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सीता वनवास - डा. विजय चौरसिया

 

सीता वनवास

- डा. विजय चौरसिया

राजा रामचंद्र जी की एक बहन थी। उसका नाम था कारी अंजनी। कारी अंजनी का विवाह रैयतपत नगर में हुआ था। एक दिन कारी अंजनी अपने मन में सोचती है बहुत दिन हो गये भैया - भाभी को देखे। ऐसा सोचकर कारी अंजनी सीता जी के बदन महल में पहुंचती हैं। रामचंद्र जी अपनी बहन को देखकर बहुत प्रसन्न होते हैं। उसका आदर सत्कार करते हैं।

एक दिन रामचंद्र जी अपने भाई लक्ष्मण जी से कहते हैं । लक्ष्मण बहुत दिनों बाद बहन घर आई है न होता तो हम दोनों जंगल जाकर बहन के लिये एक हिरन मारकर लाते। ऐसा सेाचकर दोनों भाई हिरन का शिकार करने जंगल जाते हैं। दोनों भाई कजली वन में जाकर एक हिरन का शिकार करके महल में वापस आते हैं।

उसी दिन कारी अंजनी अपनी भाभी सीता जी के पास बैठी थी। कारी अंजनी सीता जी से पूछती हैं क्यों भाभी जब तुमको रावण हरण करके ले गया था । तुम बारह वर्ष तक लंका में रही। तब उस समय रावण का रंग रुप कैसा था। सीता जी हंस हंसकर अपनी ननद कारी अंजनी को बतलाती हैं कि रावण का रुप बहुत ड़रावना था। उसके दस सिर और बीस हाथ थे। बड़ी - बड़ी गुफाओं के समान उसके कान के छेद थे। एक बड़ी सुरंग के समान उसकी नाक का नथुना था। काली चट्टान के समान उसका मस्तक था।

कारी अंजनी सीता जी से कहती है । भाभी ऐसे में मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुम उसकी मूर्ति बनाकर दिखाओ। तब अच्छे से समझ में आयेगा। तब सीता जी अपने नौकरों से बारह खंड़ी आटा मंगवाती हैं। सीता जी आंगन में बैठकर रावण की मूर्ति बनाने लगती हैं। जिस समय मूर्ति बनकर तैयार होती है । तो कारी अंजनी रावण की मूर्ति देखकर आश्चर्य चकित हो जाती हैं। यहां पर ननद - भौजाई दोनों उस मूर्ति को देखने में व्यस्त थी ।

उसी समय लक्ष्मण जी अपने कंधे में हिरन को लादकर आंगन में खड़े हो जाते हैं। वे दरवाजे पर खड़े होकर सीता जी को आवाज देते हैं परंतु सीता जी और कारी अंजनी रावण की मूर्ति देखने में इतनी तल्लीन थी की उन्हें लक्ष्मण जी की आवाज नहीं सुनाई दी। तब लक्ष्मण जी दरवाजा खोलकर महल के अंदर प्रवेश करते हैं । तब लक्ष्मण जी देखते हैं कि उनकी भाभी रावण की मूर्ति बनाकर उसे एकटक देख रही थीं।

लक्ष्मण जी अपनी भाभी के पास आकर कहते है। भाभी आप उस पापी रावण की मूर्ति बनाकर पूजा कर रही हो । जो रावण आपका हरण करके ले गया था। भैया रामचंद्र जी देख लेंगे तो आपका सिर धड़ से अलग कर देंगे।

सीता जी कहती हैं - नहीं देवर जी ननद बाई ने कहा था मैं रावण की मूर्ति देखूंगी इसलिये मैंने उसकी मूर्ति बनाई है। तब कारी अंजनी कहती है भैया मैंने ही सीता भाभी से कहा था तभी भाभी ने यह मूर्ति बनाई है भाभी तो मना कर रही थी। मेरे बार - बार कहने पर ही उसने यह मूर्ति बनाई है यह मेरी गलती है मुझे माफ कर दो।

लक्ष्मण जी रावण की मूर्ति को देखकर आगबबूला हो जाते हैं। उनकी आंखों से आग की चिनगारियां निकलने लगती हैं। लक्ष्मण जी अपनी तलवार निकालकर मूर्ति पर प्रहार करते हैं। उसी समय वह मूर्ति साक्षात रावण का रुप लेकर खड़ी हो जाती हैं आटा से बनी मूर्ति सजीव हो जाती है। रावण ने जैसे ही लक्ष्मण जी को अपने सामने देखा उनकी आंखें लाल अंगार के समान दगदगाने लगी। रावण के हाथ फड़कने लगे नाक के नथुनों से आंधी के समान सांस चलने लगी। रावण लक्ष्मण जी से युद्ध करने लगे। युद्ध करते - करते लक्ष्मण जी परास्त होने लगते हैं तब सीता जी लक्ष्मण जी को अपनी तलवार देकर कहती हैं देवर जी इस तलवार से रावण का सिर धड़ से अलग कर दो। लक्ष्मण जी तलवार लेकर फिर से रावण से युद्ध करने लगते हैं। जैसे ही रावण को तलवार लगती है और उनके शरीर से जितनी बूंदें खून की गिरती है उतने ही रावण तैयार होकर सामने खड़े हो जाते हैं। थोड़ी ही देर में हजारों रावण एकत्र हो जाते हैं। लक्ष्मण जी ने इतने रावण देखकर हिम्मत छोड़ दी । तब सीता जी कहती हैं देवर जी आप हिम्मत ना हारें एक - एक रावण को उठाकर अंधे कुएं में फेंकते जाओ और उसके ऊपर चट्टान रख दो तब लक्ष्मण जी ने हजारों रावणों को अंधे कुऐं में ड़ालकर उस के ऊपर चट्टान ढ़ंक दी।

रावण को मारकर लक्ष्मण जी महल से बाहर निकलते हैं । रामचंद्र जी जैसे ही लक्ष्मण को देखते हैं की उसके हाथ में तलवार है और वह खून से लथपथ हैं तो वे लक्ष्मण से पूछते हैं तुम किसके साथ युद्ध करके आ रहे हो। तब लक्ष्मण जी महल की घटना को विस्तार से रामचंद्र जी को बतलाते हैं। इतना सुनते ही रामचंद्र जी गुस्से से आगबबूला हो जाते हैं। लक्ष्मण जी उनकी गुस्सा शांत करने के लिये रामचंद्र जी को बगीचा घुमाने ले जाते हैं। बगीचा में एक तालाब था। उस तालाब पर एक धोबी अपनी पत्नी के साथ कपड़े धो रहा था। उसी समय उन दोंनों में विवाद हो जाता है। धोबिन कहती है मैं अब तुम्हारे पास नहीं रहूंगी। तुम्हारे जैसे पति मुझे बहुत मिल जायेंगे। धोबी कहता है जा भाग जा मैं तेरे पैर नहीं पड़ता । मैं राजा रामचंद्र नहीं हूं जिसे अपनी पत्नि से मोह हो । सीता जी बारह वर्ष तक लंका में रहीं वे उसे जाकर ले आये और अपनी रानी बना लिया। जा भाग जा यहां से लौटकर आई तो तेरे हाथ पैर तोड़ दूंगा।

राम लक्ष्मण दोनों उस धोबी की बातें सुनते हैं तो रामचंद्र जी अपना सिर पकड़कर बैठ जाते हैं वे लक्ष्मण जी से कहते हैं लक्ष्मण यह धोबी कैसी हंसी उड़ा रहा है। मैं यहां का राजा हूं मर्यादा से बंधा हूं। ये छोटे - छोटे लोग मेरी हंसी उड़ा रहे हैं।

तुम सीता जी को अभी जंगल ले जाकर उसके दो टुकड़े कर दो। दया बिलकुल मत दिखाना । मुझसे धोखा करोगे तो ठीक नहीं होगा।

लक्ष्मण जी महल में आते हैं। वे सीता जी से कहते हैं भाभी जी बहुत दिन हो गये कहीं घूमने नहीं गये। चलो मैं तुमको जंगल घुमाकर लाता हूं। लक्ष्मण जी सीता जी को लेकर जंगल जाते हैं। चलते - चलते सीता जी थक जाती हैं और एक पेड़ के नीचे बैठ जाती हैं। सीता जी लक्ष्मण से कहती हैं देवर जी मुझे बड़ी जोर से प्यास लगी है कही से पानी लेकर आओ। लक्ष्मण जी पानी की खोज में चले जाते हैं। सीता जी उसी पेड़ के नीचे लेट जाती हैं जिससे उनको नींद लग जाती हैं लक्ष्मण जी पानी लेकर आते हैं तो वे देखते हैं की सीता जी बेसुध होकर पेड़ के नीचे सो रही हैं। उनकी साड़ी का आंचल पेट के ऊपर से हट गया है। जिसके कारण सीता जी का पेट खुल जाता है। लक्ष्मण जी देखते हैं की सीता जी गर्भवती हैं। उनके पेट में बच्चा है, इसे मारुंगा तो मुझे बड़ा पाप लगेगा। ऐसा सोचकर लक्ष्मण जी सीता जी को जंगल में अकेले छोड़कर वापस आ जाते हैं।

लक्ष्मण जी सोचते हैं मैं अपने भाई के पास जाकर कौन सा बहाना करुंगा । उनको किस प्रकार समझाऊंगा। सत्य बात सुनेंगे तो बहुत नाराज होंगे। ऐसा सोचकर लक्ष्मण जी एक बढ़ई के पास जाते हैं वे बढ़ई से सीता जी के समान एक सुंदर हाथ लकड़ी का बनवाते हैं बढ़ई लक्ष्मण जी को सीता जी के हाथ के समान एक हाथ बनाकर दे देता हैं लक्ष्मण जी हाथ देखकर खुश हो जाते हैं। उसी समय हिरणों का एक झुंड़ लक्ष्मण जी के सामने से गुजरता है लक्ष्मण जी एक हिरन का वध करके उसकी आंखें निकाल लेते हैं। हिरण की आंखें सीता जी की आंखों के समान सुंदर थीं। उसे लेकर लक्ष्मण जी बदन महल में रामचंद्र जी के पास जाते हैं। लक्ष्मण जी रामचंद्र जी को सीता जी का हाथ और दोनों आंख दिखलाते हैं। रामचंद्र जी उन्हें देखकर विलाप करने लगते हैं।

सीता जी उस घने वन में सोकर जब जागती हैं तो उनको लक्ष्मण जी कहीं नहीं दिखते। सीता जी के पास पानी का लोटा रखा था। वे उससे पानी पीती हैं। सीता जी उस वन में आगे बढ़ती हैं तो उन्हें नदी के किनारे एक कुटी नजर आती है। सीता जी उस कुटी में पहुंचती हैं। वहां पर दो बाबा रहते थे। एक बाबा ने सीता जी को पहचान लिया। तब सीता जी ने उन बाबाओं को बतलाया की मुझे मेरे पति ने घर से निकाल दिया है। इसलिये मैं जंगल - जंगल भटकती फिर रही हूं। दोनों बाबा सीता जी को आश्रय देते हैं और उनकी सेवा करने लगते हैं। समय पूरा होने पर सीता जी एक पुत्र को जन्म देती हैं। दोनों बाबा उस बच्चे का नाम लव रखते हैं।

एक दिन सीता जी अपने पुत्र के कपड़े धोने नदी पर जाती है। वह दोनों बाबा से कहती है बाबा मैं नदी जा रही हूं आप लव को देखते रहना। दोनों बाबा लव को झूला झुलाते हैं। झूला झूलते - झूलते लव को नींद आ जाती है दोनों बाबा को भी नींद आ जाती है। सीता जी नदी से लैाटती हैं और झूला से उठाकर लव को कुटी के अंदर ले जाकर दूध पिलाने लगती हैं। कुछ समय बाद दोनों बाबा नींद से जागते हैं तो उन्हें झूले में लव नहीं दिखता। दोनों बाबा घबड़ा जाते हैं। दोनों बाबा सोचते हैं की सीता जी आयेंगी और लव के बारे में पूंछेंगी तो उन्हें क्या जवाव देंगे। तब दोनों बाबा आपस में विचार कर कुशा का चारा लाकर उस पर मंत्र फूंकते हैं जिसके कारण वह कुशा का चारा लव के समान एक बालक के रुप में परिर्वतित हो जाता हैं बाबा उस बालक को झूले में लिटा देते हैं। बालक रोने लगता हैं तो सीता जी कुटी के अंदर से लव को गोद में लेकर बाहर निकलती हैं। तो उन्हें झूले में एक बालक रोते हुये दिखता है। दोनों बाबा आश्चर्यचकित होकर सीता जी को देखने लगते हैं की सीता जी की गोद में लव खेल रहा था। सीता जी भी आश्चर्य से देखती हैं की यह लव के समान दूसरा बालक झूले में कहां से आ गया। किसी के समझ में नहीं आता की यह क्या हो रहा है। सीता जी उस सुन्दर बालक को उठाकर प्यार करने लगती हैं। दोनों बाबा सीता जी को देखकर ड़र जाते हैं। सीता जी बाबाओं को देखकर हंसती है। वे कहती हैं तुम चिंता मत करो मुझे सच - सच बतलाओ की यह बालक कहां से आया है। तब दोनों बाबा सब हाल सीता जी को बतलाते हैं। दोनों बाबा कहते हैं देवी हमसे बहुत बड़ी भूल हो गयी है यदि आप कहैं तो इस बालक को खतम कर देते हैं। सीता जी कहती हैं ऐसा मत करना मैं इस बालक का नाम कुश रखती हूं। क्योंकि यह कुशा की घास से बना है। अब मेरे दो पुत्र लव और कुश हो गये हैं। दोनों मेरी आंखों के तारे हैं। मैं इन दोनों को पालूंगी। समय के साथ - साथ लव - कुश भी बढ़ने लगते हैं । एक दिन लव कुश अपनी मां सीता जी से कहते हैं। माता जी हमको तीर कमान बनवा दो हम दोनों भाई शिकार खेलने जायेंगे।

लव और कुश तीर कमान लेकर जंगल जाते हैं वे उस जंगल के सभी जानवरों का शिकार कर ड़ालते हैं। एक दिन लव - कुश अपनी मां से कहते हैं मां इस जंगल के सभी जानवर समाप्त हो गये हैं। आप आज्ञा दें तो हम दोनों भाई दूसरे जंगल में शिकार खेलने चले जायें। लव - कुश अपनी माता से आज्ञा लेकर शिकार खेलने एक घने वन में चले जाते हैं।

राम लक्ष्मण भी शिकार खेलने उसी वन में जाते हैं। जहां लव और कुश शिकार खेलने जाते हैं। रामचंद्र जी घने वन में दो सुंदर बालकों को देखकर आर्श्चयचकित हो जाते हैं। वे उन दोनों बालकों से उनका परिचय पूछते हैं। तब लव कहता है हमारी माता का नाम सीता,पिता का नाम राम और काका का नाम लक्ष्मण जी है। हम दोनों भाई यहां पर शिकार खेलने आये हैं।

रामचंद्र जी लक्षमण जी से कहते है भाई लक्ष्मण सीता जी को मरे तो बारह वर्ष हो गये। ये मेरे बच्चे कहां से होंगे। तब रामचंद्र जी ने उन बच्चों से कहा मैं ही राजा राम हूं और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है। यदि तुम मेरे बेटे हो तो तुम मेरे बाणों को स्वीकार करके बतलाओ। तभी मैं समझूंगा की तुम मेरे पुत्र हो। इतना सुनते ही लव - कुश रामचंद्र जी के सामने छाती तानकर खड़े हो गये। लव - कुश ने कहा यदि हम सत्य होंगे तो बाण हमारे चूमा लेकर वापस चले जायेंगे। राम चंद्र जी लव - कुश पर बाण चलाते हैं पर बाण लव - कुश के पास जाकर उसका चूमा लेकर वापस रामचंद्र जी के पास आ जाते हैं। रामचंद्र जी को विश्वास हो जाता है कि ये दोनों मेरे ही पुत्र हैं। राम - लक्ष्मण दौड़कर लव - कुश को गोद में उठा लेते हैं।

रामचंद्र जी लक्ष्मण से पूछते हैं - भाई लक्ष्मण तुमने तो सीता जी को मार ड़ाला था। मुझे तुमने सीता जी का हाथ और आंख भी दिखलाये थे। अब यह क्या है। लक्ष्मण जी कहते हैं भैया वह सब झूठ था। भाभी के पेट में बच्चा था इसलिये मैं भाभी को नहीं मार सका।

राम लक्ष्मण लव - कुश को लेकर सीता जी के पास जाते हैं। सीता जी जैसे ही राम - लक्ष्मण को देखती हैं। वे पाताल लोक में उतरने लगती हैं। रामचंद्र जी जाकर सीता जी की चोटी पकड़ लेते हैं। जिससे सीता जी की चोटी उखड़ जाती है। उसे रामचंद्र जी ने वहीं पर फेंक दिया। वही हैं सीता जी की लटैं जो सांप बन गयीं। जिसे सीता लटी कहते हैं। अब रामचंद्र जी ने सीता जी की बाहें पकड़कर बाहर निकाला। रामचंद्र जी सीता जी से रो - रोकर माफी मांगते हैं। दोनों बाबा सीता जी को समझाते हैं। बाबा कहते हैं सीता जी आप अपने घर जाईये मान सम्मान का घमंड़ मत करो। बाबाओं के कहने से सीता जी लव कुश को लेकर राम - लक्ष्मण जी के साथ बदन महल में आ जाती हैं। पूरे राज्य में उत्साह मनाया जाने लगा।

जय सीता राम जी की.................

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मंड़ला एवं ड़िंड़ौरी जिले के गोंड़ प्रदेश में परधान जाति के लोगों द्वारा गायी जाने वाली रामायण में उक्त प्रसंग प्रचलित है। मैंने रामायनी का संकलन किया है जिसका प्रकाशन वन्या प्रकाशन संस्कृति विभाग भोपाल द्वारा राजकमल प्रकाशन दिल्ली से कराया गया है। उक्त प्रसंग रामायनी से ही लिया गया है।

डॉ. विजय चौरसिया

गाड़ासरई जिला ड़िंड़ौरी

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बायोडाटा डॉ.विजय चौरसिया

सम्प्रति -ª चिकित्सा कार्य, पत्रकारिता, लोक संस्कृति पर लेखन, प्रदेश के लोक नृत्यों एवं लोक संस्कृति के संरक्षण हेतु प्रयासरत। म.प्र.तथा देश की विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं जैसे कादंबनी, धर्मयुग,हिन्दुस्तान टाइम्स, दिनमान,इंड़िया टूडे, दैनिक भास्कर, नवभारत,नई दुनिया में एक हजार से अधिक लेखों का प्रकाशन। ª मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में करीब 30 लोक नाट्य एवं लोक नर्तक दलों का नेतृत्व एवं देश - विदेशों तथा फिल्मों में लोक नृत्यों का प्रदर्शन। चीन,मलेशिया,इंडोनेशिया,सिंगापुर,मारिशस, म्यानमार, दक्षिण अफ्रिका हरारे एवं बंगला देशों की यात्रा।

उप्लब्धियां-ª म.प्र. की प्रसिद्व समाजसेवी संस्था सावरकर शिक्षा परिषद में अध्यक्ष।सावरकर लोक कला परिषद में निर्देशक। दैनिक भास्कर पत्र समूह के क्षेत्रीय संवाददाता। इंटरनेशनल रोटरी क्लब डिंड़ौरी में सदस्य।राजीव गांधी शिक्षा मिशन ड़िड़ौरी में जिला इकाई के सदस्य। पंचायत समाज सेवा संचालनालय म.प्र. द्वारा डिंड़ौरी जिले के वरिष्ट नागरिक समूह के सदस्य। प्रदेश प्रतिनिधी रेड़ क्रास सोसायटी, म.प्र.,राष्ट्रीय भारत कृषक समाज के अजीवन सदस्य।.,दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र नागपुर भारत सरकार द्वारा लोक नृत्यों के लिये 2012.13 के लिये गुरु नियुक्त। चेयरमेन जूनियर रेड़ क्रास सोसायटी म.प्र.।

शोध पत्र -ª स्वराज संस्थान संचालनालय संस्कृति विभाग भोपाल द्वारा स्वाधीनता फैलोशिप 2006.07, प्प्रचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग म.प्र., उच्च शिक्षा विभाग म.प्र. भाासन, मेरठ बाटनी कालेज मेरठ,रानी दुर्गावती विश्वविघालय जबलपुर,जवाहर लाल नेहरु कृशि विश्वविघालय जबलपुर, स्वराज भवन भोपाल एवं गौंड़ी पब्लिक ट्रस्ट मंड़ला, भाासकीय चंद्र विजय महाविघालय डिंड़ौरी,रानी दुर्गावती महाविघालय मंड़ला,भारतीय संस्कृति निधि दिल्ली,,गुरु घासीराम विश्वविद्यालय रायपुर,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजाती विश्वविघालय अमरकंटक में आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार 28 फरवरी 2012 को शोध पत्र का वाचन।

प्रकाशित कृतियां -ª एशिया महाद्वीप की सबसे पुरानी जनजाति बैगा के जनजीवन पर आधारित भारत वर्ष की प्रथम हिन्दी पुस्तक 'प्रकृति पुत्र बैगा' का म.प्र. हिन्दी ग्रंथ अकादमी भोपाल द्वारा प्रकाशन। म.प्र. की प्रसिद्व जनजाति गौंड़ में प्रचलित बाना गीत पर आधारित 'आख्यान' (गोंड राजाओं की गाथा) पुस्तक का म.प्र. आदिवासी लोक कला अकादमी द्वारा प्रकाशन। म.प्र. की प्रसिद्व जनजाति परधान द्वारा गायी जाने वाली गाथा रामायनी, पंडुवानी एवं गोंड़वाना की लोक कथाओं का वन्या प्रकाशन भोपाल द्वारा राजकमल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित। जनजातीय लोक गीतों में राजनैतिक एवं सामाजिक चेतना शोध पत्र का प्रकाशन स्वराज भवन संस्कृति संचालनालय भोपाल द्वारा.।

अप्रकाशित कृतियां -ª बैगा जनजाति में प्रचलित चिकित्सा पद्वति,सर्प बिष तंत्र - मंत्र चिकित्सा,म.प्र. के आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आदि।

संर्पक-डॉ.विजय चौरसिया

चौरसिया सदन गाड़ासरई जिला ड़िड़़ौरी म.प्र.

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