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फिल्म संपादन (Film Editing) - डॉ. विजय शिंदे

फिल्म संपादन (Film Editing)

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

फिल्म संपादन एक रचनात्मक और तकनीकी तरीका है। फिल्म निर्माण, शूटिंग, साउंड़ रिकॉर्डिंग, पृष्ठभूमि संगीत रिकॉर्डिंग के बाद फिल्मों का संपादन होता है। विभिन्न तकनीकों, कंप्यूटर सॉफ्टवेयरों के आधार पर फिल्मों का संपादन किया जा सकता है। आधुनिक टेक्नॉलॉजी का इतना अधिक विकास हो गया है कि संपादन में आसानी बनी है। अतः पहले इसके संपादन के लिए जितना समय लगता था उतना अब नहीं लग रहा है। आधुनिक तकनीकों के चलते फिल्मों में पहले से अधिक साफसुथरापन आ गया है। यह साफसुथरापन दृश्य और श्रव्य (वीड़ियो और ऑड़ियो) में देखा जा सकता है। फिलहाल फिल्मों को तेजी से संपादन करने के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जा रहा है।

फिल्म संपादक फिल्माए गए कच्चे दृश्यों और आवाजों के साथ काम करता है। फुटेज का चयन, शॉटस् और उनमें संयोजन तथा पहले दृश्य के खत्म होने के बाद दूसरे दृश्य का आरंभ तथा उन दोनों की विषय के साथ संगति बिठाकर गतिशीलता बनाए रखने की जिम्मेदारी संपादक की होती है। फिल्म संपादन कला और कौशल का अद्भुत मिलाप है। संपादकीय टेबल पर जब फिल्म आती है तब संपादक, निर्देशक, सहायक निर्देशक आदि महत्त्वपूर्ण लोगों के साथ बैठकर विविध शॉटों का चुनाव करता है और बाद में अपने कौशल, अभ्यास तथा ज्ञान के बल पर जोड़ने की प्रक्रिया शुरू करता है। इस प्रक्रिया को जोड़ते वक्त जितना कला और तकनीकी कार्य है उतना ही सृजनात्मक कार्य है। क्योंकि संपादक को साहित्य और फिल्मी कलाओं से परिचित होना पड़ता है, उसकी सूक्ष्मताओं से अवगत होना पड़ता है तथा सृजनप्रक्रिया से भी वाकिफ होना पड़ता है; तभी वह पटकथा और संवादों में पिरोयी गई कहानी को सुसूत्रता से जोड़ सकता है। फिल्म संपादन को अदृश्य कला के रूप में जाना जाता है । इसका कारण यह है कि वह पर्दे के पीछे रहकर फिल्म को अंजाम तक पहुंचाता है। संपादक आम तौर पर एक फिल्म के निर्माण में गतिशील भूमिका निभाते हैं। डिजिटल संपादन के आगमन के साथ फिल्म संपादन में गति आ गई है और एक संपादक की जगह पर अनेक संपादक फिल्मों में योगदान दे रहे हैं। वे अपने-अपने क्षेत्र के माहिर विद्वान होते हैं। चित्र संपादक केवल चित्रों का संपादन, ध्वनि संपादक केवल ध्वनि संपादन, संगीत संपादक संगीत का संपादन, दृश्य संपादक दृश्य संपादन करता है। यह सारे संपादकीय कार्य मुख्य संपादक के निर्देशों से होते हैं और अंत में निर्देशक के साथ बैठकर यह पूरी टीम दुबारा पूर्ण हो चुके संपादकीय कार्य का अवलोकन करती है। निर्देशक की मान्यता के बाद जोड़ने की प्रक्रिया शुरू होती है।

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फिल्म संपादन की मशीन और संपादकीय टेबल

1. संपादन क्या है?

संपादन का अर्थ है किसी लेख, पुस्तक, दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, कविता के पाठ, भाषा, भाव या क्रम को व्यवस्थित करके तथा आवश्यकतानुसार उसमें संशोधन, परिवर्तन या परिवर्धन करके उसे सार्वजनिक प्रयोग अथवा प्रकाशन के योग्य बना देना। लेख और पुस्तक के संपादन में भाषा, भाव तथा क्रम के साथ-साथ उसमें आए हुए तथ्य एवं पाठ का भी संशोधन और परिष्कार किया जाता है। इस परिष्करण की क्रिया में उचित शीर्षक या उपशीर्षक देकर, अध्याय का क्रम ठीक करके, व्याकरण की दृष्टि से भाषा सुधार कर, शैली और प्रभाव का सामंजस्य स्थापित करके, नाम, घटना, तिथि और प्रसंग का उचित योग देकर, आवश्यकतानुसार विषय, शब्द, वाक्य या उदाहरण बढ़ाकर, उद्धरण जोड़कर, नीचे पादटिप्पणी देकर सुबोध व्याख्या भी जोड़ दी जा सकती है। तात्पर्य यह है कि संपादन के द्वारा किसी भी लेख, पुस्तक या पत्र की सामग्री को उचित अनुपात, रूप, शैली और भाषा में इस प्रकार ढाल दिया जाता है कि वह जिस प्रकार के पाठकों के लिए उद्दिष्ट हो उन्हें वह प्रभावित कर सके, उनकी समझ में आ सके और उनके भावों, विचारों तथा भाषाबोध को परिमार्जित, सशक्त, प्रेरित और प्रबुद्ध कर सके तथा लेखकों का भी पथप्रदर्शन कर सके। (ई-संदर्भ) संपादन का यह आम अर्थ हो गया जो सीधे लिखित सामग्री के साथ जुड़ता है। फिल्मों भी इसी धरातल पर संपादन का कार्य होता है।

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व्यावसायिक संपादन केंद्र का एक दृश्य

फिल्में दृश्य और श्रव्य माध्यम है साथ ही इसमें पढ़ने योग्य भी थोड़ी-बहुत सामग्री होती है परंतु उसका उपयोग दृश्य और श्रव्य को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए किया जाता है। लिखित माध्यम और दृश्य माध्यम के संपादकीय अंगों में अंतर होता है। लिखित स्वरूप में उपलब्ध सामग्री का एक दृष्टि से संपादन आसान है। दृश्य-श्रव्य माध्यम का संपादन कार्य लिखित की तुलना में कठिन है परंतु इन संपादकों की सहायता हेतु आधुनिक संसाधन, तकनीक और कंप्यूटर मदत करता है। दृश्य का आरंभिक फिल्मांकन, संवाद का रिकॉर्डिंग, संगीत और गीत आदि प्रकार की श्रव्य सामग्री जब संपादकीय टेबल पर आती है तब इसमें से फिल्म की कथा-पटकथा के अनुकूल उचित दृश्य-श्रव्य सामग्री को एक क्रम से प्रभावशाली ढंग से काटकर जोड़ने की प्रक्रिया को फिल्मी संपादन कहा जाता है। ऐसी स्थिति में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि फिल्मों की कहानी अधिक प्रभावशाली बने, दर्शकों का मनोरंजन हो, दृश्यों के क्रम में सुसूत्रता हो और अखंड़ित फिल्म का निर्माण हो।

2. संपादन के चरण

फिल्में टी. वी. इंटरनेट, सिनेमाघर आदि जगहों पर प्रदर्शित होती है और इनके अनुकूल उनका होना भी जरूरी होता है। क्षेत्र व्यापक है और दर्शकों की संख्या तथा उसका वर्गीय विस्तार भी अधिक है। अतः इन सबके मांगों के हिसाब से दृश्य-श्रव्य संपादन तथा टेक्नॉलॉजी के हिसाब से उसकी सहज उपलब्धता होना अत्यंत आवश्यक है। यानी समय‚ माध्यम‚ दर्शक से इनकी मांग, मनोरंजन प्रियता और सिनेमा से अपेक्षा ही सिनेमा को अपड़ेट रखने‚ उसका उचित संयोजन करने और उसे बेहतर ढंग से सुसंपादित रूप में प्रस्तुत करने में मदद कर सकती है। आगे चलकर सिनेमा प्रौद्योगिकी (टेक्नॉलॉजी) में कई नए परिवर्तन होते रहेंगे और उसके साथ संपादकीय तकनीकी कौशल भी बदलते रहेंगे। फिलहाल उपलब्ध साधन-सामग्री और कौशलों के आधार पर फिल्मों के तीन संपादकीय चरणों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वह हैं –

अ. दृश्य-श्रव्य सामग्री का चयन और उसका क्रम,

आ. दृश्य सामग्री के रंग और श्रव्य सामग्री का भाषाई सौंदर्य,

इ. प्रस्तुतिकरण।

यह तीनों काम परस्पर संबद्ध हैं‚ और इनमें बेहतर तालमेल से ही बेहतर संपादन कार्य किया जा सकता है। फिल्में व्यवसाय है और मनोरंजन का आधार बनाकर इसे बड़ी सफलता के साथ पूरा किया जाता है। परंतु संपादन करते वक्त एक बात यह भी ध्यान रखनी चाहिए कि वे मात्र व्यवसाय नहीं है उसमें कलात्मकता भी है और उसका सौंदर्य उसी में निहित है। अगर इस सौंदर्य को फिल्म संपादक बनाए रखता है तो फिल्मों के भविष्य को भी सुरक्षित करता है। संपादकीय जिम्मेदारी बहुत नाजुक और महीन कार्य है। फिल्मों को बनाने के लिए हजारों लोगों के हाथ लगे होते हैं, अतः संपादकीय कौशल विविध चरणों से होकर सौंदर्य को चयन करने, उसे पकड़ने और प्रस्तुत करने में सफल होता है तो यह सबकी सफलता माना जाता है, साथ ही सबके आत्मविश्वास को भी बढ़ावा देता है।

3. फिल्म संपादन के प्रमुख प्रकार

सिनेमा दृश्य और श्रव्य माध्यम है। दर्शक देखकर और सुनकर इसका आनंद लेता है। देखने और सुनने की प्रक्रियाएं एक साथ होती है और उसे अपेक्षा होती है कि इन दो माध्यमों से जो फिल्म उसके सामने उपस्थित है वह तकनीकी तौर पर और सौंदर्यात्मक रूप से भी लबालब भरी हो। दर्शक इनमें से एक भी कमजोरी बर्दाश्त नहीं कर सकता है। दर्शकों की अपेक्षा में न उतरने का मतलब है फिल्म का आर्थिक घाटे में जाना। कोई सिनेमा निर्माता आर्थिक घाटा उठाने की मनस्थिति में नहीं होता है। अतः फिल्मों के संपादन के दौरान विशेष ध्यान रखा जाता है और कोई नए प्रयोग नहीं होते हैं। अगर कोई प्रयोग करना ही है तो अचानक नहीं किया जाता है, धीरे-धीरे संभलकर किए जाते हैं। दर्शक बहुत मुड़ी होते हैं वे कौनसी फिल्म को सर पर उठाएंगे और कौनसी फिल्म को पटक देंगे इसका भरौसा नहीं होता है। फिल्म संपादन पूरा होने के बाद भी अगर निर्देशक को लग रहा है कि कुछ प्रसंग छूट चुके हैं या कहीं कमजोरियां रही हैं तो वे उन प्रसगों पर दुबारा काम करते हैं। अगर आवश्यकता हो तो उन दृश्यों और ध्वनियों पर दुबारा काम भी किया जाता है। मूलतः फिल्मों का दृश्य (Video) और श्रव्य (Audio) रूप में संपादन कार्य होता है।

3.1 श्रव्य संपादन (Audio Editing)

जिस संपादन के भीतर आवाज (ध्वनि) का संपादन कार्य होता है उसे श्रव्य संपादन कहा जाता है। इस कार्य के दौरान रिकॉर्ड की गई आवाजों को साफ करना, गलतियों को दुरुस्त करना, विविध साउंड़ ट्रॅक बनाना, पृष्ठभूमि संगीत के साथ आवाजों को जोड़ना, गीतों को जोड़ना, दृश्यों के अनुरूप ध्वनि का मिलाप करना आदि कार्य किया जाता है और सबसे अंत में इन सारी संपादित ध्वनियों को पूरी फिल्म के साथ जोड़ा भी जाता है।

3.2 दृश्य संपादन (Video Editing)

वीड़ियो संपादन वह प्रक्रिया है जिसमें हम एक आम कॅमरे से ली गई सामान्य-सी लगनेवाली वीड़ियो को भी रंग, रूप, आकार आदि के प्रभाव डाल कर आकर्षक बनाते हैं। आज कल ये कार्य कंप्यूटर की सहायता से किया जाता है। सामान्यतः एक कंप्यूटर, कॅमकॉर्डर, एक डेटा केबल और एड़िटिंग सॉफ्टवेयर की सहायता से किया जा सकता है। पिनाकल, केनोपस एड़ियस, वेगास, आदि प्रोफेश्नल सॉफ्टवेयर की सहायता से दृश्य संपादन आसान हो जाता है।

4. फिल्म संपादन प्रक्रिया

पीछे लिखा है कि फिल्मों का संपादन एक प्रकार से तकनीकी कार्य है और इस कार्य में जितनी वैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता है उतना ही संपादकों का सौंदर्यात्मक दृष्टिकोण व्यापक होना चाहिए। फिल्म संपादन विविध चरणों के तहत चलनेवाली एक प्रक्रिया है। फिल्मों के पूरा होने के बाद ही यह प्रक्रिया पूर्ण होती है। इस प्रक्रिया में संपादक और निर्देशक अहं भूमिका निभाते हैं। पटकथा, कहानी, संवाद और अभिनय का परिपूर्ण मिलन करने का कार्य इन्हीं का होता है। बीस-बाईस घंटों में बनी फिल्म को दो-तीन घंटों की बनाते वक्त उसमें अनेक कट लग जाते हैं। कभी-कभार पात्रों को पूरी फिल्म देखने के बाद बहुत आश्चर्य होता है कि अपनी भूमिका को बहुत ज्यादा कट किया है। यह हादसे मुख्य अभिनेताओं के साथ नहीं तो सहायक और गौन पात्रों के साथ हमेशा होते हैं।

4.1 संपादकीय कट

संपादकीय कट के दौरान संपादक उसके टेबल पर मौजूद दृश्य फिल्म और श्रव्य फिल्म के केवल मिलाप का ही काम नहीं करता है तो उसकी जिम्मेदारी यह होती है कि बहुत अच्छे दृश्य-श्रव्य प्रसंगों को चुनना और उसे कट करना भी है। फिल्म संपादक दृश्यों को चुनते वक्त फिल्म निर्देशक के साथ हमेशा विचार-विमर्श करता है और चुनिंदा दृश्यों को चुनकर विभिन्न प्रकार के जब कट बनाता है तब उसे संपादकीय कट कहा जाता है। परंतु यह ध्यान रखना चाहिए कि उसका प्रस्तुत कार्य अंतिम नहीं होता।

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दृश्यों के संपादन का निरीक्षण

4.2 निर्देशकीय कट

संपादकीय कट के बाद फिल्म निर्देशक उन दृश्यों का अवलोकन करता है। वह कहानी, पटकथा और संवादों से जुड़ा होता है साथ ही सारी फिल्म के दृश्य उसके अनुमति के बाद ही शूट किए होते हैं उसे पता होता है कि कौनसे दृश्य अच्छे बने हैं और कौनसे प्रसंग अच्छे हैं। उसकी निर्देशक के नाते नजर पक्की होती है और संपादक से छूट चुके दृश्यों को निर्देशक कट करवाता है।

4.3 अंतिम कट

संपादकीय और निर्देशकीय कट पूरा होने के बाद दुबारा पूरी संपादकीय टीम निर्देशक के साथ बैठकर सारे फिल्माए गए दृश्यों को देखती है कि कहीं ऐसे दृश्य तो नहीं कि जो दोनों के नजरों से छूट चुके हो। अगर ऐसे दृश्य है तो उन्हें अंतिम कट के तहत छाटकर अलग निकाला जाता है।

4.4 निरंतरता

फिल्मों में कथा, पटकथा, संवाद और अभिनय अत्यंत अहं होते हैं। फिल्म के सारे संपादकीय कटों को नोट किया जाता है और उसके साथ समय का कोड़िंग होता है। दृश्य और श्रव्य को इस कोड़िंग के सहारे एक दूसरे के साथ मिलाकर निरंतरता लाई जाती है। मूल कहानी पटकथा, संवाद और अभिनय की निरंतरता का भी संपादन प्रक्रिया के भीतर ध्यान रखा जाता है। तकनीकी तौर पर निरंतरता की जिम्मेदारी स्क्रिप्ट पर्यवेक्षक और फिल्म निर्देशक की होती है।

5. वीड़ियो संपादन सॉफ्टवेयर

आजकल बाजार में आधुनिक वीड़ियो संपादन के सॉफ्टवेयर मिल जाते हैं। नई तकनीक और नए अस्त्रों के साथ लदे यह सॉफ्टवेयर फिल्म प्रौद्योगिकी के लिए देन हैं। बिल्कुल कम समय में वीड़ियो और ऑड़ियो संपादन करने की क्षमता रखते हैं। परंतु इसे भी जानना जरूरी है कि इनका इस्तेमाल कैसे किया जाए। किसी के पास कॅमरा होने से कोई अच्छी तस्वीरें नहीं निकाल सकता या किसी के पास कलम होने से कोई कहानी नहीं लिख सकता बिल्कुल वैसे ही सॉफ्टवेयर होने से सीधे फिल्म संपादक नहीं बन सकता। फिल्म संपादक की सूक्ष्मताएं, तकनीक, कौशल, ज्ञान, सौंदर्यदृष्टि, कलाकारिता अगर किसी के पास हो और उसके साथ संपन्न अनुभव हो तो ही फिल्म संपादन किया जा सकता है। इंटरनेट पर कई सारे मुफ्त और बिक्री के लिए फिल्म संपादक सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं। आमतौर पर इन सॉफ्टवेयरों से दृश्य को साफ करना, ध्वनि साफ करना, दृश्य और ध्वनि में कट लगाना और जहां जरूरी है वहां जोड़ना, साउंड़ ट्रॅक जोड़ना, शीर्षक संपादन, लिखित सामग्री को प्रभावशाली बनाना, ऍनिमेशन, वीड़ियो आयात और निर्यात करना, खींचना और ड्रॉप करना, डिजाइन करना, छवि संपादन करना, डिस्क संपादन करना, एकल वीड़ियो और डबल ऑड़ियो ट्रॅक बनाना, थ्री डी इफेक्ट देना, कलर ग्रेड़िंग करना, स्लाईड़ शो करना, डीवीड़ी लेआउट और डिजाइन करना, रेखीय प्रदर्शन करना, टाईम कोड़िंग करना आदि कामों को अंजाम देने के लिए उपयोग होता है।

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कुछ चुनिंदा सॉफ्टवेयरों के नाम निम्नानुसार बताए जा सकते हैं –

  • AVS वीड़ियो संपादक
  • Last Cut Pro
  • सोनी वेगास फिल्म स्टूड़ियो
  • Lightworks
  • सोनी वेगास प्रो
  • सिनलेरा
  • Pinnacle Studio
  • कोरल वीड़ियो स्टूड़ियो
  • iMovie वीड़ियो संपादक
  • एड़ोब प्रीमियर समर्थक
  • Pitivi वीड़ियो संपादक
  • Cyberlink Power Director
  • Kdenlive
  • ivsEdits
  • विंड़ोज़ मूवी मेकर
  • ConoaEasyFX
  • WLM प्लस Loudness
  • Gen Arts
  • AVX

6. फिल्म संपादन की पढ़ाई

फिल्म संपादन रोजगार का नवीन क्षेत्र है। आजकल सिनेमा और धारावाहिक रूपांतरों का बहुत अधिक प्रचलन है और साथ ही विविध टी. वी. चॅनल्स भी है जहां पर फिल्म संपादकों की जरूरत होती है। आपके पास जरूरी अंग्रेजी, अच्छी हिंदी और कंप्यूटर का ज्ञान हो तो अच्छे संपादक बन सकते हैं। इसका बेसिक कोर्स पूरा करने के बाद आपके पास फिल्मों के संपादकीय कौशल की निपुणता आ सकती है। किसी भी विषय से स्नातक होने के उपरांत आप फिल्म संपादन का कोर्स कर सकते हैं। ‘दि फिल्म एंड़ टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंड़िया पूना, सत्यजीत रे फिल्म एंड़ टेलीविजन इंस्टीट्यूट कोलकाता, सिम्बायोसिस इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन पूना आदि जगहों पर फिल्म संपादन के कोर्स चलाए जा रहे हैं। आप अगर उत्सुक है तो इंटरनेट पर फिल्म संपादन कोर्स चलानेवाले केंद्रों से परिचित हो सकते हैं। यह सूचना और प्रौद्योगिकी के जमाने में रोजगार उपलब्ध कराने का बहुत बड़ा क्षेत्र है। परंपरागत क्षेत्रों को छोड़कर नए क्षेत्र में प्रवेश करना है तो ऐसे क्षेत्रों का चुनाव किया जा सकता है।

सारांश

फिल्म के दृश्यों का फिल्मांकन और ऑड़ियो का रिकॉर्डिंग होने के बाद अगली प्रक्रिया के नाते संपादन प्रक्रिया को देखा जाता है। पहले दृश्य संपादन और फिर उसके अनुरूप ध्वनि का संपादन होता है। यह एक निरंतर और लंबी चनेवाली प्रक्रिया है। फिल्मों के संपादकों के पास वैज्ञानिक ज्ञान के साथ तकनीकी और सृजनात्मक नजरिया होना चाहिए। फिल्म बनाना सृजन का कार्य है और इस सृजनात्मक निर्मिति के सौंदर्य स्थलों को पकड़ना, इकठ्ठा करना और एक क्रम में सजाना संपादक का दायित्व होता है। फिल्मों के आरंभिक दौर में किसी भी प्रकार के संपादन को अंजाम तक लेकर जाना बहुत अधिक मुश्किल कार्य था। लेकिन अब आधुनिक तकनीकों कंप्यूटर के भीतर विकसित प्रोग्रॅमों तथा मौजूद सॉफ्टवेयरों के चलते यह कार्य आसान बन चुका है। आधुनिक तकनीक के कारण फिल्मों में संपादकीय साफसुथरापन आ चुका है तथा दृश्यों और ध्वनियों की स्तरीयता भी बढ़ चुकी है।

भारत में और विदेशों में जिस प्रकार से फिल्में और धारावाहिकों का निर्माण हो रहा है उसके देखते हुए कहा जा सकता है कि फिल्म संपादन के क्षेत्र में रोजगार के बहुत अधिक मौकें बढ़ गए हैं। फिल्म संपादन का कार्य जितना तकनीकी है उतना ही सृजनात्मक है। जो लोग नवनिर्माण और विज्ञान के क्षेत्र में अधिक रुचि रखते हैं, उनके लिए यह पसंदिता कार्य साबित हो सकता है। फिल्मों का संपादन करना संपादकों के लिए पर्दे के पीछे का कार्य है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. कॅमरा मेरी तीसरी आंख – राधू करमाकर (अनु. विनोद दास), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम 2010.
  2. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.
  3. सिनेमा : कल, आज, कल – विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006.
  4. सिनेमा की सोच – अजय ब्रह्मात्मज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2006, आवृत्ति 2013.
  5. हिंदी साहित्य कोश भाग 1, पारिभाषिक शब्दावली – (प्र. सं.) धीरेंद्र वर्मा, ज्ञानमंड़ल लि. वाराणसी, तृतीय संस्करण, 1985.
  6. हिंदी सिनेमा दुनिया से अलग दुनिया – (सं) गीताश्री, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2014.

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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