रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 6 - तुम भी ऊँचा उठ सकते हो - दिवाकर राय

SHARE:

अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक / टैप करें - रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 6 -...

अधिक जानकारी के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक / टैप करें -

रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020


प्रविष्टि क्र. 6 -

तुम भी ऊँचा उठ सकते हो

दिवाकर राय

------------------------------------------

image


दृश्य-एक

----------------

(रामकिशन जमीन पर पालथी मारकर भोजन करने के लिए बैठा है। उसकी पत्नी रधिया भोजन की थाली लाकर उसके सामने रखती है और वहीं बैठ जाती है। )

रामकिशन-(भोजन करते हुए)का बात है रधिया, आजकल तुम चिन्ता में बहुते डूबी रहती है। जब देखो तब कुछ सोचती रहती है। कुछो हो गया है का?

रधिया-का कहें बिरजू के बाबू, जब से बिरजुआ पढ़-लिखकर बेकार घूमने लगा है,मेरी आँखों की नींद और दिल का चैन चला गया है। कितनी तमन्ना से उसे पढ़ाया हमलोगों ने। खुद नून-रोटी खा के रात काट लिए,किन्तु बेटे को कभी कमी नहीं होने दी। पर आज जब उसे बेरोजगार देखती हूँ न,तो आपसे का कहें;कलेजा फट जाता है। (रधिया सुबकने लगती है। )

रामकिशन-(सान्त्वना देते हैं)अरे,दुख में पगला जाने से सुख दौड़े थोड़े ही चला आएगा? सबकी अपनी गति होती है रधिया। न उससे कम मिलता है, न अधिक। न उससे पहले मिलता है, न बाद में। वह जब भी मिलेगा,समय पर ही मिलेगा। वो भगवान श्रीकृष्ण कहे हैं न,गीता में- कर्म करो,फल की चिन्ता काहे करते हो? उसे समझो रधिया,समझो। फल हमारे वश में नहीं है। पेड़ रोपना अपने वश में है। वो हमने कर दिया। अब पेड़ पर फल कब लगेगा, वह तो ऊपरवाला ही जानता है। हमारे हड़बड़ाने से जल्दी फल नहीं आएगा वृक्ष पर। वह तो अपने समय पर ही आएगा।

रधिया-पर अब इस कलियुग में तो लगता है कि फल कभी आएगा ही नहीं पेड़ पर। केवल अपना बच्चा बेरोजगार हो तो कहा जाय,यहाँ तो पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज ही निकल रही है। अब ये करेंगे क्या?इनका रोज का कुछ अपना खर्चा भी तो है। ये कहीं कोई गलत धन्धा न पकड़ लें,इसी से मन सशंकित रहता है। चार-पाँच हजार की भी कोई नौकरी लग जाती,तो शादी-विवाह करके निश्चिंत हो जाते। बस!

रामकिशन-(मजाकिया अंदाज में)अच्छा, तो ई बात है। हमरी जोरू को पतोहू चाहिए। अब समझा माजरा क्या है? बहू के हाथ का स्वादिष्ट भोजन करना चाहती हो? आराम चाहिए? है न? सब समझ गया।

रधिया-(लजाती है)धत् तेरी की। आप तो पीछे ही पड़ गये। मैं तो ऐसे ही बात चलायी। आखिर जब बेटा जवान हो जाए,तो माँ-बाप का फर्ज बनता है कि नहीं कि योग्य लड़की देखकर उसकी शादी कर दी जाय। आपके माँ-बाप आपकी शादी नहीं किये थे क्या?

रामकिशन-उस समय की बात और थी भाग्यवान! आज की बात कुछ और है। महँगाई बढ़ गयी है, फैशन बढ़ गया है,व्यवहार बदल गया है,रहने का तौर-तरीका बदल गया है। तुम जिस परिस्थिति में इस घर में आयी, क्या तुम्हारी बहू उसमें रह सकती है। नहीं न? तो सबकी बात समझो,सबकी भावना समझो और अपनी हैसियत से तालमेल बैठाओ। तब पता चलेगा कि सपने सोते समय ही अच्छे लगते हैं। धरातल पर आते ही टूट-टूट कर बिखर जाते हैं वे। इसलिए मेरा मानो शादी की बात तो अभी छोड़ ही दो। अरे, कहीं देवी-देवता के पास जाकर मन्नत माँगो कि बेटे की चार पैसा कमाने लग जाय। फिर वो जैसा चाहेगा, हो जाएगा। उस पर कुछ भी थोपना ठीक नहीं है। डिप्रेशन में चला जाएगा, पहले से ही नौकरी न लगने का तनाव है।

रधिया-इहे त चिन्ता है कि बेरोजगारी में कहीं कुछ गड़बड़ कदम उठा लिया, तो हम कहीं के नहीं रहेंगे। अभी महीना दिन भी नहीं हुआ, उसी का दोस्त बब्लुआ एटीएम काटते में पकड़ाया था। जेल की हवा खा रहा है। बिरछा काका का बेटा तो जाके ट्रेने के आगे कूद गया। अब ई सब देख-सोच के दिमाग में हमेशा टेंशन बनेगा कि नहीं?आखिर माँ का कलेजा बेटा के लिए ही तो धड़कता है!

रामकिशन-टेंशन की कोई बात नहीं है, रधिया। हमारा बिरजुआ होशियार है। और लड़कों की तरह मुर्ख नहीं है वह। आगे-पीछे सब समझता है। मैं उससे बातचीत करूँगा। उसे सान्त्वना दूँगा। उसको समझाऊँगा भी। जरूर बात मानेगा। इसलिए चिन्ता-फिकिर को मारो गोली। और आनंद से ऐश करो। नहीं तो तुम्हारी भी तबियत बिगड़ जाएगी।

रधिया-(अचानक थाली की ओर देखती है)अरे,आपकी थाली में तो रोटी है ही नहीं। मैं भी न ,बात करने में बहक गयी। रुकिए मैं अभी लाती हूँ। (रधिया रोटी लाने तेजी से अंदर जाती है। )

रामकिशन-(मुस्कराते हुए खुद से) पगली कहीं की! हमेशा अपने में ही खो जाती है। भगवान भला करें इसका।

दृश्य- दो

----------------

(बिरजू कुर्सी-मेज पर बैठकर पढ़ रहा है। रधिया उसके पास नाश्ता लेकर जाती है। )

रधिया-(नाश्ता बढ़ाती हुई) ले बिरजू नाश्ता कर ले। बहुत देर से पढ़ रहा है।

बिरजू-नहीं माँ,अभी नाश्ता नहीं करूँगा। अभी कुछ एक्सरसाइज बाकी है। पूरा कर लूँगा, तो खाऊँगा।

रधिया-(नाराजगी दिखाती है) तेरी न, यही सबसे बड़ी कमी है। न समय पर खाना खाता है,न नहाता है,न कोई काम करता है। दिनभर किताब में आँखें गडाये रहता है। अच्छी स्मरणशक्ति के लिए समय पर भोजन-पानी भी जरूरी है।

बिरजू-अच्छा अब तुम जाओ। नाश्ता रख दो। मैं खा लूँगा।

रधिया-(जिद करती है) नहीं, तू अभी मेरे सामने खा। ठंडा हो जाएगा,तो इसकी ताकत कम हो जाएगी।

बिरजू-मैं खा लूँगा न। तुम जाओ यहाँ से।

रधिया-जबतक तू नहीं खाता,मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी।

(रामधनी का प्रवेश होता है। )

रामधनी-अरे,क्या तू-तू मैं-मैं चल रहा है माँ-बेटे में?

रधिया-(शिकायत के लहजे में)देखिए न,इसकी आदत बिगड़ती जा रही है। जब भी मैं नाश्ता या भोजन लाती हूँ,यह समय पर करता ही नहीं है। हमेशा बहाना बनाता रहता है। पहले ऐसा नहीं था यह।

रामधनी-कोई काम समय पर ही अच्छा लगता है,बिरजू। और वैसे भी शरीर को निश्चित समय पर आहार की आवश्यकता होती है अन्यथा कई प्रकार की परेशानियाँ आ सकती हैं शरीर में।

(बिरजू चुपचाप थाली हाथ में लेकर नाश्ता करने लगता है। )

रामकिशन- देखो तो,कितना अच्छा है हमारा बेटा!अरे,प्यार से समझाया करो इसे। अभी बच्चा ही है न!

रधिया-(कुछ नाराज होकर) हाँ-हाँ,आपने ही इसे बहका दिया है दुलारकर। अब यह कोई बबुआ नहीं है गोदी का कि हर समय अस्सो-अस्सो करते रहें। इसकी उमर तक आपकी शादी हो गयी थी और दू गो बच्चा भी।

रामकिशन- तब की बात और थी रधिया। और अब की बात और है। तब केवल खाना-पीना,भैंस चराना और मस्ती करना ही काम था। अब पाँच वर्ष के हुए नहीं कि देह से भारी बस्ता पीठ पर। बेचारे लड़के तो बचपन में ही गदहा बन जा रहे हैं। जवानी चढ़ी तो नौकरी की चिन्ता अलग से। सच कहें तो अब तो बचपन में बच्चे वयस्क हो जा रहे हैं। उनकी सोच,उनका दृष्टिकोण सबपर कैरियर हावी हो गया है। अब बिरजू को ही देख लो। दिन-रात एक किये है। किताबी कीड़ा इसी को कहते हैं।

बिरजू-(नाश्ता करते हुए) फिर भी तो रिजल्ट नहीं आ रहा। तीन साल से लगे हैं कम्पीटीशन में। एक भी रिजल्ट पास नहीं किया। (मायूस होता है। )

रामकिशन-इसमें मायूस होने की कोई बात नहीं है बेटा! कम्पीटीशन पास करना तो जस्ट लाईक अ गेम है। जैसे क्रिकेट में बल्लेबाज गेंद पर जोर से प्रहार करता है। वह गेंद छक्का भी जा सकता है और खिलाड़ी आउट भी हो सकता है। सब संयोग पर निर्भर है। यदि गेंद बाउण्ड्री के बाहर चला गया, तो छक्के का जश्न और यदि किसी कारण गेंद फिल्डर के हाथ में चला गया,तो आउट होने का गम। कम्पीटीशन को भी इसी खेल भावना से लेना चाहिए। इसमें पास होना केवल आपकी काबिलियत पर निर्भर नहीं करता। बहुत कुछ परीक्षा देने की परिस्थिति पर भी निर्भर करता है। इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है। और भी आत्मविश्वास के साथ गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजने की जरूरत है।

बिरजू- लेकिन पापा,बेरोजगारों की फौज के आगे सारा स्ट्रैटेजी धरी की धरी रह जा रही है। बेरोजगारी का आलम यह है कि एक चपरासी के पद के लिए एमएससी- बीटेक किए लड़के तक कतार में लगे हैं। अब अनुमान लगा सकते हैं कि कम्पीटीशन कितना टफ हो गया है!

रामकिशन- मैं तुम्हारी बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ बेटा,परन्तु जीवन- बसर के लिए क्या एक मात्र सरकारी नौकरी ही सहारा है?आज की नयी पीढ़ी में नौकरी का इतना क्रेज क्यों है?क्यों नहीं युवा स्वरोजगार, स्टार्ट्स-अप, कृषि,पशुपालन आदि क्षेत्रों की ओर रुझान कर रहे हैं? क्योंकि इनमें चुनौतियाँ अधिक हैं। आज के युवा सरकारी नौकरी पाकर पैर पर पैर चढ़ाकर पगार ऐंठते हैं। उन्हें न काम से मतलब है, न ही चुनौतियों और संघर्ष से। पैंतालीस वर्ष की उम्र तक नौकरी के पीछे पागलों की तरह भाग रहे हैं। और उसके बाद डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं, आत्महत्या भी कर लेते हैं। इसलिए समय रहते इसका निदान क्यों न ढूँढ़ा जाय। क्यों बिरजू?

(बिरजू कुछ झेंप सा जाता है। )

रामकिशन-आखिर सबकी सरकारी नौकरी तो लगेगी नहीं, यह पक्का है। क्यों बेटा?

बिरजू-(बेमन से)जी पापा!

रामकिशन-तो फिर एक निश्चित समय तक ही नौकरी की प्रतीक्षा क्यों न की जाय?फिर इसके बाद स्वरोजगार की रणनीति ज्यादा कारगर हो सकती है। पैंतालीस की उम्र के बाद तो अवसाद और निराशा के सिवा कुछ हाथ नहीं आने वाला। और वैसे भी एक छोटी नौकरी से जीवन की उमंगों को पंख नहीं दिया जा सकता।

बिरजू-तो आप क्या चाहते हैं पापा?

रामकिशन-बस इतना कि तुम अपना आकलन करके समय पर निर्णय ले लो। मैं पैंतालीस वर्ष तक प्रतीक्षा के पक्ष में नहीं हूँ। उसके बाद हाथ में कुछ बचता नहीं है।

बिरजू-पर कुछ काम करने के लिए पूँजी तो चाहिए न?

रामकिशन-पहले मन तो बनाओ। काम का चयन तो करो। फिर तो पूँजी की व्यवस्था भी हो जाएगी। सरकार भी स्वरोजगार के लिए ऋण की सुविधा उपलब्ध करा रही है। अरे आज जो टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अडानी जैसे लोग दिख रहे हैं न,वे भी पहले अपना धंधा छोटे स्तर पर ही शुरू किए थे। तुम भी उनकी तरह ऊँची उड़ान भर सकते हो। पर नौकरी में तो सपने भी नहीं देख सकते। और मेरा मानना है कि पैतृक धंधे में सफलता की संभावना अधिक रहती है।

बिरजू-जी पापा, मैं विचार करता हूँ।

रामकिशन-मुझे तुमसे ऐसी ही उम्मीद थी। हम दोनों मिलकर अपनी पैतृक विरासत को आगे बढायें। इससे भारत माता की सेवा तो करेंगे ही,कृषि को भी लाभकारी व्यवसाय में बदलकर न केवल अपना बल्कि देश के सपने को पूरा करेंगे।

बिरजू-ठीक है। कल से मैं आपके साथ लग जाऊँगा।

रामकिशन-कल से क्यों?अभी से क्यों नहीं?शुभस्य शीघ्रम्।

बिरजू-बिल्कुल मैं अभी से तैयार हूँ। नाश्ता करके मैं आपके साथ खेत में चलूँगा। और वहीं पर परिस्थितियों के अनुकूल प्लानिंग की जाएगी।

रामकिशन- बेस्ट ऑफ लक बेटा! यह काम तुम्हारे लिए यशस्वी हो। मैं चलता हूँ,तुम आओ।

(रामकिशन प्रस्थान करते हैं। )

दृश्य-तीन

-----------------

(रात का समय। रधिया भोजन बना रही है। बिरजू उसके पास आता है। )

बिरजू-(आनंद में सराबोर हो कर माँ को दोनों बाँहों में पकड़ते हुए) माँ-माँ, खाना दो,बहुत भूख लगी है।

रधिया-( अति प्रसन्न होकर)अरे वाह,तू मेरा बिरजू ही है न?

बिरजू-क्यों? तुम मुझे नहीं पहचानती?

रधिया-(गहरी साँस लेकर)अरे पहचानूँगी भी कैसे?आज पहली बार मेरा लाल मुझसे खाना माँग रहा है। रोज तो मैं उसे खिलाने के लिए ही परेशान रहती थी।

बिरजू-अच्छा-अच्छा, अब बात मत बनाओ। मुझे सचमुच जोर की भूख लगी है। जल्दी कुछ खिलाओ। क्या बना रही हो? बहुत मीठी-मीठी सोंधी-सोंधी खुशबू आ रही है।

रधिया-जब परोसूँगी तब पता चल जाएगा। जा पहले हाथ-पैर धो ले,फिर आ। और हाँ,आज अपने पापा को भी साथ बैठाना। अच्छा लगेगा उन्हें। रोज तो अकेले ही खाते हैं।

(बिरजू जाता है। रधिया थाली लगाती है। बैठने की व्यवस्था करती है। बिरजू अपने पापा के साथ आकर बैठ जाता है। रधिया थाली परोस देती है। )

बिरजू-(खुशबू से आनंदित होकर) अरे वाह,बासमती की खीर? दाल-पराठा भी? क्या बात? आज तो जितनी जोर की भूख,उतना ही स्वादिष्ट भोजन!लगता है,माँ आज बहुत खुश है।

रधिया-मैं खुश क्यों न रहूँ?आखिर आज मेरी इच्छा पूरी हुई है। तुझे अपने पापा के साथ देखकर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है। पता है,मैं तुम्हारा रंग-ढंग देखकर डर ही गयी थी मुझे यह भय अंदर ही अंदर खाये जा रहा था कि मेरा बिरजुआ भी कहीं गलत लड़कों के सम्पर्क में आकर बिगड़ न जाय। आजकल के लड़कों को देखकर मुझे बहुत डर लगता है।

रामकिशन-अरे भाग्यवान,आखिर बिरजू बेटा किसका है?वो कहावत सुनी हो न- माँ गुने बाछी,पिता गुने घोड़। ना बेसी त थोड़ो थोड़।

(सभी ठठ्ठा मारकर हँसते हैं। )

रधिया-अच्छा तो बिरजू,आज काम का पहला दिन कैसा रहा?

बिरजू-(प्रसन्नचित्त होकर)बहुत शानदार।

सच कहूँ,तो आज पहली बार मैं खेत में गया। वहाँ मैंने पापा के साथ काम भी किया। और बीच के समय में पापा के साथ मिलकर भविष्य का रोडमैप भी बनाया। जानती हो माँ,मैं जल्दी ही लोन लेकर गुड़ बनाने वाला एक क्रसर लेना चाहता हूँ। मैं शुद्ध व स्वादिष्ट गुड़ बनाऊँगा तथा शहर में बेचूँगा। ईश्वर की कृपा रही तो मेरा व्यवसाय जल्दी ही चल निकलेगा। आजकल शुद्ध हर्बल उत्पाद की बहुत माँग है।

रधिया- वाह मेरे लाल,मुझे तो अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा है कि तू वही बिरजुआ है जो किताब के सिवा न कुछ देखता था,न ही कुछ करता था। खाना खिलाने में भी नानी याद आ जाती थी।

रामकिशन-अरे भाई,इसी को न टर्निंग प्वाइंट कहते हैं। कब कौन सी बात जीवन की दिशा बदल दे,कौन जानता है? भगवान बुद्ध तो राजकुमार थे न,पर एक वृद्ध व्यक्ति को देखकर वे महात्मा बन गये। गांधी जी तो राजकोट के दीवान के बेटे थे,पर एक अधनंगी महिला को देखकर सूट-बूट त्याग दिये। कब किसका टर्निंग प्वाइंट आएगा, कौन जानता है!पर एक बात पक्का है कि एक बार जिसने भी अपने जीवन का लक्ष्य तय कर लिया, वह आसमान को छू सकता है,जमीन पर तारे ला सकता है। आज मुझे लग रहा है कि मेरा बेटा भी अपना लक्ष्य तय कर लिया है। अब वह दिन दूर नहीं, जब बिरजू भी सब कुछ पा सकता है।

रधिया-(आँख से आँसू निकलते हैं। )आपके मुँह में घी-शक्कर। मेरा बेटा एक अच्छा इंसान बन जाय बस। बाकी तो वह खुद अपने पुरुषार्थ से प्राप्त कर लेगा।

बिरजू-बस आपलोगों का आशीर्वाद चाहिए माँ। अब मैं पीछे लौटकर नहीं देखूँगा। अपने सामर्थ्य के अनुसार शक्ति सृजनकर लक्ष्य को प्राप्त करूँगा।

रधिया-मुझे तुम्हारी क्षमता-योग्यता पर विश्वास है बेटा। तुम नित नयी ऊँचाइयों को छूएगा। पर एक बात ध्यान रखना। मैं तो कहूँगी कि गाँठ बाँधकर रख लेना। अपने जीवन में कितने भी झंझावात आयें, सत्य और न्याय से कदम डिगने मत देना। और हाँ,हमेशा मानवता की सेवा करना। एक माँ का आशीर्वाद है ,तुम कभी भी निराश नहीं होओगे। अगर ऐसा हुआ तो तुम भी ऊँचा उठ सकते हो। कुछ भी कर सकते हो तुम,कुछ भी कर सकते हो। (कुछ रुककर)सब कुछ पा सकते हो! सब कुछ पा सकते हो। सब कुछ। (आँचल से अपनी आँखों से उतर आए आँसू पोंछती है। )

बिरजू-(आँखें भर आती हैं। )आज मैं धन्य हो गया माँ,मैं धन्य हो गया। मेरे संकल्प का पहला दिन ही मेरे घर में जब इतनी खुशियाँ ला सकता है,तो मैं समझ सकता हूँ कि मेरा भविष्य क्या है। मैं आप दोनों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैं कभी भी अपने मार्ग से च्युत नहीं होऊँगा, कभी नहीं, कभी नहीं। बस, आपलोगों का आशीर्वाद ऐसे ही बना रहे। मुझे जन्म देने वाले आप देवी-देवताओं के चारों हाथ मुझे अभय प्रदान करे। मुझे सन्मार्ग की ओर ले जाने को प्रेरित करे। करता रहे।

(रधिया बिरजू की बलैया उतारती है। सभी भावुक हैं। )

*********************

परिचय
  ----------------
नाम- दिवाकर राय
जन्म-तिथि-02.01.1973
शिक्षा-स्नातकोत्तर द्वय(हिन्दी, भोजपुरी),लब्ध स्वर्ण पदक।
प्रकाशन:-दो प्रकाशित नाटक 1.राष्ट्रपुजारी(2011), 2.नीली आग (2018)।
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख,कविता, कहानी,एकांकी प्रकाशित।
सम्मान:- विश्व हिन्दी सचिवालय द्वारा आयोजित 'अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी एकांकी  प्रतियोगिता' में द्वितीय स्थान। 'नीली आग' पुस्तक पर 'शब्दगुंजन नाटक सम्मान,2018'.
पता:- पिउनीबाग शिव मंदिर के पास, बसवरिया, बेतिया,जिला-पश्चिमी चम्पारण, बिहार-845438

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 6 - तुम भी ऊँचा उठ सकते हो - दिवाकर राय
रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 6 - तुम भी ऊँचा उठ सकते हो - दिवाकर राय
https://3.bp.blogspot.com/-3rA8zhBejrg/Xd954AGVb3I/AAAAAAABQaU/GZsrV4AMXqsp6k_HfE3ZTBRlMjzL8L89gCK4BGAYYCw/s320/plboekldigliomec-714599.png
https://3.bp.blogspot.com/-3rA8zhBejrg/Xd954AGVb3I/AAAAAAABQaU/GZsrV4AMXqsp6k_HfE3ZTBRlMjzL8L89gCK4BGAYYCw/s72-c/plboekldigliomec-714599.png
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2020/02/2020-6.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2020/02/2020-6.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content