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खारा-पानी, कड़वी कहानियां - प्रमोद भार्गव

खारा-पानी, कड़वी कहानियां

प्रमोद भार्गव

खारा पानीः प्रसिद्ध कथा लेखिका आशा पाण्डेय का नया कहानी संग्रह है। ये कहानियां अपने समय की नब्ज पकड़ने में सार्थक हैं, इसलिए कड़वी हैं। कहानियों में ग्रामीण समाज और शहर में जीवन-यापन के लिए गांव से आए लोगों की ऐसी त्रासदियां हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न वर्ग की मानसिक विद्रूपता से परिचय कराती हैं। इन कहानियों में गरीब, लाचार एवं वंचितों का जीवन संघर्ष है। पुरातन तथा आधुनिक जीवन मूल्यों की कश्मकश निकलते प्राण हैं। कुप्रथाओं की कुरूपता है। कर्ज में डूबे किसानों की मौत है, तो जीने के लिए पगडंडी बनाते किसान भी हैं। साफ है, संघर्षरत लोगों के जीवन के विविध रूप कथ्य का हिस्सा हैं। ये चित्र इतनी सहजता से बिंबों, प्रतीकों और लोक में व्याप्त मुहाबरों के माध्यम से संपूर्ण मानवीय करुणा व संवेदना के साथ उकेरे गए हैं। कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि वाकई सत्य और कल्पना के सम्मिश्रण की ये ऐसी कथाएं हैं, जो संवेदनशील व्यक्ति के अंतकरण में बदलाव की दस्तक देकर उसे झकझोरती हैं कि हम यह कैसा समाज निर्मित कर रहे हैं ?

इस संग्रह की कहानियों में यह तय करना मुश्किल है कि कौनसी श्रेष्ठ और कौनसी सर्वश्रेष्ठ कहानी है ? इसलिए बात उत्पादक समाज, यानी किसान के कथानक से जुड़ी कहानी 'जागते रहो' से करते हैं। इस कहानी संदेश देती है कि इसके पात्र ही नहीं, जैसे पूरे देश का उत्पादक एवं श्रम से जुड़ा समाज आजीवन त्रासदी भोगने को अभिशप्त है। अवर्षा या अतिवृष्टि की चपेट में तो वह है ही, सरकारी कामकाज में फैली अव्यवस्था और भ्रष्टाचार की मार भी सबसे ज्यादा इसी वर्ग को झेलनी पड़ रही है। कहानी में कर्ज में डूबे एक के बाद एक किसान की आत्महत्या की खबरें आती हैं। टीवी में इस बहस के दौरान कि सूखा पड़ा है अथवा नहीं के बीच भाभी अपने देवर को सूचना देती है, 'प्रथमेश देख, दौड़, तेरे दादा के मुंह से झाग निकाल रहा है।' यह झाग भोजन के जहर बन जाने से नहीं, भोजन पैदा करने वाले किसान द्वारा कीटनाशक दवा पी लेने से निकला है।

यह वह साल है, जब आम चुनाव के कारण दो बार संसद में पेश हुए आम बजट में किसान की आय दोगुनी करने और साल में छह हजार रुपए सीधे खाते में डालने के प्रावधान किए गए हैं। सरकारी आंकड़े बोलते हैं कि इसी वर्ष के छह महीनों में अकेले महाराष्ट्र में तेरह सौ किसानों ने आत्महत्या की है। यह लेखिका आशा पाण्डेय का रचनात्मक दृष्टि बोध है कि पटवारी और अन्य राजस्व कर्मचारी जो आर्थिक मदद पर भी गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे हैं, उन्हें ठेंगा दिखाते हुए गांव में सहकारिता का माहौल रचकर, बेरोजगार अलग-अलग सामान की दुकानें खोलते हैं। शर्त रहती है कि एक दुकान पर मिलने वाला सामान दूसरी दुकान पर नहीं मिलेगा। इससे बिक्री और आय में समानता बनी रहेगी। यह व्यवस्था मॉल और डिपार्टमेंटल स्टोरों को दरकिनार कर एक ऐसी राह दिखाती है, जिससे गांव और कस्बों में समृद्धि के द्वार खुल सकते हैं ?

मर्ज कहानी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर तमाचा है। इस कहानी में ग्रामीणों का वह सतत संघर्ष है, जो उन्होंने जमींदारों-जागीरदारों से किया और फिर जब देश आजाद हो गया तो यही लोग विधायक एवं सांसद बनकर सत्ता पर काबिज हो गए। लेखिका ने इस कहानी में एक बिंब रचा है, जिसके जरिए नायक मातादीन की पत्नी पति द्वारा अनाज की चोरी के जुर्म से मुक्ति के लिए शारीरिक शोषण को विवशता झेलती है। इसके बदले में शुल्क के रूप में एक बोरी रोजाना अनाज मिलता है। मातादीन का परिवार इस आनाज का उपयोग करने की बजाय एक कोठरी में एकत्रित करता रहता है। धीरे-धीरे समय बीता और कोठरी खण्डर में तब्दील होकर मैदान में बदल गई। अब न मातादिन है, न उसकी पत्नी, किंतु उसके वंशज हैं। यह वंशज जब इस मैदान में खेलता है, तो उसे गंघाई धूल से छींक और सर्दी की शिकायत होने लगती है। क्योंकि उसने अपने पूर्वजों से सुना है कि इस खण्डर की धूल में एक निर्दोष स्त्री के दैहिक दुराचार लाचारी पसरी है।

'खारा-पानी' एक जिज्ञासु बालक के शहर आकर घरेलू नौकर बनने की कहानी है। जब वह घर में पानी-बिजली जैसी बुनियादी जरूरतों की फिजूलखर्ची रोकता है तो उसे डांट-फटकार मिलती है। जिज्ञासु बालक की एक अन्य कहानी 'जंगल' भी है। इसमें शहरी सभ्यता की मानसिक विदू्रपता घने जंगल में रहने वाले आदिवासियों के मानवीय पक्ष से तुलना करके दिखाई गई है। 'यही एक राह' एक ऐसी संघर्षशील ग्रामीण स्त्री की कहानी है, जिस पर कुदरत की मारें पड़ती हैं। जब वह अपनी विधवा बहू के साथ अकेली रह जाती है तो गांव के दबंग उसकी जमीन हड़प लेते हैं और राजस्व व पुलिस अमला आंख मूंदे रहता है। जमीन वापसी के लिए वह देवी के थान पर अनायास सिर में देवी आ जाने का स्वांग रचती है और उसकी समस्याएं आश्चर्यजनक ढंग से हल होने लगती हैं। 'चीख' एक संभावनाशील ऐसी युवती की कहानी है, जिसके सपने जड़ हो चुके पुरातन और आधुनिक कश्मकश में हिचकोले खा रहे मूल्यों पर टूटते चले जाते हैं और अंततः पुनर्विवाह का सपना लिए वह अवसाद की मानसिकता से गुजर रही होती है, तो उसी का भाई, उसे कुएं में धकेल देता है। लेकिन इसे बताया आत्महत्या जाता है।

इस संकलन की प्रत्येक कहानी एक नूतन व मौलिक कथ्य का विस्तार लिए हुए ग्रामीण, आर्थिकी और समस्याओं से जुड़े विविध आयामों के सार्थक अक्श खींचती हैं। विशेषतः जिस तरह पटवारी हलकों में फैले खेतों के अक्शों की आड़ी-तिरछीं रेखाएं मानचित्र पर उभरी होती हैं, ठीक वैसे ही लाचारी और शोषण से अभिशप्त स्त्री-पुरुषों के चेहरे इस संग्रह के पृष्ठों पर अपनी संघर्ष-गाथा कहते उभरे हैं। ये चेहरे निकम्मे के आलस्य का प्रतीक न होकर व्यवस्था के भ्रष्टाचार और विदू्रपता की ऐसी परछाईयां हैं, जो हर मृत्यु के पीछे अनुत्तरित प्रश्न छोड़ जाती हैं। इन कहानियों में लेखिका ने कहीं गहरे उतरकर लाचार की विवश्ता का यर्थाथ और मर्म समझने की कोशिश की है। कहानियों का शिल्प प्रांजल भाषा और देशज मुहाबरों-कहावतों से गढ़ा गया है। इसलिए कहानियां पाठक के लिए सहज, पठनीय व रोचक हैं।

पुस्तकः खारा पानी, लेखिकाः आशा पाण्डेय, प्रकाशकः बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा, जयपुर-302006, मूल्य-150 रुपए।

प्रमोद भार्गव

लेखक@पत्रकार

शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी (म.प्र.)

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।

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