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हम जो छले, छलते ही गये - आत्माराम यादव पीव

साझा करें:

हम जो छले , छलते ही गये ​​ 15 अगस्त की वह सुबह तो आयी थी जब विदेशी आंक्रान्ताओं से हमें शेष भारत की बागड़ोर मिली हम गुलाम थे , आजाद हुये आजाद...

हम जो छले, छलते ही गये

​​

15 अगस्त की वह सुबह तो आयी थी
जब विदेशी आंक्रान्ताओं से हमें
शेष भारत की बागड़ोर मिली
हम गुलाम थे, आजाद हुये
आजादी के समय भी हम छले गये थे
आज भी हम अपनों के हाथों छले जा रहे है।
भले आज हम आजादी में साँसे ले रहे है
पर यह कैसी आधी अधूरी आजादी ?
पहले अंगे्रेजों के जड़ाऊ महल बनाते थे
अब अपने ही तथाकथित नेताओं के
पिछलग्गू बने सैकड़ों हाथ मजदूर ही तो है?
तुम खुश हो विदेशियों की गुलामी से
तुम्हारें पूर्वज मुक्त हो गये है और
भारत आजाद देश हो गया है
पर यह भूल गये तुम्हारे पूर्वज गुलाम थे अंग्रेजों के
तुम भी गुलाम हो, अपनों के
तुम उन लोगों में हो जो कभी आजाद नहीं होते
तुम उन लोगों में हो जो गुलाम होकर भी नहीं होते
तुम्हारे तथाकथित अपनों ने
हजारों हाथों को तोड़ा है
हजारों कंधें इन्होंने उखाड़कर फेंके हैं
तुम सिर्फ मजदूर हो,मजबूर ही मरोंगे।।
तुम्हारे दादा मजदूर थे, तुम मजदूर हो
तुम्हने अपने माँ-बाप के साथ मजदूरी शुरू की
घर छोड़ा, परिवार छोड़ा, गाँव छोड़ा
शहर की चकियाचैध में तुम बना रहे हो अटटालिका
तुम्हारी बेटी कब जवान हो जाती है
तुम्हारे बच्चे सड़कों पर, कचरेघरों में
तलाशते है अपना भविष्य।
टूट जाते है वे दो जून की रोटी के लिये
सड़कां के किनारें, बसस्टेण्ड या
रेल्वेस्टेशनों के कौने-कुचेरे में होता है
तुम्हारा बिस्तर,
तुम्हारी गुदड़ी में आबारा कुत्ते भी
हाड़ कपा देने वाली ठण्ड से बच जाते है।
कोई एक दो नहीं तुम करोड़ों में हो
जिनका कोई भविष्य नहीं है
तुम्हें 15 अगस्त की आजादी का पता नहीं
तुम्हने कभी नहीं देखी परेड़
तुम्हें कोई भी नहीं खिलाता मिठाई
तुम 15 अगस्त 26 जनवरी को भी
चहकते मिल जाते हो,सिर्फ इसलिये
उस दिन तुम तिरंगा बेचकर
दो जून की रोटी का जुगाड़करके
पीव समर्पित हो जाते हो बेगारी के लिये।।

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​​

(2)

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***अंतरिक्ष में दफन होते शब्द****
रात की काली पलकें
जैसे आकाश ने मून्दी हो अलकें
भयाभय घनघोर काली है
मानों सारी अराजकता को समेटे
वसुन्धरा के लघुत्तम जीव से
सभी प्राणियों-वनस्पतियों के
उच्चारित शब्दों को
हृदय के भावों-पीड़ाओं कोे
अंतरिक्ष में दफन कर रही है।
ये शब्द इस धरा के
हर प्राणी के मुख से
सोते-जागते स्पन्दित है
एक चींटी की फुस्फुसाहट चीख से लेकर
एक भयाभय विशाल प्राणी की संवेदनाओं तक
अंकन करता है यह परमव्योम।
छोटी सी घास के तिनके या
लघुत्तम पौधे या पेड़ के पत्ते
अपनी टहनी से जब नोचे जाते है
तब घास और पौधे के भीषण दर्द को
वायु संवाहक बनकर
पहुंचाती है व्योम को
और यम के लेखे में
दर्ज होती है सबकी करनी।
धरती के प्रथम जीव,वनस्पति से लेकर
कोटिशः मानवों की तबसे
आज तक की संतति तक
यानी आपकी सभी पीढ़ियों से आप तक
सभी की करूणा,दया,वेदना
प्रार्थना,दुआ-बददुआ या
दर्दभरी चीख की संवेदनाओं की सिसकियां
अंतरिक्ष में हुंकार मार रही है।
अंतरिक्ष का यह मायाजाल
अपनी संप्रभुता के साथ
सदियों से हर मनुष्य,प्राणी वनस्पति के
एक-एक स्वर,शब्द और वाणी का
संग्रहालय बना हुआ है
और उसके जन्म से मृत्यु तक के
एक-एक पल, एक एक क्षण की
गुंजित हर ध्वनि,किये गये
कर्म-अकर्म और विकर्म का साक्षी है
और पराजगत का प्रमाणित दस्तावेज।
आकाश के इन अमिट दस्तावेजों को
समय की परिधि से निकालकर
पुर्नजीवित करने का अज्ञेय ज्ञान
कभी प्रगट कर सकेगा इंसान
यह समय के चक्रपातों में उलझे
उसके विवेक के लिये पीव
काला अक्षर भैस के बराबर ही है।
शरीर मरता है शब्द नहीं मरते
खुद को जीवित रखने के लिये
कन्दराओं-पहाड़ों के शिखर पर
इंसान उकेर आता है
अपने नाम के शब्द और लकीरें
शब्द वैसे ही जीवित रहते है
जैसे जिस भाव से उपजते है
शब्द गाना,गाली,रोने धोने वाले
आर्तनाद, सिंहनाद लिये होते है।
जिसके मुख से ये शब्द निकले
शब्द निकालने वाला
उन शब्दों का पिता होता है।
मुख से शब्द निकलने पर
वैमनस्यी गाली-गलौच से लबरेज शब्द
परछाई की तरह अपने पिता के
पीछे अंतरिक्ष में मंडराते है
मरने के बाद भी वे अपने पिता को
खोजकर उनके सहचरी हो जाते है।
जो सार्थक प्रार्थनामयी शब्द होते है
वे शब्द अपने जन्मदाता को
चिर-परिचित आत्मीयता का
आभास कराते है
मानो आने वाले कल की संरचना
और दुनिया के निर्माण में
इन्हीं शब्दों की निधियाँ इनसे
पीव जगत संचालित करायेगी।

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(3)

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’’आदमी कौन है’’’
मैं भी हॅू आदमी,
तू भी है आदमी
आदमी आदमी है,
आदमी के लिये।
आदमी तब आदमी नहीं,
जब आदमी न हो
आदमी के लिये।
यह भी है आदमी
वह भी है आदमी
सभी है आदमी कहने के लिये।
आदमी की रात बीतती नहीं
आदमी की बात बीतती नहीं
आदमी है कमाल
कमाल का है आदमी।
बडा प्यासा है आदमी
बड़ा उदासा है आदमी
एकता से डरता आदमी
रंग देख ढंग बदलता आदमी
आदमी है चाटुकार
चाटुकार का है आदमी।
युग की पुकार है
आदमी से गुहार है
पीव जीवन का रस बहे
दुनिया में रहे ऐसे ही आदमी।

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(4)
**वे अपने घर लौट आते है***
दिन उगता है रात उगती है
दिन ढ़लता है रात ढ़लती है
रात के हिस्से में अंधकार है
दिन के हिस्से में प्रकाश है
दिन और रात तय समय पर
रोज अपने घर लौट आते है।
सूरज उगता है सूरज ढलता है
पर चान्द न उगता है न ढ़लता है
चान्द घटता है और बढ़ता है
धरती प्रदक्षिणा करती है सूर्य की
चान्द प्रदक्षिणा करता है धरती की
धरती,सूर्य और चन्द्रमा तय समय पर
अपने परिवार से मिलने के लिये
वे अपने घर लौट आते है।
चान्द,सूर्य और धरती के कर्तव्यमार्ग पर
नियत समय पर अपने रिश्ते निभाना
पीव प्रकृति का एक पर्वोत्सव हो गया।

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(5)

​​

***बिना कहे सुने को झगड़ा***
न कुछ दिये
न कुछ लिये
आपस में भिड़़ लिये।
न कोई बात
न कोई मुलाकात
कानाफूँसी हुईं कान भर लिये।
न आपस में सोचा
न आपस में विचारा
घर की बात थी
कर लिया घर से किनारा।
डरते नहीं जान ले लेंगे
डरते नहीं जान दे देंगे
भाईयों के रक्त के प्यासे
पीव ये भाई है कैसे ?
जंगली जानवर हो जैसे ॥

​​


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(7)

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’’’ ईश्वर को नौकर रख सकता है इंसान ’’
जिस दिन ईश्वर ने अपना वसीयतनामा
इंसान के नाम लिख दिया
इंसान ने खोद डाली सारी खदानें
सोना,चान्दी, हीरे-मौती
निकाल कर अपनी तिजौरी भर ली।
धरती की सारी सुरंगे
स्वार्थी इंसान ने खोज ली
और सारी तिजौरियों को
बहुमूल्य रत्न भण्डारों से भर ली।
उसने पहले नदियों के पानी को बेचा
नदियों के किनारों की रेत मिटटी को बेचा
वह अब जमीन के टुकड़े-टुकड़े बेच रहा है
वह हरे भरे पेड़-पौधों को बेच रहा है
वह जंगल-पहाड़ बेच रहा है
वह जिंदगी-मौत बेच रहा है
भगवान के मुफ्त दिये सारे उपहार
यह इंसान बेखौफ बेच रहा है।
ईश्वर की वसीयत इंसान को क्या मिली-
वह भूल गया है सारी इंसानियत
और सभी नदियो में सभी समुद्रो में
खुदकी नाव-जहाजें चलवाकर कमा रहा है।
आकाश में उड़ रहे है उसके विमान
वह कर रहा है देश का नेतृत्व
और उसके देश
प्रक्षेपात्र भेज रहे है अंतरिक्ष में।
इंसान इंसान ता न बन सका
पर वह व्यापारी बन गया है
और बेच रहा है
इस सृष्टि की सम्पूर्ण सम्पदा-
धरती,पहाड़ और आकाश
चन्द्रमा,सूर्य और प्रकाश
पद,प्रतिष्ठा और पदवी
मुक्ति,भोग और सादगी
इंसान ने धरती को
अपने कदमों में झुका लिया है।
ईश्वर की वसीयत पाकर
इंसान खुद को विलक्षण मान बैठा है
वह अपने मन में ईश्वर की
करूणा का अन्वेषण किये बिना
पीव अहंकार से भरा हुआ है
कि वह वसीयतकर्ता ईश्वर को
अब अपना नौकर रख सकता है।

​​

(8)

​​

छेदवाली नाव पर सवार पत्रकार’’’
मुद्दत से चली आ रही
पत्रकारिता की पुरानी
कई छिद्रवाली नाव पर
सवार है
मेरे शहर के तमाम पत्रकार
इस पुरानी नाव में
कुछ छेद
पार कर चुके लोगों ने
तो कुछ छेद
इस नाव पर सवार लोगों ने किये है।
इस पुरानी नाव को
चट्टानों के बीच
भयंकर तूफानों को
भी झेलना होता है
नदी का पानी तेजी से
मौत के रूप में नाव में घुस रहा है
और पत्रकार निश्चिंतता से
चैन की बंशी बजा रहे है।
इनका आचरण
स्वयं मृत्युवरण का है
पर दुनियावालों को
नाव पर सवार ये सभी पत्रकार
स्थिरता,निर्बाधता,शांति और संघर्ष की
पतवार खेते
नदी पार करते नजर आते है।
नाव पर सवार प्रायः अधिकांश पत्रकार
संकीर्णताओं में जकड़े स्वार्थ में अकड़े
खुदको सर्वोच्चता के
उच्चतम शिखर पर देख रहे है।
पत्रकारिता की सेकड़ों छिद्रवाली
पुरानी नौका को
अपनी बपौती समझने वाले लोग
अपने नये साथी को देखकर चैकते है
जैसे अचानक
गाँव का साँड
शहर में आ घुसा हो।
ये हर तरह से
अपने पैने नुकीले सींगें को
दिमाग के घटिया
षड़यंत्रों के कुतर्को को
अपने भारीभरकम
अनुभवों व दैत्याकार शरीर को
हथियार बनाकर निरूत्तर
कर देते है नवागतों को
नाव पर सवार सभी
गहरे जानी दुश्मन की तरह बैठे हुये है।
ग्रीष्म चूसकर जैसे
ऊर्जा को दग्ध कर देता है
कमजोर वृक्षों को जैसे
अंधड़ उखाड़ देता है
पौथीधारी ये अपने घर के
नबाव से जमे जकड़े है
दुनिया जाये भाड़ में
ये शराब कबाब पाकर अकड़े है
पीव सदा के लिये डूब जाये
यह नाव हमारी बला से
हम तो किनारे आ गये,
तुम मरो हमारी दुआ से।।

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(9)

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** ब्रज नहीं बचो कान्हा के समय जैसों***

​​

(ब्रजदर्शन के बाद )
जे वृन्दावन धाम नहीं है वैसो,
कान्हा के समय रहो थो जैसो
समय बदलते सब बदले हाल
वृन्दावन हुओ अब बेहाल।
कान्हा ग्वालो संग गईया चराई,
वो जंगल अब रहो नहीं भाई
निधि वन सेवाकुंज बचो है,
राधाकृष्ण ने जहाँ रास रचो है।
खो गयी गलियाँ खो गये द्वारे,
नन्दगाँव की पीर कौन बिचारे
सघनकुंज की छाया को सब तरसे,
बृजवासी ही बृजभाषा को अब बिसरें
बृज की पीव सब गलिया खो गई,
बृजमण्डल में यमुना जी रो रर्ही
मलमूत गटर सब जामे मिल रहो
यमना की अकुलाहट न कोई सुन रहो ॥

​​


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(10)

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***मैं हूँ इस देह की आत्मा **
न में शरीर हूँ , न ही हूँ आत्मा
किसका बसेरा है ,न जानू परमात्मा
न मैं प्राण हूँ , न प्राण है मेरा
न मैं शरीर हूँ ,न शरीर है मेरा
न मैं मन हूँ, न मन है मेरा
न मैं ज्ञान हूँ , न ज्ञान है मेरा
कौन हूँ में ,है मुझमे किसका बसेरा ?
मैं हूँ कर्ता ,यह मेरा अभिमान
मैं हूँ अकर्ता , कहता स्वाभिमान
मैं हूँ चैतन्य ,चैतन्य है मेरा
मैं हूँ नित्य, है नित्य का बसेरा ॥
मैं हूँ भोक्ता ,अभोक्ता भी हूँ
मैं हूँ साक्षी ,असाक्षी भी हूँ
मैं हूँ शांति , अशांति भी हूँ
मैं हूँ प्रकाश ,स्वम प्रकाश भी हूँ ॥
पीव है अस्तित्व , पीव परमात्मा
परम शाश्वत है , मैं हूँ इस देह की आत्मा ॥

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(11)

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***क्यों हुये डाक्टर लुटेरा एक समान***
ओ नाच जमूरे छमा-छम,

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सुना बात पते की एकदम
हाथपैर में हड़कन होती है,

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सर में गोले फूटे धमा-धम
आं छी जुकाम हुआ या

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सीने में दर्द करे धड़ाधड़क,
छींकें गरजे तोपों सी या

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खून नसों में फुदकें फुदकफुदक
मेरा जमूरा बतायेगा,

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क्यों डाक्टर लूटेरा नहीं किसी से कम
सुन मेरे प्यारे सुकुमार जमूरे

​​

तेरी बात लगे सही एकदम।
यह जुमूरा बतलाता है

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एक डाक्टर और लूटेरे का तानाबाना
हे भाई तूने अपने डाक्टर को

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क्या अब तक नहीं पहचाना है।
गौर से देख डाक्टर और

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लुटेरे में एक समानता है
लुटेरा नकाब में मुंह छिपाये,

​​

डाक्टर मास्क पहनता है
जान बचाना चाहो तो,

​​

माल सारा बाहर निकालो
लुटेरे की इस धमकी से

​​

झुकजाता है इंसान यारों।
जमूरा कहता है

​​

जान की धमकी अब डाक्टर भी देता है
कईप्रकार के टेस्ट कराकर,

​​

वह मरीज को लूट लेता है
लुटेरा हाथ में चाकू थामे,

​​

और डाक्टर थामे छुरी
दोनों के हाथों लुटना ही हैें,

​​

इंसान की किस्मत बुरी।
पेशा लुटेरे का खून से खेलना,

​​

खेले खूनी घटनायें
खून खराबे से बचने,

​​

लुटरे से सब लुट जाये।
जमूरा कह रहा

​​

डाक्टर और लुटेरा दोनों एक समान
लुटेरा पहने नकाब,

​​

मास्क सर्जन की पहचान
जान बचाना चाहते

​​

धमकाना दोनों का काम
आदमी खुद ही लुट जाता,

​​

दोनों को मिलते मुंहमाँगे दाम।
हथियार लुटेरे का चाकू,

​​

डाक्टर के हाथ में छुरी
जान चली जाने के डर से,

​​

दोनों की इच्छायें हो पूरी।
जमूरा बता रहा

​​

डाक्टर और लुटेरा, दोनों एक समान
खून से खेलने का पेशा,

​​

है लुटेरे ओर डाक्टर के नाम
धन के भूखें दोनों है,

​​

डराना-धमकाना दोनों का काम
आज व्यापारी हुये डाक्टर,

​​

मुनाफा कमाना इनका ईमान
पीव वैद्य सुसेण से कहाँ

​​

मिलेंगे, पुकार रहा भारत का आवाम।

​​

(12)

​​

*** ये पत्रकार बड़े है ***

​​

शहर में इनकी खूब चर्चा है
अतिक्रमण हटाने वाली टीम के
अधिकारियों से चलता खर्चा है।
ये शौकीनमिजाज है
सभी जगह खबू चरते-फिरते है
सांडों को इनपर नाज है।
ये सरकारों से बड़े है
इनका नाम खूब चलता है
ये सरदार बड़े है।
ये जो तंबूओं से तने बने है
नौकर इनके पढ़े लिखे है
ये अंदर ही अंदर जले भुने है।
ये दमदार है इनमें बड़ा दम है
बड़ा हाजमा है इन्हें सब हजम है
ये ऐसे वैसे नहीं छटी हुई रकम है।
कम नापना-तौलना इनका काम
ये नेता बड़े है लाँ पढ़े है
कम जाँचना-तौलना इनके नाम।
ये सोने के पलने में चान्दी से चलते है
इनके ओठों पर लाली,गाल गुलाबी है
ये साँझ ढ़लते ही गर्मी में मचलते है।
ये सायकल पर अटके कभी न भटके
खरे सिक्के से चलते रहे है
ये बिना पंख के है सभी से जरा हटके ।
ये दिखते गुुटके से है गजब लटके से
किसी पेटूबाला सा पेट मटका है
इनके अजूबेपन का देश में खटके है।
ये दिमाग गिरवी रखते है बुद्धिवंद है
अक्ल के दरवाजे सदा रखते बंद है
पीव खेलते-खाते ये रहते स्वच्छन्द है।
यहाँ के पत्रकार बहुमुखी है बहुमत से दूर
अखबार चैनलों के पीव ये है परिपोषक
निर्दन्दी है अपने अधिकार पाने मतिमन्द भरपूर।

​​

(13)

​​

*** कब होगी सुख की भोर***

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कह रहे है माता-पिता
अब जीवन कितना बाकी है
कब तक धड़केगा यह दिल
और कितनी साँसें बाकी है।
बेटा बहू पोता नहीं आते
ममता से धड़के छाती है।
बेटे से बतियाना कब होगा
मुश्किल से कटती दिन-राती है।
पोते को कंठ लगाने की
यह प्यास अभी तक बाकी है।
घर अपने बहू क्यों नहीं आये
ममता में कसर कौन सी बाकी है।
एक एक दिन दुख में बीतें
मौत गले लगाने को आती है।
हम दोनों आपस में बतियाते है
कैसे कैसे दिन जीवन में आयेंगे
क्या बेटे-बहू पोते के बीच
हम हॅसी खुशी से मिल पायेंगे।
व्यथा में डूबते और उतराते
हम सपने दोनों देख रहे है।
कोई ओर-छोर नहीं सुखका
हम सुख की भोर देख रहे है।
पीव जीवित रहते क्या पाया
यह माता-पिता बैठे सोच रहे है।
कब आयेगी परिवारमिलन की सुखद बेला
बच्चों से मिलन का स्वप्न देख रहे है।
माता-पिता जिंदगी दर्दभरा क्षोम है
वेदना है मन में गहरी और वे मौन है।
अगणित गाँठों से क्यों जीवन गाँठा, बेटे

​​

(14)

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जख्म बहुत गहरे है

​​

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रात की बाँहों का सहारा मिल जाता है

​​

मेरे जज्वातों को किनारा मिल जाता है।

​​

जख्म बहुत गहरे है पेबन्द लगाकर देखा

​​

रिसने लगा खून अफसोस न कुछ कर पाता हॅू।

​​

दर्द होता है बेशुमार सहना हुआ है मुश्किल,

​​

कही नासूर न बन जाये, कहना हुआ मुश्किल।

​​

कुछ टूट रहा है मन में, भीतर घुटन भरी है

​​

देख रही ऐसे वह, चेहरे पर उसके तनातनी है।

​​

जंगलों से माँगकर पनाह, हमने बस्तिया बसा दी

​​

शहर बसता गया, आदमियत घटती गयी।

​​

कदमताल पैरों ने किये, पगडंडियाँ बन गयी

​​

पगडंडिया हारकर खुद राह से हटती गयी।

​​

अंहकार इतना मुटठी में कैद सारी जिंदगी

​​

सूरज जो निकला अंधकार खुद मिट गया।।

​​

मन कैसे करेगा इलाज, जब नब्ज दिखाये आदमी

​​

पीव दर्द से टूट जाये, टुकड़ों में बसा आदमी।।

​​

(15)

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कोयलिया बोली

​​

कुहुक कुहुक कुहुकी कोयल

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डाल डाल की जागी कोंपल

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बंसतऋतु की प्यारी बोली

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मुहुःकुहुःसुन दुनिया डोली।

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बौरे आम की हुई मधुरित

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पीपल नीम भी हुये सुरभित

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कुहुक कुहुक गूंजा मधुवन

​​

भॅवरे लुभावे कलियों का मन।

​​

सूनेमन के तन प्राणों में जागी

​​

यौवन को प्यार की तलाष है।

​​

मुहुकुहु सुन खग-मृग सब बिहॅसे

​​

कोयलिया की बोली को बिरही तरसे

​​

बिरही के तिक्त हृदय की भी बोली

​​

कुहुमुहु कुहुमुहु कोयलिया बोली

​​

पीव मदन ने अपना कामबाण छोड़ा

​​

प्रिय-प्रियतमा को अधरों से जोड़ा।

​​

(16)

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सच झूठ का भेद

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सच का मुँह

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झूठ की आँख

​​

क्या देखी है कभी।

​​

सच का रूख

​​

झूठ का रूख

​​

क्या देखा है कहीं।

​​

सत्य का सुख

​​

झूठ का सुख

​​

क्या भोगा है कभी ।

​​

सत्य का रंग

​​

झूठ का रंग

​​

क्या स्वाद चखा है कभी।

​​

सच का मुँह

​​

सच का रूख

​​

सच का सुख और

​​

सच का रंग सदा

​​

एक ही होता है

​​

जिस प्रकृति में

​​

जहाँ भी वह

​​

वास करता है

​​

अपनी पूर्णता के साथ

​​

अपने होने का

​​

जयघोश करता है।

​​

झूठ झूठ होता है

​​

झूठ का मुंख दैत्याकार

​​

झूठ की आँखें में क्रूरता

​​

झूठ का रूख बनावटी

​​

झूठ का सुख तनिक आरामदेह

​​

झूठ का रंग लोभ से भरपूर

​​

जनता को भटकाने वाला है

​​

पीव सत्य और झूठ का

​​

भेद वाणी से मुखरित

​​

आचरण से प्रगट होता है

​​

वाणी स्वयं बोलती है

​​

सत्य-झूठ का भेद खोलती है।

​​

(17)

​​

प्रेमपत्र जो भेजे नहीं गये

​​

सोचता हॅू कितना अच्छा था वह समय

​​

जब मैंने गुजारे थे तेरी याद में

​​

कितनी ही रातें सोया नहीं और

​​

तुम्हें पत्र लिखता,खुद पढ़ता रहा

​​

पर कभी भी तुम्हें पत्र भेज न सका।

​​

मेरे हरेक पत्र के एक-एक शब्द में

​​

मैंने लिखी थी वेदनायें

​​

लिखे थे आँसू जो बह गये

​​

लिखे थे आँसू जो ठहर गये

​​

लिखे थी सिसकिया

​​

मेरे एकाकी जीवन की व्यथा

​​

पर तुम्हें भेज न सका और

​​

कहीं तुम्हारा पागल प्रेमी की

​​

उलाहना न मिले,

​​

इसलिये पत्रों को

​​

मैं लिखता, और फाड़ता गया।

​​

तुम क्या जानों मेरी वेदना

​​

वह नागिन सी डसती रातों को

​​

मैं तनहाँ होता था और

​​

टिक-टिक चलती घड़ियों की सुई का

​​

एक एक पल मुझे डॅसता था

​​

मैंने देखी पुरूषार्थ की मजबूरी

​​

कितने ही बार टूटा था अपने में

​​

कितने ही बार चकनाचूर हुआ था

​​

मेरे दिल में वेदना का सागर था

​​

जिसे मैंने छिपाकर रखा था तुमसे।

​​

तुम मौन थी, स्थिरप्रज्ञ भी

​​

न मेरी आँखों को पढ़ पाती थी

​​

और न ही मेरे चेहरे के दर्द को जानती

​​

तुम इतनी निष्ठुर क्यों थी

​​

मैं हर आघात को सहता था

​​

पर कभी तुमसे शिकायत नहीं की।

​​

तुमने हमेशा मेरे दिल को खिलौना समझा

​​

और मेरे कोमल मर्म स्थल को

​​

बेरहमी से कुरेदना अपनी फितरत माना।

​​

पीव सहलाता रहा

​​

अपने घायल दिल को

​​

तुम्हारे अक्खड़पन से वेधित

​​

दिल के हर जख्म को ,

​​

वह नादानी ही थी

​​

तभी मैं पत्रों में दर्द लिखता और

​​

प्यार के हर दर्द को तुम्हारा

​​

उपहार समझकर

​​

तुम्हारी उपेक्षा की ही खातिर

​​

मैं पत्रों को फाड़ता रहा

​​

कसम तुम्हारी प्रियतमे

​​

मैंने अपना दर्द जो प्रेमपत्रों में था

​​

कभी तुम्हें व्यक्त न कर सका।

​​

(18)

​​

चांद उतरा था मेरी खिड़की पर

​​

कहो न चाँद

​​

तुम मेरी खिड़की से उतरकर

​​

कितनी बार मुझसे मिले हो।

​​

आकाष से झाँककर

​​

तुम मेरे आँगन में उतरे

​​

फिर खिड़की के पास

​​

मुझे अकेला पाकर तुम

​​

गुपचुप मेरे पास बैठे हो।

​​

जब तुम आये तब मैं

​​

अपनी प्रियतमा से विछोह के

​​

प्रेम पत्र लिख रहा था।

​​

मेरी प्रिय इस समय सोयी है

​​

या मेरी ही तरह खोयी हुई है

​​

मैं उसकी पलकों में

​​

उसके सपनों में प्रेमासक्ति

​​

मन की पीड़ा में

​​

उसकी आँखों के आँसूओं में

​​

एक तड़फ देखना चाहता था

​​

और तुम आ गये।

​​

कहो न चांद

​​

तुमने मुझे कितना प्रेमातुर विकल देखा है

​​

मेरे प्राणों में मेरी प्रियतमा के अलावा

​​

कोई नहीं, जिसे मैंने याद किया

​​

वह मेरी छाती में दहकती थी

​​

वह मेरी साँसों में महकती थी

​​

मेरा रोम रोम उसे पुकारता था

​​

और तब तुम्ही तो थे चांद

​​

जो मुझे दीवाना कहते थे।

​​

तुम आकाश से उतरकर

​​

मुझसे मिलने आते थे

​​

पर मैं कहीं और डूबा रहता था

​​

ठीक वैसे ही चाँद

​​

जैसे मेरे मन के कई टुकड़े बिखरे थे

​​

वैसे ही तुम भी बिखरे होते थे

​​

कई वातायनों में उतरे होते थे

​​

तुम्हें देखा जा सकता था वनों में

​​

उपवनों में, ताल-सरिताओं के जल में

​​

तुम ही तो आकाश से उतरे होते थे चांद

​​

पीव जैसे मेरी खिड़की पर मौजूद रहे

​​

वैसे ही धरती पर हर जगह।

​​

जो तुम कभी पढ़ नहीं सकी

​​

तुम्हें कितने ही पत्र लिखे थे

​​

दिन-रात डूबा रहता था

​​

तेरे ख्यालों में और विरह की पीड़ा

​​

मुझे कभी सोने नहीं देती थी।

​​

(19)

​​

​​

हिस्सों में बॅटा इंसान

​​

इंसान की जिन्दगी के

​​

कई हिस्से है, जिनमें

​​

कुछेक हिस्से मर चुके होते है

​​

और कुछेक हिस्से जीवित होते है।

​​

अपने आसपास कचरेघर पर

​​

बचपन को भविष्य तलाशते देखता हॅू

​​

कुछेक बचपन नषे के आदी है

​​

कुछेक बचपन जुएँ के आदी है

​​

कुछेक बचपन चाय बेच रहे है

​​

कुछेक बचपन रेजगारी कर रहे है

​​

इन्हांेंने कभी बंसत नहीं देखी

​​

इनके हिस्से में सदा पतझड़ ही रहा है-

​​

ऐसी जिन्दगियाँ मुष्किल से

​​

अपने घरों में दो किलो आटा,नमक,चाय

​​

मसाला और हरी सब्जियाँ

​​

पहुँचाकर पेट भर पाते है।

​​

इनकी माँ बड़े घरों में

​​

बर्तन माँजती है

​​

रसोई पकाती है

​​

कपड़े धोती है

​​

मजदूरी करती है

​​

जवाँ बहिनें पेट की खातिर

​​

ग़िद्धों के समान नौंची जाती है

​​

और छोटे बहिन भाई

​​

गरीबी को खेलते-बिछाते,ओढ़ते है

​​

क्योंकि इन इंसानों के

​​

ज्ीवन के हिस्से अर्द्धजीवित है

​​

या उसे अर्द्धमरा भी मान सकते हो।

​​

और जिनके बीच

​​

या कहिये सभ्य समाज के बीच

​​

ये मर-मर कर जी रहे है

​​

वह सभ्य समाज की इंसानियत

​​

या इंसान के इंसानी हिस्से मर चके है।

​​

बाजार और घरों में भीख माँगते

​​

कुछेक फटेहाल भिखारी होते है

​​

कुछेक कटे-पिटे अंगवाले होते है

​​

कुछेक बुर्जुग महिला-पुरूष होते है

​​

कुछेक तमाशबीन होते है

​​

कुछेक धर्मध्वजा थामे होते है

​​

कुछेक दान-दक्षिणा चंदा वाले होते है

​​

कुछेक सफेदी वाले नेता होते है।

​​

देष में सरकारें चलती है,योजनायें बनती है

​​

गरीबी हटायी जाती है,गरीब मौजूद रहता है

​​

लाचार-मजबूरों के इंसानी हिस्से जीवित है

​​

पर जो इन्हें लाचार-मजबूर बनाये है

​​

उन सबके इंसानी हिस्से मर चुके है।

​​

एक युवक अकेली महिला के गले से

​​

कान से सोने की चेन छीन कर भागता है

​​

कोई पकड़ना चाहे तो वह

​​

बेरहमी से चाकू मारकर भागता है।

​​

भीख माँगने वालों के क्षैत्र बटे है

​​

अगर दूसरा भिखारी घुसपैठ करें

​​

तो खूंनी जंग सरेआम होती है

​​

इंसान के ये बीमार हिस्से है

​​

जिनका ईलाज हो सकता है

​​

पर जब खाने के लाले पड़े हो

​​

तो इलाज करायेगा कौन ?

​​

इंसान के भीतर के अधूरे हिस्से

​​

समाज में गोंच की तरह फैल गये है

​​

अन्नदाता किसान फसल आने पर

​​

छोटे-छोटे विवादों में उठा लेता है

​​

लाठी-कुल्हाड़ा और

​​

रिष्तों का खून कर देता है

​​

रिष्तें जेलों में भरे जा रहे है

​​

इंसानियत सरेआम कत्ल की जा रही है।

​​

वे भूल गये है कत्ल-अपराध से बचाने

​​

शैतान का एक हिस्सा

​​

कई लिवास में उन्हें लूट रहा है

​​

इंसान के भीतर जीवित हिस्से,

​​

इंसान के भीतर जी रहे हिस्से

​​

भूल गये है कि उनका उठाया एक कदम

​​

अपराध करते ही मुकदमें का तोहफा देगा

​​

और यह तोहफा जेल के सींखचों में

​​

कैद रखने के बाद

​​

उम्र कैद की सजा दे सकता है।

​​

इंसान के अपराधी बनते ही

​​

बचने का हर अवसर तलाशता व्यक्ति

​​

होता है नेताओं की शरण में

​​

होता है पुलिस की शरण में

​​

होता है वकीलों की शरण में

​​

लुट जाता है उसके घर का चैन,

​​

बिखर जाता है उसका पूरा परिवार

​​

नेताओं,पुलिस को मिलता है जेबखर्च

​​

और वकीलों को मुँहमाँगी फीस।

​​

पीव मुकदमा लड़ते लड़ते

​​

बिक जाते है खेत-खलियान और जमीन,जायदाद

​​

इंसान के भीतर का जीवित हिस्सा

​​

इंसान की गल्ती से मर जाता है।

​​

जिन्दगी के कई हिस्सों में बटा

​​

इंसान अपने कर्तव्य से

​​

विमुख हो गया है

​​

समाज में जीने के लिये

​​

जिन्दगी के हिस्से किये थे

​​

ताकि जिसके हिस्से में

​​

जो दायित्व आये

​​

वह उसका निर्वहन

​​

कर्तव्यनिष्ठा से कर सके

​​

पर इंसान ने अपने मतलब के लिये

​​

जिन्दगी के हिस्से किये

​​

और आज जिन्दगी खुद

​​

हिस्से हिस्से में बॅटी है।

​​

​​

​​------------


पता -

​​

आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार

​​

पत्रकार आत्माराम यादव गली,

​​

काली मंदिर के पीछे,ग्वालटोली वार्ड नंबर 31

​​


​​

Email –atmaramhindus@gmail.com

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रचनाकार: हम जो छले, छलते ही गये - आत्माराम यादव पीव
हम जो छले, छलते ही गये - आत्माराम यादव पीव
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