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क्या हम " छद्म " संसदीय लोकतंत्र में जी रहे हैं ? डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

26 जनवरी गणतंत्र दिवस विशेष आलेख

क्या हम " छद्म " संसदीय

लोकतंत्र में जी रहे हैं ?

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" जन " से " तंत्र " का हो रहा मोह भंग....

यकीनन संविधान निर्माताओं ने जब भारतवर्ष में संसदीय लोकतंत्र की परिकल्पना की होगी तब उन्होंने एक खुशहाल भारत का सपना संजोया होगा,जो अब तक साकार नहीं हो सका है । वह परिकल्पना आज न सिर्फ अनेक विषम परिस्थितियों से गुजर रही है बल्कि तमाम दबावों के कारण चरमरा उठी है । कहना असंगत न होगा कि अनेकानेक गतिरोधों के चलते संसदीय लोकतंत्र प्रभावहीन तथा क्षीण पड़ता दिख रहा है । उसकी गति और लय जो प्रारम्भिक चरण में चमकदार थी अब सुप्त पड़ गई है । आज की स्थितियों में ऐसा लगने लगा है जैसे हम किसी ' छद्म " संसदीय लोकतंत्र में जी रहे है। जिस उत्साह के साथ हमने संसदीय लोकतंत्र को अंगीकार किया था, वह अब कमजोर पड़ने लगा है। कारण यह कि मौजूदा स्थितियां उत्साहवर्धक नहीं लगती। हमें यह सोचने पर विवश होना पड़ता है कि क्या लोकतंत्र की यह प्रणाली हमारी जरूरतों, आकांक्षाओं एवं पृष्ठभूमि के अनुरूप है? हमारे लोकतंत्र में समाहित चारित्रिक मानक, मान्यतायें तथा आदर्श "गूलर के फूल" हो गए है। हम देख रहे है विगत कुछ दशकों से क्षेत्रवाद, प्रादेशिक संकीर्णता, अलगाववाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अपराधीकरण ( विशेषकर राजनीति का ), भ्रष्टाचार, आतंकवाद, अस्थिर सरकारे और जनप्रतिनिधियों का उत्तरदायित्वो से विमुख होना सामान्य घटनायें बन चुकी है, जो लोकतंत्र की विफलता का पर्याय बनकर उभर रही है।

कैसा विरोधाभास आज हमारे सामने प्रत्यक्ष है,जिन खूबियों को ध्यान में रखकर हमने लोकतंत्र को अंगीकार किया,अब खुद उस पर हम खरे नहीं उतर रहे हैं । जनता के प्रति जवाबदेही और उत्तरदायित्व आज दुःसाध्य है। स्थिति अत्यंत त्रासद होती जा रही है । सत्ता में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे मंत्रियों के दायित्वों के सिद्धांत में जनता के प्रति दायित्व ही प्रमुख माने जाते हैं ,किन्तु मौजूदा परिदृश्य बताते हैं कि लोकतंत्र की निष्ठाएं बदल गई हैं । जनता के प्रति दायित्व हाशिए पर चले गए हैं । यही कारण है कि " जन " से " तंत्र " विलग हो गया है । " तंत्र " अपने हित साधने में लग गया है और " जन " भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है ।जिस उत्तरदायित्व की अवधारणा को ध्यान में रखकर देश के संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की गई । इससे बड़ी विडंबना और त्रासदी क्या होगी कि उसकी खिल्ली संसद में ही उड़ाई जाती है । संसद चलती कम है , हंगामे ज्यादा होते हैं । जिस संसद के कंधों पर महत्वपूर्ण दायित्व टिके हों ,वह चले ही नहीं ,इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा ? प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में - " अभी जब रात्रि में सारा विश्व सो रहा है , तब भारत जाग उठा है , भारत की आत्मा अपने शब्दों को तलाश रही है और वह एक नए उत्साह के साथ उठ खड़ा होगा ।" अब स्वप्न ही लगने लगा है ।

भारतीय संस्कृति के उषाकाल में हुए समन्वय ने उन आदर्शों , भावनाओं और विचारों को जन्म दिया जो लगातार सैकड़ों वर्षों से सभी भारतीयों को समान रुप से अनुप्राणित और प्रेरित किया है ।इसमें सहिष्णुता ,समन्वय, कर्मवाद, अदृश्य सत्ता में विश्वास, अहिंसा, करुणा आदि प्रमुख हैं और ये ही भारतीय संस्कृति के मूलाधार हैं। भारत जैसे महान देश के लुई यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि इसे सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहना पड़ा । इतिहास गवाह है कि गुलामी हमारी सांस्कृतिक जड़ता के कारण ही झेलनी पड़ी । यह इस बात का भी गवाह है कि हमने अपनी गुलामी के बंधनों को सामाजिक- सांस्कृतिक एकता की शक्तियों से न केवल काटा है ,बल्कि अपनी अस्मिता को बचाकर भी रखा है । इसी बात को लक्ष्य कर महाकवि इकबाल ने लिखा है ---

यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से,

अब तक मगर है बाकी, नामों-निशां हमारा,

कुछ बात है कि,हस्ती मिटती नहीं हमारी,

सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा।।

जब हमारा देश ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब समस्त भारतवासी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, ऊंच-नीच आदि को भूलकर कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद कराने के लिए संग्रह कर रहे थे ,किन्तु आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है । आज "सारे जहाँ से अच्छा...." , "वंदेमातरम", और "जन-गण-मन" जैसे देश प्रेम की चेतना की लहर दौड़ा देने वाले रचयिताओं की कमी ही विरोधाभाष का कारण लग रही हैं ।

कश्मीर से कन्याकुमारी तक और गुजरात से त्रिपुरा तक फैले विशाल भारतवर्ष में विभिन्न धर्म-सम्प्रदाय एवम भाषा-भाषी निवास करते हैं । अनेक जातियों से समृद्ध भारतीय संस्कृति की एक बड़ी विशेषता है कि उसने सब प्रकार की विविधताओं से परिपूर्ण इस देश में मौलिक एकता स्थापित की है । इस देश में निवास करने वालों की नस्ल, बोलियाँ, धर्म, रहन- सहन, वेश-भूषा, खान-पान एक नहीं है। यहाँ कई प्रकार की नस्लें हैं जैसे- आर्य, अनार्य, द्रविण, शक, पठान, मुगल, तिब्बती, भील आदि ।इन सभी के सम्मिश्रण से अनेक नस्लें पैदा हुईं और ये सब एक महामानव के शरीर में समाकर एक हो गईं ।विश्व कवि रबिन्द्रनाथ ठाकुर ने इस तथ्य का उल्लेख करते हुए "भारत तीर्थ " नामक कविता में लिखा है ---

"हेथाय आर्य, हेथाय अनार्य, हेथाय द्रविण,चीन,

शक, हूण, दल, पाठांन, मोगल एक देहे होलो लीन ।।

उक्त कविता की महान भावना से गदगद होकर रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है --- " यह कविता एकता की अदभुत अनुभूति की कविता है । यह भारत में बसने वाली सभी जातियों के साथ एकात्म होने का भाव है। भारत में प्राचीन काल से जो रक्त मिश्रण होता आया है , यह कविता उसकी स्मृति और अनुभूति को ताजा बनाती है ।"

भारतवर्ष में विद्यमान संसदीय लोकतंत्र को लेकर बेशक स्थितियां बेहद निराशाजनक हैं ,किन्तु ऐसा नहीं है कि इन स्थितियों में सुधार लाकर संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को वापस न लाया है सके । यह थोड़ा मुश्किल काम अवश्य है ,किन्तु असम्भव नहीं है । उचित प्रयासों की आवश्यकता अनेक स्तरों पर है । सबसे पहली जरूरत यह है कि लोकतंत्र के " पांचवें स्तंभ " के रूप में जाना जाने वाला " जनमत " जन- प्रतिनिधियों पर जवाबदेही और उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए दबाव बनाया । लोकतंत्र में " जनमत " ही सर्वशक्तिशाली होता है और इस दिशा में वह प्रभावी भूमिका निभा सकता है । इसके लिए जनमत को खुद भी जागना होगा । गौरतलब है कि वर्तमान लोकसभा के कुल सांसदों में से जहाँ 300 करोड़पति हैं वहीं लगभग 175 ऐसे हैं जिनकी आपराधिक पृष्ठभूमि रही है ।जाहिर है कि इन धनिकों व आपराधिक छवि के लोगों को हमने ही चुनकर भेजा है ।इनसे जनहित और गरीब की लड़ाई लड़ने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है और न ही ये राजनीति के अपराधीकरण को ही दूर कर सकते हैं । संसदीय लोकतंत्र के गतिरोधों को हम तभी निष्प्रभावी बना सकेंगे ,जब संसद के लिए चुने गए लोग योग्य , ईमानदार, चरित्रवान और निष्ठावान हों । यही वह सूरत है जो संसदीय लोकतंत्र की खोयी गरिमा को लौटा सकती है। दुर्भाग्य यह है कि इसके लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है , वह दिखती ही नहीं है । उल्टे ऐसा लगता है कि राजनीतिज्ञ स्वयम नहीं चाहते कि यह सूरत बदले ।

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डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

न्यू खंडेलवाल कॉलोनी, ममता नगर

प्रिंसेस प्लैटिनम, हाउस नंबर 05

राजनांदगाँव (छ. ग.)

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