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संस्थानोपनिषद (व्यंग्य –उपन्यास ) -1 : यशवंत कोठारी

संस्थानोपनिषद

(व्यंग्य –उपन्यास )


यशवंत कोठारी

86, लक्ष्मी नगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर-३०२००२

Email-ykkothari3@gmail. com

(इस रचना के सभी पात्र व् घटनाएँ पूरी तरह काल्पनिक हैं. )

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मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्" ||

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धरती को प्रणाम, आकाश को प्रणाम, सूर्य को प्रणाम, चाँद तारों को प्रणाम, नदियों को प्रणाम, अग्नि को प्रणाम, ब्रह्माण्ड को प्रणाम, दसों दिशाओं को प्रणाम, आदि कवि वाल्मीकि को प्रणाम, आदि आशु लेखक गणेश को प्रणाम, साहित्य कला के ईश्वर शिव को प्रणाम.

अब मैं गुरु आज्ञा से संस्थानोपनिषद का श्री गणेश करता हूँ प्रभु इसे पूरी करने की शक्ति व् आशीर्वाद देने की कृपा करें.

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जाना डायरेक्टर का दिल्ली

देश का हर नागरिक दिल्ली-मुखी है, और दुखी है. दुखी आत्माएं सशरीर दिल्ली की ओर कूंच करती रहती हैं.

राजधानी के सबसे महत्व पूर्ण इलाके में स्थित इस भवन से देश की महत्व पूर्ण सेवाओं का परिचालन होता है. लेकिन यदि भूल से भी आप इस के अंदर के टॉयलेट, बाथरूम्स, में चले जायेंगे तो आप का बीमार होना व् अस्पताल जाना तय है. हो सकता है आप को अस्पताल से सीधे निगम बोध घाट जाना पड़े, जाना नहीं पडेगा क्योंकि आप स्वयम वहां तक चल कर नहीं जा पाएंगे. शव वाहन ही आपको गंतव्य तक पहुंचा सकता है. खैर !

इसी भवन में मंत्री, राज्य मंत्री, सचिव व पूरे देश को चलाने वाला अमला बैठता है. इस भवन के पास में ही संसद भवन है, देश के नीति निर्धारक यहाँ बैठ कर आम आदमी के भाग्य का निर्धारण करते हैं. थोडा आगे जायेंगे तो साऊथ ब्लाक व नार्थ ब्लोक, रायसीना हिल्स और राष्ट्रपति भवन है. आस पास बड़े बड़े बंगले और पार्टियों के दफ्तर हैं. यही है लुटियंस की दिल्ली, राज धानी दिल्ली, नौकरशाहों की दिल्ली, सरकारों कि दिल्ली. दिल्ली के केन्द्रीय सचिवालय की फाइलों में असंख्य याने एक सो तीस करोड़ लोगों के भाग्य बंद है. कभी कभी किसी का भाग्य खुलता भी है.

यहीं अपना भाग्य खुलवाने दूर प्रदेश का एक अदना निदेशक आया है, दिल्ली में अदना मगर वैसे पावरफुल, कई लोग कहते हैं की उनकी उम्र का पता लगाना बड़ा मुश्किल है, उनके बा ल सखा सहपाठी सभी, सभी सेवाओं से निव्रत्त हो गए है, लेकिन ये अपने पुराने मेट्रिक प्रमाणपत्र के बल बूते पर अभी सेवा निवृत्ति से काफी दूर है. निदेशक के साथ निजी सहायक, ड्राइवर, एक चमचा नुमा प्रोफेसर या प्रोफेसर नुमा चमचा व एक प्रेमिका है. ये लोग निदेशक को सँभालने के लिए हर समय साथ रहते हैं. कब श्रीमान को किसी प्रकार का अटेक आ जाये, जो मंत्रालय के उच्चधिकारियों से मिलने के बाद अक्सर आ जाता है.

निदेशक ने चमचों को बाहर छोड़ा और खुद हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए सचिव के कमरे में घुसे, सचिव ने कोई ध्यान नहीं दिया, मन में सोचा –आ जाते है रोज-रोज़ कोई न कोई समस्या लेकर, दफ्तर संभलता नहीं यहाँ आकर परेशान करेंगे. निदेशक उवाच-

-सर मैं निदेशक

सचिव ने फिर भी ध्यान नहीं दिया.

निदेशक ने इस बार फिर कहा –

- सर !प्रणाम सर, मैं डायरेक्टर,

इस बार सचिव ने हूँ शब्द उचारा.

निदेशक –सर हमारी कुछ फाइल्स पेंडिंग हैं

हाँ तो? पूरे देश की फाइलें आती है.

सर निकल जाती तो....

निकल जायगी... मेरे पास कोई फाइल पेंडिंग नहीं... नीचे देखो.

-जी सर.

-और सुनो ये कर्मचारी क्यों चिल्ला रहे हैं, तुम से नहीं संभलता है तो क्लोज दी इंस्टिट्यूट एंड ब्रिग दी कीज टू मी. यू केन गो.

निदेशक फिर भी जमे रहे, सचिव ने फिर कहा –गो टू हेल.

निदेशक पसीना पोंछते हुए बाहर आये. और सीधे संयुक्त सचिव के कक्ष में घुसे, यहाँ माहोल थोडा दोस्ताना था.

संयुक्त सचिव ने पूछा

-सर क्या बोले

, निदेशक उवाच-गो टू हेल.

लेकिन मेरा कक्ष हेल नहीं है, और क्या बोले –क्लोज दी इंस्टिट्यूट ब्रिग दी कीज टू मी

जॉइंट सेक्रेट्री बोले – इट इज अ वे टू कनवे अन हेपीनेस. डू नॉट वरी. सुनो एक प्रोजेक्ट बनाओ, पांच करोड़ का. बाहर जाओ, शाम को पांच बजे तक ले लाओ.

, निदेशक ने बाहर आकर फिर पसीना पोंछा, तब तक चमचे भी नजदीक आ गये थे.

-सर अंदर क्या बात हुई?

शाम तक पांच करोड़ का शोध प्रोजेक्ट बना कर देना है.

सर ये कैसे होगा? -स्टेनो बोला अंग्रेजी जानने वाला पी ए भी नहीं है. निदेशक ने सुना अनसुना किया.

वो अपने साथ मास्टर आया था, वो कहाँ है?

सर वो तो अपने ससुराल मिलने गया है.

उससे बात कराओ मेरी.

निदेशक ने आदेश उचारा. पी ए ने मोबाईल मिलाया –निदेशक दहाड़े –तुम कहाँ रोते फिर रहे हो, यहाँ मैं तुम्हारी डी पी सी की कोशिश में लगा हूँ और तुम ससुराल में गुलछर्रे उड़ा रहे हों. तुरंत आओ. एक प्रोजेक्ट बनाना है. साली फ्री हो तो ले ते आना.

बिना बात सुने निदेशक ने फोन रख दिया, सही प्रशासन का कायदा सामने वाले की सुनो ही मत.

भागता दौड़ता मास्टर आ पहुंचा. पास के एक खा ली पड़े कमरे में डेरा जमाया गया. एक लेपटोप, एक टाइपिस्ट की मदद से प्रोजेक्ट बनने लगा. स्टाफ की सेलरी, फर्निचर , उपकरण, केमिकल आदि का तीन वर्ष का प्रोजेक्ट पांच करोड़ का हो गया.

सर मेरी साली ने भी डिग्री ले ली है , उसे इस में फिट कर देंगे. -मास्टर बोला.

शटअ प, शहर बसा नहि और भिखमंगे आने लग गए, अरे वज्र मूर्ख ये प्रोजेक्ट ही साहब की साली के लिए है. लेकिन अगर सब ठीक रहा तो इस साल तुम्हारी पदोन्नति पक्की. मास्टर ने सरे आम चरण स्पर्श किये. निदेशक ने गर्दन अकड़ा कर अन्य चमचों की तरफ देखा. आकाश से पुष्प वर्षा हुई, चमचों ने साधू साधू उचारा.

मास्टर का प्रोजेक्ट लेकर निदेशक संयुक्त सचिव के चेमबर में हनुमान चालीसा व् गायत्री मन्त्र का पाठ करते करते घुसा, संयुक्त सचिव फोन पर घरवाली का प्रवचन सुन रहे थे, डायरेक्टर बैठ गए,. संयुक्त सचिव ने कोई ध्यान नहीं दिया. मोबाइल बंद करने के बाद उन्होंने फेस बुक व् ट्विटर का ताज़ा जायजा लिया. बिना बोले निदेशक से कागज लिए एक सरसरी निगाह डाली और उवाचे-

तुम से कोई भी का म ढंग से नहीं होता, दुनिया भर की स्पेलिंग मिस्टेक्स हैं, ग्रामर का तो भगवान ही मालिक है, ऊपर से इसे सचिव को भेजना है, तुम ऐसा करो मेरे पी. एस. से इसे ठीक करा लो. फिर मैं कुछ करता हूँ.

सर, एक निवेदन था,

जल्दी बोलो

वो विश्व स्वस्थ्य संगठन की फेलोशिप का मामला था,

तो?

सर मेरा नंबर लग जाता.

वो तो सचिव खुद देखते हैं

हाँ, सर मगर आप फरमा देते तो...

हूँ !तुम जाओ. प्रोजेक्ट पी. एस से बनवा लो. फिर देखेंगे. और सुनो उसे कुछ दे दिला देना.

डायरेक्टर ने बा हर आकर अपने चमचे मास्टर को निजी सचिव के पास भेजा प्रोजेक्ट की डेंटिंग पेंटिंग की गयी. इस खर्च को मास्टर के टी ए डी ए में एडजस्ट किया गया.

राजधानी से निपट कर समूह ने एक होटल में रात्रि चर्या का आनंद लिया और सडक मार्ग से अपने शहर की और रवाना हुए.

रास्ते में में खाने पीने का सब इंतजाम मास्टर ने किया, उसे नींद में भी पदोन्नति दिखने लगी थी. कभी न कभी तो सूरज उगेगा इसी आशा के साथ वो जी रहा था.

०००००००००

(क्रमशः अगले अंक में जारी...)

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