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डॉ आर बी भण्डारकर की रचनाएँ

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* शाश्वत सत्य *                                -डॉ आर बी भण्डारकर वंदन जी छल-कपट ,बेईमानी से एकदम दूर बहुत नेक ,सत्यनिष्ठ,कर्तव्य परायण व्य...

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* शाश्वत सत्य *

                               -डॉ आर बी भण्डारकर

वंदन जी छल-कपट ,बेईमानी से एकदम दूर बहुत नेक ,सत्यनिष्ठ,कर्तव्य परायण व्यक्ति हैं। वे  निस्पृह है, सबसे हिलमिल कर रहना,बड़ों का सम्मान,परमब्रह्म में अटूट आस्था उनकी आदत में शुमार है।

         वे जब भी घर से बाहर कहीं जाते हैं तब उन्हें रास्ते में कहीं भी कोई भी देव-स्थल-मंदिर,मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च ,मज़ार, समाधि आदि दिखता है तो वे स्वाभाविक रूप से नमन करते हुए ही आगे बढ़ते हैं। बहुतेरे लोग उनके इस स्वभाव का मज़ाक उड़ाते हैं,कुछ लोग उन्हें ढोंगी, तो कुछ बहुरूपिया कहते हैं।

         यह सब होता रहता है पर वंदन जी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है।

         वंदन जी जितने सरल और शालीन हैं,नन्दन जी उतने ही मजाकिया और मुँहफट। एक दिन उन्होंने पूछ ही लिया वंदन जी से-"भैया वंदन जी आप किस ईश्वर को मानते हैं? मैं देखता हूँ कि आप तो मंदिर,मस्जिद, गुरुद्वारा चर्च  सब जगह सिर झुकाते हुए दिख जाते है।"

      "भैया नंदन जी सच बात तो यह है कि मैं तो कहीं भी सिर नहीं झुकाता हूँ। जब भी मैं किसी देवस्थल के सामने से गुजरता हूँ तो मेरा सिर अपने आप ही झुक जाता है। उसे न कोई मंदिर लगता है न मस्जिद,न चर्च न गुरुद्वारा उसे तो सब के सब  परम् पिता परमात्मा के ठौर दिखते हैं सो वह अपने कर्त्ता के प्रति अनायास ही झुक जाता है।

पास में खड़े यह वार्त्ता सुन रहे एक बुज़ुर्ग कह उठते हैं। "समझे नन्दन जी कुछ; हमारे देश में जो भाईचारा है, जो सौमनस्य है, एकीकरण का जो भाव है वह वंदन जी जैसे लोगों के कारण ही है; और ऐसे ही सत्य पर यह धरती टिकी हुई है।"

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सी-9,स्टार होम्स

रोहितनगर फेस-2

भोपाल 39

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    * मेल कराते ये मेले *

                      - डॉ आर बी भण्डारकर

सुमतिराय के गाँव में आज बड़ी चहल-पहल है।....हो भी क्यों न ,आज स्नान पूर्णिमा है जो।

भारतीय कलेंडर में कार्तिक मास की पूर्णिमा को स्नान पूर्णिमा भी कहा जाता है। सुमतिराय के आस-पास के गाँवों में आज के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का बड़ा महत्त्व है। 

सुमतिराय के गाँव के और आस-पास  के नजदीकी गाँवों के लोग आज के दिन उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के जगम्मनपुर कस्बे के पास स्थित "पचनदा" में स्नान करने जाते हैं,अब यह स्थान औरैया जिले के कंजौसा कस्बे में आता है। यहाँ सिंध,पहूज, क्वांरी,चंबल और यमुना ,पाँच नदियों का संगम है। यह स्थान तीर्थराज कहा जाता है इस दिन यहाँ एक विशाल मेला भी लगता है।

सुमतिराय के गाँव से थोड़े दक्षिण की ओर के गाँवों के लोग मध्यप्रदेश के दतिया जिले के सेंवढ़ा कस्बे  में स्थित "सनकुआ" जाते हैं। यह स्थान सनत, सनन्दन,सनत कुमार की तपस्या स्थली है। यहाँ सिंध नदी एक सुंदर जल प्रपात बनाती है। संत-तपस्या भूमि होने के कारण इसे "सब तीर्थों का भानेज" कहा जाता है। यहाँ भी इस दिन एक विशाल मेला लगता है। सेंवढ़ा का किला भी दर्शनीय है।इसे कन्नरगढ़ का किला भी कहा जाता है।

भोर का धुंधलका अभी छँटा भी नहीं है कि बूढ़े,बच्चे,प्रौढ़ स्नान हेतु जाने की तैयारी करने लगे हैं। महिलाएँ जल्दी-जल्दी पकवान बना रही हैं;इसके बाद उन्हें भी चलने के लिए तैयार होना है।

सबसे पहले गुलगुले बने।फिर बेसन की पपरियाँ,बाजरे के पुए और फिर पूड़ियाँ आदि। तेल की इसी कड़ाही में अब सब्जी छौंक दी गयी। सब्जी वही,मौसमी।किसी के यहाँ लौकिया,लौका(तूमरा) तो किसी के यहाँ तुरइया(गिल्की या घिया),

किसी के यहाँ,भिंडी या काले उरदा की फलियों की सब्जी।

आज भोजन तो स्नान के बाद ही किया जाएगा। सो सभी ने अपने अपने पकवान बर्तनों में भरकर कपड़े की पोटलियाँ बना ली हैं।

अब सज-धज कर जत्थे के जत्थे चल दिये हैं, पचनदे की ओर। घरों में रह गए नितांत बूढ़े,चलने फिरने में असमर्थ लोग। हाँ, इनके परिजनों ने इनके स्नान के लिए वहीं से पानी लाने के लिए अपने साथ बर्तन अवश्य ले लिए है। तीर्थ-स्थल पहुँच  कर सबसे पहले सभी बारी-बारी से स्नान करते हैं,फिर अन्नदान किया जाता है ,इसके बाद भोजन।

फिर सब मेला घूमते हैं। आवश्यकता के छोटे मोटे सामान खरीदते हैं। सुमतिराय के गाँव की महिलाएँ दूध गरम करने के लिए मिट्टी की दुधेन्ड़ी, दूध जमाने के लिए जमौना अवश्य खरीदती हैं। पुरुष चिलम खरीदते हुए देखे जा सकते हैं। चलते समय मिष्ठान के रूप में धान की खीलें और खीलदाने तो फलों के रूप में बिहीं(अमरूद)लाल टमाटर और मूली खरीदी जाती है।

...कैसा सुंदर भाव,उत्तम विचार;सभी लोग केवल इन सब ही फलों और मिठाइयों की खरीदी इसलिए करते हैं क्योंकि यह गरीब-अमीर सबकी क्षमता में होते हैं।

इस महापर्व पर संगम-स्थल पर भोजन के समय का दृश्य देखते ही बनता है।

"काकी तुम भिंडी लायी हो,लो मेरी तुरइया तो चखो,कक्का को तो बहुत पसंद आएगी।" कहती हुई रमुआ की बहू सुमतिराय की पत्नी को दो पूड़ियों पर धर कर तुरइयन की सब्जी दे देती है। तो वे उसे अपनी भिंडी की सब्जी इसी तरह देती हैं।

उधर सनेही की बहू  कुंदी की पत्नी से कह रही है-"छोटी अम्मा आज मैंने उरदा की कोंसिन की बहुत अच्छी सब्जी बनाई है,लो थोड़ी ले लो,तुम अपने लिए और थोड़ी  बप्पा के लिए।"

कोई किसी को आम का,मिर्च का, नीबू का या सहजन के अचार का आदान-प्रदान करता है तो कोई पुओं का।

यह आदान-प्रदान चल ही रहा है कि दुर्जन की पत्नी सुमतिराय की पत्नी के पास आकर कह रही है-"बड़ी अम्मा अबकी बार गरकटू(खेत का नाम)में लाल ज्वार तो खूब हुई ही,सफेद ज्वार भी 5 सेर हो गयी। कुछ बीज के लिए रख दी है, कुछ की कोंहरी बना ली थीं; आज सेर भर ज्वार के नुनखरे पुआ बनाये हैं। अभी मैंने और तुम्हारे दौरौत ने तो चखे नहीं पर "मोंड़ा" कह रहे  थे कि बड़े ही स्वादिल बने हैं;लो ये दो तुम चखो तो;और ये दो दाऊ को दे दो।"श्रीमती सुमतिराय पुए ले लेती हैं और उसे अपने बनाये हुए गरी व गोंद  युक्त स्वादिष्ट गुलगुले देती है।

जिन दुर्जन जी से सुमतिराय की पिछले साल भर से अनबन  चल रही है,यहाँ तक कि आपसी बोलचाल भी बन्द है,अपनी पत्नी से उनकी पत्नी का इस तरह मेल-मिलाप देख कर सुमतिराय दोनों का मुँह ताकते रह जाते हैं।

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   * भ्रम *

                                      -डॉ आर बी भण्डारकर

वृद्धावस्था निष्प्रयोजन ही एक रोग नहीं कही जाती है; वस्तुतः इस अवस्था में कुछ लोगों का स्वभाव ही कुछ शक्की-सा हो जाता है।

स्वाभाविक रूप से अपनी व्यस्तताओं और जीवन की आपाधापी के कारण कभी-कभी कुछ बच्चों का ध्यान अपने वृद्ध माता के प्रति कुछ कम-सा हो जाता है तब कुछ लोग तो बच्चों की मजबूरी जानकर समन्वय बिठा लेते हैं जबकि कुछ अपने को उपेक्षित अनुभव करने लगते हैं जबकि सच्चाई में उपेक्षा की स्थिति नहीं होती है।

सेवा निवृत्त हो चुके सत्तरवें वर्ष में चल रहे सुमतिराय को भी लगने लगा है कि उनके एकमेव बेटे का व्यवहार उनके प्रति कुछ उपेक्षा-पूर्ण हो चला है।

प्रतिदिन की तरह आज भी सुबह जल्दी उठ गए हैं,सुमति। बेटी की बात बड़े ध्यान से सुनते हैं वे। उनकी बेटी अपनी माँ से कह रही है "आज पापा जब सो रहे थे तब रात में भैया पापा के पैरों की मालिश कर रहे थे। और फिर जाते समय मुझसे कह गए हैं कि पापा जी बहुत कमजोर हो गए हैं, जब तक मैं दूर पदस्थ हूँ,तब तक तुम उनका सही ढंग से ध्यान रखना।"

अवाक रह जाते हैं सुमतिराय। अब  अपनी भ्रमपूर्ण सोच पर पश्चाताप करते हुए उनके आँसू अविरल बह रहे हैं। उनका भ्रम अश्रुधारा में बह गया है।

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                          ** गृहिणी-2 **

                                     - डॉ आर बी भण्डारकर।

बुंदेलखंड का नितांत पिछड़ा एक गाँव।यहाँ के प्रायः सभी रहवासी कृषि करते हैं साथ-साथ पशुपालन भी करते हैं।

परम्परा ही ऐसी चली आ रही है सो रग्घू की पत्नी जसन्ती प्रत्येक शाम को अपने दोनों बेटों को पीने के लिए भैंस का दूध तो देती है पर दूध को दुधेंड़ी में से पहले  जमौनों में उड़ेल देती है, बाद का कुछ दूध बचा लेती है,बेटों को पीने के लिए यही दूध देती है।

पूरे ही गाँव में गृहणियाँ ऐसा इसलिए करती हैं ताकि दूध गर्म करने पर उसमें जो मलाई बनती है वह जमौनों में चली जाए जिससे अधिक घी बन सके जिसे बेचकर जो आय हो उससे घर-गृहस्थी का खर्च अच्छी तरह चल सके।

रग्घू की माँ सुक्खी ने जमाना देखा है। उन्होंने गृहणियों की इस सोच के नफा-नुकसान भी देखे,समझे हैं। सो वे सर्दियां प्रारम्भ होते ही रोज सवेरे उठकर अपनी बहू को बिना बताए, जमौनों में से ऊपर ऊपर का दही निकाल कर अपने दोनों पोतों को खिला देती हैं क्योंकि वे जानतीं है कि दूध को जमाने के लिए जब जमौनों में उड़ेला जाता है तब जमौनों में मलाई ऊपर आ जाती है अतः ऊपर का दही अधिक चिकनाई वाला और अधिक पौष्टिक होता है।

कुछ दिनों बाद,जसन्ती अपनी सास सुक्खी का यह कृत्य जान तो जाती है पर मर्यादा के कारण न सास को टोकती है और न पति से शिकायत करती है।

पहले अट्ठा(सप्ताह) में घी पूर्व की अपेक्षा कम निकला; रग्घू ने सोचा ,कोई कारण पड़ गया होगा,सो पत्नी से कुछ नहीं कहा। पर जब लगातार दो,तीन अट्ठे तक घी कम ही निकलता रहा तो वह पत्नी पर चिल्लाया और घी कम निकलने का कारण स्पष्ट करने को कहा। पत्नी ने उतरे हुए चेहरे से,कनखियों से सास की ओर इशारा किया।

रग्घू पत्नी के निकट आकर,लगभग सटकर घुटनों के बल बैठते हुए फुसफुसाकर पूछता है-" क्यों,माँ ने क्या किया?"

" रोज सवेरे सवेरे उठकर ऊपर ऊपर का दही अपने लाड़ले पोतों को खिला देतीं हैं,अब छूँछन में से घी क्या खाक निकलेगा?"

घी कम निकलने से गृहस्थी के खर्च की तंगी की बात भूलकर,रग्घू खिलखिला पड़ता है-आ हा ! अब समझा लल्लू,बल्लू के चेहरों पर आई रौनक का रहस्य।"

अभावों से जूझता रग्घू आज काफी दिनों बाद हँसा था। आज घटनाक्रम से अनजान सुक्खी बेटे का मुँह ताकने लगती है।

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रचनाकार: डॉ आर बी भण्डारकर की रचनाएँ
डॉ आर बी भण्डारकर की रचनाएँ
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