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यथार्थ के साथ लघुकथा में संवेदना का होना जरूरी - प्रोफेसर बीएल आच्छा

यथार्थ के साथ लघुकथा में संवेदना का होना जरूरी - प्रोफेसर बीएल आच्छा

समकालीन लघुकथा लेखन पर चर्चा करते हुए क्षितिज संस्था के एक कार्यक्रम में चेन्नई से पधारे वरिष्ठ समालोचक एवं व्यंग्यकार प्रोफेसर बी.एल. आच्छा ने कहा कि, " सिर्फ यथार्थ का चित्रण लघुकथा नहीं होता। लघुकथा में संवेदना भी होना जरूरी है। लघुकथा लिखने के लिए जिंदगी के विभिन्न क्षेत्रों को अपने वृत्त के भीतर लाना जरूरी होता है और उसके लिए समय को देखने के साथ-साथ पढ़ना बहुत जरूरी होता है। लघुकथा में जब सरोकार पैदा होता है, तभी वह लोक से जुड़ पाती है। लघुकथा के पाठक को यह महसूस होना चाहिए कि इस लघुकथा में उसके जीवन की बात कही गई है, उसके आसपास की बात कही गई है। कहानी और लघुकथा में मूलतःयह फर्क हो जाता है कि, कहानी जितनी अंतर्मुखी होती है उतनी ही प्रभावी हो जाती है, जबकि अंतर्मुखी लघुकथा कमजोर होती है और बहिर्मुखी लघुकथा अधिक प्रभावशाली बनती है। जब लघुकथा भाव-प्रवण होकर कही जाती है तभी उसकी स्वीकार्यता बन पाती है। जब लघुकथाओं का श्रुत काल था, जब कथा को कहा सुना जाता था तब श्रोता बार-बार यह पूछता था, अच्छा उसके बाद क्या हुआ और कथा में से कथा उपजती चली जाती थी। आज के समय में पाठक लघुकथा को पढ़कर अपना स्वाद प्राप्त कर लेता है।

लघुकथा में कृत्रिमता नहीं होना चाहिए। हमारे आस पास के जो प्रतीक हम लेकर आते हैं, वह विश्वसनीय प्रतीक होना चाहिए। ऐसे प्रतीकों से सामान्य पाठक जो गाँव का या कम पढ़ा लिखा होता है, जब जुड़ा हुआ होता है तो उसकी लोक स्वीकार्यता बढ़ जाती है। ऐसे पाठक को लगता है कि इस कथा में उसकी बात कही गई है और बड़ी ताकत के साथ कही गई है, इसलिए उसका पाठक वर्ग बढ़ जाता है। एक फूल से जब कोई फल बनता है तब भी वह अपने आसपास एक वृत्त बनाता है और तभी फल भी बन पाता है। उसी प्रकार जब किसी लघुकथा का रचाव गढ़ा जाता है तब उसमें अलग-अलग मोड़, नया रंग आना जरूरी होता है, तभी पाठक उसके भीतर तक पहुँच पाता है और उसे न सिर्फ अपना लेता है अपितु उससे संदेश भी प्राप्त करता है, जो समाज के बदलाव के लिए जरूरी होता है। "

नगर की साहित्यिक संस्था क्षितिज के द्वारा आज चेन्नई से पधारे हुए वरिष्ठ लघुकथा समालोचक एवं व्यंगकार प्रोफेसर बी.एल. आच्छा का मोमेंटो भेंट कर सम्मान भी किया गया।

कार्यक्रम में सर्वश्री पुरुषोत्तम दुबे, सतीश राठी, दीपक गिरकर, राम मूरत राही उमेश नीमा, आदि ने अपना रचना पाठ किया एवं कार्यक्रम का संचालन संस्था अध्यक्ष सतीश राठी ने किया। आभार श्री दीपक गिरकर के द्वारा माना गया।

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