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संस्थानोपनिषद (व्यंग्य –उपन्यास ) - 2 : यशवंत कोठारी

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भाग 1 /  संस्थानोपनिषद (व्यंग्य –उपन्यास ) यशवंत कोठारी भाग 2 - लौट के निदेशक घर को आये लौट के निदेशक अपनी संस्था में वापस आये, यहाँ पर वे...

भाग 1

संस्थानोपनिषद

(व्यंग्य –उपन्यास )

यशवंत कोठारी


भाग 2 -

लौट के निदेशक घर को आये

लौट के निदेशक अपनी संस्था में वापस आये, यहाँ पर वे राजा थे और बाकी सब प्रजा. वे दाता थे बाकी सब याचक. राजधानी से इतनी दूर की कहीं से कोई खबर नहीं आती. यह एक चिकित्सा शिक्षा व भारतीय विज्ञान का संस्थान था, निदेशक का पद तकनीकी था मगर वेतन भत्ते व् ऊपर की कमाई के पूरे साधन थे और यह बात सर कार जानती थी. मंत्रालय की सेवा पूजा में कोई कोर कसर होने पर पूरे स्टाफ की परेड हो जाती थी ऐसे पुराने किस्से संस्थान के वातावरण में तैरते रहते थे. जाने वाला निदेशक आने वाले निदेशक को सब गोपनीय जानकारी दे देता था, कब किसको कहाँ कैसे निहाल करना है. ये काम बड़ी शांति और शालीनता के साथ किये जाते थे. कभी कभी गलती हो जाने पर भारी कीमत चुकानी पड़ती थी.

ऐसा ही एक किस्सा बहुत मशहूर था, केंद्र सरकार का एक छोटा अफसर दौरे पर आया, खूब सेवा पूजा तो की गई, मगर अफसर पत्नी या जो कोई भी वो थी नाराज हो गई, वापसी की गिफ्ट भी नहीं ली, कुछ दिनों के बाद सरकार ने निदेशक का चार्ज अपने एक सलाहकार को दे दिया. अब मक्खन के डिब्बे सलाहकार तक नियमित पहुंचने लग गए. हटाये गए निदेशक को मंत्रालय में भाषण लिखने के काम में लगा दिया, एक बार मंत्रीजी के भाषण में गंभीर गलती के कारण निलंबन को प्राप्त हुए और अभी भी पेंशन के लिए मंत्रालय भवन के बा हर चाय –पकोड़े के ठेले पर दिख जाते हैं, सुबह से शाम तक एक नमस्ते को तरसते हैं बेचारे.

सन्स्थान बहुत अच्छा था, आपसी भाई चारा भी खूब था. जो लोग सुबह जल्दी आ जाते वे लंच के बाद चले जाते जो सुबह जल्दी अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते थे वे जल्दी नहीं आ सकते थे वे लंच के बाद आते और सायंकालीन सभा अटेंड कर के ही घर जाते. सरकारी का म काज का सीधा नियम था, निदेशक बताये वो काम कर दो, प्रशाशनिक अधिकारी को नमस्ते करो और जाओ. कुछ नेता टाइप कर्मचारियों को स्पष्ट सन्देश था की आपके नहीं आने से संस्था का काम सुचारू रूप से चलता है, कृपया संस्थान के काम काज को डिस्टर्ब न करे. आप के वेतन भत्ते आपके खाते में नियमित चले जायेंगे, नेता लोगों की हालत ये थी की यदि किसी का स्थानान्तरण कमरा नम्बर २५ से कमरा नम्बर २६ या २७ में कर दिया जाता तो हड़ताल हो जाती थी. कोई निदेशक यह रिस्क नहीं लेता था. हर बाबू को एक पढ़े लिखे चपरासी की जरूरत होती थी जो उसकी टेबल का का म देखे. इसी प्रकार हर विभागाध्यक्ष को एक चमचे अध्यापक की तलाश रहती थी जो उसकी क्लास ले, विभाग काम देखे और वे छुट्टे सांड की तरह निदेशक की पुंगी बजा कर उस पद को हस्तगत करने के प्रयास जारी रख सके. आपस में जूतम पैजार के मामले कम ही होते थे क्योंकि सब के अपने अपने निजी का म धंधे थे जो ओटो चलाने से लेकर क्लिनिक चलाने तक विस्तरित थे. लगभग सभी अपनी पत्नियों, सालियों प्रेमिकाओं के नाम से चल रही फर्मों के का म में व्यस्त रहते थे. छोटे कर्म चारी हाजरी भर कर गैस सिलिंडर बे चने, चाय बेचने, ठेले चलाने, लंच में घरेलू सामान बेचने से लगाकर जमीन जायदाद के धंधों में व्यस्त थे. प्रोफेसर नामक प्राणी कक्षा के अलावा सर्वत्र पाया जाता था. पांच प्रोफेसरों को एक साथ देख कर डायरेक्टर की घिग्घी बन्ध जाती थी. वो मान लेता था की ये लोग मेरे खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं. सुदूर प्रान्त की एक छोटी जगह पर बसा यह संस्थान केंद्र सरकार के लिए आराम गाह की तरह ही था.

वैसे तो संस्था के निदेशक दिल्ली में चूहा बन कर जाते थे मगर यहाँ संस्थान में वे बब्बर शेर की तरह दहाड़ते थे, जिसे एक महिला सफाई कर्मचारी कुकर-भुसवाड कहती थी. अपने डर को मिटाने के लिए निदेशक कभी कभी किसी सियार को मार कर अपने कक्ष के बाहर टांग देते थे, ताकि जंगल के अन्य जानवर खोफ खाए. निदेशक यूनियन से डरते थे, इस लफड़े को पुचकारने के लिए उन्होंने चमचों की एक पूरी सैना पाल रखी थी जिसका काम पठन पाठन शोध का न होकर निदेशक को बचाना होता था, निदेशक ने इनको सर्वाधिकार दे रखे थे. वैसे भी क्लास लेने का काम नए रंग रूटों का था, जिन्हें प्यार से बंधुआ या नरेगा मजदूर कहा जाता था.

०००

यह खबर या अफवाह फेक –न्यूज़ बड़ी तेजी से फैली की निदेशक दिल्ली से लौट आये हैं. आग की तरह फैले इस समाचार को सुनते ही प्रशासनिक अधिकारी, लेखा अधिकारी, विभागाध्यक्ष, चमचे यूनियन बाज़ सब निदेशक कक्ष की और दौड़ पड़े. निदेशक का कक्ष किसी नव विवाहिता की छटा देने लगा, सब अपने अपने काम की ताज़ा स्थिती की जानकारी चाहते थे. निदेशक ने किसी को भी निराश नहीं किया. हर एक को बेटा देने की ही बात की. गुड़ न सही गुलगुले सी बात तो करो सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढाओ की कोई बात नहीं हुई. अध्यापकों को डी पि सी की गाजर दी, कर्म चारी नेताओं को डी ए का नजराना पेश किया. अधिकारियों को कुछ गोपनीय कागज दिए. नयी शाषी निकाय बन ने की सूचना मात्र से आधे अंगूर खट्टे हो गए.

नए शोध प्रोजेक्ट की रपट मंत्रालय द्वारा रिजेक्ट कर दिए जाने की गाज एक विभागाध्यक्ष पर पड़ी जिसने तुरंत इसको अपने मातहत की और रपटा दी. एक आसन्न वृद्ध प्रोफेसर जिसकी सेवा निवृत्ति नजदीक थी ने अपने पद्मश्री के कागज के बारे में पूछा. निदेशक का जवाब सीधा और सपाट था –पहले मुझे और सचिव को मिल जाने दीजिये फिर देखेंगे. बुढा खिसिया कर चुप बैठ गया. कार्य वाहक निदेशक ने उनकी अनुपस्थिति में लिये गए निर्णयों से अवगत करने की कोशिश की तो सख्त लहजे में निदेशक ने मना कर दिया –मुझे सब पता है, आपसे विभाग तो संभलता नहीं संस्थान क्या चलाएंगे?

एक चमचा बोल उठा –सर आपके स्थायीकरण का मसला सुलझा क्या?

उसका क्या है, चल रहा है, जन्म दिनांक के बारे में कुछ भ्रम है, जिसे सरकार देख रही है.

और सुनाओ क्या चल रहा है? निदेशक ने बात बदल दी.

अब वातावरण की गंभीरता खतम हो गयी थी. हा हा हु हु का दौर शुरू हो चुका था, कुछ लोग चले गए थे, कुछ चाय की आस में बैठे थे. जो बैठे थे वे संस्थान में केवल बैठने ही आते थे. चाय के लिए निदेशक ने प्रशासनिक अधिकारी की ओर देखा, अधिकारी ने इंटर कोम पर चाय के आदेश दिए, कोफ़ी का बिल लिया, कुल चाय बीस थी मगर बिल तीस कोफ़ी का आया जिसे बिना किसी हील हुज्जत के पास कर दिया गया ताकि आगे भी चाय मिलती रहे.

सब कुछ ठीक ठाक ही था की अनभ्र वज्र पात की तरह एक महिला कर्मचारी ने सीन में प्रवेश किया. कक्ष में बिजली सी चमकी क्योंकि इस महिला का प्रकट होना खतरे से खा ली नहीं था.

कहने को वह चतुर्थ श्रेणी अधिकारी थी बाकी सब कुछ फाइव स्टार था. वैसे भी वे रोज़ आने की तकलीफ नहीं उठाती थी लेकिन भवानी जिस दिन आती थी उस दिन किसी की न किसी की बलि अवश्य लेती थी, निदेशक ने मन में सोचा आज किसका नंबर है?

निदेशक कक्ष तुरत-फुरत खाली हो गया, किसी को जाने के लिए कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी.

रमाजी ने बिना अनुमति के आसन ग्रहण किया, चेहरे के हाव- भाव बता रहे थे की कुछ अघटित घट चु का है. रमा जी ने एक मोहक मुस्कान फेंकी और शुरू हो गई –

डायरेक्टर सर आप जब भी दिल्ली जाते हैं पीछे से सब लफड़े फ़ैल जाते हैं, सब अनुशासनहीन हो जाते है, कोई किसी की नहिं सुनता सब मन मर्जी का करने लग जाते हैं. निदेशक वर्माजी जानते थे बात कुछ और है. उन्होंने प्रेम से रमाजी की और निहारा, रमाजी के क्लेव्ज के दर्शन जरूरत से ज्यादा हो रहे थे. वे अमृत पान करते रहें.

रमाजी उवाच – सर, वो नई मास्टरनी साली अपने आप को समझती क्या है? मुझ से पूछती है –तू सर के घ र क्यों गयी? वो होती कौन है मुझसे ये सब पूछने वाली? ड्यूटी के बाद मैं कहीं भी जाऊं, उसे क्या, मगर नहीं, पूरी दुनिया में मुझे व् आपको बदनाम करती फिरेगी. निदेशक ने हकलाते हुए पूछा -

आखिर माज़रा क्या है? सरकारी काम से बंगले पर आना जाना पड़ता है.

वहीं तो.

लेकिन बस वो तो मेरे पीछे पड़ी रहती है.

मगर तभी चपरासी दौड़ता हुआ आया, बदहवासी में बोला -

सर मैंने इनको रोकने की बहुत कोशिश की मगर ये आ गई याने अब कक्ष में डायरेक्टर, रमाजी और नई मास्टरनी याने मिस शर्मा भी घुस आई थी. स्थिति अत्यंत भयंकर व् विस्फोटक थी. दोनों भद्र महिलाओं ने एक दुसरे के स्वर्णिम इतिहास व् विकृत भूगोल की विस्तृत जानकारी देना शुरू कर दिया था. निदेशक किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए. चैम्बर के बाहर भीड़ हो गई थी भीड़ मज़े ले रही थी. रमाजी ने क्रोध में कहा –

तुम रोज़ रोज़ वहां क्यों जाती हो?

मैं सर के अंडर में थीसिस लिख रही हूँ जाना पड़ता है,

मुझे सब पता है एक थीसिस तो पहले ही बाहर आ चुकी है, स्कूल भी जाने लगी है.

-तुम्हें इस से क्या मतलब है. तू बा हर तो निकल.

- तू भी बाहर मिलना मुझे, साली का झोंटा पकड़ कर बरामदे में घसीटूंगी.

निदेशक शांत भाव से खड़े थे, द्रौपदियां ही एक दूसरे के चीर हरण में व्यस्त थी, फिर अस्त-व्यस्त हुई.

प्रशासनिक अधिकारी ने आकर मामले को संभालने का असफल प्रयास किया. एक-दूसरे पर चिल्लाती रमाजी व् मिस शर्मा चली गई लेकिन जाते जाते एक समिति बनाने का पूरा मसाला दे गई, सो एक वृद्ध महिला प्रोफेसर की अध्यक्षता में एक जाँच समिति का गठन कर दिया गया. समिति को तीन माह में रपट देनी थी, लेकिन मामला निदेशक कक्ष का होने के कारण यह रपट कभी नहीं आई. महिला प्रोफेसर यथा समय रिटायर हो गई, रपट भी अपने साथ ही ले गई. यूनियन ने कुछ दिन हल्ला मचाया लेकिन यूनियन अध्यक्ष के एक मित्र की मृत्यु के कारण वे अनुकम्पा नियुक्ति में व्यस्त हो गये. निदेशक के चरित्र और आचरण की चर्चा गौण हो गई.

इन झंझटों के चलते निदेशक कई दिनों से अस्पताल का राउंड नहीं ले सके थे, क्लास भी नहीं ली थी. वे चाहते तो किसी को भी भेज देते मगर महीने में एक क्लास तो बनती है ताकि शिक्षाशात्री का तमगा लगा रहे पी जी के स्कोलर्स से सम्पर्क बना रहे, जासूस लोग आकर मिलते रहे. वे कक्षा में व्याख्यान देने चले गए.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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रचनाकार: संस्थानोपनिषद (व्यंग्य –उपन्यास ) - 2 : यशवंत कोठारी
संस्थानोपनिषद (व्यंग्य –उपन्यास ) - 2 : यशवंत कोठारी
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