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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 6 - तुम भी ऊँचा उठ सकते हो - दिवाकर राय

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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020


प्रविष्टि क्र. 6 -

तुम भी ऊँचा उठ सकते हो

दिवाकर राय

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दृश्य-एक

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(रामकिशन जमीन पर पालथी मारकर भोजन करने के लिए बैठा है। उसकी पत्नी रधिया भोजन की थाली लाकर उसके सामने रखती है और वहीं बैठ जाती है। )

रामकिशन-(भोजन करते हुए)का बात है रधिया, आजकल तुम चिन्ता में बहुते डूबी रहती है। जब देखो तब कुछ सोचती रहती है। कुछो हो गया है का?

रधिया-का कहें बिरजू के बाबू, जब से बिरजुआ पढ़-लिखकर बेकार घूमने लगा है,मेरी आँखों की नींद और दिल का चैन चला गया है। कितनी तमन्ना से उसे पढ़ाया हमलोगों ने। खुद नून-रोटी खा के रात काट लिए,किन्तु बेटे को कभी कमी नहीं होने दी। पर आज जब उसे बेरोजगार देखती हूँ न,तो आपसे का कहें;कलेजा फट जाता है। (रधिया सुबकने लगती है। )

रामकिशन-(सान्त्वना देते हैं)अरे,दुख में पगला जाने से सुख दौड़े थोड़े ही चला आएगा? सबकी अपनी गति होती है रधिया। न उससे कम मिलता है, न अधिक। न उससे पहले मिलता है, न बाद में। वह जब भी मिलेगा,समय पर ही मिलेगा। वो भगवान श्रीकृष्ण कहे हैं न,गीता में- कर्म करो,फल की चिन्ता काहे करते हो? उसे समझो रधिया,समझो। फल हमारे वश में नहीं है। पेड़ रोपना अपने वश में है। वो हमने कर दिया। अब पेड़ पर फल कब लगेगा, वह तो ऊपरवाला ही जानता है। हमारे हड़बड़ाने से जल्दी फल नहीं आएगा वृक्ष पर। वह तो अपने समय पर ही आएगा।

रधिया-पर अब इस कलियुग में तो लगता है कि फल कभी आएगा ही नहीं पेड़ पर। केवल अपना बच्चा बेरोजगार हो तो कहा जाय,यहाँ तो पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज ही निकल रही है। अब ये करेंगे क्या?इनका रोज का कुछ अपना खर्चा भी तो है। ये कहीं कोई गलत धन्धा न पकड़ लें,इसी से मन सशंकित रहता है। चार-पाँच हजार की भी कोई नौकरी लग जाती,तो शादी-विवाह करके निश्चिंत हो जाते। बस!

रामकिशन-(मजाकिया अंदाज में)अच्छा, तो ई बात है। हमरी जोरू को पतोहू चाहिए। अब समझा माजरा क्या है? बहू के हाथ का स्वादिष्ट भोजन करना चाहती हो? आराम चाहिए? है न? सब समझ गया।

रधिया-(लजाती है)धत् तेरी की। आप तो पीछे ही पड़ गये। मैं तो ऐसे ही बात चलायी। आखिर जब बेटा जवान हो जाए,तो माँ-बाप का फर्ज बनता है कि नहीं कि योग्य लड़की देखकर उसकी शादी कर दी जाय। आपके माँ-बाप आपकी शादी नहीं किये थे क्या?

रामकिशन-उस समय की बात और थी भाग्यवान! आज की बात कुछ और है। महँगाई बढ़ गयी है, फैशन बढ़ गया है,व्यवहार बदल गया है,रहने का तौर-तरीका बदल गया है। तुम जिस परिस्थिति में इस घर में आयी, क्या तुम्हारी बहू उसमें रह सकती है। नहीं न? तो सबकी बात समझो,सबकी भावना समझो और अपनी हैसियत से तालमेल बैठाओ। तब पता चलेगा कि सपने सोते समय ही अच्छे लगते हैं। धरातल पर आते ही टूट-टूट कर बिखर जाते हैं वे। इसलिए मेरा मानो शादी की बात तो अभी छोड़ ही दो। अरे, कहीं देवी-देवता के पास जाकर मन्नत माँगो कि बेटे की चार पैसा कमाने लग जाय। फिर वो जैसा चाहेगा, हो जाएगा। उस पर कुछ भी थोपना ठीक नहीं है। डिप्रेशन में चला जाएगा, पहले से ही नौकरी न लगने का तनाव है।

रधिया-इहे त चिन्ता है कि बेरोजगारी में कहीं कुछ गड़बड़ कदम उठा लिया, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। अभी महीना दिन भी नहीं हुआ, उसी का दोस्त बब्लुआ एटीएम काटते में पकड़ाया था। जेल की हवा खा रहा है। बिरछा काका का बेटा तो जाके ट्रेने के आगे कूद गया। अब ई सब देख-सोच के दिमाग में हमेशा टेंशन बनेगा कि नहीं?आखिर माँ का कलेजा बेटा के लिए ही तो धड़कता है!

रामकिशन-टेंशन की कोई बात नहीं है, रधिया। हमारा बिरजुआ होशियार है। और लड़कों की तरह मुर्ख नहीं है वह। आगे-पीछे सब समझता है। मैं उससे बातचीत करूँगा। उसे सान्त्वना दूँगा। उसको समझाऊँगा भी। जरूर बात मानेगा। इसलिए चिन्ता-फिकिर को मारो गोली। और आनंद से ऐश करो। नहीं तो तुम्हारी भी तबियत बिगड़ जाएगी।

रधिया-(अचानक थाली की ओर देखती है)अरे,आपकी थाली में तो रोटी है ही नहीं। मैं भी न ,बात करने में बहक गयी। रुकिए मैं अभी लाती हूँ। (रधिया रोटी लाने तेजी से अंदर जाती है। )

रामकिशन-(मुस्कराते हुए खुद से) पगली कहीं की! हमेशा अपने में ही खो जाती है। भगवान भला करें इसका।

दृश्य- दो

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(बिरजू कुर्सी-मेज पर बैठकर पढ़ रहा है। रधिया उसके पास नाश्ता लेकर जाती है। )

रधिया-(नाश्ता बढ़ाती हुई) ले बिरजू नाश्ता कर ले। बहुत देर से पढ़ रहा है।

बिरजू-नहीं माँ,अभी नाश्ता नहीं करूँगा। अभी कुछ एक्सरसाइज बाकी है। पूरा कर लूँगा, तो खाऊँगा।

रधिया-(नाराजगी दिखाती है) तेरी न, यही सबसे बड़ी कमी है। न समय पर खाना खाता है,न नहाता है,न कोई काम करता है। दिनभर किताब में आँखें गडाये रहता है। अच्छी स्मरणशक्ति के लिए समय पर भोजन-पानी भी जरूरी है।

बिरजू-अच्छा अब तुम जाओ। नाश्ता रख दो। मैं खा लूँगा।

रधिया-(जिद करती है) नहीं, तू अभी मेरे सामने खा। ठंडा हो जाएगा,तो इसकी ताकत कम हो जाएगी।

बिरजू-मैं खा लूँगा न। तुम जाओ यहाँ से।

रधिया-जबतक तू नहीं खाता,मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी।

(रामधनी का प्रवेश होता है। )

रामधनी-अरे,क्या तू-तू मैं-मैं चल रहा है माँ-बेटे में?

रधिया-(शिकायत के लहजे में)देखिए न,इसकी आदत बिगड़ती जा रही है। जब भी मैं नाश्ता या भोजन लाती हूँ,यह समय पर करता ही नहीं है। हमेशा बहाना बनाता रहता है। पहले ऐसा नहीं था यह।

रामधनी-कोई काम समय पर ही अच्छा लगता है,बिरजू। और वैसे भी शरीर को निश्चित समय पर आहार की आवश्यकता होती है अन्यथा कई प्रकार की परेशानियाँ आ सकती हैं शरीर में।

(बिरजू चुपचाप थाली हाथ में लेकर नाश्ता करने लगता है। )

रामकिशन- देखो तो,कितना अच्छा है हमारा बेटा!अरे,प्यार से समझाया करो इसे। अभी बच्चा ही है न!

रधिया-(कुछ नाराज होकर) हाँ-हाँ,आपने ही इसे बहका दिया है दुलारकर। अब यह कोई बबुआ नहीं है गोदी का कि हर समय अस्सो-अस्सो करते रहें। इसकी उमर तक आपकी शादी हो गयी थी और दू गो बच्चा भी।

रामकिशन- तब की बात और थी रधिया। और अब की बात और है। तब केवल खाना-पीना,भैंस चराना और मस्ती करना ही काम था। अब पाँच वर्ष के हुए नहीं कि देह से भारी बस्ता पीठ पर। बेचारे लड़के तो बचपन में ही गदहा बन जा रहे हैं। जवानी चढ़ी तो नौकरी की चिन्ता अलग से। सच कहें तो अब तो बचपन में बच्चे वयस्क हो जा रहे हैं। उनकी सोच,उनका दृष्टिकोण सबपर कैरियर हावी हो गया है। अब बिरजू को ही देख लो। दिन-रात एक किये है। किताबी कीड़ा इसी को कहते हैं।

बिरजू-(नाश्ता करते हुए) फिर भी तो रिजल्ट नहीं आ रहा। तीन साल से लगे हैं कम्पीटीशन में। एक भी रिजल्ट पास नहीं किया। (मायूस होता है। )

रामकिशन-इसमें मायूस होने की कोई बात नहीं है बेटा! कम्पीटीशन पास करना तो जस्ट लाईक अ गेम है। जैसे क्रिकेट में बल्लेबाज गेंद पर जोर से प्रहार करता है। वह गेंद छक्का भी जा सकता है और खिलाड़ी आउट भी हो सकता है। सब संयोग पर निर्भर है। यदि गेंद बाउण्ड्री के बाहर चला गया, तो छक्के का जश्न और यदि किसी कारण गेंद फिल्डर के हाथ में चला गया,तो आउट होने का गम। कम्पीटीशन को भी इसी खेल भावना से लेना चाहिए। इसमें पास होना केवल आपकी काबिलियत पर निर्भर नहीं करता। बहुत कुछ परीक्षा देने की परिस्थिति पर भी निर्भर करता है। इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है। और भी आत्मविश्वास के साथ गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजने की जरूरत है।

बिरजू- लेकिन पापा,बेरोजगारों की फौज के आगे सारा स्ट्रैटेजी धरी की धरी रह जा रही है। बेरोजगारी का आलम यह है कि एक चपरासी के पद के लिए एमएससी- बीटेक किए लड़के तक कतार में लगे हैं। अब अनुमान लगा सकते हैं कि कम्पीटीशन कितना टफ हो गया है!

रामकिशन- मैं तुम्हारी बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ बेटा,परन्तु जीवन- बसर के लिए क्या एक मात्र सरकारी नौकरी ही सहारा है?आज की नयी पीढ़ी में नौकरी का इतना क्रेज क्यों है?क्यों नहीं युवा स्वरोजगार, स्टार्ट्स-अप, कृषि,पशुपालन आदि क्षेत्रों की ओर रुझान कर रहे हैं? क्योंकि इनमें चुनौतियाँ अधिक हैं। आज के युवा सरकारी नौकरी पाकर पैर पर पैर चढ़ाकर पगार ऐंठते हैं। उन्हें न काम से मतलब है, न ही चुनौतियों और संघर्ष से। पैंतालीस वर्ष की उम्र तक नौकरी के पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं। और उसके बाद डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं, आत्महत्या भी कर लेते हैं। इसलिए समय रहते इसका निदान क्यों न ढूँढ़ा जाय। क्यों बिरजू?

(बिरजू कुछ झेंप सा जाता है। )

रामकिशन-आखिर सबकी सरकारी नौकरी तो लगेगी नहीं, यह पक्का है। क्यों बेटा?

बिरजू-(बेमन से)जी पापा!

रामकिशन-तो फिर एक निश्चित समय तक ही नौकरी की प्रतीक्षा क्यों न की जाय?फिर इसके बाद स्वरोजगार की रणनीति ज्यादा कारगर हो सकती है। पैंतालीस की उम्र के बाद तो अवसाद और निराशा के सिवा कुछ हाथ नहीं आने वाला। और वैसे भी एक छोटी नौकरी से जीवन की उमंगों को पंख नहीं दिया जा सकता।

बिरजू-तो आप क्या चाहते हैं पापा?

रामकिशन-बस इतना कि तुम अपना आकलन करके समय पर निर्णय ले लो। मैं पैंतालीस वर्ष तक प्रतीक्षा के पक्ष में नहीं हूँ। उसके बाद हाथ में कुछ बचता नहीं है।

बिरजू-पर कुछ काम करने के लिए पूँजी तो चाहिए न?

रामकिशन-पहले मन तो बनाओ। काम का चयन तो करो। फिर तो पूँजी की व्यवस्था भी हो जाएगी। सरकार भी स्वरोजगार के लिए ऋण की सुविधा उपलब्ध करा रही है। अरे आज जो टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अडानी जैसे लोग दिख रहे हैं न,वे भी पहले अपना धंधा छोटे स्तर पर ही शुरू किए थे। तुम भी उनकी तरह ऊँची उड़ान भर सकते हो। पर नौकरी में तो सपने भी नहीं देख सकते। और मेरा मानना है कि पैतृक धंधे में सफलता की संभावना अधिक रहती है।

बिरजू-जी पापा, मैं विचार करता हूँ।

रामकिशन-मुझे तुमसे ऐसी ही उम्मीद थी। हम दोनों मिलकर अपनी पैतृक विरासत को आगे बढायें। इससे भारत माता की सेवा तो करेंगे ही,कृषि को भी लाभकारी व्यवसाय में बदलकर न केवल अपना बल्कि देश के सपने को पूरा करेंगे।

बिरजू-ठीक है। कल से मैं आपके साथ लग जाऊँगा।

रामकिशन-कल से क्यों?अभी से क्यों नहीं?शुभस्य शीघ्रम्।

बिरजू-बिल्कुल मैं अभी से तैयार हूँ। नाश्ता करके मैं आपके साथ खेत में चलूँगा। और वहीं पर परिस्थितियों के अनुकूल प्लानिंग की जाएगी।

रामकिशन- बेस्ट ऑफ लक बेटा! यह काम तुम्हारे लिए यशस्वी हो। मैं चलता हूँ,तुम आओ।

(रामकिशन प्रस्थान करते हैं। )

दृश्य-तीन

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(रात का समय। रधिया भोजन बना रही है। बिरजू उसके पास आता है। )

बिरजू-(आनंद में सराबोर हो कर माँ को दोनों बाँहों में पकड़ते हुए) माँ-माँ, खाना दो,बहुत भूख लगी है।

रधिया-( अति प्रसन्न होकर)अरे वाह,तू मेरा बिरजू ही है न?

बिरजू-क्यों? तुम मुझे नहीं पहचानती?

रधिया-(गहरी साँस लेकर)अरे पहचानूँगी भी कैसे?आज पहली बार मेरा लाल मुझसे खाना माँग रहा है। रोज तो मैं उसे खिलाने के लिए ही परेशान रहती थी।

बिरजू-अच्छा-अच्छा, अब बात मत बनाओ। मुझे सचमुच जोर की भूख लगी है। जल्दी कुछ खिलाओ। क्या बना रही हो? बहुत मीठी-मीठी सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही है।

रधिया-जब परोसूँगी तब पता चल जाएगा। जा पहले हाथ-पैर धो ले,फिर आ। और हाँ,आज अपने पापा को भी साथ बैठाना। अच्छा लगेगा उन्हें। रोज तो अकेले ही खाते हैं।

(बिरजू जाता है। रधिया थाली लगाती है। बैठने की व्यवस्था करती है। बिरजू अपने पापा के साथ आकर बैठ जाता है। रधिया थाली परोस देती है। )

बिरजू-(खुशबू से आनंदित होकर) अरे वाह,बासमती की खीर? दाल-पराठा भी? क्या बात? आज तो जितनी जोर की भूख,उतना ही स्वादिष्ट भोजन!लगता है,माँ आज बहुत खुश है।

रधिया-मैं खुश क्यों न रहूँ?आखिर आज मेरी इच्छा पूरी हुई है। तुझे अपने पापा के साथ देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। पता है,मैं तुम्हारा रंग-ढंग देखकर डर ही गयी थी मुझे यह भय अंदर ही अंदर खाये जा रहा था कि मेरा बिरजुआ भी कहीं गलत लड़कों के सम्पर्क में आकर बिगड़ न जाय। आजकल के लड़कों को देखकर मुझे बहुत डर लगता है।

रामकिशन-अरे भाग्यवान,आखिर बिरजू बेटा किसका है?वो कहावत सुनी हो न- माँ गुने बाछी,पिता गुने घोड़। ना बेसी त थोड़ो थोड़।

(सभी ठठ्ठा मारकर हँसते हैं। )

रधिया-अच्छा तो बिरजू,आज काम का पहला दिन कैसा रहा?

बिरजू-(प्रसन्नचित्त होकर)बहुत शानदार।

सच कहूँ,तो आज पहली बार मैं खेत में गया। वहाँ मैंने पापा के साथ काम भी किया। और बीच के समय में पापा के साथ मिलकर भविष्य का रोडमैप भी बनाया। जानती हो माँ,मैं जल्दी ही लोन लेकर गुड़ बनाने वाला एक क्रसर लेना चाहता हूँ। मैं शुद्ध व स्वादिष्ट गुड़ बनाऊँगा तथा शहर में बेचूँगा। ईश्वर की कृपा रही तो मेरा व्यवसाय जल्दी ही चल निकलेगा। आजकल शुद्ध हर्बल उत्पाद की बहुत माँग है।

रधिया- वाह मेरे लाल,मुझे तो अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा है कि तू वही बिरजुआ है जो किताब के सिवा न कुछ देखता था,न ही कुछ करता था। खाना खिलाने में भी नानी याद आ जाती थी।

रामकिशन-अरे भाई,इसी को न टर्निंग प्वाइंट कहते हैं। कब कौन सी बात जीवन की दिशा बदल दे,कौन जानता है? भगवान बुद्ध तो राजकुमार थे न,पर एक वृद्ध व्यक्ति को देखकर वे महात्मा बन गये। गांधी जी तो राजकोट के दीवान के बेटे थे,पर एक अधनंगी महिला को देखकर सूट-बूट त्याग दिये। कब किसका टर्निंग प्वाइंट आएगा, कौन जानता है!पर एक बात पक्का है कि एक बार जिसने भी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया, वह आसमान को छू सकता है,जमीन पर तारे ला सकता है। आज मुझे लग रहा है कि मेरा बेटा भी अपना लक्ष्य तय कर लिया है। अब वह दिन दूर नहीं, जब बिरजू भी सब कुछ पा सकता है।

रधिया-(आँख से आँसू निकलते हैं। )आपके मुँह में घी-शक्कर। मेरा बेटा एक अच्छा इंसान बन जाय बस। बाकी तो वह खुद अपने पुरुषार्थ से प्राप्त कर लेगा।

बिरजू-बस आपलोगों का आशीर्वाद चाहिए माँ। अब मैं पीछे लौटकर नहीं देखूँगा। अपने सामर्थ्य के अनुसार शक्ति सृजनकर लक्ष्य को प्राप्त करूँगा।

रधिया-मुझे तुम्हारी क्षमता-योग्यता पर विश्वास है बेटा। तुम नित नयी ऊँचाइयों को छूएगा। पर एक बात ध्यान रखना। मैं तो कहूँगी कि गाँठ बाँधकर रख लेना। अपने जीवन में कितने भी झंझावात आयें, सत्य और न्याय से कदम डिगने मत देना। और हाँ,हमेशा मानवता की सेवा करना। एक माँ का आशीर्वाद है ,तुम कभी भी निराश नहीं होओगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम भी ऊँचा उठ सकते हो। कुछ भी कर सकते हो तुम,कुछ भी कर सकते हो। (कुछ रुककर)सब कुछ पा सकते हो! सब कुछ पा सकते हो। सब कुछ। (आँचल से अपनी आँखों से उतर आए आँसू पोंछती है। )

बिरजू-(आँखें भर आती हैं। )आज मैं धन्य हो गया माँ,मैं धन्य हो गया। मेरे संकल्प का पहला दिन ही मेरे घर में जब इतनी खुशियाँ ला सकता है,तो मैं समझ सकता हूँ कि मेरा भविष्य क्या है। मैं आप दोनों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैं कभी भी अपने मार्ग से च्युत नहीं होऊँगा, कभी नहीं, कभी नहीं। बस, आपलोगों का आशीर्वाद ऐसे ही बना रहे। मुझे जन्म देने वाले आप देवी-देवताओं के चारों हाथ मुझे अभय प्रदान करे। मुझे सन्मार्ग की ओर ले जाने को प्रेरित करे। करता रहे।

(रधिया बिरजू की बलैया उतारती है। सभी भावुक हैं। )

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परिचय
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नाम- दिवाकर राय
जन्म-तिथि-02.01.1973
शिक्षा-स्नातकोत्तर द्वय(हिन्दी, भोजपुरी),लब्ध स्वर्ण पदक।
प्रकाशन:-दो प्रकाशित नाटक 1.राष्ट्रपुजारी(2011), 2.नीली आग (2018)।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख,कविता, कहानी,एकांकी प्रकाशित।
सम्मान:- विश्व हिन्दी सचिवालय द्वारा आयोजित 'अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी एकांकी  प्रतियोगिता' में द्वितीय स्थान। 'नीली आग' पुस्तक पर 'शब्दगुंजन नाटक सम्मान,2018'.
पता:- पिउनीबाग शिव मंदिर के पास, बसवरिया, बेतिया,जिला-पश्चिमी चम्पारण, बिहार-845438

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