हूँ , न ही हूँ आत्मा
किसका बसेरा है ,न जानू परमात्मा
न मैं प्राण हूँ , न प्राण है मेरा
न मैं शरीर हूँ ,न शरीर है मेरा
न मैं मन हूँ, न मन है मेरा
न मैं ज्ञान हूँ , न ज्ञान है मेरा
कौन हूँ में ,है मुझमें किसका बसेरा ?
मैं हूँ कर्ता ,यह मेरा अभिमान
मैं हूँ अकर्ता , कहता स्वाभिमान
मैं हूँ चैतन्य ,चैतन्य है मेरा
मैं हूँ नित्य, है नित्य का बसेरा ॥
मैं हूँ भोक्ता ,अभोक्ता भी हूँ
मैं हूँ साक्षी ,असाक्षी भी हूँ
मैं हूँ शांति , अशांति भी हूँ
मैं हूँ प्रकाश ,स्वम प्रकाश भी हूँ ॥
पीव है अस्तित्व , पीव परमात्मा
परम शाश्वत है , मैं हूँ इस देह की आत्मा ॥

(11)

***क्यों हुये डाक्टर लुटेरा एक समान***
ओ नाच जमूरे छमा-छम,

सुना बात पते की एकदम
हाथपैर में हड़कन होती है,

सर में गोले फूटे धमा-धम
आं छी जुकाम हुआ या

सीने में दर्द करे धड़ाधड़क,
छींकें गरजे तोपों सी या

खून नसों में फुदकें फुदकफुदक
मेरा जमूरा बतायेगा,

क्यों डाक्टर लूटेरा नहीं किसी से कम
सुन मेरे प्यारे सुकुमार जमूरे

तेरी बात लगे सही एकदम।
यह जुमूरा बतलाता है

एक डाक्टर और लूटेरे का तानाबाना
हे भाई तूने अपने डाक्टर को

क्या अब तक नहीं पहचाना है।
गौर से देख डाक्टर और

लुटेरे में एक समानता है
लुटेरा नकाब में मुंह छिपाये,

डाक्टर मास्क पहनता है
जान बचाना चाहो तो,

माल सारा बाहर निकालो
लुटेरे की इस धमकी से

झुकजाता है इंसान यारों।
जमूरा कहता है

जान की धमकी अब डाक्टर भी देता है
कईप्रकार के टेस्ट कराकर,

वह मरीज को लूट लेता है
लुटेरा हाथ में चाकू थामे,

और डाक्टर थामे छुरी
दोनों के हाथों लुटना ही हैें,

इंसान की किस्मत बुरी।
पेशा लुटेरे का खून से खेलना,

खेले खूनी घटनायें
खून खराबे से बचने,

लुटरे से सब लुट जाये।
जमूरा कह रहा

डाक्टर और लुटेरा दोनों एक समान
लुटेरा पहने नकाब,

मास्क सर्जन की पहचान
जान बचाना चाहते

धमकाना दोनों का काम
आदमी खुद ही लुट जाता,

दोनों को मिलते मुंहमाँगे दाम।
हथियार लुटेरे का चाकू,

डाक्टर के हाथ में छुरी
जान चली जाने के डर से,

दोनों की इच्छायें हो पूरी।
जमूरा बता रहा

डाक्टर और लुटेरा, दोनों एक समान
खून से खेलने का पेशा,

है लुटेरे ओर डाक्टर के नाम
धन के भूखें दोनों है,

डराना-धमकाना दोनों का काम
आज व्यापारी हुये डाक्टर,

मुनाफा कमाना इनका ईमान
पीव वैद्य सुसेण से कहाँ

मिलेंगे, पुकार रहा भारत का आवाम।

(12)

*** ये पत्रकार बड़े हैं ***

शहर में इनकी खूब चर्चा है
अतिक्रमण हटाने वाली टीम के
अधिकारियों से चलता खर्चा है।
ये शौकीनमिजाज है
सभी जगह खबू चरते-फिरते हैं
सांडों को इनपर नाज है।
ये सरकारों से बड़े है
इनका नाम खूब चलता है
ये सरदार बड़े है।
ये जो तंबूओं से तने बने है
नौकर इनके पढ़े लिखे हैं
ये अंदर ही अंदर जले भुने हैं।
ये दमदार है इनमें बड़ा दम है
बड़ा हाजमा है इन्हें सब हजम है
ये ऐसे वैसे नहीं छटी हुई रकम है।
कम नापना-तौलना इनका काम
ये नेता बड़े है लाँ पढ़े हैं
कम जाँचना-तौलना इनके नाम।
ये सोने के पलने में चान्दी से चलते हैं
इनके ओठों पर लाली,गाल गुलाबी हैं
ये साँझ ढ़लते ही गर्मी में मचलते है।
ये सायकल पर अटके कभी न भटके
खरे सिक्के से चलते रहे हैं
ये बिना पंख के है सभी से जरा हटके ।
ये दिखते गुुटके से है गजब लटके से
किसी पेटूबाला सा पेट मटका है
इनके अजूबेपन का देश में खटके है।
ये दिमाग गिरवी रखते है बुद्धिवंद है
अक्ल के दरवाजे सदा रखते बंद है
पीव खेलते-खाते ये रहते स्वच्छन्द है।
यहाँ के पत्रकार बहुमुखी है बहुमत से दूर
अखबार चैनलों के पीव ये है परिपोषक
निर्दन्दी है अपने अधिकार पाने मतिंमन्द भरपूर।

(13)

*** कब होगी सुख की भोर***

कह रहे है माता-पिता
अब जीवन कितना बाकी है
कब तक धड़केगा यह दिल
और कितनी साँसें बाकी है।
बेटा बहू पोता नहीं आते
ममता से धड़के छाती है।
बेटे से बतियाना कब होगा
मुश्किल से कटती दिन-राती है।
पोते को कंठ लगाने की
यह प्यास अभी तक बाकी है।
घर अपने बहू क्यों नहीं आये
ममता में कसर कौन सी बाकी है।
एक एक दिन दुख में बीतें
मौत गले लगाने को आती है।
हम दोनों आपस में बतियाते है
कैसे कैसे दिन जीवन में आयेंगे
क्या बेटे-बहू पोते के बीच
हम हॅसी खुशी से मिल पायेंगे।
व्यथा में डूबते और उतराते
हम सपने दोनों देख रहे है।
कोई ओर-छोर नहीं सुखका
हम सुख की भोर देख रहे है।
पीव जीवित रहते क्या पाया
यह माता-पिता बैठे सोच रहे है।
कब आयेगी परिवारमिलन की सुखद बेला
बच्चों से मिलन का स्वप्न देख रहे है।
माता-पिता जिंदगी दर्दभरा क्षोम है
वेदना है मन में गहरी और वे मौन है।
अगणित गाँठों से क्यों जीवन गाँठा, बेटे


कुर्सी की राजनीति में उलझी पत्रकारिता का हुआ चीरहरण

कौरवों की राजसभा में द्रौपदी को उसकी इच्छा के विरूद्घ लाया गया था जबकि वह रजस्वला थी और उसे परपुरूष द्वारा हाथ लगाना ही अपने आप में महापाप था, लेकिन भरी सभा मे उसे केश पकडक़र लाया गया और उसके चीरहरण की कोशिश की गयी। ऐसा ही होशंगाबाद जिला मुख्यायलय की पत्रकारिता के साथ हो रहा है? विधायिका का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला यही पत्रकार यहॉ होशंगाबाद में अपने दायित्व से हटकर कुर्सी की राजनीति में उलझकर रह गया है और पत्रकारिता का स्वयं बुरी तरह चीरहरण करने पर तुला है। प्रतिदिन अखवारों से पाठक घर बैठे जिन घटनाओं, सनसनीखेज खबरों, घोटालों, आयोजनों, कार्यक्रमों सूचनाओं और जानकारी को समाचारों के रूप में ताजातरीन पाता है वह बहुत कम सोच पाता होगा कि इन सच्चाईयों तक कैसे पहुँचा जा सकता है। देखा जाये तो वास्तविक रूप से अखबार समाज के मुँह की वह जीभ है, जो बत्तीस दॉतों की क्रूरताओं को चकमा देकर सच को सबके सामने उगागर कर देती है। लेकिन अब यहीं बातें यहॉ पत्रकारिता क्षैत्र में अदूरदर्शिता के कारण कुर्सी की आपसकी खींचतान के कारण विकास, स्वतंत्र एवं निष्पक्षता से कोसों दूर स्वार्थलिप्सा का आहार बन चुकी हैँ। यहॉ अब पत्रकारिता के दायित्व में साफ सुथरा और संतुलित परिपेक्ष्य गायब है और विशुद्घ रूप से यहॉ कलमकार लॅगड़ी,जनहित की दुश्मन, वैशाखियों का दामन थामे दिशाहीन राजनीति का दामन थामे चल रहा है।

जिला मुख्यालय होशंगाबाद मेें वर्ष 1999 के फरवरी माह में जिला प्रेस क्लब का गठन पत्रकारिता जगत के स्थापित और न्यूनतम आदर्शो के क्षितित को पाने वाले पत्रकारों के हितों की सुरक्षा एवं उन्हें संरक्षण देने के लिये किया गया था आज वहीं दो फाड़ हो गया है। इस संगठन के गठन,पंजीयन से लगायत अब तक कोई ऐसी ठोस रणनीति को अंजाम नहीं दिया गया जिससे कहा जा सकता हो कि जिला मुख्यालय के प्रेस जगत, आंचलिक या क्षैत्रीय पत्रकारों के हित में कोई ठोस निर्णय लिया जाकर उन्हें उसका लाभ प्रदान किया गया हो? जिले की तहसीलों में भी प्रेस क्लब है जो निरन्तर अपने सदस्यों को संरक्षण,सुविधा व जिला प्रशासन,शासन की ज्यादतियों के शिकार होने अथवा राजनीति के चंगुल में फॅसाये जाने पर अपने सदस्यों व पत्रकारों को एक सूत्र में बॉधे चलकर फलफूल रहे हैं और उनकी वृहद उपलब्धियॉ जो ऑकड़ों में आती है किन्तु इसके विपरीत होशंगाबाद में एड़ी-चोटी का बल लगाने के बाद प्रेस क्लब को जो प्रशासकीय स्तर पर कार्यालय उपलब्ध कराया गया उसकी देखरेख तक करने में यहॉ अक्षमता दिखी फिर जिले के प्रबुद्घ साहित्यकारों, इतिहास रचने वाले नगर के पत्रकारों, स्वतंत्रतासंग्राम सेनानियों व अन्य विधायों के मूर्तिमानों को स्मरण कर उनकी स्मृति में मील का पत्थर साबित किये जाने वाला कोई भी सराहनीय कार्य इनकी झोली मं नहीं है सिर्फ है तो आपस में एक दूसरे की छींटाकशी करने, एक दूसरे को नीचा दिखाने, एक दूसरे के सम्मान को ठेस पहुँचाने की दक्षता जरूर है जो अब राजनीतिक रूप लेकर कुर्सी की खींचातान में न्यायालय की शरण में पहुँची है।

पक्षपातों और पूर्वाग्रह की शिकार यहॉ की पत्रकारिता का अस्तित्व संकट में है और प्रेस संगठन में विवादास्पद बनी कुर्सी की खींचतान घातक हो गयी है। पत्रकारिता को चारागाह बनाने वाले छद्म पत्रकारों ने दूषित तत्वों को स्वीकार किया है और अपढ़,अयोग्य, अक्षम,कार्य-व्यवसाय में अवसरों का लाभ उठाने वाले लोगों की इस क्षैत्र में बाढ़ सी आयी है जो अच्छा-बुरा में भेद नहीं कर पाते है जबकि गुणात्मकता से जो इस क्षैत्र के स्तम्भ हैं उन्हें भुलाया जा चुका है अथवा उनके विरूद्घ षडय़ंत्रों के जाल बुने जाकर उन्हें शिकार बनाया गया है। इस जहरीली गलत परम्परा से पत्रकारिता शैया पर तीरों से भिदें भीष्म के समान कराह रही है। प्रेस संगठन का विवाद न्यायालय पहुँचना अच्छे संकेत नहीं कहे जा सकते हैï? वास्तविक रूप से संगठन के पद का यह द्वन्द राजनीति व प्रशासनिक महकमें में अपनी तूती बोलने, भ्रष्टïाचार के उजागर हुये प्रकरणों में निपटारा कर कुबेर बनने की दौड़ का हिस्सा माना जा रहा है पर किसी को भी पत्रकारिता के चीरहरण की चिंता नहीं है । तभी एक ही नाम से दो पृथक संगठनों में भ्रम,विवाद की स्थिति निर्मित की जाना इन प्रेस क्लब के संगठनकर्ताओं के गिरते प्रभाव व संगठन प्रमुख द्वारा सबकी अनसुनी करने का भी एक हिस्सा है जिसकी आवश्यकता नहीं थी। यहॉ प्रेस क्लब के वास्तविक संगठन को अपने उद्देश्यों के तहत पत्रकारों के हित संरक्षण में जुटकर एक मिसाल कायम करना थी ताकि पत्रकारों को एक बैनरतले किया जाकर संगठन को एक नई वृहद ऊॅचाईया प्रदान कर अपनी शक्ति को प्रकट करना था। विभिन्न असली-नकली प्रेस संगठनों में नाजायज घुस आये कथित पत्रकारों पर भी अंकुश लगाये जाने की आवश्यकता थी जो आधी-अधूरी रह गयी हैँ।म्हें अंतहीन घेरे में रखने वाला कौन है।

आत्माराम यादव पीव

काली मंदिर के पीछे ,आत्माराम यादव गली

ग्वालटोली होशंगाबाद मध्यप्रदेश

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: आत्माराम यादव पीव की रचनाएँ
आत्माराम यादव पीव की रचनाएँ
http://lh5.ggpht.com/-9XFrYi9BQT0/UUGcwqF134I/AAAAAAAAURo/_6xV8lj-GBs/image%25255B2%25255D.png?imgmax=200
http://lh5.ggpht.com/-9XFrYi9BQT0/UUGcwqF134I/AAAAAAAAURo/_6xV8lj-GBs/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=200
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2019/12/blog-post_62.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2019/12/blog-post_62.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content