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रिश्तों की डोर - ज्ञानदेव मुकेश

रिश्तों की डोर 

    सुबह-सुबह मौसा के पिता जी के निधन का दुखद समाचार मिला। यह सूचना मुझे सीधे तौर पर नहीं मिली थी। किसी अन्य रिश्तेदार को यह सूचना व्हाट्सएप पर दी गई थी और उन्होंने मुझे यह मेसेज फारवर्ड किया था।
    इस सूचना से मैं विचलित होने लगा था। वे सभी पास के ही शहर में रहते थे। मैं वहां अक्सर जाया करता था और मौसा के पिताजी के पास बैठा करता था। वे अधिकतर पुरानी बातें ही किया करते थे। मगर उनमें पूरी ताजगी होती थी। मन प्रसन्न हो जाया करता था। उनका स्वास्थ्य ठीक था। अचानक क्या हो गया, कुछ समझ में नहीं आ रहा था।
   मैं वहां फौरन जाने की तैयारी में जुट गया। सोचा, पहले मौसा को फोन कर लूं। मैंने उन्हें फोन लगाया और पिताजी के निधन पर अफसोस जताया। आवाज से वे बड़े सहज से लगे, मानो आम दिनों की तरह बात हो रही हो। मैंने आगे कहा, ‘‘मौसा जी, मैं अभी तुरंत घर से निकल रहा हूं। बस एक से डेढ़ घंटे में पहुंच जाऊंगा। मंजिल पर निकलने से पहले मेरी थोड़ी प्रतीक्षा कर लीजिएगा।’’
   उधर से मौसा की बड़ी निर्मोही आवाज सुनाई दी। उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, खामख्वाह क्यों परेशान हो रहे हो ? आना कोई जरूरी नहीं है। वे तो बूढ़े-पुराने व्यक्ति थे। उनके जाने का समय तो हो ही चला था। तुम अपने ऑफिस और घर का काम देखो।’’
    और फोन कट गया। सुबह किसी के जीवन की डोर टूटी थी। मगर अभी एक और डोर के टूट जाने की आवाज सुनाई दी, जो कहीं ज्यादा तेज और कड़वी थी। मैं पहले से अधिक शोकाकुल हो गया।
       
                                                        -ज्ञानदेव मुकेश                         
                                     पता-
                                                 फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                 अल्पना मार्केट के पास,
                                                 न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                 पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. पुराने लोगों के साथ रिश्ते भी समाप्त होते जा रहे हैं इसी भाव को अभिव्यक्त करती सुंदर लघुकथा |

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