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सुखमंगल सिंह की सुपाठ्य काव्य सरिता (समीक्षा )

इस काव्य सरिता की धारा 'नारायणी स्वर दो ' से आरम्भ होती है | काशी में 'चातुर्मास के दौरान 'शिव याचक बनिहौ काशी में 'का गान करती है | 'उठो बहादुर उठो ' का हुंकार भरती है | 'राखो चुंदरिया संवारि ' का सन्देश देती है | 'बाबा हमहूँ काशी आयो 'कहते हुए 'अनोखी काशी ' का गुणगान कराती है | 'भाषा 'और कर्म बंधन ' के गूढ़ तत्तो को समझाती है | नारी को जगाती है | सद्भावना - सन्देश घर-घर पहुंचाती है |

'ओसरवा से माई करेले पुकार ' 'माई के आइल बा जड़इया बुखार ' जैसी पंक्तियां  भोगे हुए यथार्थ - बोध से पाठकों को सहज ही जोड़ देती हैं | 'काम कितना भी कठिन हो ,मनुज जो चाह दे ' जैसी उत्साहवर्धक साथ ही प्रेरणादायक भी , पंक्ति से समृद्ध है | 'पंडित पोंगा पड़ी पाले तो, लबादा ले दौड़ाना होगा '- जैसा आज के लिये जरूरी दिशा ज्ञान भी है |

'चना जोर ' भी अपनी सार्थकता समेटे हुए है | 'आंसू पोंछ तूं अपनी हिन्दी ' के माध्यम से राजनैतिक मनमानी की तरफ इशारा भी है |

'बेटी -विदाई ' का मार्मिक चित्रण प्रश्नोत्तरी शैली में मन, ह्रदय और बुद्धि तीनों पर एक साथ गहरा प्रभाव डालने में सक्षम है | प्रस्तुत है मर्मस्पर्शी ये पक्तियां -

'केकरिय रोअले गंगा बढ़ि अइली

  केकरिय रोअले अंधियार हे रामा

  केकरिय रोअले  भींजला अंचरवा

केकरिय बाड़ी  कठिन परान हे रामा '    

                 *

'माई के रोअले गंगा बढि अइली

बाबू के  रोअले अंधियार हे रामा

भइया के  रोअले भींजल अंचरवा

भउजी के कठिन परान हे रामा '

देश की ज्वलन्त दशागत दृष्टि भी कवि की दूरदर्शी और पैनी है |

वह सत्ताधारियों को आगाह करने में एक जिम्मेदार कवि की भूमिका में खड़ा है | कवि कहता है-

" युद्ध -गृहयुद्ध आते मँडराते ,देख ऐ कातिल

मुल्क पर काले बादलों की छाया घनघोर "

माँ गंगा के बहाने कवि का दर्द -

" आह! कहें क्या तुझे भगीरथ, इसीलिए धरती पर लाये

  युग -युग तक मानव का दु:ख:, तू सहती ही जाये "

बड़ी रचना है यह ,वार्ता से ज्ञात हुआ सन 1995-96 के दौरान कमलापति त्रिपाठी इंटरकालेज के सामने व्यावसायिक केंद्र के नीचे लिखी गई प्रथम बड़ी रचना यह सुखमंगल सिंह जी की है | इसी दौरान स्वामी रामकमल दास वेदांती जी सिंह से मिलने आते है | जो राम जानकी मंदिर खोझवा ,वाराणसी के महंत हैं |

ये पक्तियाँ कवि और कविता से गहरे लगाव को परिलक्षित करती हैं | साथ ही उन सरकारी आयोजकों को करारा तमाचा भी कि जो गंगा -महोत्सव के नाम पर हर साल लाखों का राजस्व पानी कि भांति बहाते हैं |

'साहित्य वह मशाल जो आगे चला करता सदा ,

सामंतशाही राजनीति को धकिया के चलता सदा "

प्रीति की महत्ता का बखान करने में भी कवि पीछे नहीं है | कवि कहता है -

" बिनु प्रेयसी जिन्दगी माने सेमल का फूल

जैसे तैसे कटती ,कटा खीरा तरबूज "

कवि सुखमंगल सिंह व्यापक धरातल पर सोच रखने वाले, बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि हैं | काव्य सरिता लोकप्रिय हो , मेरी यही शुभकामनायें |

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- डा अजीत श्रीवास्तव

शिवकृपा -सी 4/204-1 कालीमहल                  

वाराणसी (उत्तर प्रदेश  

1 टिप्पणियाँ

  1. हार्दिक आभार आदरणीय जी आपका प्रकाशित करने की क्रिया सराहनीय है।

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