नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

नवगीत, दोहे व ग़ज़लें - अविनाश ब्यौहार

 

(ऊपर का चित्र - धर्मेंद्र मेवाड़ी की कलाकृति)


मुक्तिका

//हिंदी ग़ज़ल//

नेक बुरा सब हुआ उजागर।
जहाँ आँसुओं का है सागर।।
पड़ा हुआ चहूँ ओर है सूखा,
छूछी  है  मेघों  की   गागर।
मुझे जंगली दिखता है अब,
आज आदमी जो है नागर।
वृक्ष  बहुत  होते हैं लेकिन,
देवों का निवास है साँगर।
रुसवाई  नारी  से मिलती,
इसीलिए खो जाता जाँगर।
धंधा  हमने खूब किया है,
पर वो आँसू का सौदागर।

नवगीत

श्रीमान जी
छत पर बैठे
करें जुगाली।
आगजनी है,
तोड़ फोड़ है,
दंगे हैं।
हर आदमी
इस हम्माम
में नंगे हैं।
सत्ता की
लगाम को थामे
हैं मवाली।
ग़फ़लत है
जुबानों पर
पड़े हैं ताले।
जनतंत्र पर
अट्टाहास
हैं घोटाले।
एक हाथ से
कभी नहीं
बजेगी ताली।

दोहे

आज देश में चल रहे, जहाँ सियासी खेल।
निरपराध  है  व्यूह में, अपराधी  से  मेल।।
लोकतंत्र को खा.गए, दीमक जैसे आज।
रिश्वत को पहना दिया, बदमाशों ने ताज।।
रिश्वत जो खाते रहे, हुए गुलाबी लाल।
ऐसे लोगों का उदर, सच में एक सवाल।।
बड़े लगें जो उमर में  , वे खुद हैं गुमराह।
आने वाली पौध की, क्या समझेंगे चाह।।
वे  कटुता  बोते  रहे,  हमनें  किया  निबाह।
सच का दामन पकड़ कर, भटके अपनी राह।।
धरती पर मानव बसा, हथियारों की होड़।
बेखटके  कैसे  चलें,  आगे  अंधा   मोड़।
--

//नवगीत//

वे करते
गाली गलौज तो
उनके अपने
पैमाने हैं।
मेल मिलाप
यहाँ होता है
सीमा में।
अगर जायका
मिलता है तो
कीमा में।।
मुजरिम को जो
गले लगा लें
भारत के ऐसे
थाने हैं।
है नग्नता
जवान स्त्रियों
के फैशन में।
मात्र ऐब
की मूरत है
काले मन में।।
यौवन आज
नशे में डूबा
गली गली में
मयखाने हैं।
--

नवगीत

सोने के
दिन होते हैं
चाँदी की रातें।
अंबर पर
चमके-
झिलमिल तारे हैं।
बैठा मचान पर
वक्त-
पुकारे है।।
साँझ हुई तो
दिखतीं हैं
चिड़ियों की पाँतें।
एक तरफ
पैसों के
पेड़ लगे।
देखें हम
लोकतंत्र को
ठगे ठगे।।
महानगर का
चौड़ा पथ
निकलीं बारातें।
---

//-हिंदी ग़ज़ल-//

धरती - अंबर - तारे  होंगे।
उनके   वारे   न्यारे  होंगे।
नदिया कितनी भी मीठी हो,
पर   ये   सागर  खारे  होंगे।
जुगनू  जो  रातों में निकले,
अंधेरे   तो   हारे    होंगे।
रातें  जब  बूढ़ी  हो जाएं,
निश्चित तब भिन्सारे होंगे।
तम जब हिम सा गल जाता है,
उत्सव   से   उजियारे   होंगे।
---

//-हिंदी ग़ज़ल-//

हम भी ईश्वर के बंदे हैं।
वे तो खूंखार दरिंदे हैं।।
हक गैरों का अब मारेंगे,
सोच विचार लगे गंदे हैं।
सरकारी कर की चोरी है,
रिश्वतखोरी  के  धंधे  हैं।
अच्छे लोगों की पूँछ नहीं,
आँखों  के  होते  अंधे हैं।
चौराहों  पर  दारूखोरी,
वे  माँग  रहे  थे  चंदे हैं।
--
अविनाश ब्यौहार
रायल एस्टेट कटंगी रोड
जबलपुर म.प्र.

1 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.