उर्दू की आख़िरी किताब - पतरस बुख़ारी - अनुवाद : डॉ. आफ़ताब अहमद

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उर्दू की आख़िरी किताब पतरस बुख़ारी (पतरस बुख़ारी द्वारा लिखित यह निबंध उर्दू के शैलीकार लेखक मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की पुस्तक ...

उर्दू की आख़िरी किताब
पतरस बुख़ारी

(पतरस बुख़ारी द्वारा लिखित यह निबंध उर्दू के शैलीकार लेखक मौलाना मुहम्मद हुसैन आज़ाद की पुस्तक “उर्दू की पहली किताब” की पैरोडी है। पंजाब के शिक्षा विभाग ने मुहम्मद हुसैन आज़ाद से एक पाठ्य-पुस्तक तैयार करवाई थी, जिसे पूरे भारत के स्कूलों में लागू कर दिया गया था। यह निबंध इसी पुस्तक के तीन अध्यायों की पैरोडी पर आधारित है। इसके लिखने का उद्देश्य शुद्ध मनोरंजन था। उर्दू के आलोचक डॉक्टर वज़ीर आग़ा और तमकीन काज़मी ने इस लेख को उर्दू की पहली बाक़ायदा व औपचारिक पैरोडी कहा है। पतरस ने शब्दों के थोड़े से परिवर्तन या मूल वाक्यों में छोटे-छोटे अंश या वाक्य जोड़कर इसे अत्यंत दिलचस्प बना दिया है। पतरस मंझे हुए लिखारी थे। अतः इस निबंध से पैरोडी की कला के व्यावहारिक पक्ष पर भी प्रकाश पड़ता है। इस निबंध का पूरा आनंद तभी लिया जा सकता है जब इसे “उर्दू की पहली किताब” के उन अंशों को सामने रखकर पढ़ा जाए, जिनकी इसमें पैरोडी की गई है। पाठकगण इस पैरोडी का भरपूर रसास्वादन कर सकें, इसलिए निबंध के बाद मूल पुस्तक के पैरोडी-शुदा अंश सम्मिलित कर दिये गए हैं। -अनुवादक)

माँ की मुसीबत
माँ बच्चे को गोद में लिए बैठी है। बाप अंगूठा चूस रहा है और देख-देखकर ख़ुश होता है। बच्चा हस्बे-मामूल आँखें खोले पड़ा है। माँ मुहब्बत भरी निगाहों से उसके मुँह को तक रही है और प्यार से निम्नलिखित बातें पूछती है:
1. वह दिन कब आएगा जब तू मीठी-मीठी बातें करेगा?
2. बड़ा कब होगा? विस्तारपूर्वक लिखो।
3. दूल्हा कब बनेगा और दुल्हन कब ब्याह कर लाएगा? इसमें शर्माने की ज़रूरत नहीं।
4. हम कब बुड्ढे होंगे?
5. तू कब कमाएगा?
6. ख़ुद कब खाएगा? और हमें कब खिलाएगा? बाक़ायदा टाइम-टेबल बनाकर स्पष्ट करो।
बच्चा मुस्कुराता है और कैलेंडर की विभिन्न तिथियों की तरफ़ संकेत करता है। तो माँ का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। जब नन्हा-सा होंठ निकाल-निकालकर शेष चेहरे से रोनी सूरत बनाता है, तो यह बेचैन हो जाती है। सामने पालना लटक रहा है। सुलाना हो तो अफ़ीम खिलाकर उसमें लिटा देती है। रात को अपने साथ सुलाती है। (बाप के साथ दूसरा बच्चा सोता है) जाग उठता है तो झट चौंक पड़ती है और मोहल्ले वालों से माफ़ी माँगती है। कच्ची नींद में रोने लगता है, तो बेचारी मामता की मारी आग जलाकर दूध को एक और उबाल देती है। सुबह जब बच्चे की आँख खुलती है तो ख़ुद भी उठ बैठती है। उस समय तीन बज रहा होता है। दिन चढ़े मुँह धुलाती है। आँखों में काजल लगाती है और जी कड़ा करके कहती है क्या चाँद सा मुखड़ा निकल आया। वाह वा!

खाना ख़ुद-बख़ुद पक रहा है
देखना! पत्नी ख़ुद बैठी खाना पका रही है, वरना दरअसल यह काम पति का है। हर चीज़ क़रीने से रखी है। धोए-धाए बर्तन संदूक़ पर चुने हैं, ताकि संदूक़ न खुल सके। एक तरफ़ नीचे-ऊपर मिट्टी के बर्तन धरे हैं। किसी में दाल है। किसी में आटा। किसी में चूहे। फुकनी और पानी का लोटा पास है, ताकि जब चाहे आग जला ले, जब चाहे पानी डालकर बुझा दे। आटा गुंधा रखा है। चावल पक चुके हैं। नीचे उतारकर रखे हैं। दाल चूल्हे पर चढ़ी है। संक्षेप में सब काम हो चुका है। लेकिन यह फिर भी पास बैठी है। पति जब आता है तो खाना लाकर सामने रखती है। पीछे कभी नहीं रखती। खाना खा लेता है तो खाना उठा लेती है। हर रोज़ यूँ न करे तो पति के सामने हज़ारों रकाबियों का ढेर लग जाए। खाने पकाने से फ़ुर्सत पाती है तो कभी सीना ले बैठती है कभी चर्ख़ा कातने लगती है। क्यों न हो? महात्मा गांधी की बदौलत ये सारी बातें सीखी हैं। ख़ुद हाथ पाँव न हिलाए तो डाक्टर से इलाज करवाना पड़े।

धोबी आज कपड़े धो रहा है
बड़ी मेहनत करता है। शाम को भट्ठी चढ़ाता है। दिन भर बेकार बैठा रहता है। कभी-कभी बैल पर लादी लादता है और घाट का रस्ता लेता है। कभी नाले पर धोता है, कभी नदी पर। ताकि कपड़ों वाले कभी पकड़ न सकें। जाड़ा हो तो सर्दी सताती है। गर्मी हो तो धूप जलाती है। सिर्फ़ वसंत ऋतु में काम करता है। दोपहर होने को आई। अब तक पानी में खड़ा है। उसे ज़रूर सन्निपात हो जाएगा। पेड़ के नीचे बैल बंधा है। झाड़ी के पास कुत्ता बैठा है। नदी के उस पार एक गिलहरी दौड़ रही है। धोबी उन्हीं से अपना जी बहलाता है।
देखना! धोबिन रोटी लाई है। धोबी को बहाना हाथ आया है। कपड़ा पटरे पर रखकर उससे बातें करने लगा। कुत्ते ने भी देखकर कान खड़े किए। अब धोबिन गाना गाएगी। धोबी नदी से निकलेगा। नदी का पानी फिर नीचा हो जाएगा।
मियाँ धोबी! यह कुत्ता क्यों पाल रखा है? साहब कहावत की वजह से और फिर यह तो हमारा चौकीदार है। देखिए! अमीरों के कपड़े मैदान में फैले पड़े हैं। क्या मजाल कोई पास तो आ जाए। जो लोग एक दफ़ा कपड़े दे जाएँ फिर वापस नहीं ले जा सकते। मियाँ धोबी! तुम्हारा काम बहुत अच्छा है। मैल-कुचैल से पाक साफ़ करते हो। नंगा फिराते हो।

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उर्दू की पहली किताब
मुहम्मद हुसैन आज़ाद
माँ की मुहब्बत
माँ बच्चे को गोद में लिए बैठी है। बाप हुक़्क़ा पी रहा है। और देख-देखकर ख़ुश होता है। बच्चा आँखें खोले पड़ा है। अंगूठा चूस रहा है। माँ मुहब्बत भरी निगाहों से उसके मुँह को तक रही है और प्यार से यह कहती है, मेरी जान! वह दिन कब आएगा कि मीठी-मीठी बातें करेगा! बड़ा होगा! सहरा बंधेगा! दूल्हा बनेगा ! दुल्हन ब्याह कर लाएगा! हम बुड्ढे होंगे! तू कमाएगा! ख़ुद खाएगा! हमें खिलाएगा! बच्चा मुस्कुराता है तो माँ का दिल बाग़-बाग़ हो जाता है। जब नन्हा-सा होंठ निकालकर रोनी सूरत बनाता है, तो यह बेचैन हो जाती है। सामने पालना लटक रहा है। सुलाना होता है तो उसमें लिटा देती है। रात को अपने साथ सुलाती है। जाग उठता है तो झट चौंक पड़ती है। कभी नींद में रोने लगता है, तो आधी-आधी रात तक यह बेचारी, मामता की मारी लिए बैठी रहती है। जब सुबह बच्चे की आँख खुलती है तो ख़ुद भी उठ बैठती है। दिन चढ़े मुँह धुलाती है। आँखों में काजल लगाती है, और यह कहती है क्या चाँद सा मुखड़ा निकल आया! वाह वा वाह!

खाना पक रहा है
देखना! पत्नी ख़ुद बैठी खाना पका रही है। हर चीज़ क्या क़रीने से रखी है। धोए-धाए बर्तन संदूक़ पर चुने हैं। एक तरफ़ नीचे-ऊपर मिट्टी के बर्तन धरे हैं। किसी में दाल है, किसी में आटा, किसी में चूहे। फुकनी, चिमटा, और पानी का लोटा पास है। आटा गुंधा रखा है। चावल पक चुके हैं। नीचे उतारकर रखे हैं। दाल चूल्हे पर चढ़ी है। नीचे आँच हो रही है। ख़ुद पास बैठी है कि आग न बुझ जाए या दाल न जल जाए। अब चपनी (ढक्कन)  उठाई है। दाल देख रही है। कि गल गई हो तो नीचे उतारकर रखे, करछे में घी गरम करे, कतरकर प्याज़ डाले, जब लाल हो जाए तो दाल बघारे। फिर तवा चढ़ाए, रोटी पकाए। पति जब आता है तो खाना लाकर सामने रखती है। खा चुकता है तो खाना उठा लेती है। खाने पकाने से फ़ुर्सत पाती है तो कभी सीना ले बैठती है कभी चर्ख़ा कातने लगती है। क्यों न हो? बड़ी सलीक़े वाली है। माँ-बहनों की बदौलत ये सारी बातें सीखी हैं। ख़ुद हाथ पाँव न हिलाए तो घर का काम क्योंकर चले।

धोबी कपड़े धो रहा है
बड़ी मेहनत करता है। शाम को भट्ठी चढ़ाता है। सुबह बैल पर लादी लादता है और घाट का रस्ता लेता है। कभी नाले पर धोता है, कभी नदी पर। जाड़ा हो तो सर्दी सताती है। गर्मी हो तो धूप जलाती है। देखो! दोपहर होने को आई, अब तक पानी में खड़ा है। कपड़े छाँट रहा है। छुआ-छू बराबर कर रहा है। पेड़ के नीचे बैल बंधा है। झाड़ी के पास कुत्ता बैठा है। नदी के दोनों तरफ़ कैसी हरियावल है। देखकर जी ख़ुश होता है।
देखना! धोबिन रोटी लाई है। धोबी कपड़ा पटरे पर रखकर उससे बातें करने लगा। कुत्ते ने भी देखकर कान खड़े किए। अब धोबी नदी से निकलेगा। पेड़ के नीचे छाँव में बैठकर रोटी खाएगा।
मियाँ धोबी! यह कुत्ता क्यों पाल रखा है? साहब यह तो हमारा चौकीदार है। देखिए! अमीरों के कपड़े मैदान में फैले पड़े हैं। क्या मजाल कोई पास तो आ जाए। मियाँ धोबी! तुम्हारा काम बहुत अच्छा है। मैल-कुचैल से पाक साफ़ करते हो। उजले कपड़े पहनाते हो।

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अनुवादक : डॉ. आफ़ताब अहमद
व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क

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अहमद शाह पतरस बुख़ारी
(1 अक्टूबर 1898- 5 दिसंबर 1958)
असली नाम सैयद अहमद शाह बुख़ारी था। पतरस बुख़ारी के नाम से प्रशिद्ध हैं। जन्म पेशावर में हुआ। उर्दू अंग्रेज़ी, फ़ारसी और पंजाबी भाषाओं के माहिर थे। प्रारम्भिक शिक्षा से इंटरमीडिएट तक की शिक्षा पेशावर में हासिल की। लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज से बी.ए. (1917) और अंग्रेज़ी साहित्य में एम. ए. (1919) किया। इसी दौरान गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर की पत्रिका “रावी” के सम्पादक रहे।
1925-1926 में इंगलिस्तान में इमानुएल कॉलेज कैम्ब्रिज से अंग्रेज़ी साहित्य में Tripos की सनद प्राप्त की। वापस आकर पहले सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज और फिर गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में प्रोफ़ेसर रहे। 1940 में गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर के प्रिंसिपल हुए। 1940 ही में ऑल इंडिया रेडियो में कंट्रोलर जनरल हुए। 1952 में संयुक्त राष्ट्र संघ में पाकिस्तान के स्थाई प्रतिनिधि हुए। 1954 में संयुक्त राष्ट्र संघ में सूचना विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी जनरल चुने गए। दिल का दौरा पड़ने से 1958 में न्यू यार्क में देहांत हुआ।
पतरस ने बहुत कम लिखा। “पतरस के मज़ामीन” के नाम से उनके हास्य निबंधों का संग्रह 1934 में प्रकाशित हुआ जो 11 निबंधों और एक प्रस्तावना पर आधारित है। इस छोटे से संग्रह ने उर्दू पाठकों में हलचल मचा दी और उर्दू हास्य-साहित्य के इतिहास में पतरस का नाम अमर कर दिया। उर्दू के व्यंग्यकार प्रोफ़ेसर रशीद अहमद सिद्दिक़ी लिखते हैं “रावी” में पतरस का निबंध “कुत्ते” पढ़ा तो ऐसा महसूस हुआ जैसे लिखने वाले ने इस निबंध से जो प्रतिष्ठा प्राप्त करली है वह बहुतों को तमाम उम्र नसीब न होगी।....... हंस-हंस के मार डालने का गुर बुख़ारी को ख़ूब आता है। हास्य और हास्य लेखन की यह पराकाष्ठा है....... पतरस मज़े की बातें मज़े से कहते हैं और जल्द कह देते हैं। इंतज़ार करने और सोच में पड़ने की ज़हमत में किसी को नहीं डालते। यही वजह है कि वे पढ़ने वाले का विश्वास बहुत जल्द हासिल कर लेते हैं।” पतरस की विशेषता यह है कि वे चुटकले नहीं सुनाते, हास्यजनक घटनाओं का निर्माण करते और मामूली से मामूली बात में हास्य के पहलू देख लेते हैं। इस छोटे से संग्रह द्वारा उन्होंने भविष्य के हास्य व व्यंग्य लेखकों के लिए नई राहें खोल दी हैं । उर्दू के महानतम हास्य लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी एक साक्षात्कार में कहते हैं “….पतरस आज भी ऐसा है कि कभी गाड़ी अटक जाती है तो उसका एक पन्ना खोलते हैं तो ज़ेहन की बहुत सी गाँठें खुल जाती हैं और क़लम रवाँ हो जाती है।”
पतरस के हास्य निबंध इतने प्रसिद्द हुए कि बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक महान अनुवादक (अंग्रेज़ी से उर्दू), आलोचक, वक्ता और राजनयिक थे। गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में नियुक्ति के दौरान उन्होंने अपने गिर्द शिक्षित, ज़हीन और होनहार नौजवान छात्रों का एक झुरमुट इकठ्ठा कर लिया। उनके शिष्यों में उर्दू के मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ शामिल थे।
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डॉ. आफ़ताब अहमद
व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क
जन्म- स्थान: ग्राम: ज़ैनुद्दीन पुर, ज़िला: अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश, भारत
शिक्षा: जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी, दिल्ली से उर्दू साहित्य में एम. ए. एम.फ़िल और पी.एच.डी. की उपाधि। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ से आधुनिक इतिहास में स्नातक ।
कार्यक्षेत्र: पिछले आठ वर्षों से कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में हिंदी-उर्दू भाषा और साहित्य का प्राध्यापन। सन 2006 से 2010 तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया, बर्कली में उर्दू भाषा और साहित्य के व्याख्याता । 2001 से 2006 के बीच अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्डियन स्टडीज़, लखनऊ के उर्दू कार्यक्रम के निर्देशक ।
विशेष रूचि: हास्य व व्यंग्य साहित्य और अनुवाद ।
प्रकाशन: सआदत हसन मंटो की चौदह कहानियों का “बॉम्बे स्टोरीज़” के शीर्षक से अंग्रेज़ी अनुवाद (संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के उपन्यास “मृगमरीचिका” का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘मिराजेज़ ऑफ़ दि माइंड’(संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक)
पतरस बुख़ारी के उर्दू हास्य-निबंधों और कहानीकार सैयद मुहम्मद अशरफ़ की उर्दू कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद ( संयुक्त अनुवादक : आफ़ताब अहमद और मैट रीक ) कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित।
सम्प्रति: हिन्दी-उर्दू लैंग्वेज प्रोग्राम, दि डिपॉर्टमेंट ऑफ़ मिडिल ईस्टर्न, साउथ एशियन एंड अफ़्रीकन स्टडीज़, कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क से सम्बद्ध।
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नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया 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रचनाकार: उर्दू की आख़िरी किताब - पतरस बुख़ारी - अनुवाद : डॉ. आफ़ताब अहमद
उर्दू की आख़िरी किताब - पतरस बुख़ारी - अनुवाद : डॉ. आफ़ताब अहमद
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