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बैगा जनजाति की लोक कथाएँ - 4. जादूवाली अंगूठी - डॉ.विजय चौरसिया

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4. जादूवाली अंगूठी डा.विजय चौरसिया एक राज्य में एक राजा राज्य करता था। मैं न तो राजा का नाम जानता हूं न उस नगर का नाम जहां वह राज्य करता था ...

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4. जादूवाली अंगूठी

डा.विजय चौरसिया

एक राज्य में एक राजा राज्य करता था। मैं न तो राजा का नाम जानता हूं न उस नगर का नाम जहां वह राज्य करता था पर मैं उसके दोस्त का नाम जानता हूं जो धुर्वा दवार बैगा था। उसका दवार बैगा दोस्त अच्छा नाचने गाने वाला था। इसलिए राजा ने उससे दूसरे गांव में जाकर सैला नाचने के लिए कहा! तो बैगा ने कहा राजा जी मेरे पास इस समय पहनने के लिए अच्छे कपड़े नहीं हैं। तब राजा ने कहा मैं तुमको कपड़े उधार में दे दूंगा। तब राजा ने अपने लड़का के कपड़ों में से धोती, फैंटा, कमीज और नाचने वाला जामा दे दिया। इसके साथ ही राजा ने उसे सोना और चांदी के गहने भी पहनने के लिए दे दिए। इस प्रकार से सज - धज कर राजा और उसका दोस्त सैला नाचने दूसरे राज्य में चले गये।

राजा अपने मित्र के साथ दूसरे नगर में जाकर सैला नृत्य करने लगा। सुंदर वस्त्रों में बैगा ऐसा नृत्य करने लगा कि उस राज्य के राजा की दो लड़कियां उसके नृत्य की प्रशंसा करने लगीं। उन लड़कियों ने राजा से पूछा : यह कौन राजा है! जो इतना अच्छा नृत्य कर रहा है। हम लोगों ने तो इसे पहले नहीं देखा था। राजा उन लड़कियों को यह बताना नहीं चाह रहा था कि यह उनका दोस्त है और उसे राजा ने पहनने के लिए उधार कपड़े दिए हैं। तब राजा ने कहा कि यह मेरा भाई है। तब राजा की बेटी ने पूछाः क्या यह जन्म से तुम्हारा भाई है। तब राजा ने कहा हां जन्म से यह मेरा भाई है। फिर से राजा की बेटी ने पूछा यह तुम्हारा बड़ा भाई है कि छोटा भाई! राजा ने कहाः यह मेरा छोटा भाई है।

तब राजा की दोनों बेटियां राजा के साथ भागने का विचार करने लगीं। बड़ी बहन ने राजा को पसंद किया और छोटी बहन ने राजा के दोस्त को। जो उसे राजा का छोटा भाई समझती थी। बहुत देर तक नाचने के बाद राजा के दोस्त के शरीर से पसीना निकलने लगा। तो उसने कहा मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूं। तब सभी नाचने वाले भी नदी में स्नान करने चल देते हैं। जब बैगा ने देखा कि सभी नाचने वाले उसी घाट में स्नान करने आ रहे हैं। तो वह स्नान करने ऊपर वाले घाट में चला गया। राजा भी उसके साथ एक सुनसान घाट पर स्नान करने चले गये और वहां पर स्नान किया। उसी समय राजा की दोनों बेटियां राजा और उसके भाई के लिए भोजन लेकर आ गई। राजा और उस बैगा ने भोजन किया। इसके बाद उस राज्य के राजा की बेटियों ने राजा और उसके भाई के साथ भागने की सोची।

बड़ी बहन ने राजा और उसकी छोटी बहन ने बैगा जिसे वह राजा का छोटा भाई समझती थीं। उनके साथ वहां से भाग गईं।

जब दोनों बहनें राजा के नगर में पहुंची तो दोनों बहनों ने नगर के बाहर एक झोपड़ी देखी। बैगा ने कहा यही मेरा घर है। राजा की छोटी बेटी यह देखकर घबड़ा गई और कहने लगी यह झोपड़ी तुम्हारा घर है। नहीं ऐसा नहीं हो सकता! यह तो बगीचा के रखवाले की झोपड़ी लगती है। तब बैगा ने कहा : सही में यह मेरा ही घर है। मैं तो एक गरीब बैगा हूं। मैं राजा का भाई नहीं हूं। राजा की बेटी ने अपने मन में कहा : अब मैं कैसा करुं। क्या मैं अभी अपने घर वापस भाग जाऊं। क्योंकि मेरे पिताजी तो बहुत नाराज होंगे! क्योंकि मैं एक बैगा के साथ भाग कर आ गई हूं। ऐसा सोचकर अपने पिताजी के डर के कारण वह उस बैगा के साथ ही अपना जीवन बिताने की सोचने लगी। राज अपनी नई पत्नी के साथ राजमहल में चला गया। कुछ दिन बाद राजा ने उस बैगा से उधार दिये कपड़े वापस करने के लिए कहा! बैगा ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और एक लंगोटी लगा ली और राजा के कपड़े वापस कर दिए। जब राजा की बेटी ने अपने पति को बिना कपड़ों के देखा तो उसने कहा : तुम्हारे कपड़े कहां गए। तुम लंगोटी लगा कर ऐसे नंगे होकर यहां वहां घूमोगे! तो तुमको शर्म नहीं लगेगी। तब बैगा ने कहा मेरे पास दूसरे कपड़े नहीं हैं। मैंने जो कपड़े पहने थे ! वे राजा के थे उसे मैंने लौटा दिये हैं।

राजा की बेटी ने अपने मन में कहा : यह मैंने कैसा पति पाया है। राजा की बेटी उस बैगा की झोपड़ी के अंदर गई! ते देखा उसके घर में कुछ भी नहीं है। उसकी झोपड़ी में खाना बनाने का समान भी नहीं था। उसने अपने पति से कहा मैं क्या खाना बनाऊं! तुम्हारे घर में तो एक भी राशन नहीं है। बैगा ने कहा तुम बिलकुल चिंता मत करो। मैं अभी राजा के घर जाकर थोड़ा सा आटा मांग कर लाता हूं। इसके बाद वह राजमहल गया और ढ़ेर सारा भोजन का समान लेकर आ गया। राजा की बेटी ने भोजन तैयार किया और उस बैगा से कहा भोजन बन गया है भोजन कर लो! उस बैगा ने कहा : पहले तुम भोजन कर लो मैं बाद में खा लूंगा। तो राजा की बेटी ने कहा मैं पहले कैसे खा सकती हूं। मैं तुम्हारी पत्नी हूं। पहले आप भोजन कर लें। अंत में बैगा पहले खाना खाने बैठ गया।

वह राजा की बेटी के सामने बैठकर खाना खाने में शर्मा रहा था। उसने एक दो कौर भोजन किया और उठकर बाहर चला गया। राजा की बेटी ने भर पेट भोजन किया। इसके बाद राजा की बेटी ने अपने पति से कहाः तुम एक लंगोटी लगाकर यहां - वहां घूम रहे हो ! यह मुझे अच्छा नहीं लगता। तुम यह दो रुपया लो और अपने लिए अच्छे कपड़े ले आओ। बैगा उस दो रुपया को लेकर बाजार गया पर उसे दो रुपया में पूरे कपड़े नहीं मिले। तब वह बिना कपड़ा लिए खाली हाथ घर वापस लौटने लगा। जब बैगा वापस अपने घर में आया तो उसकी पत्नि ने पूछा : कहां है तुम्हारी धोती और कोट ? तो बैगा ने कहा दो रुपया में पूरे कपड़े नहीं मिल रहे थे। इसलिए मैं नहीं लाया। राजा की बेटी ने कहा : कैसा आदमी है, जाओ दो रुपया में जो मिले लेकर आ जाना। बैगा तुरंत वहां से बाजार के लिए भागा। बाजार जाते समय रास्ते में एक नदी पड़ती थी! उसे पार करके ही बाजार जाना पड़ता था।

उसी नदी के किनारे उसे एक जोगी मिला, जो एक पिंजरा में कोयली सांप रखा था। बैगा ने पूछा : तुम इस पिंजरा में क्या रखे हो। जोगी ने कहा : इसमें कोयली सांप है। तुम इसे लोगे क्या? तब बैगा को याद आया की राजा की बैटी ने कहा था, दो रुपया में जो कुछ भी मिले लेकर आ जाना। तब बैगा ने पूछा : तुम इस सांप का कितना पैसा लोगे। तो जोगी ने कहा चार रुपया लूंगा।

बैगा ने कहाः मैं तुमको एक रुपया दूंगा। जोगी ने कहाः एक रुपया में नहीं आयेगा। तब बैगा ने कहा : यह दो रुपया ले लो और सांप दे दे। जोगी ने सांप का पिंजरा बैगा को दे दिया।

अब बैगा अपने मन में सोचता है कि मैंने दो रुपया सांप के लिए खर्च कर दिए हैं। तो अब बाजार जाने का क्या मतलब! ऐसा सोचकर वह अपने घर के लिए वापस आने लगा। कुछ दूर जाकर वह थक गया और एक जगह पर बैठकर आराम करने लगा। उसने अपना पिंजरा एक पुट्टी के ऊपर रख देता है और जंगल के भीतर लघु शंका करने चला जाता है। जब वह लौटता है! तो देखता है कि सांप पिंजरा का दरवाजा खोलकर उस पुट्टी के भीतर घुस रहा था। उसने देखा कि सांप पूरा उस पुट्टी में घुस गया है! उसकी पूंछ दिख रही है। बैगा ने उस सांप की पूंछ पकड़ ली और उसे बाहर की ओर खीचने लगा। सांप उससे अपनी पूंछ छोड़ने के लिए कहने लगा। सांप कह रहा था कि मैं अभी इस छेद से बाहर आ जाऊंगा। तब बैगा ने उसकी पूंछ छोड़ दी। तब सांप उस छेद से बाहर आ गया।

तब बैगा ने सांप से कहा तुम कहां जा रहे थे! तो सांप ने कहा मैं उत्तराखंड़ जा रहा था। तो बैगा ने कहा मैं भी उत्तराखंड जाना चाहता हूं। तो सांप ने कहाः तुम मुझे अपने शरीर में अच्छे से लपेट लो मैं तुमको उत्तराखंड ले चलूंगा।

अब बैगा ने सांप को अच्छे से अपनी छाती में लपेट लिया। फिर बैगा ने अपने सिर के लम्बे - लम्बे बालों को खोला और सांप के गले में बांध दिया। इसके बाद सांप उस पुट्टी के छेद में चला गया। सांप चलते - चलते उत्तराखंड पहुंच गया। वहां वह भूरा नाग के पास पहुंचा। जो सब नागों का राजा था। तब भूरा नाग ने कोयली सांप से पूछा : बता तुझे क्या चाहिए और तुम यहां पर किसे लाये हो? तुमको नहीं मालूम की उत्तराखंड में किसी मानव का प्रवेश निषेध है। कोयली सांप ने कहा यह धुर्वा बैगा है। जब मैंने इससे उत्तराखंड जाने के लिए कहा तो इसने मुझे अपने शरीर में लपेट लिया था।

जब भूरा नाग को भरोसा हो गया तो उसने बैगा से कहा : तुम जाओ वहां पटा में बैठ जाओ। जब बैगा ने देखा कि वहां सांप ही सांप है तो उसने वहां बैठने के लिए मना कर दिया। तब भूरा नाग ने उसे अपने पलंग पर बैठने के लिए कहाः तो बैगा ने देखा कि भूरा नाग के बिस्तर में सांप ही सांप हैं। तो बैगा ने उसमें भी बैठने के लिए मना कर दिया। अंत में भूरा नाग आराम करने लगा। तब कोयली नाग ने कहा : अब तुम भूरा नाग के हाथ पैर दबा दो। बैगा ने कहा : मैं कैसे भूरा नाग के हाथ पैर दबाऊंगा। तब कोयली नाग कहता है! तुम मूसर से उसके हाथ पैर दबा दो। तब बैगा ने सात दिनों तक मूसर से भूरा नाग के हाथ पैर दबाये। सात दिनों के बाद भूरा नाग की नींद खुली। उसे अपने शरीर में हल्कापन लगा। तब उसने कहा किसने मेरे शरीर की मालिश की है। उसे बुलाया जाये। मैं उसको ईनाम दूंगा। कोयली नाग ने कहा धुर्वा बैगा ने आपकी मालिश की है। तब भूरा नाग ने बैगा को बुलाया और कहा मांग लो जो तुमको मांगना हो। तब कोयली नाग ने बैगा से भूरा नाग की अंगूठी मांगने के लिए कहा! बैगा ने सांपों के राजा भूरा नाग से कहा : तुम अपने हाथ की अंगूठी हमको दे दो। भूरा नाग ने कहा : तुम इसको क्यों मांग रहे हो। तुमको जितना सोना चांदी चाहिये ले लो। तब बैगा ने कहा मुझे आपकी अंगूठी चाहिए और कुछ नहीं। तब भूरा नाग ने कहा : जब तुमने हठ ही पकड़ ली है तो मैं तुमको अपनी अंगूठी देता हूं पर तुमको इसे हर पांच साल में वापस करना होगी। तुम हर पांच साल में इसे उसी पुट्टी के छेद में ड़ाल देना । जिससे तुम आये थे। भूरा नाग ने अपनी अंगूठी निकाली और उसे बैगा को दे दी।

फिर भूरा नाग ने बैगा को बताया कि इस अंगूठी से पैसा किस तरह बनता है। उसने गाय का गोबर उठाया और उसे जलाया! फिर उसमें उस अंगूठी को घुसेड़ दिया। जब तक अंगूठी गाय के गोबर के कंड़ों में रही तब तक ऊपर से रुपये टपकते रहे। बैगा ने उस अंगूठी को रखा और उसे लेकर उसी पुट्टी के रास्ते अपनी दुनिया में आ गया।

जब वह बैगा अपने घर पहुंचा तो राजा की बेटी ने देखा तो खुश हो गई। उसने बैगा से कहा : तुम इतने दिन तक कहां चले गए थे और वह कपड़े कहां हैं! जो तुम लेने गए थे। बैगा ने कहा : मैं बाजार गया था! तो मेरे रिश्तेदार मिल गये। उनके साथ वह दो रुपया खर्च हो गए। फिर बैगा ने राजा की बेटी से कहा तुम आठ दिनों तक गोबर के कंड़े एकत्र करो। राजा की बेटी ने आठ दिनों तक गोबर एकत्र किया। एक रात में बैगा ने अपनी पत्नी से कहाः तुम सो जाओ ! मुझे कुछ काम करना है। उसकी पत्नी सो गई। रात को बैगा ने गोबर के कंड़ों में आग लगाई और उसकी आग में अंगूठी को घिसने लगा। अगूंठी के घिसते ही आसमान से रुपये टपकने लगे। जब बहुत रुपये गिर गये तो बैगा ने उन रुपयों को एक जगह छिपा कर रख दिये। सुबह उठकर राजा की लड़की ने घर के कोने में ढ़ेर सारे रुपये देखा तो बैगा से कहा : रात को तुमने किसी के घर से रुपये चुराकर लाये हो। बैगा ने कहा : मैंने रुपये कहीं से चुराकर नहीं लाया। अब रानी की बेटी ने सोचा कि मालूम करना पड़ेगा कि बैगा इतने रुपये कहां से लाया है। दूसरे दिन शाम को बैगा और उसकी पत्नी जंगल में पिहरी लेने गये। रात को वापस आने पर बैगा की पत्नी ने सोने का बहाना करके लेट गई। रात के समय बैगा ने फिर गोबर के कंड़े जलाये और उसकी राख में अंगूठी को रगड़ा तो आसमान से चांदी के सिक्के गिरने लगे। उसकी पत्नी सोये - सोये सब देख रही थी। वह समझ गई कि इतने सारे रुपये कहां से आते हैं।

कुछ दिनों बाद उस बैगा के पास इतना पैसा हो गया कि उसने वहां के राजा के महल से तीन गुना बड़ा महल तैयार करवा लिया। वह बैगा बहुत धनवान हो गया था। उस नगर के लोग उसे धुर्वा राजा के नाम से पुकारने लगे। उसने अपने महल की रखवाली के लिए एक बिलैया और एक कुत्ता को रखा था। कुछ दिनों बाद उस धुर्वा राजा ने कुछ गायों को खरीदने का विचार किया ! उसके लिए उसे दूसरे नगर में जाना था। उसने अपने साथ एक कोरी को ले जाने की सोचा। उसने वह अंगूठी एक लोहा के संदूक में रखकर उसमें बहुत बड़ा ताला लगा दिया। उस धुर्वा राजा की पत्नी ने उसको संदूक में अंगूठी रखते देख लिया। उसने अपनी पत्नी से कहा : यह अंगूठी तो बहुत सुंदर है। मैं इस अंगूठी को हमेशा के लिए अपनी अंगुली में पहनना चाहती हूं। उस धुर्वा राजा ने कहा जैसी तुम्हारी इच्छा पर तुम इसको कभी भी अपने से दूर मत करना। ऐसा कहकर धुर्वा राजा अपने साथी के साथ चल दिया।

जब वह जा रहा था तो रास्ते में एक बर्तन वाला जो उसका दोस्त था। उसको मिला और उसने कहा : आप बाहर जा रहे हो। तब तक मैं आपके महल के सामने अपनी दुकान लगा लूं। धुर्वा राजा ने कहा ठीक है लगा लेना। मेरी घरवाली को कभी कुछ चीज की जरुरत पड़े तो दे देना। ऐसा कहकर धुर्वा राजा दूसरे राज्य गायों को लेने चला जाता है।

उसके जाने के बाद वह बर्तन वाला उसके महल के सामने अपनी बर्तन की दुकान खोल लेता है। क्योंकि उसने एक दिन धुर्वा राजा को उसकी अंगूठी से चांदी के सिक्के बनाते देख लिया था। एक दिन उस बैगा की घरवाली महल से निकली और उसने महल के सामने बर्तन की दुकान देखी तो वह उसकी दुकान पर गई और उसने वहां पर अच्छे - अच्छे बर्तन देखे। जो व्यापारी उसे बेचने लाया था। राजा की बेटी वहां से दूसरी दुकान में और बर्तन देखने जाने लगी। उसी समय एक बूढ़े व्यापारी ने राजा की बेटी के हाथ में भूरा नाग वाली अंगूठी देख ली। वह उस अंगूठी के बारे में जानता था। उसने राजा की बेटी से कहा : तुम मुझको यह अंगूठी दे दो। इसके बदले में तुम बाजार में जितना समान रखा है सब ले लो। इसके साथ मैं तुमको अपने हाथी, घोड़ा, ऊंट और अपना महल भी दे दुंगा। धुर्वा राजा की घरवाली ने उस व्यापारी को अपनी अंगूठी दे दी। उसी दिन रात को उस व्यापारी ने अपनी दुकान बंद कर दी और वहां से भाग गया।

वह व्यापारी वहां से भागकर एक बहुत बड़ी नदी के सामने जाकर रुका और उसने वहां पर ढ़ेर सारे गोबर के कंड़े एकत्र किया और उसमें आग लगा दी। जब आग बुझी तब उस व्यापारी ने उस अंगूठी को उसकी राख में घिसना चालू किया।

कुछ दिनों के बाद धुर्वा राजा अपने घर वापस लौटा तो उसकी घरवाली उसकी खूब सेवा - सत्कार करने लगी। उसके हाथ - पैर दबाने लगी। जब वह उसके पैर दबा रही थी। उसी समय उस धुर्वा राजा ने देखा कि उसके अंगुली में अंगूठी नहीं है। धुर्वा राजा ने पूछा उसकी अंगुली की अंगूठी कहां गई। तो राजा की बेटी ने कहा : वह लोहे के संदूक में रखी है। धुर्वा राजा ने कहा उसे जल्दी से लाकर मुझे दे दो। राजा की बेटी ने कहा अभी लाकर देती हूं। पहले तुम्हारे हाथ - पैर तो दबा दूं। धुर्वा राजा ने अपनी घरवाली का हाथ पकड़ा और कहा पहले अंगूठी लाकर दे दो। अब राजा की बेटी घबड़ा गई और उसने सच - सच धुर्वा राजा को बता दिया कि उसने वह अंगूठी उस बर्तन वाले व्यापारी को दे दी है और उसके बदले ढ़ेर सारा समान खरीद लिया है। अब धुर्वा राजा को बहुत गुस्सा आ गया! वह अपनी घरवाली को मारने लगा।

उसी समय धुर्वा राजा के सेवक कुत्ता और बिलैया आ गये। वे राजा को रोकने लगे की रानी को मत मारो। हम लोग तुम्हारी अंगूठी उस व्यापारी से वापस लाकर दे देंगे। तब कहीं जाकर राजा का गुस्सा शांत हुआ।

एक दिन बाद धुर्वा राजा के सेवक कुत्ता और बिलैया राजा की अंगूठी खोजने निकल जाते है। कुत्ता और बिलैया शाम को एक गांव में पहुंचते हैं और दोनों गांव के पहले मकान में रुक जाते हैं। दसरे दिन वह दोनों एक बड़ी नदी को पार करके उस बर्तन वाले व्यापारी की दुकान पर पहुंच जाते हैं। जिसने रानी से अंगूठी ले ली थी। कुत्ता और बिलैया रात को उस व्यापारी के यहां रुक जाते हैं। आधी रात को वह व्यापारी उस अंगूठी से रुपया बनाता था। कुत्ता और बिलैया ने उस व्यापारी को रुपया बनाते देख लिया। जब व्यापारी ने रुपया बना लिए । तब उसने अंगूठी को एक टोकनी में रखकर उसे एक रस्सी के सहारे मकान में लटका दिया। कुत्ता और बिलैया दोनों यह सब देख रहे थे। अब बिलैया सोचती है कि उस टोकनी तक कैसे पहुंचा जावे। उसी समय एक बहुत बड़ा घूंस वहां से निकला। बिलैया तुरंत उसके ऊपर सवार हो गई और उस घूंस (बड़ा चूहा) का गला पकड़ लिया। वह घूंस दर्द के कारण चिल्लाने लगा। तब बिलैया ने कहा : तुम उस टोकनी तक जा सकते हो! जो रस्सी से लटकी है। घूंस ने कहा मैं तो वहां रोज जाता हूं। इसमें कौन सी बड़ी बात है। तो बिलैया ने कहा तुम उधर जाकर उस टोकनी की रस्सी को काट दोगे ! तो मैं तुमको छोड़ दूंगी। घूंस ने कहा मैं अभी जाकर उस रस्सी को काटकर आती हूं। घूंस मकान के ऊपर चढ़ा और रस्सी को काट दिया । जिसके कारण टोकनी जमीन पर आकर गिर गई और जिस बर्तन में अंगूठी रखी थी। वह बर्तन टूट गया। अब बिल्ली ने तुरंत उस बर्तन से अंगूठी निकाली और वहां से भागी। वह कुत्ता के पास आई तो कुत्ता ने कहाः तुम अंगूठी मुझे दे दो! मैं उसको अपने मुंह में रख लेता हूं। तो बिल्ली कहती हैः तुम दौड़ते हो तो तुम्हारा मुंह खुल जाता है। जिससे अंगूठी गिर जायेगी। तब कुत्ता ने कहा ठीक है! मैं इस अंगूठी को अपनी पूंछ में ड़ाल लेता हूं! तो यह नहीं गिरेगी। तब कुत्ता ने अंगूठी को अपनी पूंछ में पहना दिया और वहां से भागा। पूंछ में अंगूठी होने के कारण कुत्ता अपनी पूंछ को ऊपर की ओर मोड़कर रखा रहा । तभी से कुत्ता की पूंछ आज तक मुड़ी हुई है। वह नीचे की तरफ नहीं झूलती है। वह हमेशा ऊपर की ओर ही मुड़ी रहती है।

अब कुत्ता और बिलैया धुर्वा राजा के नगर और महल के लिये वहां से चल दिये। रास्ते में उनको फिर वही बहुत बड़ी नदी मिली। अब नदी को पार करने के लिए बिलैया कुत्ता की पीठ पर चढ़ गई और नदी पार करने लगी। जिस समय दोनों किनारे पर पहुंचते हैं। उसी समय नदी में एक बहुत बड़ी मछली आती है और कुत्ता को निगल जाती है। बिलैया तुरंत उसकी पीठ से कूंदकर नदी के उस पार हो जाती है। अब बिलैया नदी के किनारे - किनारे चली जाती है। रास्ते में नदी के किनारे एक लाख हाथियों का झुंड़ मिलता है। बिलैया उस झुंड़ में जाकर हाथी के राजा को देखती है। जैसे ही बिलैया को हाथियों का राजा दिखता है बिलैया उस हाथी की सूंड़ पकड़कर लटक जाती है और उसकी सूंड़ को नोंचने लगती है। तब हाथी चिंघाड़ने लगता है और बिल्ली को अपनी सूंड़ छोड़ने के लिये कहता है। बिल्ली कहती है : मैं तुम्हारी सूंड़ छोड़ दूंगी पर तुमको मेरा एक काम करना होगा। हाथी उससे काम करने के लिए हां कह देता है। तब बिलैया हाथी को पूरी कहानी सुनाती है कि किस प्रकार उसके साथी कुत्ता को मछली निगल जाती है।

हाथी ने तुरंत अपने सभी साथियों को बुलाया और बिल्ली की सहायता करने के लिए कहा और सभी हाथियों ने मिलकर उस नदी के पानी को सुखा दिया। नदी में मछली ही मछली दिखने लगीं। तब हाथियों ने सब मछलियों का पेट फोड़ना चालू कर दिया अंत में वह मछली मिल गई जिसके पेट में कुत्ता था। हाथी ने उस मछली का पेट फोड़ दिया और कुत्ता बाहर निकलकर आ गया और वह बिलैया के पास आ गया। अब बिलैया ने कहा : तुम अंगूठी मुझे दे दो। मैं उसको अपने मुंह में रख लेती हूं। कुत्ता कहता है यह अंगूठी मेरी पूंछ में ही रहने दो, तुम्हारे मुंह से गिर सकती है। अब दोनों राजा के महल के लिए चल दिये। राजा का महल तीन चार मील और बचा था कि उसी समय एक गिद्ध आकाश से उड़ते आया और उस कुत्ता की पूंछ को जड़ से उखाड़कर आकाश में लेकर उड़ गया। कुत्ता और बिलैया फिर से चिंता में पड़ गए।

एक दिन कुत्ता एक रास्ते में मरे होने के जैसा सो गया। उसी के पास बिल्ली एक बिल में जाकर छुप गई। गिद्ध आकाश में उड़ रहा था। उसने जमीन में एक कुत्ता को रास्ते में मरा हुआ देखा। वह जमीन पर उतर कर उस कुत्ता के पास आकर बैठ गया। गिद्ध ने कुत्ता के पेट में चोंच मारने की सोची, उसी समय कुत्ता ने देख लिया और उठकर भाग गया। गिद्ध भी वहां से उड़ने लगा तभी बिल्ली ने एक झपट्टा मारा और गिद्व की गर्दन पकड़ ली और उसकी गर्दन को चबाने लगी। जिससे गिद्ध मर गया। इसके बाद बिल्ली ने गिद्ध का पेट फाड़कर अंगूठी निकाल ली। कुत्ता फिर से अपने पास अंगूठी रखने के लिए बिल्ली से मांगने लगा। तब बिल्ली ने कहा अब तो तुम्हारी पूंछ भी नहीं है। तुम अंगूठी को कहां रखोगे। ऐसा कहकर बिल्ली अंगूठी लेकर धुर्वा राजा के महल में आ गई और अटारी में चढ़ गई। कुत्ता देखता रह गया।

तब धुर्वा राजा ने बिल्ली को देखा और अपने पास बुलाया। बिल्ली ने राजा को उसकी अंगूठी दे दी । धुर्वा राजा खुश हो गया।

पांच साल बाद धुर्वा राजा एक पुट्टी के पास गया और उसके बिल में अंगूठी रख दी। उस बिल में पांच किलो दूध ड़ाल दिया जिससे अंगूठी उस दूध के साथ बहते हुये। भूरा नाग के पास पहुंच गई।

उसी दिन से बैगा लोग हर पांच साल में दिन भर उपवास रहकर पुट्टी में दूध चढ़ाते हैं।

कहानी अब खतम हो गई। कहानी बताने वाला झूठा है। उस पर विश्वास करने वाला गंवार है। जिस प्रकार से धुर्वा राजा की बनी वैसे ही सबकी बने।

जय सीता राम की!

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पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: बैगा जनजाति की लोक कथाएँ - 4. जादूवाली अंगूठी - डॉ.विजय चौरसिया
बैगा जनजाति की लोक कथाएँ - 4. जादूवाली अंगूठी - डॉ.विजय चौरसिया
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रचनाकार
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