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नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 4 - अमरबेल - एकांकी - लेखक : डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव

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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020


प्रविष्टि क्र. 4 -

अमरबेल

एकांकी

लेखक : डॉ.सुनील गुलाबसिंग जाधव


पात्र परिचय


1. जय (ज्योति का मित्र ) उम्र ३५

2. ज्योति ( उम्र ३५ )

3. निवेदिका

4. ज्योति की माँ ( उम्र ५५ )

5. पेपरवाला

6. फलवाली

7. टी.सी.

8. रोहित (उम्र ३६ )



दृश्य एक

{स्टेशन नांदेड का प्लाटफार्म नंबर एक। श्याम के ७ बज रहे हैं। देवगिरी एक्सप्रेस के आने का समय हो गया है। यात्री ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए स्टेशन पर खड़े हैं। निवेदिका घोषणायें कर रही है। “यात्री गण कृपया ध्यान दें। नांदेड से मुंबई की ओर जाने वाली देवगिरी एक्सप्रेस प्लाटफार्म नंबर एक पर आ रही है।” थोड़ी देर बाद ट्रेन स्टेशन पर आ जाती है। यात्री भीतर चढ़ कर अपनी जगह तलाश कर बैठ रहे हैं।}

जय : नाइन नंबर......नाइन नंबर...ये रही। मिल गई सीट। खिड़की वाली सीट

है...भाई। समान सीट के नीचे रखता हूँ। और बैठ जाता हूँ..खिड़की वाली सीट पर। लो बैठ गया...भाई ...। गाड़ी शुरू होने से पहले जरा एकाध समाचार पेपर लेता हूँ। खिड़की के बाहर देखता हूँ, कहीं पेपर वाला दिखता है क्या ?

( ज्योति को उसके पति रोहित का फोन कॉल आता है। रिंग बज रही है।हम तुम्हें इतना प्यार करेंगे, के लोग हमें याद करेंगेज्योति थोड़ी देर बाद कॉल रिसीव करती है।)

ज्योति : हैलो ....रोहित ...

रोहित : हाय ज्योति ...कहाँ पर हो ....? कब निकल रही हो ? मुझे तुम्हारी बहुत याद आ

रही है।

ज्योति : अभी नांदेड स्टेशन पर पहुँच गयी हूँ। ट्रेन मेरे सामने खड़ी है। मैं देवगिरी

एक्सप्रेस से आ रही हूँ। मुझे लेने के लिए जरुर आना ...और हाँ मुझे भी तुम्हारी बहुत याद आ रही है...रोहित ..

रोहित : मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा। मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं तुम्हें कब-कब मिलूं और

गले से लगा लूँ। मैं सुपर मैन होता तो अभी उड़कर आ जाता और तुम्हें मेरे साथ ले आता ..पर क्या करू ..सुपर मैन नहीं हूँ ना।

ज्योति : तुम मेरे सुपर मैन ही हो ...और मेरे पंख होते तो मैं भी उड़ आती ...पर अभी

इस वक्त मैं अगर ट्रेन में ना बैठूं तो ट्रेन छुट जायेगी .. ओके बाय ...

रोहित : ओके बाय ज्योति ...मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ। अभी फोन रखता हूँ।

ज्योति : चल ज्योति ...ट्रेन छुट जायेगी ..जल्दी भाग ...हुश्श..चढ़ गयी ....मिल गयी

ट्रेन। वरना यही रहना पड़ता कलतक के लिए ..और ख्वाबों में उड़कर जाती रोहित के पास ...चलो.. कोई खाली सीट ढूँढ़ती हूँ ...वह रही उस व्यक्ति के पास.. एक सीट खाली है ... पूछती हूँ ....क्या यहाँ कोई बैठा है ? ...मैं बैठ सकती हूँ ?

जय : (खिड़की से बाहर झांकता जय ने जानी पहचानी आवाज को सुनकर

पलटकर देखता है।)आवाज तो कुछ जानी पहचानी लगती है....जरा पलटकर तो देखता हूँ।..(आश्चर्य से ) ज्योति तुम ?

ज्योति : अरे, जय तुम ? ( मुस्कुराते हुए हाथ दिखाती है। )

जय : हाँ..यह मैं ही हूँ !

ज्योति : जय यह बैग यहाँ रख रही हूँ और मैं अभी आयी। (कहते हुए ट्रेन से बाहर

उतर जाती है।)

जय : (जय चकित हो जाता है। ) अं...यह क्या...वो ज्योति ही थी ना ? कहीं मैं

सपना तो नहीं देखा रहा हूँ। जरा हाथ को चिकोटी कटता हूँ। आह....दर्द हुआ। नहीं..नहीं ..यह सपना नहीं हो सकता !...मुझे पक्का यकीन है कि वह ज्योति ही थी। वही लम्बा कद...वही बाल...वही आँखें...और वही बोलने का ढंग। मैं उसकी आवाज कैसे भूल सकता हूँ। और ये उसने यहाँ बैग रखी है....यह सबकुछ तो ठीक है। पर वह मुझे देख कर ऐसे क्यों भाग गयी ? कहा कि... “मैं अभी आती हूँ”....और अबतक नहीं आयी। अब तो ट्रेन के छूटने का समय भी हो गया है। कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई। जिसका वह बुरा मान गई। पर वह तो मुस्कुरा रही थी। ऐ मेरे दिल.... छोटे-छोटे शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होते रहती है। डोंट टेक टेंशन....

ज्योति : जय ! (ट्रेन के बाहर से ज्योति ने जय को आवाज लगाई।)

जय : क्या ज्योति,.. दिल के अंदर से आवाज निकाल रही हो ?

ज्योति : जय ! इधर देखो ... माँ !...वो देखो... जय वहाँ बैठा है। वह मेरे साथ है। अब

चिंता की कोई बात नहीं। तुम जानती होना उसे। वह कॉलेज के दिनों में अपने घर आया करता था। वह जो आते ही आपके पाँव पकड़ लेता था और कहता था “जब तक माँ आशीर्वाद नहीं देगी, तबतक मैं माँ के पैर नहीं छोडूंगा।’’

ज्योति की माँ :- जरा खिड़की के पास आकर देखती हूँ। (साड़ी की पल्लू से चश्मा

पोंछते हुए ) यह तो वही है...हुबहू जय ...।

ज्योति : माँ हुबहू वही नहीं ...अपना जय ही है।

माँ : हाँ, बेटा हाँ ..मैंने जय को देखते ही पहचान लिया था। मैं तो मजाक कर रही थी

। मैं तो उसे बिना चश्मे के भीड़ में भी पहचान लूँगी।

जय : (जय ट्रेन से झट से नीचे उतर जाता है और ज्योति के माँ के पैर पकड़ लेता

है।) जब तक माँ आशीर्वाद नहीं देगी तबतक मैं माँ के पैर नहीं छोडूंगा।

माँ : (आसपास के सारे लोग देख रहे हैं। माँ के आँखों में आँसू आ गये। पल्लू से

ओंठ दबाते हुए।) इतने साल हो गये जय...तू अबतक बिल्कुल नहीं बदला। जस का तस है। (झूठा गुस्सा-प्यार-हँसी के मिश्रण के साथ ) धत्त ! जा मैं तुझे आशीर्वाद नहीं देती। पहले पैर छोड़ ...।

जय : नहीं, माँ....मैं आपके पैर नहीं छोड़ूंगा। ना माँ ना मुझसे ऐसी बात न कर माँ ...।

(माँ के हाथ पकड़ते हुए ) ये आशीर्वाद मुझे दे दे माँ ! मैं कह रहा हूँ...ये आशीर्वाद मुझे दे दे माँ ! तू जबतक मुझे आशीर्वाद नहीं देगी। तबतक मैं तेरे पैर नहीं छोड़ूंगा माँ ! माँ ..माँ ..माँ ..।

माँ : जय बस कर ये फिल्मी डायलॉग ..सब लोग देख रहे हैं हमें ..।

जय : (नाटक करते हुए ) देखने दो माँ ..आज सारे संसार को पता चलने दो .. एक

बेटा माँ के आशीर्वाद के लिए गिड़गिडा रहा है। और माँ है कि अपने आशीर्वाद की झोली से एक आशीर्वाद नहीं दे सकती। देखो हे दुनिया वालों ..ये माँ कितनी बेरहम है ..जो अपने बेटे को एक आशीर्वाद तक नहीं दे रही है।

ज्योति : जय बस करो अब ...(हँसती है।)

जय : ज्योति तुम कहती हो कि मैं बस करूं ...ना ज्योति ना ...ये मुमकिन नहीं...

नामुमकिन है ज्योति ...नामुमकिन।

माँ : (अबतक रोने वाली माँ खिलखिलाकर हंसती है।) हां...हां .....( नाटकीय

अंदाज में ) ले, मैं तुझे आशीर्वाद दे रही हूँ। बालक मैं तेरी तपस्या से प्रसन्न हुई ..मांग जो तुझे मांगना है ... तथास्तु ..! ( माँ-ज्योति और जय तीनों एक साथ हँसते हैं।)

जय : थैंक्स माँ ...

माँ : ( कुछ पल बाद गम्भीर होकर ..।) बेटा तेरी शादी हो गई ?

जय : जी माँ, मेरी शादी हो गयी ..पर मैं तुम्हें शादी में बुला नहीं पाया ...

माँ : चल छोड़ ...कोई बात नहीं। बता ..तुझे कोई बाल-बच्चे है कि नहीं ?

जय : है क्यों नहीं। है ना ! दो बच्चे हैं। बिलकुल अपनी दादी और नानी पर गये हैं

दोनों।

माँ : बेटा, अब तू कहाँ रहता है ?

जय : मैं ...यहीं नांदेड में रहता हूँ। नमस्कार चौक के पास ....

माँ : तो तू मुझे घर कब बुला रहा है। तू मुझे घर बुलायेगा ना ? मैं तेरे बच्चों को

देखना चाहती हूँ। उनके साथ खेलना चाहती हूँ। क्या मैं उनके साथ खेल सकती हूँ।

जय : हाँ ..हाँ ..क्यों नहीं। अब तो मैं मुंबई जा रहा हूँ। जैसे ही मैं लौटकर आऊँगा तुम्हें

अपने घर लेता जाऊँगा।

( ट्रेन की सिटी बजती है। निवेदिका सूचना दे रही है। “प्लेटफार्म नंबर 1 पर खड़ी देवगिरी एक्सप्रेस रवाना होने के लिए तैयार है।” )

ज्योति : माँ... तुम भी ना .. कहीं भी शुरू हो जाती हो ...। ट्रेन छूट रही है माँ ....।

जय : अच्छा माँ चलते हैं ...फिर मिलेंगे। चलो ज्योति जल्दी चलो ...ट्रेन छूट रही है

... लो हिल गई ट्रेन .. चढ़ो जल्दी चढ़ो ...(ट्रेन में चढ़ जाते हैं।) हुश्श्श्स..चढ़ गये ... चलो जल्दी खिड़की के पास ...वहाँ से माँ को बाय करना ...

ज्योति : हाँ...जल्दी करो ...

जय : देखो माँ खिड़की की ओर देख रही है ....

ज्योति : (खिड़की के बाहर हाथ दिखाते हुए ) बाय माँ ... माँ ..अब घर जाना और

निश्चिन्त रहना ...जय मेरे साथ है। मेर चिंता मत करना ...।

जय : बाय माँ ....!

माँ : जय बेटा.. मैं तेरा इंतजार करूँगी ... मुझे अपने घर ले जाना। मुझे तेरे बेटे के साथ खेलना है। मैं तेरे बच्चों के लिए खिलौना लेकर आऊँगी। (ट्रेन ने धीरे-धीरे प्लाटफार्म छोड़ दिया।) लो ...चला गया ...बेटा मैं तेरा इंतजार करूँगी।

(दृश्य पहला समाप्त)

दृश्य दो

( ट्रेन में जय और ज्योति दोनों आमने-सामने खिड़की के पास बैठे हैं। दोनों पुराने कॉलेज मित्र हैं। ज्योति के सम्मुख माँ द्वारा जय से पूछा गया सवाल ज्योति के हृदय को आहत कर गया। उसने अपने आंसुओं पर मुस्कान की चादर ओढ़ली। उसमें अब वीरों का-सा साहस आ चुका है। )

ज्योति : जय, कैसे हो ?

जय : खुद ही देख लो....हम कल भी ऐसे ही थे और आज भी ऐसे ही है।

बिल्कुल स्मार्ट लग रहा हूँ ना ?

ज्योति : हाँ..जय तुम आज भी वैसे ही हो ....जैसे पहले थे। थोड़ा भी नहीं बदले।

बिल्कुल स्मार्ट ....गड़बड़ में मैं तुमसे कुछ बोल नहीं पायी। हम आज कितने सालों बाद मिल रहे हैं ना ?

जय : हाँ...कई सालों बाद हम मिल रहे हैं। मुझे लगता है कि हम एम.ए. होने के

उपरांत दस साल के बाद मिल रहे हैं। ऍम आय राईट।

ज्योति : यू आर अप्स ल्युटली राइट। तुम सही कह रहे हो। आज दस साल हो रहे हैं।

जय : ओफ !...दस साल बाद हमारी मुलाकात हो रही है और वह भी ऐसे। ठीक

है...मिली तो सही ..। वरना मैं तो तुम्हें भूल ही गया था। ..........कैसी हो ?

ज्योति : तुम ही देख लो कैसी लग रही हूँ ?

जय : पहले तुम पतली थी।

ज्योति : और अब ?

जय : अब...थोड़ी कम पतली लग रही हो। (दोनों ठहाके लगाते हैं। हँसते हैं।)

ज्योति : जय तुम भी ना। ... इसीलिए तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र थे। कई बार तुम्हारी

ऎसी बातें याद करके अकेले में ही हँसती थी

जय : अच्छे मित्र थे ..मतलब ...अब नहीं ?

ज्योति : ऐसे नहीं यार ...तुम हमेशा से ही मेरे अच्छे मित्र थे ..हो और रहोगे।

पेपरवाला : पेपरवाला....पेपरवाला.....आज की ताजा खबर...आज की ताजा खबर

...एक माँ ने पांच बच्चों को एक साथ जन्म दिया।

जय : सुनो पेपरवाला ...एक पेपर देना ..

पेपरवाला : कौन-सा पेपर चाहिए साहब ? लोकमत, लोकसत्ता, प्रजावाणी, सकाळ,

गोदातीर, दैनिक भास्कर, पूण्य नगरी, गावकरी, गाववाला, मराठवाडानेता, सम्राट, सामना, देशोन्नति, एकजुट, एकमत, सत्य प्रभा और सबका पसंदीदा अपना लक्ष्य विश्व.....

जय : वही अपना वाला..सबका पसंदीदा “लक्ष्य विश्व” हिंदी पेपर ...है ना ?

पेपरवाला : है क्यों नहीं ...है ना ...एक ही बचा है। यह आते ही हाथों-हाथ बिक जाता है

। एक रह गया। शायद यह आपके पास ही आना चाहता था। ये....रहा आपका पेपर ....

जय : धन्यवाद ! यह लीजिये पैसे।

पेपरवाला : धन्यवाद साहब ! पेपरवाला...पेपरवाला ......

( कहता हुआ..आगे निकल जाता है।)

जय : पेपर बाद में पढ़ता हूँ। यहाँ पीछे रखता हूँ। ज्योति ...

ज्योति : क्या ?

जय : ज्योति ....

ज्योति : क्या ?

जय : कुछ नहीं ...ज्योति ....

ज्योति : अरे क्या ? सिर्फ ज्योति...ज्योति ही कहते रहोगे। आगे भी कुछ बढोगे।

जय : हाँ...आगे ही तो बढ़ रहा हूँ ....गुस्सा क्यों होती हो ? तुम कुछ भूल रही हो।

ज्योति : क्या .... ( कुछ सोचती है। ) हाँ..याद आया ..सॉरी ...

दोनों : पहले मुट्ठी बांधो ...फिर

मुट्ठी पर मुठ्ठी टकराओं

ऊँगली और अंगूठे को मिलाकर.

फिर सेकंड करते हाथ हिलाओ।

(दोनों हँसते हैं। )

जय : ज्योति, मुझे लगता है कि तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो ? मुझे रह-रह कर ऐसा

क्यों लग रहा है कि तुम भीतर से बहुत दुखी हो ...और उपर से तुमने हँसी की चादर ओढ़ ली है। कुछ बात है, जो तुम मुझे बताना नहीं चाहती ?

ज्योति : (झूठी हँसी-हँसते हुए ) नहीं तो, ऐसी कोई बात नहीं। मैं एकदम मस्त हूँ।

अपनी जिन्दगी में बहुत खुश हूँ। मुझे रोहित जैसा हैंडसम, स्मार्ट और नौकरीवाला पति मिला है। वह मुझसे बहुत प्रेम करता है। मुझे फूलों-सा रखता है। मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ते। हर वक्त मेरे साथ रहता है।

जय : तो फिर..वो कहाँ है ? क्या वे तुम्हारे साथ नहीं।

ज्योति : ऐसी बात नहीं ...बस ..इस बार वह ऑफिस के कामों में व्यस्त थे ...इसीलिए

....वरना वह इस वक्त मेरे साथ होते।

जय : लगता है, उन्हें तुम्हारी चिंता नहीं। वरना ऑफिस का काम छोड़कर यहाँ तुम्हारे

साथ होते।

ज्योति : वह मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। मेरी चिंता करते हैं। हर घंटे में उसका एक फोन

काल तो होता ही है। अभी स्टेशन पर ही तो उनका फोन आया था। कुल मिलाकर हमारी जिदंगी फाइव स्टार चल रही है। और तुम कहते हो कि मैं कुछ छिपा रही हूँ।

फलवाली : संतरे ...संतरे ....ताजा मीठा संतरा ले लो ...दस का एक.... दस का एक

संतरा ले लो...लिंबगाँव का ताजा मीठा संतरा ले लो ....

ज्योति : ओ... संतरे वाली बाई ! दो संतरे देना।

फलवाली : ये ले लीजिये बाई साहेब ...आपके लिए दो संतरे ....

ज्योति : thanku ...ये लीजिये आप के बीस रूपये। क्या ये सच में ही लिंबगाँव के

संतरे हैं ?

फलवाली : बाई साहेब आपको क्या लगता है, क्या संतरे सिर्फ नागपुर से ही आते हैं। ये

हमारे लिंबगाँव के प्रसिद्ध संतरे हैं। नागपुरी संतरे से किसी भी बात में कम नहीं हैं।

ज्योति : अच्छा-अच्छा ठीक है बाई ..आप तो बुरा मान गई। मुझे लिंबगाँव के संतरे

बहुत पसंद हैं, इसीलिए मैंने ऐसे ही कह दिया।

फलवाली : भाई साहब जरा मदद कीजिये ...टोकरा सर पर रखना है।

जय : हाँ..हाँ ..क्यों नहीं ...लो उठाता हूँ। हूँ ......लो ठीक से पकड़ो ...अब ठीक है।

फलवाली : धन्यवाद ! भाई साहब।....संतरे...संतरे....ताजा मीठा संतरे ....लिंबगाँव के

संतरे ....ताजा मीठा संतरे .... (कहते हुए आगे बढ़ जाती जाती है।)

जय : लगता है... परभणी स्टेशन आ रहा है ...

ज्योति : तुम्हें कैसे पता ... यहाँ तो स्टेशन नहीं दिख रहा है ..

जय : ये दीवार देख रही हो ...हम इसे चीन की दीवार कहते हैं ...वास्तव में यह लम्बी

दीवार कृषि विश्व विद्यालय की कंपाउंड है। इसकी लम्बाई के कारण इसे यह नाम पड़ा। देखो ...देखते देखते स्टेशन भी आ जायेगा ..

ज्योति : जय ! तुमने सही कहा...देखते-देखते स्टेशन आ जायेगा ...देखो स्टेशन आ

गया ..

निवेदका : परभनी स्टेशन आपका स्वागत करता है ! परभनी स्टेशन आपका स्वागत

करता है !

( ट्रेन की खिड़की के पास फल-समोसे, चने, पानी आदि बेचने वालों की अलग-अलग आवाजें आ रही हैं।)

(पूरी भाजी ...पूरी भाजी ...

चिक्की..चिक्की....चिक्की..

पानी ..पानी ...१० रु सैना जल

चाय ...चायवाला ... गरमा-गरम चाय )

निवेदिका : (ट्रेन की सीटी बजती है।)

“प्लाटफार्म नंबर 1 पर खड़ी देवगिरी एक्सप्रेस रवाना हो रही है।” )

(दृश्य दूसरा समाप्त )

दृश्य तीन

(स्थान वही है। दोनों संतरे खा चुके हैं। आपस में बातें कर रहे हैं।)

जय : ऊमम .....ज्योति संतरे बहुत मीठे और ताजा थे। मैं भी अक्सर सफर में इन

संतरों का इंतजार करता हूँ। थैंक्यू ज्योति इन ताजा-मीठे संतरों के लिए।

ज्योति : अलवेज वेलकम डियर ...जय तुम्हारे इस थैंक्यू का हमेशा स्वागत रहेगा।

वैसे दोस्ती में सॉरी-थैंक्यू तो नहीं चलता है, पर चला लेंगे। तुम्हारी दोस्त जो हूँ ..इतना तो बनता ही है। (हँसती है।)

जय : ओ हमारी बिल्ली हमी से म्याऊं....(हँसता है।) ज्योति तुम्हें हँसता हुआ देख

अच्छा लगा। पर मैं तुम्हारा सच्चा मित्र हूँ। मैं तुम्हें और तुम्हारे दिल की बात को अच्छी तरह से जानता हूँ। ज्योति तुमने सिर्फ रोहित का जिक्र किया। पर बच्चों का नहीं ? कितने बच्चे हैं, तुम्हें ?

ज्योति : (निराशात्मक हँसी ) हमने फैमिली प्लानिंग किया है।

जय : झूठ मत बोलो ज्योति ! मुझे पता है, तुम्हें झूठ बोलना नहीं आता। इतने

साल...कोई भला..फैमिली प्लानिंग करता है क्या ?

ज्योति : अरे, डॉक्टर ने कहा है कि मैं माँ नहीं बन सकती।

जय : क्यों....क्यों नहीं बन सकती ?

ज्योति : बस..नहीं बन सकती ..इसीलिए नहीं बन सकती ...डॉक्टर ने जो कहा है।

जय : ओ सॉरी ...मैंने कुछ गलत तो नहीं पूछ लिया ..मुझे माफ कर देना ...शायद मैंने

तुम्हारे मन को जाने अनजाने ठेस पहुँचा दी है।

ज्योति : नहीं कोई बात नहीं ...तुमने ठेस नहीं पहुँचाई। तुम मेरे अच्छे दोस्त हो ...तुम्हें

मेरे बारें में जानने का पूरा अधिकार है। आखिर दोस्ती किस लिए होती है। माँ बनना तो भाग्य की बात होती है पर ईश्वर ने मुझे यह वरदान दिया ही नहीं।

जय : मुझे लगा ...खैर छोड़ो ... आज तो विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। अब माँ

बनना कोई बड़ी बात नहीं है। जिस कारण निराश होकर घर बैठा जायें। तुम अभी भी माँ बन सकती हो। क्यों कि ईश्वर ने विज्ञान और डॉक्टर के रूप में सक्षात धरती पर जन्म लिया है। उनके वरदान से तुम माँ जरुर बन सकती हो।

ज्योति : माँ बनना इस सृष्टि का सुखद अहसास है। इस धरती का सबसे पुण्य कर्म है।

वो क्या होता है, पता नहीं। दूर से देखा... किताबों में पढ़ा है। पर खुद महसूस नहीं किया। मैं महसूस करना चाहती थी। माँ बनना क्या होता है ? पहले मैं माँ बनना नहीं चाहती थी पर जब अहसास हुआ कि माँ नना चाहिए तब समय को यह मंजूर नहीं था। ( निराशात्मक हंसी ) वह मुझ से रूठ गया था। नहीं ....वो मुझे तो...हमेशा के लिए ही रूठ गया है।

जय : तुम निगेटिव क्यों सोचती हो ? पोजिटिव क्यों नहीं सोचती ? ज्योति समय नहीं

रूठा है, तुम खुद से रूठ गयी हो... बस ...। तुम्हें टेस्ट ट्यूब बेबी का नाम तो सुना होगा। ‘टेट ट्यूब बेबी’ प्रक्रिया के करण तुम फिर से माँ बन सकती हो। विश्व में ५० लाख से ज्यादा टेस्ट ट्यूब बेबी जन्म ले चुके हैं। लूसी ब्राउन नामक लड़की विश्व की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी है। आज इस प्रक्रिया से कई निसंतान दम्पति संतान सुख का लाभ उठाकर ख़ुशी-ख़ुशी से जिन्दगी जी रहे हैं। वे धरती के भगवान का जिन्दगी भर आभार मानते हैं। जिनके कारण उन्हें यह अपार सुख की प्राप्ति हुई। उनके वंश की वृद्धि हुई। उन्हें सहारा मिल गया। वे अब अमर बेल नहीं जो दूसरों का सहारा पाकर खिलता है। उनका अपना सहारा उन्हें मिल गया। तुम भी माँ बन सकती हो। नांदेड में ऐसे हॉस्पिटल हैं, चाहो तो मैं तुम्हें उनका पता दे सकता हूँ। इसीलिए सकारात्मक सोचों तुम माँ जरुर बनोगी।

ज्योति : माँ बनना इतना आसान होता, तो मैं अवश्य माँ बन जाती। मुझे पता है टेस्ट

ट्यूब बेबी प्रक्रिया क्या है। मैं इस प्रक्रिया से भी माँ नहीं बन सकती।

जय : क्यों, नहीं बन सकती ? जब तुम्हें पता है कि टेस्ट ट्यूब बेबी की प्रक्रिया से तुम

माँ बन सकती हो तो तुम माँ क्यों नहीं बन सकती ?

ज्योति : माँ बनना किसे अच्छा नहीं लगता जय ! मैं माँ बनने के सपने देखा करती थी।

सारे उपाय किये। भगवान के पास मन्नत मांगी, ताबीज बांदे, व्रत रखे ..पर कुछ नहीं हुआ ... मैं सपने देखा करती थी कि मेरे गर्भ में शिशु पल रहा है। उसका जन्म हुआ है। वह घुटने पर दौड़ रहा है। मुझे देखकर हँस हा है। मैं पकड़ने के लिए आगे बढ़ूं तो वह दौड़-दौड़ जाता है। मैं जब उसे ढूँढती हूँ...तो वो छिप जाता है। जब मैं थक कर बैठ जाती हूँ, तो वह पीछे से आकर आँखें बंद कर देता है। वो मुझे माँ कहकर पुकारता है। मुझे उन दिनों में सोना बहुत पसंद आता था क्यों कि सोने के बाद मेरा बच्चा मुझसे मिलने मुझसे खेलने के लिए सपने में आता था। जागती तो असली दुनिया दिखायी देती। खाली घर, खाली कोख, खाली जिन्दगी..सबकुछ खाली ही खाली लगता था। एक दिन जब सुना कि टेस्ट ट्यूब बेबी प्रक्रिया से मैं माँ बन सकती हूँ, तो मैं ख़ुशी से उछल पड़ीं थी। मानो ईश्वर ने मेरी बात मान ली। उसने मुझे वरदान दे दिया।

जय : और आगे क्या हुआ ?

ज्योति : मैं ख़ुशी से अस्पताल गई और डॉक्टर ने चेक किया और .....मेरे पैरों तले की

जमीन खिसक गई। उन्होंने फिर से कहा। मैं माँ नहीं बन सकती। कभी भी। जो मैंने खुशियों का महल बनाया था। वह धडाम से गिर गया। निर्दयी ....। ईश्वर ने मेरे साथ मजाक किया था। ( दुखात्मक हँसी-हँसती )

जय : (ज्योति का हाथ पकड़ते हुए )

ज्योति ये क्या कह रही हो तुम... मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मुझे स्पष्ट कहो क्या बात है। विज्ञान कैसे हार सकता है ?

ज्योति : विज्ञान नहीं हारा जय ...मैं हार गई।

जय : ज्योति , अब बस ....तुम मुझे बताओगी या नहीं।

ज्योति : मैं बाँझ हूँ ...जय मैं बाँझ हूँ। ऐसा खेत जिस पर कभी फसल ही नहीं उग

सकती। बिल्कुल बंजर ...। मेरे पेट में बच्चादानी ही नहीं..जय.. बच्चादानी ही नहीं। (उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं।)

जय : (ज्योति का हाथ दबाते हुए ) सॉरी ज्योति... मैंने तुम्हारा दिल दुखाया।

ज्योति : नहीं, कोई बात नहीं जय। तुम गिल्टी फिल मत करना। जो है सो है। हम

जीवन के इस सफर में और क्या कर सकते हैं। पर मुझे अब कुछ लगता नहीं। पहले बहुत दुखी रहा करती थी कि मुझे कोई संतान क्यों नहीं है। मैंने अपने पति से यहाँ तक कहा था कि रोहित... तुम दूसरी शादी कर लेना। पर उस दिन के बाद उसने मुझ से पूरे दो दिनों तक बात नहीं की और ठीक से खाना भी नहीं खाया। उसने मुझसे वचन लिया कि ऐसी बात फिर कभी नहीं करुँगी तब जाकर वह माना ...।

जय : फिर आगे क्या हुआ ?

ज्योति : मैं बहुत खुश नसीब हूँ कि मुझे रोहित जैसा पति मिला है। अब वही मेरा बच्चा

है। वह भी रोज मुझसे बच्चों जैसी जिद करता है। शरारत करता है। उसे रोज मेरे हाथों से खाना पसंद है। वह मेरे ही हाथों से दूध पीता है और बहुत कुछ बच्चों वाली हरकत ...करता है। अब वह मेरे लिये बच्चा बन जाता है। और मैं उसमें अपने मातृत्व सुख को प्राप्त कर लेती हूँ।

टी सी.: टिकिट प्लीज....

जय : यह लीजिये टिकिट ...

टी.सी. : कौन-सी सीट है, आपकी ?

जय : जी, ९ नंबर की सीट है। खिड़कीवाली।

टी.सी.:- ठीक है .. यह लीजिये टिकिट ..नेक्स्ट ..आपकी कौन सी सीट है ?

ज्योति : जनरल टिकिट है। औरंगाबाद तक जाना है।

टी.सी. : मैंडम जरनल टिकिट है, तो जनरल बोगी में बैठना चाहिए। यह रिजर्वेशन बोगी

है। प्लीज अगले स्टेशन पर उतरकर जनरल बोगी में बैठ जाइये।

जय : बैठने दीजिये ना सर। औरंगाबाद तक तो जाना है, ना। कोई आ जायेगा तो वह

उठ जायेगी। प्लीज सर ...मेरी दोस्त है ..दस सालों बाद मिल रही है। ऐसे हमें अलग मत करो। बस अब तीन घंटे का सफर ही तो बाकी रहा है। चाहे तो आप फीस ले लीजिए जो भी बनती है।

टी.सी. ठीक है.. आप दोस्तों को मैं जुदा नहीं करूँगा। आप बैठे रहे। और हां फीस की

आवश्यकता नहीं। आखिर हममें भी इंसानियत होती है।

( “टिकिट-टिकिट” कहता हुआ आगे चला गया।)

ज्योति : थैंक्स जय...तुमने मुझे बचा लिया ...तुम न होते तो शायद मुझे उतर कर अगले

बोगी में जाना पड़ता। वैसे जरनल टिकिट पर आरक्षित बोगी में बैठना गलत है। पर जनरल बोगी में भीड़ बहुत होती है। और भीड़ मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं।

जय : तुम्हें थैंक्स कहने के कोई आवश्यकता नहीं ...यह मेरा कर्तव्य था। रही बात भीड़

की इसे देखकर कभी-कभी लगता है कि हमारा देश सिर्फ भीड़ ही बना रहा है। ‘मेड इन भीड़’ हा...हा....हा...(हँसता है।)

ज्योति : लगता है, जालना स्टेशन आया है ...लो देखते ही देखते स्टेशन आ ही गया ...

निवेदिका : जालना स्टेशन आपका स्वागत करता है। जालना स्टेशन आपका स्वागत

करता है।

( ट्रेन की खिड़की के पास फल-समोसे, चने, पानी आदि बेचने वालों की अलग-अलग आवाजें आ रही हैं। )

(समोसा-समोसा दस का एक समोसा

..खरमुरे खरमुरे ....

पानी ..पानी ...

चाय ...चायवाला ...

गरमा-गरम चाय )

निवेदिका : (ट्रेन की सीटी बजती है।)

“प्लेटफार्म नंबर 1 पर खड़ी देवगिरी एक्सप्रेस रवाना हो रही है।” )

(दृश्य तीसरा समाप्त )

दृश्य चार

(जालना स्टेशन से गाड़ी आगे के लिए निकल पड़ती है। औरंगाबाद डेढ़ घंटे की दूरी पर है। दोनों आमने-सामने बैठे हैं। जय “लक्ष्य विश्व” पढ़ रहा है। और उसमें से एक पंक्ति सुनाता है।)

जय :

आँसुओं से भीगे आंचल पर

मन का सबकुछ रखना होगा

तुमको अपनी स्मिति रेखा से

वह सन्धि पात्र लिखना होगा।

ज्योति क्या तुम्हें यह पंक्ति याद है।

ज्योति : हाँ..अच्छी तरह से याद है। जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ महाकाव्य में यह

पंक्ति है। इसे मैं कैसे भूल सकती हूँ। हमेम यह एम.ए.के सिलेबस में थी। मैडम ने इस पंक्ति को मुझसे श्याम पटल पर लिखवाया था। हमारा नांदेड का पीपल्स कॉलेज।

जय : तो तू यह भी समझ गई होगी कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।

ज्योति : हाँ.. समझ गई ...जय। मैंने अपने पुराने दुखों को भुला दिया है। अब मैंने

जिन्दगी से समझौता कर लिया है। ईश्वर और नसीब को दोष देकर मैं औरों की भांति दुखी नहीं रहना चाहती। जो मुझे मिला वह सर्व श्रेष्ठ मिला है। मैं इसी में खुश हूँ। मैं जब भी दुखी होती हूँ तब मैं वह पुराना गीत सुनती हूँ , जिससे सुनकर अपना दुःख तिल भर भी महत्व नहीं रखता।

जय : मुझे पता है, वह कौन-सा गीत है।

दुनिया में कितना गम है,

मेरा गम कितना कम है।

ज्योति सच में ही इस दुनिया में कितने लोग किसी न किसी कारण से दुखी रहते हैं। उनके दुःख के सामने हमारा दुःख कुछ भी नहीं होता है। पर वे लोग जीने हाथ-पैर नहीं होते, आँखें नहीं होती। अनाथ होते हैं। क्या वे जीवन जीना छोड़ देते हैं। नहीं ना ... ! वह उसमें भी जीवन जीते हैं और ऐसे लोगों को देख कर हम जैसों में अपने दुःख को भूलकर जीवन जीने का मन करता है। पर इसका यह मतलब नहीं की हर कहीं ऐसे लोग दिख जाये। या उदाहरण प्रस्तुत किया जाये। यह तो जीवन जीने की बात है। क्यों कि जीवन जीने के लिए होता है। और वह एक बार ही मिलता है। इसीलिए हम उसे जीवन कहते हैं।

ज्योति : सही कहा, जीवन एक बार ही मिलता है। हमें उसे जीना चाहिये।

जय : ज्योति, तुमने सरोगेट मदर ......या किसी अनाथ को गोद लेने के बारें में सोचा

है ?

ज्योति : सरोगेट मदर से मुझे बच्चा नहीं चाहिए। मैं अपने गर्भ में बच्चे को अनुभव करना

चाहती हूँ औरों के गर्भ में नहीं। इसीलिए सरोगेट मदर नहीं। और रही अनाथ बालक को गोद लेने की बात अबतक इसके बारें में हमने सोचा नहीं है।

जय : ज्योति चलो छोड़ो इस बात को ..रोहित क्या करता है ?

ज्योति : वह एक ऑफिस में बड़ा अधिकारी हैं। उसे किताबें पढ़ने का बहुत शौक है।

वह मेरे जैसा ही है। उसने और मैंने डॉ.बाबा साहेब अम्बेडकर विश्वविद्यालय, औरंगाबाद के नाटक विभाग से नाटक की उपाधि भी प्राप्त की है। हम दोनों को अभिनय करने का शौक है। तुम्हें पता है, हम दोनों को एक नाटक बहुत पसंद है। जिसे पढ़ना और रंगमंच पर प्रस्तुत करना हम दोनों के रूचि का विषय है। उसमें हमें ख़ुशी मिलती है। और लोगों को यह नाटक इतना पसंद आया कि बार-बार उसी नाटक को करने के लिए वे हमें बुलाते भी हैं।

जय : कौन-सा नाटक है और वही नाटक तुम दोनों को पढ़ना और रंगमंच पर प्रस्तुत

करना रूचि का विषय क्यों है ? आखिर उस नाटक में ऐसी कौन –सी बात है, जिस कारण लोगों को यह नाटक इतना पसंद आया ?

ज्योति : हाँ..हाँ बताती हूँ ..जय। मुझे पता है कि सबकुछ जान लेनी की जिज्ञासा तुममें

है। जबतक तुम किसी बात को पूरी तरह से नहीं जान लेते तबतक तुम बेचैन रहते हो। मैं तुम्हें और बेचैन नहीं करना चाहती।

जय : तो सुनाओ ना ?

ज्योति : तो सुनो ..वह नाटक हमें क्यों पसंद है। नाटक में एक ऐसा दाम्पत्य है, जो

एक दूसरे से बेहद प्रेम करता है और उन्हें एक मासूम-सा, नटखट-सा बालक होता है। जो कृष्ण की भांति बाल लीलायें करता है। नाटक दो हिस्से में बंटा हुआ है। पहला हिस्सा बाल लीला और जवान होने तक का है। और दूसरा हिस्सा जवान बच्चे के नौकरी और विवाह का है। पहला हिस्सा हम दोनों को बहुत पसंद है। पर दूसरा हिस्सा हमें पसंद नहीं है। क्यों कि दूसरे हिस्से में वह अपने वृद्ध माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करते हुए घर से बाहर निकाल देता है। जिस कारण उसके माता-पिता को ऐसी संतान होने पर पश्चाताप होता है। और वे कहते हैं कि “ऐसी संतान होने से अच्छा है कि निसंतान होना। वे दोनों एक दूसरे में अपनी संतान की कल्पना करते हैं। एक दूसरे को मम्मी और पप्पा कहते हैं। उस नाटक का नाम है, ‘मैं तेरी संतान और तू मेरी संतान’

जय : वा बहुत सुन्दर नाटक है। जिन्दगी की रिक्तता को पूर्ण करनेवाला नाटक।

जिन्दगी को जीवन जीना सिखाने वाला नाटक...। दुःख के क्षणों में सुख बाँटने वाला नाटक ..बहुत उम्दा ...। मौका मिला तो मैं भी नाटक देखने जरुर आऊँगा। ज्योति मान गया। मैं तुम्हें मान गया। तुम दोनों ने अपनी रिक्तता को नाटक के माध्यम से पूरा किया। अपने संतान के सुख को भी प्राप्त कर लिया। और जीवन जीना नहीं छोड़ा। अभावों में सुख की तलाश कर ली।

ज्योति : क्या तुम्हें नाटक इतना पसंद आया ...मैं तुम्हें जरुर बुलाउंगी। तुम नाटक

देखने जरुर आना। मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी। ( औरंगाबाद स्टेशन आता है।)

निवेदिका : (निवेदिका स्वागत परक घोषणा कर रही है।)

औरंगाबाद स्टेशन यात्रियों का स्वागत करता है।

औरंगाबाद स्टेशन आपका का स्वागत करता है।

( ट्रेन की खिड़की के पास फल-समोसे, चने, पानी आदि बेचने वालों की अलग-अलग आवाजें आ रही है।)

चाय ...चाय....चाय ...गरमा-गरम चाय

खरमुरे खरमुरे ...

पानी ..पानी ...

ज्योति : लो... देखते ही देखते औरंगाबाद स्टेशन कब आया पता ही नहीं चला। जय

अब चलती हूँ ..फिर मिलेंगे। बाय !

जय : मैं नीचे तक आता हूँ। चलो ..। रोहित भी आया होगा। उससे नहीं मिलवाओगी।

ज्योति : हाँ.. क्यों नहीं। चलो ... उतरते हैं। लो उतर गये। कहाँ है, रोहित। कहीं

दिखायी नहीं दे रहा है। लो..वो रहा ..वहाँ पर। पप्पा....इधर मैं यहाँ हूँ।

रोहित : मम्मा ..मैं तुम्हारा कब से इंतजार कर रहा हूँ। चलो अब जल्दी घर चलते हैं।

मुझे बहुत भूख लगी है।

ज्योति : हाँ..हाँ चलते हैं। पर थोड़ा रुको। जय मेरा क्लास मेट है।

निवेदिका : यात्री गण कृपया ध्यान दें। औरंगाबाद से मुबई की ओर जानेवाली देवगिरी

एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर 1 से रवाना हो रही है।

रोहित : धन्यवाद जय। सफर में तुमने ज्योति का खयाल रखा। फिर से धन्यवाद ! बाय

! फिर मिलते हैं।

जय : बाय रोहित ! बाय ज्योति ! अपना खयाल रखना। फिर मिलेंगे।

ज्योति : तुम कुछ भूल रहे हो जय ....

जय : हाँ.हाँ..याद आया ...

दोनों : पहले मुट्ठी बांधो ...

फिर मुट्ठी पर मुठ्ठी टकराओ .....

ऊँगली और अंगूठे को मिलाकर..

फिर हाथ मिलाते हाथ हिलाओ।

(दोनों हँसते हैं। )

निवेदिका : (ट्रेन की सिटी बजती है।)

प्लेटफार्म नंबर एक पर खड़ी देवगिरी एक्सप्रेस मुंबई की और रवाना हो रही है।....

(जय ट्रेन में बैठ जाता है। गाड़ी प्लाटफार्म छोड़ने तक वह ज्योति और रोहित को हाथ हिला रहा है। यही प्रक्रिया उधर भी जारी है

समाप्त

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लेखक परिचय

डॉ.सुनील जाधव जी का जन्म ०१ सितम्बर, १९७८ में अपने ननिहाल जिला नांदेड के तहसील मुदखेड में हुआ। पिता गुलाबसिंग एवं माता का नाम शकुंतलाबाई है। अनिल बड़े भाई और संदीप तथा राजेश दो छोटे भाई हैं। उनका विवाह माजलगाव के शिक्षा अधिकारी परशुराम राठोड की सुपुत्री वैशाली से २००८ में सम्पन्न हुआ। उन्हें तनिष्का एवं तन्मय दो संतान हैं। आपकी प्राथमिक शिक्षा हादगांव तो माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक कॉस्मोपालीटन, स्नातक शिक्षा सरस्वती विद्या मंदिर महाविद्यालय, किनवट में हुई। एम्. ए. हिंदी में नांदेड के पीपल्स कॉलेज से तो पीएचडी की उपाधि स्वामी रामानंद तीर्थ विश्वविद्यालय से प्राप्त की। यू.जी.सी. से प्राध्यापक पात्रता परीक्षा नेट।

साहित्यिक परिचय :-

कविता संकलन :- 1.मैं बंजारा हूँ २.सच बोलने की भूल ३.मेरे भीतर मैं ४.रौशनी की ओर बढ़ते कदम ५.त्रिधारा। कहानी संकलन :- 1.मैं भी इंसान हूँ २. एक कहानी ऐसी भी ३.गोधड़ी एकांकी :- 1.भ्रूण २. कैची और बंदूक 3.अमरबेल ४.अनुवाद :- सच का एक टुकड़ा (नाटक) ५.समीक्षा/आलोचना :- 1.नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य २.हिंदी साहित्य विविध आयाम ३.दलित साहित्य विविध आयाम ४.अंतरजाल की दुनिया

पुरस्कार :-1. “मैं वर्ण और वर्णनातित” कविता को विश्व हिंदी सचिवाल, मोरिशियस का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार। २. ‘’कैची और बंदूक’’ एकांकी को विश्व हिंदी सचिवाल, मोरिशियस का तृतीय अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार।

सम्प्रति :- हिंदी विभाग, यशवंत महाविद्यालय, नांदेड

पता:- महाराणा प्रताप हाउसिंग सोसाइटी, हनुमान गढ़ कमान के सामने, नांदेड-४३१६०५

1 टिप्पणियाँ

  1. महोदय लेखक सुनील सिंह जाघव जी मैंने आपके द्वारा रचित नाटक शीर्षक *अमरबेल* पड़ा नाटक की विषय वस्तु व प्रस्तुतीकरण बेहतरीन है

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