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शबनम शर्मा की कविताएं

इंतज़ार

नहीं लिखनी है मुझे कविता, 

नहीं बाँधना है मुझे किसी भी 

जज़्बात को शब्दों के जाल में, 

नहीं दुखाने हैं मुझे इन 

नादान अक्षरों के दिल, 

अब बहुत हो चुका, 

थक गई हूँ मैं, 

पथरा गई हैं मेरी आँखें, 

मुझे सिर्फ करना है अब,

तुम्हारा इन्तज़ार, ज़िन्दगी की 

नाव में, यादों की पतवारों के साथ, 

उस जल पर जो तुम्हें प्रिय, 

जिसकी लहरों में है वो उतार-चढ़ाव

जो तुमने दिये, 

जिन पर चढ़ना अच्छा लगा, 

और उतरने पर विछोह,

ले जाये वह हमें उस किनारे, 

जहाँ पर तुम्हें इंतज़ार हो नाव का, 

उस पार जाने के लिए।

- शबनम शर्मा ] 


जो सुगंध तुमने बिखराई

उसे समेटे बैठा कोई, 

ऐसी दी सौगात किसी को 

प्राण बनाए बैठा कोई, 

पायल का घुंघरू बन बैठा, 

आँखों का काजल बन बैठा, 

बिंदिया का कुमकुम बन बैठा,

ऐसा ही बन बैठा कोई, 

छूट गया दुपट्टा कहीं, 

उसे सम्हाले बैठा कोई 

ख्वाब सजाये बैठा कोई

आस लगाये बैठा कोई, 

चंदन मन में आग लगी है 

आँखों में बरसात लगी है 

इंतज़ार तेरे आने का 

हाथ पसारे बैठा कोई, 

खामोशी में डूब गई है 

राह निहारे बैठा कोई, 

तेरे नयनों का कायल है 

ज्योति जगाये बैठा कोई।

शबनम शर्मा  


सारे मौसम एक से यारों 

सारी बातें एक सी 

सारी कसमें एक सी यारों 

सारी जातें एक सी 

सारे आँसू एक से यारों 

सारी आँखें एक सी 

सारे वादे एक से यारों

सारी रस्में एक सी 

सारी रातें एक सी यारों 

कर ली रातें एक सी 

एक सी चाहत सबकी देखी 

सारी जुदाई एक सी 

सारे जिस्म एक से यारों 

सारी कामना एक सी 

सब कुछ एक, जुदा है किस्मत 

सारी मौतें एक सी। 

शबनम शर्मा 



तनहाई में ऐसा क्या है, जो हमको तड़पाता है

ख्यालों में हम खोये रहते, ख्वाबों में दिन जाता है 

रुसवाई में ऐसा क्या है, जिससे दिल घबराता है 

रस्मों से हम बंधे हुए हैं, उसमें सब मिट जाता है 

चाल मुहब्बत की कब बदली, दुनियां की रंजिश कायम 

अपनी-अपनी मजबूरी है, घायल दिल रह जाता है 

फुर्कत में ऐसा क्या यारों, रंज बहुत खुशियाँ गायब,

ये पहली सीढ़ी उल्फत की, अश्क यहाँ बह जाता है 

सदियाँ बीत गई हैं लेकिन, रंजिश जैसी की तैसी 

जब भी घूंघट उठा हुस्न का, किस्सा इक बन जाता है। 

शबनम शर्मा ] 



उनकी आँखों ने रातों के किस्से कहे

मुद्दतों में मिले कुछ तो होना ही था 

उनकी बाहों के खम में सकून आ गया 

सिसकियाँ लेके सीना भिगोना ही था 

उनसे पूछो अगर रात को क्या हुआ

कुछ नजर झुक गई कुछ पसीना भी था 

बिखरे गेसू गवाही के हालात के 

रात जो भी हुआ वो तो होना ही था 

एक दस्तक हुई चाँद भी छुप गया 

जो जेहन में बसा वो हमें दिख गया 

ये हकीकत नहीं ख्वाब की बात है 

जब सहर हो गई दिन होना ही था।

शबनम शर्मा ] 


खोल दी खिड़की हवा फिर भी यहाँ आती नहीं 

जुस्तजू जिसकी दरीजे में नज़र आती नहीं 

हो रही बरसात फिर भी क्यों तपिश जाती नहीं 

दिल को जिसकी आरज़ू वो शकसियत आती नहीं 

खोजती जिसको निगाहें पास का है मामला 

है करीबी दिल से इतनी वो नज़र आती नहीं 

थक गई हैं इंतजारी में मेरी उम्मीदियाँ 

खत कितावत की भी सूरत अब नज़र आती नहीं 

जनते मंज़िल को हम, मंज़िल हमें पहचानती

बात वो भी जानती, फिर सदा आती नहीं।

शबनम शर्मा 

 माजरा, तह. पांवटा साहिब, जिला सिरमौर, हि.प्र. 

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