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एक चिंतन इस पर भी हो - जिसने जन्म दिया उन्हें न दिखाएं "स्टेटस"... डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

चिंतन

          एक चिंतन इस पर भी हो

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जिसने जन्म दिया उन्हें न दिखाएं "स्टेटस"...

                   जिंदगी की आधुनिकता की तीव्र रफ्तार किसे अच्छी नहीं लगती ? हर शख्स यही चाहता है कि उसके बच्चे इस रेस में पीछे न रहें । यह अच्छी सोच भी कही जा सकती है ,किन्तु कहीं न कहीं आधुनिकता के इस बवंडर में संस्कारों की गरिमा बिखर न जाए इस बात का बराबर ध्यान रखा जाना जरूरी है । जब से संयुक्त परिवार की मजबूत दीवारें अपनी ईंटें छोड़ने लगी हैं ,तब से इंसानी जज्बातों पर वज्रपात की शुरुआत ने परिवार को जन्म देने वालों पर कष्टदायी प्रहार चला रखे हैं । हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारे बच्चों की शिक्षा-दीक्षा इतनी अच्छी हो कि वे प्रतियोगिता की दौड़ में कभी नंबर 02 पर न रहें बल्कि रेस जीतते हुए हर अरमान पूरे कर पाएं । हमारी कामना को ईश्वर पूरी भी कर रहा है ,किन्तु शिक्षा के साथ संस्कार पल्लवित नहीं हो पा रहे हैं ।जिंदगी की भाग-दौड़ में बच्चे अपना देश छोड़कर विदेशों में धन-संपत्ति अर्जित कर अपना वैभव बढ़ा रहे हैं । उन माता-पिता की चिंता का थोड़ा भी दर्द महसूस नहीं किया जा रहा है ,जिन्होंने उनकी संपन्नता और प्रगति के लिए लाखों मिन्नतें ईश्वर से की थीं ।जब तक हमारे बच्चे हमारे होते हैं अर्थात उनकी शादी नहीं हुई होती है ,तब तक तो थोड़ी चिंता की झलक दिखाई पड़ती है । जैसे ही उनकी शादी कर जीवन साथी का साथ उन्हें मिलता है ,वे सिर्फ उसी के होकर रह जाते हैं । माता-पिता का संघर्ष और उनके प्रति जवाबदारी का उत्तरदायित्व आधुनिकता के इसी बवंडर का शिकार हो जाता है ।

                  सवाल यह उठता है कि जीवन की इस डगर पर खड़े माता-पिता के दुःख- दर्द के लिए जवाबदार कौन है ? जहाँ तक मैं समझता हूँ स्वयं ऐसे माता-पिता ही इसके लिए उत्तरदायी हैं ।हम जब यह सुनते हैं कि पडोसी का बच्चा अमेरिका, जापान ,आस्ट्रेलिया,या जर्मनी में रह रहा है, तो हमें ऐसा लगने लगता है कि हमारा बच्चा इस काबिल नहीं है ,जो हमारी गलत सोच ही होती है । हमने अपने बच्चे को जो शिक्षा दी क्या वह विदेशी धरती पर उन्नति का शिखर तय करने के लिए दी गई है या फिर अपने वतन की सेवा के लिए ? यह मेरे पाठकों को मेरी बकवासी सोच लग सकती है ,किन्तु इसकी गहराई में झांका है तो हम स्वयम अपने अकेलेपन के लिए बीजारोपण करते दिखाई पड़ते हैं । जिस माता- पिता ने हमें जन्म दिया। अपनी वृद्धावस्था का सहारा समझा। हमें हर कष्ट और तकलीफ की परछाईं से दूर रखते हुए योग्य बनाया कि हम स्वयम के पैर पर खड़े हो पाए। क्या उन्हें बे-सहारा छोड़ देना संस्कारों का प्रतीक है ? वृद्धावस्था में उन कंधों को सहारा देना अथवा उन्हें हाथ पकड़कर चलाना क्या हमारा कर्तव्य नहीं कि,जिन्होंने हमें उँगली पकड़कर चलना सिखाया उन्हें हम यह एहसास दिला सकें कि वे वृद्धावस्था में हमारे कदमों के सहारे "मैराथन"जीत सकते हैं ।

               मैं इस नए साल में इस तरह के नकारात्मक विचारों का शिकार क्यों हो रहा हूँ यह भी प्रश्न उठाया जा सकता है । नए युग के नए विचारों और अपनी मौज-मस्ती से जीवन जीने वाले लोगों की जीवनचर्या ने शायद मुझे इस तरह के विचारों में उलझा दिया है । जीवन साथी का साथ मिलने के बाद अपने माता-पिता की ओर से नजरें फेर लेना और केवल अपना "स्टेटस" बनाने की ओर खो जाने वालों ने घर पर पड़ी बूढ़ी माँ या फिर बूढ़े पिता का साथ एक ही घर में रहते हुए कैसे छोड़ दिया ? इस परिस्थिति ने मुझे कुछ लिखने पर विवश कर दिया है । थोड़ी सी सर्दी-खांसी होने पर जिन माता-पिता ने अपनी रात की नींद की परवाह नहीं की ,आज उनके वृद्धावस्था की खांसी बेटे-बहु की रात की नींद का खलल कैसे बन गयी ? माता- पिता की अस्वस्थता को अपने बजट का बड़ा हिस्सा मान लेने वाले बच्चों ने यह सोचना भी जरूरी नहीं समझा कि किस तरह हर प्रकार के जीवन रक्षक टीकों की व्यवस्था माता-पिता ने एक वक्त भूखे रहकर की थी । आज जिस स्वस्थ जीवन के सहारे वे धनोपार्जन कर रहे हैं उस स्वस्थ शरीर रूपी वृक्ष का खाद-पानी इन्हीं बूढ़ी आंखों ने अपना पसीना बहाकर ,रात-दिन एक कर जुटाया था । उसी बाग के कुशल माली के लिए आज खाद रूपी दो वक्त की रोटी तैयार वृक्ष कैसे नहीं दे पा रहा है ? क्या इस पर चिंतन जरूरी नहीं ?

             मैं अपने इस लेख का समापन एक कहानी के साथ करना चाहता हूँ और ये चाहता हूँ कि यह कहानी किसी परिवार में न दोहराई जाए। यह भी कामना करता हूँ कि एक भी युवक-युवती इससे प्रेरणा ले सकें तो मेरा लिखना सार्थक कर दिखाएं । तो चलिए अब आता हूँ कहानी पर । अचानक घर में घुसते ही सरकारी अफसर पुलिस को देखकर होश खो बैठा। घर की सारी आलमारियां सील बंद, सारे कीमती सामानों पर आयकर अधिकारी की सील एवम घर को अस्त-व्यस्त देख उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था । एक कोने पर पड़ी कुर्सी पर सिकुड़ी-सिमटी बैठी बूढ़ी माँ और पास ही खड़ी पत्नी का चेहरा पतझड़ सा उजाड़ लग रहा था । पता चला कि आयकर की टीम ने घर पर छापेमारी की है ।इतना समझते ही घर का मालिक और सरकारी अफसर चुप-चाप बैठ गया। जांच करने काले अधिकारी वृद्ध माँ से उनकी संदूक की चाबी के लिए मिन्नतें कर रहे थे,किन्तु वह देने के लिए तैयार नहीं थी । जैसे-तैसे चाबी मिलने के बाद जब संदूक खोली गई तो उसमें वृद्ध मां के शादी के कपड़े, पति की फ़ोटो और एक प्लास्टिक की एक थैली पायी गई। अब जैसे ही अधिकारियों ने उस थैली को खोलने का प्रयास किया,उस बूढ़ी माँ ने बिजली की शक्ति की तरह झपट्टा मारते हुए उसे छीन लिया। उस बूढ़ी माँ के हाथों से वापस लेकर जैसे ही थैली खोली गई, सभी की आंखें कौड़ियों की तरह फैल गईं।

                 इस लेख को लिखने का उद्देश्य शायद इसी थैली में मिले समान पर छिपा हुआ है । थैली के खुलते ही आयकर अधिकारी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया। अपने हाथों में सुखी रोटियाँ पकड़े अब वह उस बूढ़ी माँ से यही पूछ रहा था--इन सूखी रोटियों के लिए इतना विरोध क्यों ? उस बूढ़ी माँ को जैसे साँप सूंघ गया हो। कई बार पूछने पर उसने कंपकंपाती आवाज में जो जवाब दिया वही इस लेख का सार है। अधिकारी का फिर वही सवाल था -आखिर इन सूखी रोटियों का इस संदूक में क्या काम ? अब बारी उस बूढ़ी माँ की थी - उसने कहा बेटा ! जब बहु- बेटे दोनों बाहर खाना खाने चले जाते हैं और घर पर चूल्हा भी नहीं जलता है ,तब इन्हीं सूखी रोटियों को पानी में भिगाकर मैं अपनी क्षुधा शांत कर लेती हूँ। शायद अब और कुछ कहने की जरूरत नहीं और न ही यह बताने की जरूरत है कि मैंने इस लेख को क्यों लिखा ? उन सारे बेटों से मैं माफी चाहता हूँ ,जो इस कहानी के (कु) पात्र हैं ।

                         डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

        न्यू खंडेलवाल कॉलोनी,ममता नगर,

        प्रिंसेस प्लैटिनम, हाउस नंबर 05

        राजनांदगाँव (छ. ग.)

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