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नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 - प्रविष्टि क्र. 11 - प्रीति - सीताराम पटेल 'सीतेश'

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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020


प्रविष्टि क्र. 11 - प्रीति


सीताराम पटेल 'सीतेश'


पात्र परिचय

प्रीति : अठारह साल की लड़की

प्रमोद : इक्कीस साल का लड़का

आनंद : प्रमोद का भाई, उम्र पच्चीस साल

कामना : आनंद की पत्नी, उम्र बाईस साल

अनुमप : प्रमोद का रूम पार्टनर

अमृत : प्रमोद का रूम पार्टनर

आकाश : प्रमोद का रूम पार्टनर

सारंग : पानवाला

पुलिस : चौकी का पुलिस


दृश्य : 01


स्थान : जंगल का रास्ता,  समय : गोधूलि बेला

( आनंद, कामना, प्रीति और प्रमोद बैलगाड़ी से मेला देखने जा रहे हैं। आनंद गाड़ी हाँक रहा है।)

आनंद : (आनंद अपने धुन में गा रहा है।) कौन दिशा में लेके चला रे बटोहिया।

प्रीति : जीजी, जीजाजी इतनी अच्छी गा रहे हैं, पूरी तरह से गीत में मगन हैं।

कामना : गाड़ी भी इतनी ही अच्छे हाँकते हैं, मत पूछो, इनके बैठने से ही बैलगाड़ी हवा से बातें करने लगते हैं।

प्रीति : गीत के बोल भी बहुत ही प्यारा है।

कामना : ये नदिया के पार का है, अभी मेला में चल रही है। इसे ही दिखाने के लिए तुम्हारे जीजाजी जिद करने लगे। बहुत ही सुन्दर सिनेमा है।

प्रीति : तुम्हें कैसे मालूम जीजी?

कामना : तुम्हारे जीजाजी कह रहे थे, इतनी सुंदर और साफ सिनेमा आज तक नहीं बनी है।

प्रीति : इतनी क्या खास है इसमें?

कामना : देखोगी तो जान जाओगी।

(गाड़ी हिचकोले खाता है, कामना के दाहिने पैर के पायल गिर जाती है।)

कामना : गाड़ी रोकिए।

आनंद : भाग्यवान! गाड़ी को क्यों रोकूँ?

कामना : मेरे पायल गिर गए।

आनंद : अपनी बहन से बात करने में इतनी मगन हो, पायल गिर गया, फिर भी पता नहीं चला।

कामना : आप गाड़ी ठीक से नहीं चला रहे हैं। हिचकोले खाने से पायल गिरा है।

आनंद : छोटू, अपनी भाभी का पायल ढूंढ़कर लाओ।

प्रमोद : ( नहीं सुनता है।)

आनंद : क्या कह रहा हूँ?  तुम्हें सुनाई नहीं दे रहा है।

प्रमोद : क्या है भैया?

आनंद : देखो तो, तुम्हारी भाभी का पायल कहीं पर गिर गया है।

प्रमोद : देखता हूँ भैया।

आनंद : जाओ, अच्छे से देखना।

प्रीति : चलो, जीजी हम लोग भी ढूंढ़ते हैं।

कामना : हाँ, ठीक कह रही हो।

( गाड़ी से तीनों उतरकर पायल ढूढ़ने जाते हैं।)

प्रमोद : भाभी, कहाँ पर गिरा होगा?  कुछ पता है।

कामना : पता तो नहीं है, पर कुछ  दूरी पर गाड़ी हिचकोले खाया था। शायद वही पर गिरा हो?

प्रीति : जीजी, वो रहा पायल।

प्रमोद : भाभी, वो रहा पायल।

( प्रीति और प्रमोद एक साथ देखते हैं, खुशी से दोनों रखने को दौड़ते हैं। वहाँ एक साथ पहुंचते हैं। प्रीति पहले पकड़ती है, प्रमोद उसके हाथ को पकड़ता है। दोनों के आँखें चार होता है। प्रमोद झेंपकर हाथ छोड़ना चाहता है। )

प्रीति : हाथ पकड़कर छोड़ दोगे?

प्रमोद : हम चन्द्रवंशी है, जिसकी हाथ एक बार पकड़ लिए, उसे कभी नहीं छोड़ते हैं।

कामना : छोटी, पायल अब लाओ।

(प्रीति लाकर देती है।)

प्रीति : ये लो जीजी।

( तीनों गाड़ी में आकर बैठते हैं।)

प्रीति : ( प्रमोद से) इतनी दूरी पर क्यों बैठे हो, पास आओ न?

प्रमोद : पास ही तो बैठा हूँ और कितनी पास बैठूँगा?

प्रीति : ( प्रमोद के हाथ को खींचकर)  इतनी  पास बैठो, मेरे पीठ के ऊपर सो जाओ।

( प्रमोद प्रीति के पीठ के ऊपर सो जाता है।)

( परदा गिरता है।)


दृश्य : 02


स्थान : आनंद का घर, समय : दोपहर

कामना  : कल मेला में रात भर जगी हो, कुछ देर के लिए सो जाओ।

प्रीति : हाँ, जीजी।

( प्रीति बाहर जाना चाहती है।)

कामना : उधर कहाँ जा रही  हो?

प्रीति : प्रमोद के पास सोने जा रही हूँ।

कामना : जब तक पूरे न हो फेरे सात।

( प्रीति शरमा जाती है।)

प्रीति : हट जीजी।

कामना : कैसे शरमा रही है। जा सो जा, अपने साजन के साथ।

(प्रमोद खाट में सो रहा है। प्रीति प्रमोद के पास आती है और सो जाती है। )

प्रीति : प्रमोद !

प्रमोद : आं!

प्रीति : तुम सो रहे हो?

प्रमोद : सो कहाँ रहा हूँ।

प्रीति : तो मुझसे बात करो न।

प्रमोद : कर तो रहा हूँ।

प्रीति : हमारे घरवाले कह रहे थे।

प्रमोद : क्या कह रहे थे?

प्रीति : कहने में शरम आ रही है।

प्रमोद : तो फिर क्यों कह रही हो?

प्रीति : कह रहे थे?

प्रमोद : कहो ना बाबा, क्या कह रहे थे, पहेली न बुझाओ?

प्रीति : मेरी हाथ तुम्हारी हाथ में देने को कह रहे थे।

प्रमोद : तो तुम क्या सोच रही हो?

प्रीति : क्या सोच रही हूँ, ये भी बताना पड़ेगा।

प्रमोद : नहीं बताओगी, तो कैसे समझ पाऊँगा?

प्रीति : बुद्धू कहीं के, इतना भी तुम्हें पता नहीं?

प्रमोद : क्या?

प्रीति : कोई हसीना पहले कदम बढ़ाती नहीं।

प्रमोद : तो तुम दिल से मजबूर हो,  मैं समझता था, तुम समय गुजार रही हो।

प्रीति : तुम मुझसे कभी अलग नहीं होना, मेरे साजन।

( प्रीति प्रमोद को बाँहों में भर लेती है।)

प्रमोद : प्रीति, परमेश्वर ने हम दोनों को एक दूसरे के लिए ही बनाया है। हम दोनों अलग-अलग होने के लिए नहीं बने हैं।

( दोनों परस्पर बाँहों में समा जाते हैं।)

(परदा गिरता है।)


दृश्य : 03


स्थान : आनंद का घर  समय : दोपहर

आनंद : प्रमोद इस समय उदास कैसे हो?

प्रमोद : उदास कहाँ हूँ, भैया!

आनंद : मुझे लगता है, तुम हमेशा गुमसुम रहते हो, पढ़ाई लिखाई में ध्यान नहीं दे रहे हो।

प्रमोद : दे तो रहा हूँ, भैया!  पढ़ाई  नहीं करूँगा, तो नौकरी कहाँ पाऊँगा?

आनंद : नौकरी नहीं मिलेगी, तो छोकरी नहीं मिलेगी।

(कामना आती है।)

कामना : छोकरी के लिए तुम्हें तुम्हारे भैया जैसे नौकरी की जरूरत है।

( परदा गिरता है।)

दृश्य : 04

स्थान : पान मंदिर  समय : दोपहर

( आज प्रमोद का रिजल्ट आनेवाले हैं।)

आनंद : सारंग भैया, रिजल्ट देखना तो?

सारंग : हां, भैया आनंद देख रहा हूँ।

( सारंग तृतीय श्रेणी की ओर देख रहा है।)

आनंद : भैया, प्रथम श्रेणी देखना। हमारा छोटू प्रथम श्रेणी आयेगा।

सारंग : इसमें ये रोल नंबर नहीं है।

आनंद : भैया द्वितीय श्रेणी देखना।

सारंग : इसमें भी नहीं है।

आनंद : तृतीय श्रेणी देखना।

सारंग : इसमें भी नहीं है।

आनंद : पूरक को देखना।

सारंग : इसमें भी नहीं है।

आनंद : इसका मतलब है मेरा छोटू फेल हो गया।

सारंग : हाँ, भैया! छोटू फेल हो गया।

(आनंद रोता है।)

सारंग : चुप रहो, भैया।

आनंद : मैं कैसे चुप रह सकता हूँ,  वह हमारे घर का उद्धारक था। तो क्या शहर ने एक ग्रामीण प्रतिभा को निगल लिया।

सारंग : तुम क्या कह रहे हो, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।

आनंद : हमारा छोटू प्रतिभावान छात्र था।


अंक : 02

दृश्य : 01


स्थान : शहर का मकान  समय : गोधूलि बेला

( आकाश, अनुपम, अमृत और प्रमोद आपस में बात कर रहे हैं।)

आकाश : अनुपम ! प्रमोद के घरवाले ठीक नहीं है।

अनुपम : कैसे ठीक नहीं है? आकाश!  वे लोग बहुत ही अच्छे हैं।

आकाश : क्या खाक अच्छे हैं, चावल भी सही ढंग से नहीं देते।

अनुपम : सही कैसे नहीं देते हैं। बीस किलो चावल हर माह तो दे रहे हैं।

आकाश : मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ।

अनुपम : तो फिर किसकी बात कर रहे हो?

आकाश : मैं उसना चावल की बात कर रहा हूँ।

अनुपम : अरवा और उसना में क्या अंतर है।

आकाश : वड़ी भारी अंतर है।

अनुपम : मैं ही उन लोगों से कहा था।

आकाश : मैं भी उसना चावल लाऊँगा।

अनुपम : तुम्हें कौन मना कर रहा दोस्त।

प्रमोद : (मन ही मन सोच रहा है।)

लोग मेरे सामने मेरे घर की बुराई करते हैं और मैं कुछ कह नहीं पाता हूँ। आखिर कैसे होता है, मेरे पास!  ये सभी बातों को सुनकर दूसरे कान से निकाल देनी चाहिए । मेरी गरबीली गरीबी का सभी मजाक उड़ाते हैं। मैं क्या करूँ, समझ नहीं पा रहा हूँ। मुझे पढ़ाई में ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। मैं सिनेमा कभी नहीं देखूंगा।

(परदा गिरता है।)


दृश्य : 02


स्थान : किराए का मकान    समय : दोपहर

अनुपम :  मुकद्दर का सिकन्दर कौन कौन देखने चलोगे?

अमृत : मैं चलूँगा।

आकाश : मैं भी चलूँगा।

अनुपम : तुम नहीं चलोगे?  प्रमोद!

प्रमोद : नहीं चलूँगा। अनुपम!

(तीनों चले जाते हैं। प्रमोद अकेला रहकर पढ़ाई करता है। कुछ देर बाद तीनों आते हैं।)

प्रमोद : वापस कैसे आ गए?  अनुपम!

अनुपम : सिनेमा देखने के लिए हम दूसरे शहर जायेंगे।

प्रमोद : मैं समझा नहीं।

अाकाश : मैं समझाता हूँ, चौक के पास पुलिस वाले के मोजा पर हमारा साईकिल का पैडल लग गया।

अमृत : फिर हममें दो दो बात हो गई ।

अनुपम : हमारा मूड ऑफ हो गया, इसीलिए हम दूसरे शहर सिनेमा देखने जाना चाहते हैं।

आकाश : हमारा साईकिल थाना में है और तुम्हें वो साईकिल लाना है।

प्रमोद : मुझे कैसे साईकिल देगा?

अनुपम : हम लोग दोस्त का साईकिल है कहकर बोले। तो वो बोला, तुम्हारे दोस्त को कहना आकर ले जायेगा। तुम कुछ देर में जाना और ले आना।

प्रमोद : ठीक है, ले आऊँगा।

( परदा गिरता है।)


दृश्य : 03


स्थान : पुलिस चौकी   समय: गोधूलि बेला

प्रमोद : क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?

पुलिस : हाँ!  आ जाओ, क्यों आए हो?

प्रमोद : जी, मेरा साईकिल।

पुलिस : तुम्हारा यहाँ कोई जान पहचान है?

प्रमोद : हाँ है, मोहनदास वकील।

पुलिस  : वकील की बात करता है। कौन सा साईकिल है? जाओ चेचिस नंबर  देखकर बताओ?

(प्रमोद साईकिल के घंटी पर लिखा है, उसे बताता है।)

प्रमोद : 71

पुलिस : ( डाँटता है) बुरबक!  चेचिस नंबर सीट के नीचे डंडी में लिखा है।

(प्रमोद आकर चेचिस नंबर बताता है।)

पुलिस : यहाँ पर हस्ताक्षर करो और ले जाओ।

प्रमोद : जी सर!

(प्रमोद हस्ताक्षर कर ले जाता है।)

(परदा गिरता है।)


दृश्य : 04


स्थान : किराए का मकान.  समय : दोपहर


प्रमोद : ( अपने आप)  ये अल्फा, बीटा, गामा मेरे जीवन में क्या काम आयेंगे, मैं वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ, पर घरवाले मेरे लिए प्रयोगशाला बना पायेंगे। मैं साहित्यकार बनूँगा, यही मेरे लिए ठीक होगा। मेरे आदर्श प्रेमचन्द हैं। मैं इंसान बनूँगा, इसके लिए चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े। दर्द से ही कविता का जन्म होता है।

(अनुपम आता है।)

अनुपम : प्रमोद, अपने आप को गणितज्ञ कहते हो, तेरा गणित का क्या हाल है।

प्रमोद : मैं समझ नहीं पाया।

अनुपम : तू गणित, भौतिक और रसायन में फेल है, अंग्रेजी में पास भर है और हिन्दी में कक्षा में सबसे ज्यादा है।

प्रमोद : मैंने अपना लक्ष्य ही बदल दिया है, दोस्त। मैं अब साहित्यकार बनना चाहता हूँ। साहित्यकार बनने के लिए एक अच्छा इंसान बनना जरूरी है।

(परदा गिरता है।)


दृश्य : 05


स्थान : आनंद का घर.  समय :  गोधूलि बेला

आनंद : प्रीति, तेरे हाथ से फिसल गया, मेरे भाई!  मैं अपने श्वसुर से कुछ नहीं कह सकता हूँ।

प्रमोद : जानता हूँ भैया।

कामना : मैं भी अपने पिताजी से कुछ नहीं कह सकती हूँ।

प्रमोद : जानता हूँ भाभीजी। मैं परीक्षा में फेल हो गया हूँ, इसलिए आप लोग ऐसे बोल रहे हैं। क्या करूँ, मुझे हिन्दी के सिवा कुछ नहीं आता है। मैं हिन्दी जानता हूँ, हिन्दी पढ़ता हूँ, हिन्दी खाता हूँ, हिन्दी सोता हूँ, हिन्दी के सिवा कुछ नहीं जानता हूँ। मैं अंग्रेजी से नफरत करता हूँ, जिसने अभी तक हमारे देश को गुलाम बना कर रखा है। मैं देश के अस्सी प्रतिशत जनता के साथ हूँ, अस्सी प्रतिशत जनता के साथ मिलकर काम करना चाहता हूँ। मैं देश के आत्मा गाँव में रहना चाहता हूँ, किसान मजदूर के दर्द को आत्मसात कर जीना चाहता हूँ।

आनंद : मैं कुछ नहीं समझ पाया, छोटू!

प्रमोद : आप समझेंगे भी नहीं, आप नौकरी पाकर बड़े आदमी हो गये हैं। बड़े आदमी छोटे आदमी की जुबान नहीं समझता है। मैं छोटा था, छोटा हूँ और छोटा रहूँगा। एक चीज है भैया, गाँव हो या आदमी, जब छोटे होते हैं, तो परमेश्वर के पास होते हैं। जब जब ये बड़े होते जाते हैं, तो इनमें स्वार्थ समाता जाता है। मैं अपने गाँव से प्रेम करता हूँ, अपनी मातृभूमि से प्रेम करता हूँ, अपनी मातृभाषा से प्रेम करता हूँ, अपनी माता-पिता से प्रेम करता हूँ।

आनंद : तो क्या मैं प्रेम नहीं करता?

प्रमोद : आप भी करते हैं, भैया, इस गाँव ने मुझे पाला है। उसका कर्ज चुकाना चाहता हूँ।

आनंद : तो क्या नौकरी पाकर नहीं छूट सकते?

प्रमोद : नौकरी नौकर करते हैं, भैया, और नौकर गुलाम होते हैं। गुलाम कभी स्वतंत्र नहीं हो सकते हैं।

आनंद : तुम क्या कहते हो?  मेरे समझ के परे है।

प्रमोद : मैं इतना स्वार्थी नहीं हूँ, भैया!  कि अपने माँ बाप को भूल जाऊँ, मैं उन्हें जिन्दा भगवान मानता हूँ, उन्होंने मुझे इस संसार में लाने का नेक काम किया है।

आनंद : तुम, छोटे हो इसलिए चाहते हो।

प्रमोद : नहीं भैया!  ताली दोनों हाथों से बजता है। प्रेम दो, प्रेम लो, प्रेम देने का नाम है, मेरी प्रीति कहीं रहे, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।

आनंद : मान गए छोटू।

कामना : मान गए देवर जी।

प्रमोद :  क्या मान गए?

आनंद : यही की प्रीति तुम्हारी थी, तुम्हारी है, तुम्हारी रहेगी।

कामना : छोटी आना।

(प्रीति आती है, प्रमोद खुश हो जाता है। प्रीति प्रमोद के गले में वरमाला डालती है।)

(परदा गिरता है।)

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सीताराम पटेल 'सीतेश'

sitarampatel.reda@gmail. com

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