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वैचारिक साहित्य के अनुवाद का महत्त्व - डॉ. विजय शिंदे

वैचारिक साहित्य के अनुवाद का महत्त्व

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय औरंगाबाद

भविष्य में वैश्विक स्तर पर भाषिक तौर से कई बदलाव होने की संभावनाएं बन रही है। उसका मूल कारण वैश्विकरण है। देश-दुनिया कई मायनों में एक समान स्तर पर काम करने की मानसिकता से गुजर रहे हैं। आर्थिक और औद्योगिक प्रगति मनुष्य को एक-दूसरे के पास लेकर आ रही है। इन स्थितियों में आपसी विचार-विमर्श और वैचारिक आदान-प्रदान के लिए भाषा की मदद लेनी पड़ती है। हर एक को देश और दुनिया की सभी भाषा का ज्ञान हो या कोई एक व्यक्ति एक से ज्यादा भाषाओं में निपुण होगा कहना गलत होगा। ऐसी स्थितियों में अनुवाद की अहं भूमिका रहती है। भारतीय और वैश्विक साहित्य जगत में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अनुवाद के माध्यम से देश-दुनिया का प्रसिद्ध साहित्य, वैचारिक साहित्य, ज्ञानात्मक साहित्य, तंत्रविज्ञान, विज्ञान और तमाम प्रकारों की सामग्री हमारे लिए उपलब्ध हो रही है। लेकिन इस अनुवाद की प्रक्रिया सहज और सरल नहीं है। कई प्रकार की मुश्किलों से पार करता यह कार्य लेखक और अनुवादक की कड़ी परीक्षा लेता है। इस परीक्षा में सफल होनेवाला व्यक्ति ही सही अनुवाद को अंजाम तक लेकर जा सकता है। वैचारिक साहित्य के अनुवाद करते समय वैसी ही कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कई प्रकार की मानसिकताओं और दबावों से गुजरना पड़ता है। निरंतरता अगर खंड़ित हो गई तो दुबारा अनुवाद की गाडी को पटरी पर लाना भी मुश्किल होता है।

1. अनौपचारिकता

हमारे पास अनुवाद के लिए पहुंची सामग्री, विषय और उसमें अभिव्यक्त विचारों के साथ हमारा निजी संबंध हो ऐसा संभव नहीं है अगर है तो बहुत अच्छा तब अनुवाद में रुचि निर्माण हो सकती है। लेकिन अक्सर ऐसे नहीं होता है। खैर अनुवाद करनेवाले विषय और विचारों के साथ अनौपचारिक रूप से हमें जोड़ना पड़ता है। यह जुड़ाव सही है तो वैचारिक साहित्य के अनुवाद के समाजशास्त्र को आप सही मायने में पकड़ सकते हैं अन्यथा अनुवाद का प्रभावहीन बनना संभव है।

किसी भी वैचारिक साहित्य के अनुवाद के दौरान उसको आरंभ से अंत तक पढ़कर आकलन करना अत्यंत आवश्यक होता है। यह आकलन अनौपचारिक और सहज हो। अर्थात हम जिस भी वैचारिक साहित्य का अनुवाद कर रहे हैं उसमें अभिव्यक्त विचारों के साथ अनौपचारिक रूप से जुड़ना जरूरी है।

2. द्विभाषिकता

अनुवाद के लिए स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा का महत्त्व अधिक होता है। दोनों भाषाओं पर अनुवादक का समानाधिकार होना अत्यंत जरूरी होता है। अगर यह ना हो तो अनुवाद में मुश्किलें तो आती है साथ ही किया जानेवाला अनुवाद दोषपूर्ण भी रह रह सकता है। अतः सफल अनुवाद करने के लिए द्विभाषिक होना अत्यंत आवश्यक है और वह भी निपुणता के साथ।

3. सैंद्धातिकता

अनुवादक को अनुवाद की सैद्धांतिक बातें, कसौटियां तो पता होनी चाहिए लेकिन वैचारिक साहित्य में कई बार सैद्धांतिक कथन भी होता है। अर्थात अनुवादक को उन सिद्धांतों के स्तर तक जाना आवश्यक है। कुलमिलाकर यहां हमारा कहना यह है कि अनुवाद लेखक के विचारों के समकक्ष अपने-आप को रखे तभी सही अनुवाद हो सकता है।

4. समन्वय और संतुलन

वैचारिक साहित्य के अनुवाद में अनुवादक को भाषाई समन्वय के साथ वैचारिक समन्वय को बनाया रखना चाहिए। यही समन्वय और संतुलन अनुवाद के स्तर को मकाम तक लेकर जा सकता है और स्तरीय भी बनाता है।

5. वैचारिक साहित्य के अनुवाद का महत्त्व

इंसान भौतिक प्रगति के साथ वैचारिक प्रगति भी चाहता है। हमारे पास सुख-सुविधाएं, पैसा, साधन-संपत्ति बहुत अधिक है लेकिन वैचारिक स्तर निम्न है तो समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करना असंभव है। मनुष्य की सारी इच्छा-आकांक्षाएं और सारे सुख-सुविधाएं पूरी होने के बाद अपेक्षा होती है कि उसे समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त हो। उसे यह प्रतिष्ठा वैचारिक परिपक्वता के बिना प्राप्त नहीं होती है। अतः किसी भी व्यक्ति की वैचारिक दृष्टि परिपक्व होना आवश्यक है। इस परिपक्वता से प्रत्येक आदमी अपनी भावनाओं पर नियंत्रण कर सकता है और साथ ही वह समाज में प्रतिष्ठा पा सकता है। इसी वैचारिक परिपक्वता के बलबूते पर आदमी विकास यात्रा को तय कर सकता है और जीवन में अपने उद्देश्यों को छू भी सकता है। अर्थात वैचारिक साहित्य इंसान को परिपक्व बनाने में सक्षम है चाहे वह किसी भी भाषा का हो। एक ही भाषा में लिखी गई सामग्री से किसी इंसान की भूख पूरी हो यह संभव नहीं है; अतः अन्य भाषा के स्तरीय साहित्य को अनुवादित करना पड़ता है। इससे इंसान की वैचारिक भूख पूरी होती है और परिपक्वता भी आ जाती है।

वैचारिक परिपक्वता को एक संत कथा के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।

संत ज्ञानेश्वर, संत मुक्ताबाई और संत नामदेव एक बार गोरा कुंभार नामक संत के घर पधारे थे। संत गोरा कुम्हार थे और मिट्टी के बर्तन बनाते थे। अध्यात्मिक चर्चा के समय मुक्ताबाई ने वहां रखे एक डंड़े को देखा और गोरा से  पूछा, “इसका क्या उपयोग है?”

उत्तर मिला, “इससे मैं तैयार घड़ों का निरीक्षण करता हूं कि वे कच्चे हैं या पक्के।”

मुस्कराते हुए मुक्ताबाई ने सवाल किया कि “क्या इससे हम इंसानों की भी परीक्षा ली जा सकती है?”

“अवश्य।”
“तो कृपया हमारी भी परीक्षा कर दीजिए।”

संत गोरा ने परीक्षण शुरू कर दिया।

पहले संत ज्ञानेश्वर के सिर पर डंड़े से हल्का-सा प्रहार किया। वे शांत भाव से मुस्कराते रहे। इसी तरह साध्वी मुक्ताबाई के सर पर प्रहार किया, वे भी मुस्कराई। जैसे ही नामदेव के सिर पर प्रहार किया, वे चुप रहे किंतु चेहरे पर क्रोध स्पष्ट झलक रहा था।

संत गोरा ने तुरंत कहा, “यह घड़ा अभी कच्चा है।” फिर संत गोरा विनम्रता से बोले, “क्षमा करें नामदेव जी, आप में अभी तनिक अहंकार शेष है। जब तक यह अहंकार का सर्प मरेगा नहीं, डंड़े के प्रहार से क्रोध आएगा, मुस्कान नहीं।”

इस उदाहरण से इंसान को एक विचार के नाते जिंदगी के लिए यह सीख मिलती है कि अहंकार, घमंड़, गर्व पर यथासंभव विजय प्राप्त करें। तभी एक साधारण व्यक्ति घड़े की तरह पक्का बन सकता है। अर्थात हमारे आस-पास के साहित्य में जो नहीं है वह अनुवाद के माध्यम से हमें प्राप्त हो सकता है। देश और दुनिया में अनेक प्रकार के धर्म, जाति, पंथ और रूढ़ियां है। हर एक के अपने नैतिक नियम, सभ्यताएं, संस्कार और सामाजिक रीति-रिवाज है जिसे हमें अनुवाद करते समय ध्यान रखना पड़ता है। कुलमिलाकर यह सारी बातें इंसान के लिए वैचारिक रूप से ताकतवर बनाती है। इन्हीं विचारों को स्थायी रूप से परिपूर्ण अनुवाद के लिए दोनों भाषाओं की सूक्ष्मताओं के साथ सामाजिक ज्ञान का होना अत्यंत आवश्यक है।

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की दो किताबों को ‘अंधविश्वास उन्मूलन : सिद्धांत’ और ‘भ्रम और निरसन’ इन किताबों का अनुवाद मैंने किया है और यह दोनों किताबें अंधविश्वासों से सामाजिक मुक्ति के लिए बूनियादी बातों के साथ वैचारिक विश्लेषण भी करती है। यह वैचारिक पक्ष सैद्धांतिक पक्षों के साथ भी आता है। इन दो किताबों के अलावा डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की अन्य वैचारिक किताबों का एक टिम के नाते दूसरे अनुवादक भी कार्य कर रहे हैं जिसके साथ हमारा जुड़ाव है। अतः इनमें आनेवाली समस्याएं, उनका समाधान और समन्वय किस प्रकार से किया जाना चाहिए इसे बखूबी जानते हैं।

महाराष्ट्र की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह सारी किताबें भारतीय पृष्ठभूमि में लेकर जाते वक्त कई मायनों में सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और ऐतिहासिक पक्षों को उजागर करती है, इसका ध्यान रखना पड़ता है। इन पक्षों का बेहतर अनुवाद, अनुवादकीय विकल्प रखना अत्यंत आवश्यक बनता है। लेखक एक है और उसके साहित्य के अनुवाद करनेवाले एक से अधिक है तो उसके वैचारिक और सैद्धांतिक समन्वय के लिए संपादक की भी जरूरत पड़ती है ताकि वह अनुवादकीय विविधता को खत्म करके एक समान बना सके। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के संपूर्ण साहित्य के अनुवाद की जिम्मेदारी बारह अनुवादकों पर रही और उसके समन्वय-संपादन की जिम्मेदारी डॉ. चंदा सोनकर तथा डॉ. सुनिलकुमार लवटे जी की रही। इससे लाभ यह हुआ कि विभिन्न सामाजिक रीति-रिवाजों, परंपराओं गलत धारणाओं के वैचारिक पक्ष, सैद्धांतिक पक्ष का सही अनुवाद करना संभव हुआ। साथ ही एक से अधिक अनुवादकों के बावजूद भी अनुवादित साहित्य में समन्वय और तालमेल बिठाया गया। प्रस्तुत साहित्य के अनुवाद के प्रकाशन की जिम्मेदारी राजकमल प्रकाशन उठा रहा है। राजकमल प्रकाशन, अंधविश्वास उन्मूलन समिति महाराष्ट्र और भारतीय स्तर, सारे अनुवादक, संपादक, समन्वयक और स्वयं डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के परिवारजनों के सहयोग, तालमेल से परिपूर्णता की ओर जाता यह कार्य वैचारिक साहित्य के सामाजिक पक्ष को न्याय देने में सक्षम है।

महाराजा सयाजीराव गायकवाड चरित्र साधन सामग्री प्रकाशन समिति का कार्य भी कुछ इसी प्रकार का है। जिसे अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है। डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जी के वैचारिक साहित्य के अनुवाद कार्य से यह व्यापक अनुवाद की चुनौतीवाला कार्य है। एक राजा की प्रशासनिक व्यवस्था, पत्राचार, भाषण, गौरवग्रंथ, विभिन्न विद्वतजनों के लेख, रिपोर्टे, स्वयं महाराजा सयाजीराव के भाषण, पत्र लेखन, समीक्षाएं, प्रशासकीय विचार व्यक्त करनेवाले लेख, टिप्पण, रिपोर्ट, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विचार आदि का अनुवाद करना, उसमें समन्वय रखना एक प्रकार से चुनौती है। मराठी के प्रसिद्ध लेखक बाबा भांड जी ने इस बड़े प्रकल्प को मराठी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा में एक साथ पूरा करने का संकल्प किया है। इस प्रकल्प के 25 खंड प्रकाशित हो चुके हैं और मराठी, हिंदी और अंग्रेजी इन तीनों भाषाओं में कई खंड प्रकाशन की स्थितियों में है। महाराजा सयाजीराव से जुड़ी संपूर्ण सामग्री का विविध भाषाओं में अनुवाद, समन्वय, संपादन किसी चुनौती से कम नहीं है। तत्कालीन समाज की सूक्ष्मताओं को वर्तमान के साथ जोड़ना अत्यंत आवश्यकता तथा उसकी प्रासंगिकता को रेखांकित करना अत्यंत आवश्यक है।

यह दो उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूं कि इन दोनों प्रकल्पों के साथ जुड़ चुका है। अनुवादक, संपादक और समन्वय की भूमिका से गुजर रहा हूं तो इसको महसूस भी करता हूं और उसकी सामाजिक और सांस्कृतिक पेचीदगियों को जानता हूं। अनुवाद कार्य को पूरा करना चुनौतीभरा होता है। आगे जाकर कहे तो यह सृजन से भी मुश्किल कार्य माना जा सकता है। इसमें दो भाषाओं पर असामान्य अधिकार के साथ पेशंस और निरंतरता की अत्यंत आवश्यकता है।

किसी भी भाषा में लिखे विचारप्रधान साहित्य की आवश्यकता व्यापक मनुष्य हित के लिए अत्यंत आवश्यक है। समाज में सभी उचित व्यवहार करेंगे इसका कभी भी दावा नहीं किया जा सकता। अतः गलत व्यवहारों को दुरुस्त करने के लिए सही बातों और व्यवहारों को पुख्ता करना जरूरी होता है और इसी जरूरत की पूर्ति वैचारिक साहित्य लिखने वाले विद्वतजन करते हैं। अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग सामाजिक परिस्थिति में लिखे गए वैचारिक साहित्य के प्रचार-प्रसार का सही साधन अनुवाद ही होता है इसके सामाजिक शास्त्र को समझना अनुवाद प्रक्रिया में जरूरी होता है। मैं डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के अंधविश्वास उन्मूलन पर आधारित साहित्य के अनुवाद के पश्चात लिख सकता हूं कि हमारा देश विज्ञानवादी, आधुनिक और प्रगत होने का ढिंढ़ोरा पीटता है, लेकिन असल में हम अपने भीतर झांककर अपने आप से पूछे कि हम वैसे हैं? भारत के दूर-दराज पिछड़े इलाकों से लेकर महानगरों और मेट्रो सिटियों में जिस प्रकार के भ्रम, अंधविश्वास फैले हैं तथा पाले जा रहे हैं वह हमारे विज्ञानवादी, आधुनिक और प्रगत होने के दांवों पर कालिख पोत रहे हैं। शिक्षा पाने से कोई विवेकवादी नहीं बनता है। सामान्य से असामान्य व्यक्ति तक का नजरिया अगर विवेकहीन है, रूढ़ि-परंपरावादी है, अंधविश्वासी है तो उसको बहुत बड़ी हानी पहुंच सकती है। अतः डॉ. नरेंद्र दाभोलकर का जिंदगी के सारे चिंतन और सामाजिक सुधारों में यही प्रयास था कि इंसान विवेकवादी बने। उनका किसी जाति-धर्म-वर्ण के प्रति विद्रोह नहीं था। लेकिन षड़यंत्रकारी राजनीति के चलते अपनी सत्ता की कुर्सियों, धर्माड़ंबरी गढ़ों को बनाए रखने के लिए उन्हें हिंदू विरोधी करार देने की कोशिश की गई और कट्टर हिंदुओं के धार्मिक अंधविश्वासों के चलते एक सुधारक का खून किया गया। अर्थात बहुत दूर जाने की भी जरूरत नहीं है, डॉ. दाभोलकर का ऐसे लोगों से खून किया जाना भी विवेकहीनता का ही उदाहरण है। सत्य साईं, आसाराम, रामरहीम आदि पाखंड़ी लोग हमारे देश में स्थापित होते हैं, करोड़ों रुपए की संपत्ति से किसी हनिप्रित के साथ बाप-बेटी के रिश्ते को ताक पर छोड़कर ऐयाशी की रासलीलाएं रचते हैं। यह किस प्रकार का धर्मप्रचार है? बड़े-बड़े सेलिब्रेटी भी ऐसे पाखंड़ी बाबाओं के सामने बड़ी लिनता के साथ झूककर चुमा-चाटी करते हैं। क्या उन्हें पता नहीं है कि ऐसे पाखंड़ी बाबा के साथ जुड़कर भारतीय समाज में एक आदर्श व्यक्ति के नाते हम कौन-सा आदर्श रखने जा रहे हैं? ऐसे समय में बगले झांकना शुरू किया जाता है कि यह हमारी निजी जिंदगी है, लेकिन कोई भी सेलिब्रटी और आम व्यक्ति इस बात को ध्यान रखे कि जिस समय हमारा दहलिज के बाहर कदम पड़ता है और सामाजिक होते हैं तब हमारा निजत्व खत्म होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा वर्तन हमेशा विवेक के साथ ही हो। अर्थात विवेकवादी विचार एक सामाजिक जरूरत है लेकिन विवेकवादिता और अंधविश्वास से भरी विवेकहीनता की टकराहट के समाजशास्त्र को समझकर समाज और जनमानस को सही रास्तों पर लेकर जाना इस प्रकार के साहित्य और उसके अनुवाद के महत्त्व को प्रखरता से सामने लेकर आता है।

महाराजा सयाजीराव गायकवाड के साहित्य के लिए भी बिल्कुल यहीं बात लागू होती है। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक विचारों की उदारता इस राजा में थी और न केवल उस समय आज भी और भविष्य में भी उनके यह उदारवादी, सामाजिक विचार सबके लिए मार्गदर्शक है, अतः सबल, स्वस्थ, सामाजिक माहौल और विकास का रास्ता तय करना है तो महाराजा सयाजीराव ने जिन तकनीकों का इस्तेमाल किया उस समाजशास्त्र को समझकर अनुवाद करना आवश्यक बनता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है वर्तमान और भविष्य में अनुवाद के क्षेत्र में साहित्य, वैचारिक साहित्य और इसके अलावा भी अन्य प्रकार की सामग्री के अनुवाद की असीम संभावनाएं हैं और आवश्यकता भी। यह वैश्विक सामग्री को प्रचारित और प्रसारित करती है तथा सबको एक साथ विकास के रास्तों पर लेकर जाने की क्षमता रखती है।

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