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आत्माराम यादव पीव की रचनाएँ

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मेरे अंगना खेले बांके बिहारी रूनझुन रूनझुन बाजे पैजनिया खेले है कान्हा आज मेरे आगनियाँ । झुनक झुनक झुन बाजे करधनिया झोली खुशी से भर गयी ओ सा...

मेरे अंगना खेले बांके बिहारी

रूनझुन रूनझुन बाजे पैजनिया

खेले है कान्हा आज मेरे आगनियाँ ।

झुनक झुनक झुन बाजे करधनिया

झोली खुशी से भर गयी ओ साजनिया।।

उठता-गिरता कान्हा मुस्कुराता है

पैजनिया की रूनझुन से जी वो चुराता है।

लार टपकाता जग खजाना लुटाता है

रोने का बहाना कर खुद लूट जाता है।।

तिरछी सी चितवन से वह ठग लेता है

पीव गूंजती रून-झुन से जी भर देता है।

विश्व के रचयिता की लीला है न्यारी

मेरे अंगना खेले वह बांके बिहारी ।।

(2)

गजब का यह शौक

माना कि मिट्टी का बदन है,

मैं रहता हॅू उसमें सिमट कर ।

आया था खूब हंगामा हुआ,

जाऊॅगा खूब हंगामा कर।

इस जिस्म का क्या कहें,

यह भीड़ का साया हुआ।

हर पल सूरतें बदलती रही,

देखकर शर्मसार आईना हुआ।।

पागल है यह परिन्दा

जो तूफानों से लड़ रहा

देखकर साहस उसका

तूफानों ने रास्ता बदल लिया।

राह ऐसी कोई बनी नहीं,

जो खुदा के घर पहुचें

भीड़ के साथ चलकर,

हरेक दलदल में पहुंचे।

सर पटकते है नादान,

जानसका वह मौजी कोई

समन्दर उसकी मुट्ठी में,

भरमा सका न उसे कोई।।

पीव मिटकर भी इसलिये जिंदा है

जो गिर रहे थे उन्हें हमने संभाला है।

खून के आंसू पीना मरने को जीना

गजब का यह शौक हमने पाला है।।

(3)

नर्मदा की गोद

माँ के अमृतमयी जल से

पावनता पाकर

मैंने अपने जीवन में

सदा ही पायी है जय।

अब यह देह

माँ की गोद में रहकर तृप्त है

पीव आकांक्षी है

मिले माँ नर्मदा की गोद

जहाँ सभी को प्राप्त है

परम शांति साथ

चिरस्थायी विश्राम।।


दूरियां कौन मिटायेगा

मुझसे दूर रहकर, बेटे

तुझे चैन कैसे मिलता है

हरपल मुझसे दूर हो पर

मेरा ध्यान तुझी पर लगा रहता है।

हम अकेले बैचेन है सुखी नहीं

तू अकेले कैसे सुखी रहता है।

तुझे पाला-पोसा गोद में खिलाया

बगिया बसाई जहाँ तू रहता है।

हम बूढ़े है, बेबश है और बेसुध भी

खबर तुझे भी पर क्यों नहीं सुनता है।

बिधे हुये हो हृदय में अंदर तक

आशान्वित हॅू आओगे मन दिलाशा देता है।

मेरे देह की पहली प्रतिकृति तुम

आँखों में समाये दिल में तुम मेरे रहते हो।

पीव प्रतीक्षा की इंतहा कब होगी खत्म

देखें दूर रहते हुये, दूरियां कौन मिटाता है।


डाक्टरों के शोधप्रयोगों से रोगी मर जाता

सुन जमूरे आज भारत का,

हर इंसान चाहता है स्वस्थ्य काया

हो स्वस्थ्य जीवन हर व्यक्ति का,

न हो किसी बीमारी का साया।

सुरसा के मुख सा फैला हृदय रोग,

हर कोई इससे पीड़ित है

आहार प्रयोग विधि से सब रोग मिटे,

यह डाक्टर को विदित है।

रोग की गंभीरता और ब्लाकेज रोकना

है चिकित्सक का धर्म

पर पूर्ण स्वास्थ्य दे देगा तो

व्यवसाय चिकित्सक का होगा नर्म।

बीमारों की लम्बी लाईन लगाना

अब डाक्टरों का है काम

गंभीर बीमारी बतलाकर

यह खुशियां छीने तमाम।।

आज जमूरा खोलेगा,

डाक्टरों का कैसा है गोरखधंधा

कैसे शोषण होता है रोगी का

और कैसे चलता है मेडीकल धंधा।

ब्लाकेज रोकने का इलाज नहीं करते,

ये रोगी को मौत से डराते है

षड़यंत्री हुये अधिकांश हृदयविशेषज्ञ,

ये चीरफाड़ से ज्यादा कमाते है

कोई भी मरीज नहीं चाहेगा,

हृदयगति रूकने से हो उसकी मौत

पर हृदयगति पर रोक लगे कैसे ,

जानते डाक्टर ब्लाकेज रोकने का स़्त्रोत।।

कहता है जमूरा, सुन मेरे भाई,

हार्ट अस्पतालों का आंखो देखा हाल

सीने में दर्द उठते ही जब

रोगी हृदयविशेषज्ञ के पास जाता

तमाम जांच-परख के बाद

चिकित्सक यह फरमान सुनाता

एक मिनिट लेट हो जाते तो

मरीज को बचाना मुश्किल होता

मुहॅमागी फीस जमाकरवाने का

डाक्टर का चल जाता है यह मंत्र

हार्ट के आपरेशनफार्म की सहमति

डरे हुये सगे-संबंधी दे देते है तुरन्त

मरीज जाल में फॅस जाता है

सि़द्ध हुआ डाक्टर का अनैतिक षडंयंत्र

आपरेशन के बाद कितने साल जियेगा रोगी

कभी खोलता नहीं है डाक्टर यह रहस्य।

जमूरा कहता है जब तक सोती रहेगी सरकारें

तब तक नहीं होगी कभी भी इसपर बहस।

हृदय में छोटे से छोटे ब्लाकेज की,

क्यों की जाती है बाईपास सर्जरी

डाक्टर कहता जानलेवा ईलाज है,

फिर जान से क्यों खेल करें सर्जरी।।

सर्जरीकर डाक्टर मुनाफा कमाता,

और रोगी के प्राणों से खेल जाता

शोध-प्रयोग दवाओं के वह करता

पीव दुष्परिणामों से भले रोगी मर जाता।।

पलकों में आँसू छिपाकर

मुस्कुराना मुझे आ ही गया

गीत सुनने की चाहत न थी

सुनकर गीत गाना आ ही गया।

आंखो के आँसू धोकर

खुशी से मुस्कुराना आ ही गया।

भाई बहिन जैसे दो चुम्बकीय ध्रुव

हम सगे भाई-बहिन

कई सालों से

ऐसे रहते है

जैसे

जिन्दगी और मौत ।

जैसे ये दोनों

न अलग है

न ही मिल सके

ठीक वैसे ही जैसे

नदी के दो किनारें हो

या आकाश का छोर हो

पीव हम सगे भाई-बहिन के सम्बन्ध

दो चुम्बकीय ध्रुव की तरह

होकर रह गये हैं ?

मोहल्ले की रौनक आवारा कुत्ते

जैसे शहर के हर मोहल्ले में

मोहल्ले की हर गली में

और हर गली के

किसी सुनसान घर में

रहते हुये मिल जाता है

बीमार मरियल से कुत्ता

कुतिया और उसकी पलटन।

दिनभर गली के एक कोने से

दूसरे कौने में भागता रहता है

भूखा-प्योसा वह कुत्ता।

रोज रात गहराते ही

सबके सोने के बाद

वे न जाने क्या सुन लेते है

उन्हें क्या दिख जाता है

वे क्या सूंघ लेते है

भौंकते रहते हैं

किसी को सोने नहीं देते हैं।

मन करता है

इन कुत्ते का काम तमाम कर दू

और इत्मीनान से गहरी नींद सोऊ।

कभी कभी एक साथ

कई कुत्तों के भोंकने

और झगड़ने की आवाजें

बेचैन कर देती है

सभी को

फिर ख्याल आता है

छोड़ो उसे

जिसे एक रोटी भी नहीं खिलाई

फिर भी मोहल्ले में

रहने का फर्ज निभा रहे है

किसी अंजान कुत्ते ही नहीं

व्यक्ति के आने की सूचना

भौंककर सतर्क करते है

और कभी कभार

मोहल्लेवालों के लिये

लड़ पड़ते है अपने से बड़े कुत्ते से

और घायल होकर

काऊ-काऊ कर जख्मी हो जाते है

कोई भी उन बीमार कुत्ते का

इलाज नहीं कराता है

नींद में दखल देने के लिये

कुत्ते को मारना तो

सभी चाहते है पीव।

फिर छोड़ देते है यह कहकर

बिचारे मर जायेगे

तो इस मॅहगाई में

मुफ्त के चैकीदार कहा मिलेंगे

अपने ही स्वार्थ के रहते

हम सह जाते है इन कुत्तों का जुर्म

यह इत्मीनान करके

चलो इन कुत्तों को जिंदा रखें

ताकि पीव मोहल्ले की रौनक बनी रहे।


हम जो छले, छलते ही गये

15 अगस्त की वह सुबह तो आयी थी
जब विदेशी आंक्रान्ताओं से हमें
शेष भारत की बागड़ोर मिली
हम गुलाम थे, आजाद हुये
आजादी के समय भी हम छले गये थे
आज भी हम अपनों के हाथों छले जा रहे है।
भले आज हम आजादी में साँसे ले रहे है
पर यह कैसी आधी अधूरी आजादी ?
पहले अंगे्रेजों के जड़ाऊ महल बनाते थे
अब अपने ही तथाकथित नेताओं के
पिछलग्गू बने सैकड़ों हाथ मजदूर ही तो है?
तुम खुश हो विदेशियों की गुलामी से
तुम्हारें पूर्वज मुक्त हो गये है और
भारत आजाद देश हो गया है
पर यह भूल गये तुम्हारे पूर्वज गुलाम थे अंग्रेजों के
तुम भी गुलाम हो, अपनों के
तुम उन लोगों में हो जो कभी आजाद नहीं होते
तुम उन लोगों में हो जो गुलाम होकर भी नहीं होते
तुम्हारे तथाकथित अपनों ने
हजारों हाथों को तोड़ा है
हजारों कंधें इन्होंने उखाड़कर फैंके हैं
तुम सिर्फ मजदूर हो,मजबूर ही मरोंगे।।
तुम्हारे दादा मजदूर थे, तुम मजदूर हो
तुमने अपने माँ-बाप के साथ मजदूरी शुरू की
घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, गाँव छोड़ा
शहर की चकियाचैध में तुम बना रहे हो अटटालिका
तुम्हारी बेटी कब जवान हो जाती है
तुम्हारे बच्चे सड़कों पर, कचरेघरों में
तलाशते है अपना भविष्य।
टूट जाते है वे दो जून की रोटी के लिये
सड़कां के किनारें, बसस्टेण्ड या
रेल्वेस्टेशनों के कौने-कुचेरे में होता है
तुम्हारा बिस्तर,
तुम्हारी गुदड़ी में आवारा कुत्ते भी
हाड़ कपा देने वाली ठण्ड से बच जाते है।
कोई एक दो नहीं तुम करोड़ों में हो
जिनका कोई भविष्य नहीं है
तुम्हें 15 अगस्त की आजादी का पता नहीं
तुमने कभी नहीं देखी परेड़
तुम्हें कोई भी नहीं खिलाता मिठाई
तुम 15 अगस्त 26 जनवरी को भी
चहकते मिल जाते हो,सिर्फ इसलिये
उस दिन तुम तिरंगा बेचकर
दो जून की रोटी का जुगाड़करके
पीव समर्पित हो जाते हो बेगारी के लिये।।

(2)

***अंतरिक्ष में दफन होते शब्द****
रात की काली पलकें
जैसे आकाश ने मून्दी हो अलकें
भयाभय घनघोर काली है
मानों सारी अराजकता को समेटे
वसुन्धरा के लघुत्तम जीव से
सभी प्राणियों-वनस्पतियों के
उच्चारित शब्दों को
हृदय के भावों-पीड़ाओं कोे
अंतरिक्ष में दफन कर रही है।
ये शब्द इस धरा के
हर प्राणी के मुख से
सोते-जागते स्पन्दित है
एक चींटी की फुस्फुसाहट चीख से लेकर
एक भयाभय विशाल प्राणी की संवेदनाओं तक
अंकन करता है यह परमव्योम।
छोटी सी घास के तिनके या
लघुत्तम पौधे या पेड़ के पत्ते
अपनी टहनी से जब नोचे जाते है
तब घास और पौधे के भीषण दर्द को
वायु संवाहक बनकर
पहुंचाती है व्योम को
और यम के लेखे में
दर्ज होती है सबकी करनी।
धरती के प्रथम जीव,वनस्पति से लेकर
कोटिशः मानवों की तबसे
आज तक की संतति तक
यानि आपकी सभी पीड़ियों से आप तक
सभी की करूणा,दया,वेदना
प्रार्थना,दुआ-बददुआ या
दर्दभरी चीख की संवेदनाओं की सिसकिया
अंतरिक्ष में हुंकार मार रही है।
अंतरिक्ष का यह मायाजाल
अपनी संप्रभुता के साथ
सदियों से हर मनुष्य,प्राणी वनस्पति के
एक-एक स्वर,शब्द और वाणी का
संग्राहालय बना हुआ है
और उसके जन्म से मृत्यु तक के
एक-एक पल, एक एक क्षण की
गुंजित हर ध्वनि,किये गये
कर्म-अकर्म और विकर्म का साक्षी है
और पराजगत का प्रमाणित दस्तावेज।
आकाश के इन अमिट दस्तावेजों को
समय की परिधि से निकालकर
पुर्नजीवित करने का अज्ञेय ज्ञान
कभी प्रगट कर सकेगा इंसान
यह समय के चक्रपातों में उलझे
उसके विवेक के लिये पीव
काला अक्षर भैस के बराबर ही है।
शरीर मरता है ंशब्द नहीं मरते
खुद को जीवित रखने के लिये
कन्दराओं-पहाड़ों के शिखर पर
इंसान उकेर आता है
अपने नाम के शब्द और लकीरें
शब्द वैसे ही जीवित रहते है
जैसे जिस भाव से उपजते है
शब्द गाना,गाली,रोने धोने वाले
आर्तनाद, सिंहनाद लिये होते है।
जिसके मुख से ये शब्द निकले
शब्द निकालने वाला
उन शब्दों का पिता होता है।
मुख से शब्द निकलने पर
वैमनस्यी गाली-गलौच से लबरेज शब्द
परछाई की तरह अपने पिता के
पीछे अंतरिक्ष में मंडराते है
मरने के बाद भी वे अपने पिता को
खोजकर उनके सहचरी हो जाते है।
जो सार्थक प्रार्थनामयी शब्द होते है
वे शब्द अपने जन्मदाता को
चिर-परिचित आत्मीयता का
आभास कराते है
मानो आने वाले कल की संरचना
और दुनिया के निर्माण में
इन्हीं शब्दों की निधियाँ इनसे
पीव जगत संचालित करायेगी।


(3)

’’आदमी कौन है’’’
मैं भी हॅू आदमी,
तू भी है आदमी
आदमी आदमी है,
आदमी के लिये।
आदमी तब आदमी नहीं,
जब आदमी न हो
आदमी के लिये।
यह भी है आदमी
वह भी है आदमी
सभी है आदमी कहने के लिये।
आदमी की रात बीतती नहीं
आदमी की बात बीतती नहीं
आदमी है कमाल
कमाल का है आदमी।
बडा प्यासा है आदमी
बड़ा उदासा है आदमी
एकता से डरता आदमी
रंग देख ढंग बदलता आदमी
आदमी है चाटुकार
चाटुकार का है आदमी।
युग की पुकार है
आदमी से गुहार है
पीव जीवन का रस बहे
दुनिया में रहे ऐसे ही आदमी।

(4)
**वे अपने घर लौट आते है***
दिन उगता है रात उगती है
दिन ढ़लता है रात ढ़लती है
रात के हिस्से में अंधकार है
दिन के हिस्से में प्रकाश है
दिन और रात तय समय पर
रोज अपने घर लौट आते है।
सूरज उगता है सूरज ढलता है
पर चान्द न उगता है न ढ़लता है
चान्द घटता है और बढ़ता है
धरती प्रदक्षिणा करती है सूर्य की
चान्द प्रदक्षिणा करता है धरती की
धरती,सूर्य और चन्द्रमा तय समय पर
अपने परिवार से मिलने के लिये
वे अपने घर लौट आते है।
चान्द,सूर्य और धरती के कर्तव्यमार्ग पर
नियत समय पर अपने रिश्ते निभाना
पीव प्रकृति का एक पर्वोत्सव हो गया।

(5)

***बिना कहे सुने को झगड़ा***
न कुछ दिये
न कुछ लिये
आपस में भिड़़ लिये।
न कोई बात
न कोई मुलाकात
कानाफूँसी हुईं कान भर लिये।
न आपस में सोचा
न आपस में विचारा
घर की बात थी
कर लिया घर से किनारा।
डरते नहीं जान ले लेंगे
डरते नहीं जान दे देंगे
भाईयों के रक्त के प्यासे
पीव ये भाई है कैसे ?
जंगली जानवर हो जैसे ॥

(6)

यहाँ है सारे उत्कृष्ट गधे’’’
पुण्य सलिला के तट बसा, नगर होशंगाबाद
हितेश थुदगल बता रहे, है गधों से यह आबाद
बडे सहनशील सधे हुये, है यहाँ के सारे गधे
नपाध्यक्ष *खिलेश भले, कामों में ये रधे -सधे
उत्कृष्ट *खिलेशराज में, राज करें सभी गधे
वार्ड दो तीन हो या कोईभी, मौज करते यहाँ गधे
मारो-पीटो और सताओ, नहीं करते विरोध गधे
लोग धृष्टता करते है, पर शिष्टाचारी है गधे।
निकृष्ट न समझो थुदगल, यहाँ है सारे उत्कृष्ट गधे
पीव जगत गुण गाता,प्रशंसनीय है होशंगाबादी गधे।

(7)

’’’ ईश्वर को नौकर रख सकता है इंसान ’’
जिस दिन ईश्वर ने अपना वसीयतनामा
इंसान के नाम लिख दिया
इंसान ने खोद डाली सारी खदानें
सोना,चान्दी, हीरे-मौती
निकाल कर अपनी तिजौरी भर ली।
धरती की सारी सुरंगे
स्वार्थी इंसान ने खोज ली
और सारी तिजौरियों को
बहुमूल्य रत्न भण्डारों से भर ली।
उसने पहले नदियों के पानी को बेचा
नदियों के किनारों की रेत मिटटी को बेचा
वह अब जमीन के टुकड़े-टुकड़े बेच रहा है
वह हरे भरे पेड़-पौधों को बेच रहा है
वह जंगल-पहाड़ बेच रहा है
वह जिंदगी-मौत बेच रहा है
भगवान के मुफ्त दिये सारे उपहार
यह इंसान बेखौफ बेच रहा है।
ईश्वर की वसीयत इंसान को क्या मिली-
वह भूल गया है सारी इंसानियत
और सभी नदियों में सभी समुद्रों में
खुदकी नाव-जहाजें चलवाकर कमा रहा है।
आकाश में उड़ रहे है उसके विमान
वह कर रहा है देश का नेतृत्व
और उसके देश
प्रक्षेपात्र भेज रहे है अंतरिक्ष में।
इंसान इंसान ता न बन सका
पर वह व्यापारी बन गया है
और बेच रहा है
इस सृष्टि की सम्पूर्ण सम्पदा-
धरती,पहाड़ और आकाश
चन्द्रमा,सूर्य और प्रकाश
पद,प्रतिष्ठा और पदवी
मुक्ति,भोग और सादगी
इंसान ने धरती को
अपने कदमों में झुका लिया है।
ईश्वर की वसीयत पाकर
इंसान खुद को विलक्षण मान बैठा है
वह अपने मन में ईश्वर की
करूणा का अन्वेषण किये बिना
पीव अहंकार से भरा हुआ है
कि वह वसीयतकर्ता ईश्वर को
अब अपना नौकर रख सकता है।

(8)

छेदवाली नाव पर सवार पत्रकार’’’
मुद्दत से चली आ रही
पत्रकारिता की पुरानी
कई छिद्रवाली नाव पर
सवार है
मेरे शहर के तमाम पत्रकार
इस पुरानी नाव में
कुछ छेद
पार कर चुके लोगों ने
तो कुछ छेद
इस नाव पर सवार लोगों ने किये हैं।
इस पुरानी नाव को
चट्टानों के बीच
भयंकर तूफानों को
भी झेलना होता है
नदी का पानी तेजी से
मौत के रूप में नाव में घुस रहा है
और पत्रकार निश्चिंतता से
चैन की बंशी बजा रहे हैं।
इनका आचरण
स्वयं मृत्युवरण का है
पर दुनियावालों को
नाव पर सवार ये सभी पत्रकार
स्थिरता,निर्बाधता,शांति और संघर्ष की
पतवार खेते
नदी पार करते नजर आते हैं।
नाव पर सवार प्रायः अधिकांश पत्रकार
संकीर्णताओं में जकड़े स्वार्थ में अकड़े
खुदको सर्वोच्चता के
उच्चतम शिखर पर देख रहे हैं।
पत्रकारिता की सेकड़ों छिद्रवाली
पुरानी नौका को
अपनी बपौती समझने वाले लोग
अपने नये साथी को देखकर चैकते हैं
जैसे अचानक
गाँव का साँड
शहर में आ घुसा हो।
ये हर तरह से
अपने पैने नुकीले सींगें को
दिमाग के घटिया
षड़यंत्रों के कुतर्को को
अपने भारीभरकम
अनुभवों व दैत्याकार शरीर को
हथियार बनाकर निरूत्तर
कर देते है नवागतों को
नाव पर सवार सभी
गहरे जानी दुश्मन की तरह बैठे हुये है।
ग्रीष्म चूसकर जैसे
ऊर्जा को दग्ध कर देता है
कमजोर वृक्षों को जैसे
अंधड़ उखाड़ देता है
पौथीधारी ये अपने घर के
नबाव से जमे जकड़े है
दुनिया जाये भाड़ में
ये शराब कबाब पाकर अकड़े है
पीव सदा के लिये डूब जाये
यह नाव हमारी बला से
हम तो किनारे आ गये,
तुम मरो हमारी दुआ से।।

(9)

** ब्रज नहीं बचो कान्हा के समय जैसों***

(ब्रजदर्शन के बाद )
जे वृन्दावन धाम नहीं है वैसो,
कान्हा के समय रहो थो जैसो
समय बदलते सब बदले हाल
वृन्दावन हुओ अब बेहाल।
कान्हा ग्वालो संग गईया चराई,
वो जंगल अब रहो नहीं भाई
निधि वन सेवाकुंज बचो है,
राधाकृष्ण ने जहाँ रास रचो है।
खो गयी गलियाँ खो गये द्वारे,
नन्दगाँव की पीर कौन बिचारे
सघनकुंज की छाया को सब तरसे,
बृजवासी ही बृजभाषा को अब बिसरें
बृज की पीव सब गलिया खो गई,
बृजमण्डल में यमुना जी रो रर्ही
मलमूत गटर सब जामे मिल रहो
यमना की अकुलाहट न कोई सुन रहो ॥


(10)

***मैं हूँ इस देह की आत्मा **
न में शरीर हूँ , न ही हूँ आत्मा
किसका बसेरा है ,न जानू परमात्मा
न मैं प्राण हूँ , न प्राण है मेरा
न मैं शरीर हूँ ,न शरीर है मेरा
न मैं मन हूँ, न मन है मेरा
न मैं ज्ञान हूँ , न ज्ञान है मेरा
कौन हूँ में ,है मुझमें किसका बसेरा ?
मैं हूँ कर्ता ,यह मेरा अभिमान
मैं हूँ अकर्ता , कहता स्वाभिमान
मैं हूँ चैतन्य ,चैतन्य है मेरा
मैं हूँ नित्य, है नित्य का बसेरा ॥
मैं हूँ भोक्ता ,अभोक्ता भी हूँ
मैं हूँ साक्षी ,असाक्षी भी हूँ
मैं हूँ शांति , अशांति भी हूँ
मैं हूँ प्रकाश ,स्वम प्रकाश भी हूँ ॥
पीव है अस्तित्व , पीव परमात्मा
परम शाश्वत है , मैं हूँ इस देह की आत्मा ॥

(11)

***क्यों हुये डाक्टर लुटेरा एक समान***
ओ नाच जमूरे छमा-छम,

सुना बात पते की एकदम
हाथपैर में हड़कन होती है,

सर में गोले फूटे धमा-धम
आं छी जुकाम हुआ या

सीने में दर्द करे धड़ाधड़क,
छींकें गरजे तोपों सी या

खून नसों में फुदकें फुदकफुदक
मेरा जमूरा बतायेगा,

क्यों डाक्टर लूटेरा नहीं किसी से कम
सुन मेरे प्यारे सुकुमार जमूरे

तेरी बात लगे सही एकदम।
यह जुमूरा बतलाता है

एक डाक्टर और लूटेरे का तानाबाना
हे भाई तूने अपने डाक्टर को

क्या अब तक नहीं पहचाना है।
गौर से देख डाक्टर और

लुटेरे में एक समानता है
लुटेरा नकाब में मुंह छिपाये,

डाक्टर मास्क पहनता है
जान बचाना चाहो तो,

माल सारा बाहर निकालो
लुटेरे की इस धमकी से

झुकजाता है इंसान यारों।
जमूरा कहता है

जान की धमकी अब डाक्टर भी देता है
कईप्रकार के टेस्ट कराकर,

वह मरीज को लूट लेता है
लुटेरा हाथ में चाकू थामे,

और डाक्टर थामे छुरी
दोनों के हाथों लुटना ही हैें,

इंसान की किस्मत बुरी।
पेशा लुटेरे का खून से खेलना,

खेले खूनी घटनायें
खून खराबे से बचने,

लुटरे से सब लुट जाये।
जमूरा कह रहा

डाक्टर और लुटेरा दोनों एक समान
लुटेरा पहने नकाब,

मास्क सर्जन की पहचान
जान बचाना चाहते

धमकाना दोनों का काम
आदमी खुद ही लुट जाता,

दोनों को मिलते मुंहमाँगे दाम।
हथियार लुटेरे का चाकू,

डाक्टर के हाथ में छुरी
जान चली जाने के डर से,

दोनों की इच्छायें हो पूरी।
जमूरा बता रहा

डाक्टर और लुटेरा, दोनों एक समान
खून से खेलने का पेशा,

है लुटेरे ओर डाक्टर के नाम
धन के भूखें दोनों है,

डराना-धमकाना दोनों का काम
आज व्यापारी हुये डाक्टर,

मुनाफा कमाना इनका ईमान
पीव वैद्य सुसेण से कहाँ

मिलेंगे, पुकार रहा भारत का आवाम।

(12)

*** ये पत्रकार बड़े हैं ***

शहर में इनकी खूब चर्चा है
अतिक्रमण हटाने वाली टीम के
अधिकारियों से चलता खर्चा है।
ये शौकीनमिजाज है
सभी जगह खबू चरते-फिरते हैं
सांडों को इनपर नाज है।
ये सरकारों से बड़े है
इनका नाम खूब चलता है
ये सरदार बड़े है।
ये जो तंबूओं से तने बने है
नौकर इनके पढ़े लिखे हैं
ये अंदर ही अंदर जले भुने हैं।
ये दमदार है इनमें बड़ा दम है
बड़ा हाजमा है इन्हें सब हजम है
ये ऐसे वैसे नहीं छटी हुई रकम है।
कम नापना-तौलना इनका काम
ये नेता बड़े है लाँ पढ़े हैं
कम जाँचना-तौलना इनके नाम।
ये सोने के पलने में चान्दी से चलते हैं
इनके ओठों पर लाली,गाल गुलाबी हैं
ये साँझ ढ़लते ही गर्मी में मचलते है।
ये सायकल पर अटके कभी न भटके
खरे सिक्के से चलते रहे हैं
ये बिना पंख के है सभी से जरा हटके ।
ये दिखते गुुटके से है गजब लटके से
किसी पेटूबाला सा पेट मटका है
इनके अजूबेपन का देश में खटके है।
ये दिमाग गिरवी रखते है बुद्धिवंद है
अक्ल के दरवाजे सदा रखते बंद है
पीव खेलते-खाते ये रहते स्वच्छन्द है।
यहाँ के पत्रकार बहुमुखी है बहुमत से दूर
अखबार चैनलों के पीव ये है परिपोषक
निर्दन्दी है अपने अधिकार पाने मतिंमन्द भरपूर।

(13)

*** कब होगी सुख की भोर***

कह रहे है माता-पिता
अब जीवन कितना बाकी है
कब तक धड़केगा यह दिल
और कितनी साँसें बाकी है।
बेटा बहू पोता नहीं आते
ममता से धड़के छाती है।
बेटे से बतियाना कब होगा
मुश्किल से कटती दिन-राती है।
पोते को कंठ लगाने की
यह प्यास अभी तक बाकी है।
घर अपने बहू क्यों नहीं आये
ममता में कसर कौन सी बाकी है।
एक एक दिन दुख में बीतें
मौत गले लगाने को आती है।
हम दोनों आपस में बतियाते है
कैसे कैसे दिन जीवन में आयेंगे
क्या बेटे-बहू पोते के बीच
हम हॅसी खुशी से मिल पायेंगे।
व्यथा में डूबते और उतराते
हम सपने दोनों देख रहे है।
कोई ओर-छोर नहीं सुखका
हम सुख की भोर देख रहे है।
पीव जीवित रहते क्या पाया
यह माता-पिता बैठे सोच रहे है।
कब आयेगी परिवारमिलन की सुखद बेला
बच्चों से मिलन का स्वप्न देख रहे है।
माता-पिता जिंदगी दर्दभरा क्षोम है
वेदना है मन में गहरी और वे मौन है।
अगणित गाँठों से क्यों जीवन गाँठा, बेटे


कुर्सी की राजनीति में उलझी पत्रकारिता का हुआ चीरहरण

कौरवों की राजसभा में द्रौपदी को उसकी इच्छा के विरूद्घ लाया गया था जबकि वह रजस्वला थी और उसे परपुरूष द्वारा हाथ लगाना ही अपने आप में महापाप था, लेकिन भरी सभा मे उसे केश पकडक़र लाया गया और उसके चीरहरण की कोशिश की गयी। ऐसा ही होशंगाबाद जिला मुख्यायलय की पत्रकारिता के साथ हो रहा है? विधायिका का चौथा स्तम्भ कहलाने वाला यही पत्रकार यहॉ होशंगाबाद में अपने दायित्व से हटकर कुर्सी की राजनीति में उलझकर रह गया है और पत्रकारिता का स्वयं बुरी तरह चीरहरण करने पर तुला है। प्रतिदिन अखवारों से पाठक घर बैठे जिन घटनाओं, सनसनीखेज खबरों, घोटालों, आयोजनों, कार्यक्रमों सूचनाओं और जानकारी को समाचारों के रूप में ताजातरीन पाता है वह बहुत कम सोच पाता होगा कि इन सच्चाईयों तक कैसे पहुँचा जा सकता है। देखा जाये तो वास्तविक रूप से अखबार समाज के मुँह की वह जीभ है, जो बत्तीस दॉतों की क्रूरताओं को चकमा देकर सच को सबके सामने उगागर कर देती है। लेकिन अब यहीं बातें यहॉ पत्रकारिता क्षैत्र में अदूरदर्शिता के कारण कुर्सी की आपसकी खींचतान के कारण विकास, स्वतंत्र एवं निष्पक्षता से कोसों दूर स्वार्थलिप्सा का आहार बन चुकी हैँ। यहॉ अब पत्रकारिता के दायित्व में साफ सुथरा और संतुलित परिपेक्ष्य गायब है और विशुद्घ रूप से यहॉ कलमकार लॅगड़ी,जनहित की दुश्मन, वैशाखियों का दामन थामे दिशाहीन राजनीति का दामन थामे चल रहा है।

जिला मुख्यालय होशंगाबाद मेें वर्ष 1999 के फरवरी माह में जिला प्रेस क्लब का गठन पत्रकारिता जगत के स्थापित और न्यूनतम आदर्शो के क्षितित को पाने वाले पत्रकारों के हितों की सुरक्षा एवं उन्हें संरक्षण देने के लिये किया गया था आज वहीं दो फाड़ हो गया है। इस संगठन के गठन,पंजीयन से लगायत अब तक कोई ऐसी ठोस रणनीति को अंजाम नहीं दिया गया जिससे कहा जा सकता हो कि जिला मुख्यालय के प्रेस जगत, आंचलिक या क्षैत्रीय पत्रकारों के हित में कोई ठोस निर्णय लिया जाकर उन्हें उसका लाभ प्रदान किया गया हो? जिले की तहसीलों में भी प्रेस क्लब है जो निरन्तर अपने सदस्यों को संरक्षण,सुविधा व जिला प्रशासन,शासन की ज्यादतियों के शिकार होने अथवा राजनीति के चंगुल में फॅसाये जाने पर अपने सदस्यों व पत्रकारों को एक सूत्र में बॉधे चलकर फलफूल रहे हैं और उनकी वृहद उपलब्धियॉ जो ऑकड़ों में आती है किन्तु इसके विपरीत होशंगाबाद में एड़ी-चोटी का बल लगाने के बाद प्रेस क्लब को जो प्रशासकीय स्तर पर कार्यालय उपलब्ध कराया गया उसकी देखरेख तक करने में यहॉ अक्षमता दिखी फिर जिले के प्रबुद्घ साहित्यकारों, इतिहास रचने वाले नगर के पत्रकारों, स्वतंत्रतासंग्राम सेनानियों व अन्य विधायों के मूर्तिमानों को स्मरण कर उनकी स्मृति में मील का पत्थर साबित किये जाने वाला कोई भी सराहनीय कार्य इनकी झोली मं नहीं है सिर्फ है तो आपस में एक दूसरे की छींटाकशी करने, एक दूसरे को नीचा दिखाने, एक दूसरे के सम्मान को ठेस पहुँचाने की दक्षता जरूर है जो अब राजनीतिक रूप लेकर कुर्सी की खींचातान में न्यायालय की शरण में पहुँची है।

पक्षपातों और पूर्वाग्रह की शिकार यहॉ की पत्रकारिता का अस्तित्व संकट में है और प्रेस संगठन में विवादास्पद बनी कुर्सी की खींचतान घातक हो गयी है। पत्रकारिता को चारागाह बनाने वाले छद्म पत्रकारों ने दूषित तत्वों को स्वीकार किया है और अपढ़,अयोग्य, अक्षम,कार्य-व्यवसाय में अवसरों का लाभ उठाने वाले लोगों की इस क्षैत्र में बाढ़ सी आयी है जो अच्छा-बुरा में भेद नहीं कर पाते है जबकि गुणात्मकता से जो इस क्षैत्र के स्तम्भ हैं उन्हें भुलाया जा चुका है अथवा उनके विरूद्घ षडय़ंत्रों के जाल बुने जाकर उन्हें शिकार बनाया गया है। इस जहरीली गलत परम्परा से पत्रकारिता शैया पर तीरों से भिदें भीष्म के समान कराह रही है। प्रेस संगठन का विवाद न्यायालय पहुँचना अच्छे संकेत नहीं कहे जा सकते हैï? वास्तविक रूप से संगठन के पद का यह द्वन्द राजनीति व प्रशासनिक महकमें में अपनी तूती बोलने, भ्रष्टïाचार के उजागर हुये प्रकरणों में निपटारा कर कुबेर बनने की दौड़ का हिस्सा माना जा रहा है पर किसी को भी पत्रकारिता के चीरहरण की चिंता नहीं है । तभी एक ही नाम से दो पृथक संगठनों में भ्रम,विवाद की स्थिति निर्मित की जाना इन प्रेस क्लब के संगठनकर्ताओं के गिरते प्रभाव व संगठन प्रमुख द्वारा सबकी अनसुनी करने का भी एक हिस्सा है जिसकी आवश्यकता नहीं थी। यहॉ प्रेस क्लब के वास्तविक संगठन को अपने उद्देश्यों के तहत पत्रकारों के हित संरक्षण में जुटकर एक मिसाल कायम करना थी ताकि पत्रकारों को एक बैनरतले किया जाकर संगठन को एक नई वृहद ऊॅचाईया प्रदान कर अपनी शक्ति को प्रकट करना था। विभिन्न असली-नकली प्रेस संगठनों में नाजायज घुस आये कथित पत्रकारों पर भी अंकुश लगाये जाने की आवश्यकता थी जो आधी-अधूरी रह गयी हैँ।म्हें अंतहीन घेरे में रखने वाला कौन है।

आत्माराम यादव पीव

काली मंदिर के पीछे ,आत्माराम यादव गली

ग्वालटोली होशंगाबाद मध्यप्रदेश

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