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व्यवस्था और शामिल लोग - नाथ गोरखपुरी

व्यवस्था और शामिल लोग

गरीब असहाय व्यक्ति जब अपने किसी कार्य को कराने के लिए सरकारी महकमे में अपनी गुहार लेकर सदस्य के पास पहुंचता है....

सदस सदस काज करअ

काज कअ अकाज बा

कइसे मोर जीव बाचि

घरे ना अनाज बा


सदस्य कहता है ठीक है मैं तुम्हारा सभी काम कर दूंगा उसके बदले में मुझे इतना पैसा चाहिए,

ऐसी बात सुनकर वह उसके अध्यक्ष के

पास शिकायत लेकर पहुंचता है

अधछ अधछ सदस कहअ

सदस नाही काज करे

मोसे कमीशन मांगे

कहाँ से कमीशन लाईं

जीव के जंजाल बा

कइसे मोर जीव बाचि

घरे ना अनाज बा


अध्यक्ष सोचता है कि मेरे ही इशारे पे वह कमीशन ले रहा है और उस कमिशन में मेरा भी हिस्सा है तो मैं इसकी फरियाद कैसे सुनु, वह फरियादी को मना कर देता है।

फरियादी उन दोनों को सजा दिलाने के लिए पुलिस के पास पहुंचता है और उन्हें पकड़ने के लिए कहता है..

पुलिस पुलिस अधछ पकड़ा

अधछ ना सदस कहे

सदस नाही काज करे

मोसे कमीशन मांगे

कहाँ से कमीशन लाईं

जीव के जंजाल बा

कइसे मोर जीव बाचि

घरे ना अनाज बा


पुलिस वाले सोचते हैं कि अध्यक्ष के द्वारा हर महीने में हमको कमीशन मिलता है उसके ऊपर कार्यवाही कैसे करें वह भी मना कर देतें है

तब वह फरियादी अपनी फरियाद लेकर उनके उच्च अधिकारी के पास पहुंचता है..

साहब साहब (उच्च अधिकारी)पुलिस डाँटो

पुलिस ना अधछ पकड़े

अधछ नाही सदस कहे

सदस नाहि काज करे

मोसे कमीशन मांगे

कहाँ से कमीशन लाईं

जीव के जंजाल बा

कइसे मोर जीव बाचि

घरे ना अनाज बा


उच्च अधिकारी सोचता है कि नीचे से कमीशन का अच्छा खासा हिस्सा तो मेरे पास भी आता है और मैं ऐसा करूंगा तो कमीशन आना बंद हो जाएगा इसलिए वह भी उस फरियादी को भगा देता है

तब वह फरियादी अपनी फरियाद लेकर अपने चुने हुए नेता के पास पहुंचता है

मालिक मालिक (नेता) साहेब कहा

साऐब ना पुलिस डांटे

पुलिस ना अधछ पकड़े

अधछ नाही सदस कहे

सदस नाहि काज करे

मोसे कमीशन मांगे

कहाँ से कमीशन लाईं

जीव के जंजाल बा

कइसे मोर जीव बाचि

घरे ना अनाज बा


नेता भी सोचता है कि प्रत्येक योजनाओं का जो कमीशन है वह मुझ तक भी पहुंचता है मैं इस पर कार्रवाई कैसे कर सकता हूँ। इसलिए वह भी इस काम को करने से मना कर देता है

निराश और दुःखी होकर फरियादी अपनी फरियाद लेकर सरकार के पास पहुंचता है

संसद संसद (सरकार) मालिक डाँटो

मालिक ना साहेब कहें

साऐब ना पुलिस डांटे

पुलिस ना अधछ पकड़े

अधछ नाही सदस कहे

सदस नाहि काज करे

मोसे कमीशन मांगे

कहाँ से कमीशन लाईं

जीव के जंजाल बा

कइसे मोर जीव बाचि

घरे ना अनाज बा


सत्ता में बनी हुई सरकार भी यह सोचती है, कि हम जो योजनाएं लागू कर रहे हैं। उसी के द्वारा अच्छा सा कमीशन हमारे पार्टी फंड में भी मिलता है, और इसलिए वह भी इस फरियाद को अनसुना कर देती है।

अंत में थक हारकर वह निराश हो जाता है, वह इस व्यवस्था से बहुत ही दुःखी होता है।

तभी उसकी मुलाकात एक वकील से होती है। वह वकील न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाने की बात करता है।

तो वह व्यक्ति कहता है कि मेरी फरियाद को नहीं सुनने वालों की संख्या तो बहुत बड़ी है और मैं किस-किस पर मुकदमा करूंगा?

अंत में वह व्यक्ति विचार करता है कि मैं यदि जनता को जागरूक कर दूं , तो मेरे कार्य और मेरे जैसे दुखी सभी व्यक्तियों के कार्य बड़ी आसानी से होने लगेंगे और ऐसी व्यवस्था भी नष्ट होगी।

तब वह लोगों को जागरूक करने का कार्य शुरू करता है , कि हमें अपने कार्य के लिए किसी को भी कमीशन देने की आवश्यकता नहीं है। जो कार्य करने वाले लोग हैं उनका काम ही है हमारे समस्याओं का समाधान करना । ऐसे में हम उनको अगर कमीशन देंगे तो उनका मन बढ़ेगा और इस तरह भ्रष्टाचार का बोलबाला होगा, धीरे-धीरे उसके साथ हजारों लाखों की भीड़ शामिल हो जाती है। तब सरकार की नजर उस व्यक्ति पर पहुंचती है । सरकार अपनी सत्ता बचाने के लिए और उन समूहों का जो उस व्यक्ति के साथ खड़े हुए हैं उनका वोट बैंक हासिल करने के लिए उस व्यक्ति के बातों को मानने के लिए तैयार हो जाती है , लेकिन वह व्यक्ति अब अपने काम को करवाने के प्रति इतना उत्सुक नहीं होता है। वह ऐसी पूरी व्यवस्था को खत्म करना चाहता है । वह सरकार से खुलेआम कहता है कि अगर ऐसी व्यवस्थाएं नहीं बदली गई तो बहुत बड़ा आंदोलन होगा जिसमें तुम्हारी सरकार अथवा तुम्हारे जैसी सरकार कभी नहीं चुनी जाएगी।

               - नाथ गोरखपुरी

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