नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

हाईटेक केयर - ज्ञानदेव मुकेश

 

हाईटेक केयर

  दयालजी अपने बेटे के पास गए हुए थे। वे रात में पहुंचे थे। उनका बेटा बैंगलोर में दो कमरे के एक फ्लैट में अकेला ही रहता था। अभी वह अविवाहित था।
   अगले दिन दयाल जी सुबह-सुबह ही उठ गए थे। उन्हें चाय की तलब हो रही थी। बेटा उस समय ड्राइंग रूम में सोफे पर अलसाया हुआ-सा अधलेटा था और सुबह-सुबह ही मोबाइल पर कुछ कर रहा था। दयाल जी एक कुर्सी खींचकर बेटे के सोफे के नजदीक आकर बैठ गए। उन्होंने बेटे से पूछा, ‘‘बेटा, रसोईघर में चाय-वाय का कोई इंतजाम है या नहीं ?’’
  बेटे ने मुरझाए हुए स्वर में कहा, ‘‘पापा, मैं चाय कहां लेता हूं।’’


  दयालजी दुखी हो गए। वे अपने पुराने दिन याद करने लगे, ‘वह क्या जमाना था। वे अपने माता-पिता का कितना खयाल रखते थे। माता-पिता जब उनके पास आने वाले होते तो वे काफी पहले से ही सभी आवश्यक चीजों का इंतजाम कर लेते थे। वे पिता को अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाते थे। पानी देते थे, खाना परोसते थे। मगर आज के बच्चों के बारे में क्या कहा जाए। ये अपनी ही दुनिया में भटके रहते हैं।’


  दयालजी यह सब सोच रहे थे, उधर बेटे की उंगलियां मोबाइल के स्क्रीन पर हरकतें करने में मशगूल थीं। तभी कॉल बेल बज उठी। दयालजी ने दरवाजा खोला। देखा, एक लड़का हाथ में पैकेट लिए खड़ा है। उसने वह सामान दयाल जी की तरफ बढ़ा दिया। वह बहुत सुन्दर पैकिंग थी और अंदर से भाप निकलता हुआ दिख रहा था। दयालजी चकराए। पैकिंग पर कुछ लिखा था। दयालजी ने पढ़ा। लिखा था, चायोज डॉट कॉम। दयालजी ने पूछा, बेटा, ‘‘यह क्या है ?’’


  बेटे ने कहा, ‘‘पापा, यह चाय है। मैंने अभी-अभी इसे ऑनलाइन बुक किया था।’’
  दयालजी हैरान रह गए। उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, मगर कप तो लाओ।’’
  बेटे ने कहा, ‘‘पापा, घर में कप भी कहां है ? देखिए, पैकिंग के अंदर कुछ कप भी होंगे।’’


  दयालजी ने पैकिंग खोल दिया। सचमुच अंदर कई पेपर कप थे। उन्होंने एक कप में चाय उड़ेला। खुशबूदार महक से हवा गुलजार हो गया। उन्होंने फौरन चाय सुड़कना शुरू कर दिया।
‘‘वाह ! क्या मसालेदार चाय है। मजा आ गया।’’ दयालजी अनायास बोल पड़े।


  वे चाय का आनंद लेते हुए बेटे की तरफ कृतज्ञता से देखने लगे थे। उन्हें लगा, उन्होंने अभी-अभी आज के बच्चों के बारे में जो सोचा, वह सही नहीं था। उन्हें याद आया कि बेटे ने ही टिकट बुक कर उन्हें वाह्टसएप किया था। उन्हें यह भी स्मरण आया कि कल रात बेटे ने ही घर बैठे उनके लिए एयरपोर्ट पर कैब भिजवाया था। उन्होंने मन-ही-मन स्वीकार किया कि आज के बच्चे भी पूरा खयाल रखते हैं। बस, तरीका बदल गया है।
                                                        -ज्ञानदेव मुकेश                                               
                                   पता-
                                               फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                               अल्पना मार्केट के पास,
                                               न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                पटना-800013 (बिहार)


e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.