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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 7 - अजेयता - सुधा शर्मा

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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020


प्रविष्टि क्र. 7 -

अजेयता

सुधा शर्मा

पात्र-प्रवेश के अनुसार

सितारा/शुभांगी आयु लगभग 22 वर्ष

राखी ’’ ’’ 21 ’’

शबनम ’’ ’’ 18 ’’

सलमा ’’ ’’ 23 ’’

मुन्नी बाई मौसी ’’ ’’ 50-55 ’’

कल्लन ’’ ’’ 45 ’’

रशीद ’’ ’’ 40 ’’

इंस्पैक्टर ’’ ’’ 45 ’’

कांस्टेबिल ’’ ’’ 42 ’’

मिसेज कपूर/अंजली ’’ ’’ 48 ’’

सागर ’’ ’’ 24 ’’

कविता ’’ ’’ 19 ’’

रमा ’’ ’’ 42 ’’

रामसिंह ’’ ’’ 30-32 ’’

वृद्धा ’’ ’’ 60 ’’

शक्तिसिंह ’’ ’’ 40-45 ’’

मजि० ’’ ’’ 42 ’’

अमिता ’’ ’’ 40 ’’

तुषार ’’ ’’ 20 ’’

श्यामसिंह ’’ ’’ 30 ’’

डॉ० ’’ ’’ 52 ’’

श्यामवीर ’’ ’’ 28 ’’

सुगंधा ’’ ’’ 19 ’’

श्यामनाराण पांडे (जज) ’’ ’’ 58 ’’

--


पहला अंक

स्थान : मुन्नी बाई का कोठा

काल : आधुनिक काल

समय : दोपहर

मंच-सज्जा प्रतीकात्मक है। मंच के पृष्ठभाग में गहरे रंग की दीवार है। दीवार पर टी० वी० लगा है। पास में सिंगल बैड, बैड के पास ही प्लास्टिक की दो कुर्सियाँ। दूसरी दीवार के पास खिड़की है। दीवार पर एक लड़की का चित्र टंगा है। एक मोहक कलैण्डर भी। दायीं ओर बाहर जाने का मार्ग है।

पर्दा उठने पर कुर्सी पर बैठी एक सुन्दर युवती टी० वी० देखने में व्यस्त है। आयु होगी 23 वर्ष। पोशाक सादी, किन्तु रंग-बिरंगी मोहक। आँखों में आये अश्रुओं को छिपाने के लिए भरसक प्रयास से निरन्तर हथेलियों से पोंछ रही है। टी० वी० पर गुमशुदा लोगों की सूचना प्रसारित हो रही है। उसके बारे में भी सूचना है। सूचना देने वाले को दो लाख रु० की नकद धनराशि के इनाम की घोषणा की जा रही है। सूचना सुनकर लड़की विचलित हो जाती है और स्वयं में बड़बड़ाती है-‘‘कैसे बताऊँ मैं यहाँ हूँ इन जालिमों की कैद में, मैं क्या करूँ। दोनों हाथों से आँसू पोंछती है। तभी तीन लड़कियाँ दौड़ती हुई कमरे में प्रवेश करती हैं,

राखी (एक लड़की) - (युवती के कंधे पर हाथ रखकर उत्साहपूर्वक) ‘‘सितारा ! आज तो मौज-मस्ती का दिन आ गया।’’

सितारा - क्या हो गया ?

शबनमम - हम सब फिल्म देखने जा रहे हैं वो भी सिनेमा हॉल में।’’

सितारा उर्फ शुभांगी -‘‘बस-बस जमीन पर आजा, बहुत ऊँची उड़ गई।’’ (दाँयें हाथ से नीचे आने का इशारा करती है)

शबनम - ‘‘अरे नहीं ! यकीन कर। रॉयल टॉकीज में ‘मैंने प्यार किया’ फिल्म लगी है और वो खूसट बुढ़िया पटाये में आ गई है।’’

सितारा - (आश्चर्य से) आज बैल ने दूध कैसे दे दिया कैसे बिया गया ? गाय तो हमेशा दूध देती है।’’

सलमा - ‘‘पहले तो मौसी यहीं वी०सी०आर० मँगवाने को कह रही थी, लेकिन हम भी जिद पर अड़े रहे। बस काम बन गया।’’ (ताली बजाती है।)

शबनम - ‘‘तो सितारा! जल्दी तैयार हो जाओ। तीन से छः बजे का शो देखकर रात को फिर महफिल में बेजान कठपुतली बन कर नाचना है। कम से कम आज तो अपनी जिन्दगी जी लें।’’

सलमा - ‘‘लेकिन सभी लड़कियों को बुर्के में जाना है। मौसी का हुकुम है।’’ (सुनकर शुभांगी की आँखों में चमक आ जाती है। वह भी मन में कुछ दृढ़ निश्चय करके तैयार होने के लिए खड़ी हो जाती है। सभी लड़कियाँ तैयार हो रही हैं)

पर्दा धीरे-धीरे गिर जाता है।

पर्दा पुनः उठता है।

मंच सज्जा प्रतीकात्मक रॉयल टॉकीज का प्रांगण। खचाखच भीड़। मंच पर मौसी (उम्र 50-55 वर्ष) के साथ आठ नौ लड़कियाँ सभी लगभग समान उम्र की। सभी बुर्का पहने हैं। साथ में कल्लू व रशीद पहलवान से दिखाई देने वाले बॉडीगार्ड।,

मौसी - ‘‘ठहरो ! तुम सब यहाँ ठहरो। मैं टिकट लेकर आती हूँ। (कल्लू और रशीद की ओर मुँह घुमाकर फुसफुसाती है) तुम दोनों चौकन्ने रहना ये लड़कियाँ बहुत शैतान हैं।’’ (जाने का अभिनय करती है)

सिनेमा हॉल के अन्दर का दृश्य। मंच पर बड़ी हल्की रोशनी है। अभी विज्ञापन प्रारम्भ हुए हैं। नेपथ्य से विज्ञापन की आवाज आती रहती है। सभी कुर्सियों पर बैठ जाते हैं।

शुभांगी - (माथे में सिलवटें डालकर, रोनी सूरत बनाकर) मौसी ! मेरे पेट में दर्द हो रहा है।’’

मौसी - ‘‘अब यहाँ आ गई। मुझे ऐसे परेशान करेगी ? घर ठहर जाती।

(मुँह बनाकर) इस लड़की को तो अक्ल ही नहीं है। चुप बैठ।’’ (डाँटती है)

शुभांगी - (पीड़ा से कराहते हुए) ‘‘अब मुझे क्या पता था। घर पर तो मैं बिल्कुल ठीक थी। अब तो पेट में गोला-सा उठ रहा है।’’

मौसी - ‘‘जा तू किसी को साथ लेकर शौचालय चली जा। (इशारा करते हुए) कल्लन, जा तू इसके साथ जा।’’

शुभांगी - (कल्लन के साथ जाने का अभिनय करती है) ‘‘जाकर शुभांगी मंच पर चक्कर लगाकर आती है। (बैठते ही) मौसी फिर दर्द हो रहा है।’’ (कराहकर बोलती है।)

मौसी - (माथे में हाथ मारते हुए) ‘‘बस मैंने तो देख ली पिक्चर।’’

शुभांगी - ‘‘शायद लूज मोशन हो गए मौसी। बड़ी पीड़ा हो रही है (ऊपर को देखकर कराहते हुए) हे भगवान अब क्या करूँ ?’’

मौसी - (गुस्से से झुँझलाते हुए) ‘‘मैंने तो देख ली पिक्चर। इस लड़की ने तो बवंडर खड़ा कर दिया।’’

शुभांगी दो-तीन बार टॉयलेट जाने का अभिनय करती है।

कल्लन रशीद - हमारी आफत आ गई। (कल्लन और रशीद भी बड़बड़ाते हैं)

कल्लन - ‘‘कैसी पागल लड़की है। घर नहीं रूक सकती थी।’’

सितारा - (शुभांगी का ही नाम कोठे पर सितारा है) (सिर झुकाकर उदासी से) ‘‘मौसी मैं चुप बैठी रहूँगी। आप पिक्चर देखो। मेरी वजह से सब परेशान हो गए।’’

मौसी - (हाथ से इशारा करती है) ‘‘तू किनारे की सीट पर बैठ जा। अपने साथ किसी को ले जाया कर। अकेले मत जाना।’’

ख्नेपथ्य में फिल्मी सँवाद चलते रहते हैं सभी फिल्म देखने में व्यस्त हैं। सितारा फिर पेट दर्द की शिकायत करती है। (कोई ध्यान नहीं देता) सितारा पेट पकड़कर भाग लेती है और मंच के पार्श्व में जाकर बुर्का उतारती है और बड़बड़ाती है-मेरे पास कुछ पैसे हैं उन्हीं से रिक्शा करके पुलिस चौकी जाती हूँ भाग लेती हूँ। मंच से भागते हुए प्रस्थान,

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

मंच के पृष्ठ भाग में पुलिस चौकी का दृश्य । पुलिस थाना। अलग-अलग कुर्सी पर बैठे सभी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त। शुभांगी सीधे इंस्पैक्टर के ऑफिस के बाहर खड़े होकर बोलती है,

शुभांगी - (घबराई हुई होने के कारण अनियन्त्रित साँसें) ‘‘मे आई कम इन सर ?’’

इंस्पैक्टर - ‘‘यस कम इन।’’

शुभांगी - ‘‘सर ! मेरा नाम शुभांगी है। मैं मेरठ के मजिस्ट्रेट श्री बी० पी० शर्मा की बेटी हूँ। (इंस्पैक्टर उसके चेहरे को बड़ी गौर से देखता है) (शुभांगी अपनी बात को जारी रखते हुए) सर! लभभग डेढ़ साल पहले कुछ गुण्डों ने मुझे किडनैप किया। मैं आज किसी तरह से भागकर आई हूँ। आज के पेपर में मेरा फोटो भी छपा है। टी० पी० पर भी सूचना प्रसारित की गई है। (शब्द बीच-बीच में अटक रहे हैं अनियन्त्रित साँसें) मेरे मम्मी-पापा बहुत बेचैन होंगे। कृपया उन्हें सूचित कर दीजिए।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘बैठिए शुभांगी जी ! आप बिल्कुल सुरक्षित स्थान पर पहुँच गई हैं। आपके पापा को फोन करके बुला लेते हैं।’’ अब आपको घबराने की कोई जरूरत नहीं।

ख्रोशनी इंस्पैक्टर के चेहरे पर चली जाती है। वह मेज पर पड़े अखबार को देखता है और बीच-बीच में शुभांगी को घूरता है। इंस्पैक्टर मेज पर रखी घंटी बजाता है। एक सिपाही आता है और सैल्यूट मार कर खड़ा हो जाता है,

इंस्पैक्टर - (देखते हुए) ‘‘ये श्री आर० आर० की सुपुत्री है। तुम उन्हें फोन से सूचित कर दो कि आपकी लड़की (लड़की की ओर देखकर) क्या नाम बताया आपने ?’’

शुभांगी - ‘‘जी शुभांगी! और मेरे पिता का नाम वी० पी० शर्मा है।’’

इंस्पैक्टर - (बात पूरी करते हुए) ‘‘शुभांगी मिल गई है।’’

सिपाही - ‘‘फोन नं० सर !’’

इंस्पैक्टर - (मेज पर रखे अखबार की ओर इशारा करते हुए) ‘‘इस अखबार में इनका फोटो है, फोन नं० है, और पता भी है।’’ अखबर लेकर कांस्टेबल चला जाता है।

(लड़की की ओर देखते हुए) ‘‘तुम तो बहुत दिनों से लापता हो। इस सूचना को मैंने कई बार टी० वी० पर देखा है। अखबारों में पढ़ा है। लगभग हर शहर के हर थाने में आपका फोटो व एड्रैस है। मजिस्ट्रेट साहब ने तो पूरे शहर में जाल फैलवा दिया था। हमने तो कोठों पर भी छापे मारे, लेकिन तुम कहीं नहीं मिली, फिर आज अचान....क ..... कैसे ?’’

शुभांगी - ‘‘सर ! (आवाज में बड़ा दर्द है) ये तो बड़ी दर्दनाक कहानी है। पहले मेरे माता-पिता मिल जाएँ फिर सब ठीक हो जाएगा।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘आप एफ० आई० आर० लिखवाइए कानून उन्हें सजा देगा।’’

शुभांगी - ‘‘सर ! आप एफ० आई० आर० मत लिखिये। मैं ऐसी जगह थी जहाँ लड़कियों को कदम भी नहीं रखना चाहिए। आप मेरे मम्मी-पापा को बुलवा दीजिए। उनसे वो खुद अपने तरीके से निपट लेंगे। मम्मी-पापा सुनते ही चले आएँगे।’’

(पर्दा गिर जाता है)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

पुनः पर्दा उठता है।

दृश्य-मौसी का कोठा। प्रतीकात्मक मंच सज्जा। कल्लन, रशीद व अन्य पालतू गुण्डे गुस्से में तथा सारी लड़कियाँ डरी सहमी सी खड़ी। मौसी गुस्से में आग-बबूला।,

मौसी - (कड़क आवाज में) ‘‘कल्लू ! कहाँ है सितारा ? ढूँढ़ो उसे। शहर का चप्पा-चप्पा छान मारो। मुन्नी बाई से बचकर कहाँ जाएगी ?’’ (अपने आप में बड़बड़ाती है)

रशीद - (व्यंग्य कसता है) ‘‘अब तो चिड़िया उड़ गई मौसी। देखो कहाँ मिलती है ?’’

मौसी - ‘‘चुप ! (डाँटती है) क्यों जले पर नमक छिड़क रहा है। बस एक बार मिल जाए उसके ऐसे पंख काटूँगी कि उड़ना तो दूर, चलना भी भूल जाएगी।’’

कल्लन - ‘‘फिलहाल तो तुम्हारे पंख काट गई, मौसी।’’

मौसी - (लड़कियों को घूरते हुए) ‘‘कहीं तुममें से तो किसी की साजिश नहीं ?’’

लड़कियाँ - ‘‘हमें क्या पता था; ऐसा कर जाएगी।’’ (सिर झुका लेती हैं।)

मौसी - ‘‘तुम सब की खाल में भूसा भरूँगी मैं।’’(चिल्लाती हुई) जाओ यहाँ से (सब लड़कियाँ चुपचाप चली जाती हैं। चाँद दिल से बड़ी खुश है।)

मिर्जा - ‘‘मौसी ! पुलिस में रपट लिखवा दो।’’

मौसी - (घूरती है) ‘‘कुछ सोच-समझकर तो बात किया करो मिर्जा। इतने मूर्ख देखने में तो नहीं लगते। (स्वर तेज हो जाता है) अरे वो मजिस्ट्रेट की बेटी है। लेने के देने पड़ जाएँगे।’’ पर्दा गिर जाता है।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

पुलिस थाना। शुभांगी चुपचाप बैठी है। वह बड़ी उदास है। शाम हो चुकी है। तभी मंच पर इंस्पैक्टर प्रवेश करते हैं।,

इंस्पैक्टर - ‘‘चलो बेटी ! अब तो शाम हो गई है। मेरे घर चलो।’’

शुभांगी - ‘‘नहीं, अंकल ! मैं यहीं बैठी रहूँगी।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘बेटी, यहाँ चोर, उचक्के डकैत हर तरह का व्यक्ति आता है। अतः अच्छा रहेगा कि घर चलो। घर ही सुरक्षित होता है।’’

शुभांगी - ‘‘अंकल ! मैं तो ऐसी जगह रहकर आयी हूँ जिससे असुरक्षित स्थान कोई हो ही नहीं सकता।’’ (आँखों में आँसू छलक आते हैं)

इस्पैक्टर - ‘‘जिद नहीं करते बेटा।’’

शुभांगी - ‘‘चलिए अंकल।’’ (दोनों मंच के अग्रभाग में दो-तीन चक्कर लगाते हैं)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

तभी दूसरा पर्दा गिरता है। इस्पैक्टर का बड़ा सा घर। प्रतीकात्मक सज्जा। इंस्पैक्टर व शुभांगी घर पहुँचते हैं। मंच पर एक स्त्री, एक लड़की और एक लड़का प्रवेश करते हैं,

इंस्पैक्टर - ‘‘आओ बेटी, यही है हमारा छोटा सा घर। (सामने आती हुई स्त्री की ओर इशारा करते हुए) यह मेरी पत्नी है। ये कविता, मेरी बेटी और सागर मेरा बेटा। (सोफे पर बैठे लड़के और लड़की की ओर इशारा करते हैं) हम यहाँ चार लोग रहते हैं।’’

शुभांगी - ‘‘नमस्ते आंटी।’’ (कहते हुए शुभांगी हाथ जोड़ देती है। इंस्पैक्टर शुभांगी का परिचय सबसे कराते हैं।)

मिसेज अंजली कपूर-(नौकरानी को आवाज लगाकर कहती है) रमा चाय ले आओ। (सभी चाय पीने का अभिनय करते हैं) चाय पीने के बाद इंस्पैक्टर की पत्नी शुभांगी से उसका अतीत पूछती है।

शुभांगी - ‘‘क्या करोगे आप सब मेरे बारे में जानकर। सीने में दर्द राख में दबी चिंगारी बनकर जमा है हवा लगते ही चिंगारी भड़क जाएगी। (कहकर शुभांगी रोने लगी)

(इंस्पैक्टर व उसकी पत्नी दोनों शुभांगी को समझाते हैं, हौसला बँधाते हैं।)

इंस्पैक्टर - ‘‘अब मुझे इंस्पेक्टर नहीं, बस अंकल समझो और अपने अंकल से कुछ नहीं छिपाते।’’

(कविता, सागर, इंस्पैक्टर, अंजली सभी शुभांगी की ओर उसके बारे में उससे कुछ सुनने की उत्सुकतता में एकटक देख रहे हैं शुभांगी बोलना प्रारंभ करती है।)

धीरे-धीरे पर्दा गिरता है।

नेपथ्य से आवाज आती है ‘‘अंकल मैं बी. एस. सी. के फाइनल में पढ़ती थी। मैं रोज अपने ड्राइवर रामसिंह के साथ कॉलिज जाती थी। एक दिन रास्ते में एक बहुत कमजोर, दीन-हीन बुढ़िया मिली जो हाथ हिलाकर लिफ्ट की प्रार्थना कर रही थी।,

धीरे-धीरे परदा उठता है।

(रामसिंह और शुभांगी गाड़ी में है रास्ते में खड़ी एक वृद्धा गाड़ी रोकने के लिए हाथ देती है।)

रामसिंह - (गाड़ी रोककर बेरूखी से पूछता है) ‘‘क्या बात है ?’’

वृद्धा - ‘‘मुझे बड़ी देर हो गई बेटा, यहाँ खड़े-खड़े। कोई बस नहीं मिल रही। मुझे चक्कर आ रहा है। बस पचास कदम की दूरी पर मेरा घर है। वहाँ छोड़ दो।’’

रामसिंह - ‘‘ये टैक्सी नहीं है।’’ (बेरूखी से कहता है)

वृद्धा - बैठा लो बेटा। बस थोड़ी दूर मेरा घर है। भगवान भला करेगा।

शुभांगी - मैं कह रही हूँ बैठा लो काका (रामसिंह दरवाजा खोलता है और वृद्धा बैठ जाती है)

वृद्धा - कौन सी कक्षा में पढ़ती हो ?

शुभांगी - बी. एस. सी में।

वृद्धा - कौन से स्कूल में।

शुभांगी - आर. जी. कालेज में।

वृद्धा - मेरी बेटी कंचन भी उसी स्कूल में पढ़ती है। मैं यहाँ दवाई लेने आती हूँ। बुढ़ापा है। दवाइयों के सहारे की चलता है। बस का इन्तजार करती-करती थक गई। बस का इन्तजार करते-करते थक गई धूप में चक्कर आ रहे थे। तेरा बहुत भला हो बिटिया तूने बूढ़ी पर तरस खाकर बिठा लिया है।

शुभांगी - कोई बात नहीं अम्मा जी।

वृद्धा - बस यही उतार दो। बस दो कदम पर मेरा घर है। (सुखी रहो बिटिया आशीर्वाद देते हुए बूढ़ी उतर जाती है)

रामसिंह - ‘‘आगे से किसी को मत बैठाना। साहब सुनेंगे तो डाँटेंगे।’’

शुभांगी - ‘‘तुम चिन्ता मत करो। मैं तुम्हें डाँट नहीं पड़ने दूँगी काका।’’

पर्दा गिरता है।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

पर्दा खुलता है मंच पर शुभांगी की माँ खड़ी मिलती है।

शुभांगी - रास्ते में आज एक वृद्धा खड़ी मिल गई थी।

माँ - सारी बातें बाद में होंगी पहले खाना खा लो।

(कहकर दोनों मंच से चली जाती हैं)

पुनः शुभांगी मंच पर आती है स्वयं गाड़ी चला रही है। सामने बूढ़ी आती दिखाई देती है शुभांगी देखते ही गाड़ी रोकती है और मुस्कराकर गाड़ी का दरवाजा खोलती है। वृद्धा भी मुस्कराती हुई गाड़ी में बैठ जाती है।

वृद्धा - चलो बेटी आज मेरे घर चलो।

शुभांगी - चलो अम्मा आप 15 दिन से लगातार घर ले जाने की जिद कर रही हैं। चलो आज मैं चलती हूँ और तुम्हारी शिकायत दूर कर देती हूँ। आज मेरा ड्राइवर भी साथ नहीं है। (कहकर गाड़ी से उतरकर दोनों मंच के पृष्ठ भाग में जाती हैं। बूढ़ी आग्रह कर चाय बनाकर लाती है चाय पीते ही शुभांगी बेहोश हो जाती है और दो आदमी आकर शुभांगी को उठाकर गाड़ी में डाल लेते हैं। वृद्धा अट्टाहास करती हुई कहती है)-‘‘बड़ी मुश्किल से चिड़िया जाल में फंसी है।’’)

परदा गिरता है।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

शुभांगी, दो गुंडे गाड़ी में हैं तभी शुभांगी का होश आ जाता है। (आँखें चारों तरफ घुमाकर देखती है)

(गुंडे चुप हैं केवल शुभांगी को घूरते हैं)

शुभांगी - (गुस्से से) कौन हो तुम लोग और कहाँ ले जा रहे हो ?’’ ‘‘क्यों कर रहे हो तुम ऐसा ?

शुभांगी - मुझे कहाँ ले जा रहे हो ?

व्यक्ति - वही जहाँ कोई लड़की कदम नहीं रखना चाहती, बदनाम गली में।

शुभांगी - मगर क्यूँ ? मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा।

व्यक्ति - तुमने नहीं, तुम्हारे पिता ने बिगाड़ा है।

शुभांगी - (घूरते हुए) बकवास बंद करो। मेरे पिता ऐसे नहीं हैं।

व्यक्ति - (व्यंगात्मक हँसी होठों पर) मैं शक्तिसिंह हूँ।

(शुभांगी उसे क्रोध से घूरती रहती है)

शक्तिसिंह - ‘‘यह तुम्हारे पिता की करनी का फल है उन्होंने रिश्वत लेकर मेरे निर्दोष भाई को फांसी की सजा दी। जिसके गम में उसकी गर्भवती पत्नी ने आत्महत्या कर ली और माँ गम में पागल हो गई।’’ तेरे बाप की वजह से चार जिन्दगियाँ बरबाद हुई हैं। अब मैं तुझे ऐसी जगह पहुँचाऊँगा जहाँ से ना तू वापिस आ सकेगी और वापिस भी आ गई तो समाज नहीं अपनाएगा। मजिस्ट्रेट साहब के चेहरे पर वो दर्द देखना चाहता हूँ। जो मैंने सहा है। (अटटहस करता है)

(सुनकर शुभांगी अपने जुडो कराटे के दाँव पेंच दिखाती है लेकिन सफल नहीं हो पाती)

(नेपथ्य में मंच पर अंधकार फैल जाता है। केवल शुभांगी की सिसकियाँ सुनाई देती हैं और एक स्त्री व पुरुष के सांत्वना भरे शब्द। शांत हो जाओ बेटा सब ठीक हो जायेगा।)

परदा गिरता है।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

पुनः पर्दा उठता है।

मजिस्ट्रेट वी० पी० शर्मा का बंगला। फोन सुनकर शर्मा जी खुशी से झूम जाते हैं। ओर पत्नि को समाचार बताते हैं।,

मजिस्ट्रेट - ‘‘अमिता सुनो-सुनो अमिता। हमारी बेटी शुभांगी मिल गई है अभी-अभी फोन आया है।’’

अमिता - (खुशी में आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं) ‘‘क्या सचमुच हमारी बेटी मिल गई।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘हाँ मिल गई।’’

अमिता - (उत्साह से) ‘‘तो चलो, तुरन्त मिलने चलते हैं। उसे घर लेकर आते हैं। मैं तुरन्त चलने की तैयारी करती हूँ। (फिर रुककर) और हाँ तैयारी क्या; मैं तो इन्हीं कपड़ों में चलती हूँ।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘नहीं अमिता ! तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है।’’

अमिता - ‘‘तबियत तो मेरी लाडो के कारण खराब थी। अब तो खबर सुनकर तबियत ठीक हो गई है। देखो न, मेरे रोंगटे खड़े हो गए हैं। (अपने हाथों को दिखाती है) मैं उसके लिए कुछ मिठाई और नमकीन लेती हूँ, मेरी लाडो को रसगुल्ले बहुत पसंद हैं।’’

(लक्ष्मी नाम की नौकरानी को आवाज लगाती है) लक्ष्मी जरा तुम फ्रिज में से रसगुल्ले निकालकर पैक कर दो।

(अमिता स्वयं भी भाग-भाग कर चलने की तैयारी करने लगती है)

मजिस्ट्रेट - इतने सारे कपड़े, खाना क्यों ले रही हो अमिता ?

अमिता - अरे बेटी को डेढ़ साल हो गया। पता नहीं बेचारी पर कपड़े भी हैं या नहीं।

मजिस्ट्रेट - अरे अमिता, जल्दी करो, हैदराबाद जाना है। दो कदम पर नहीं है हैदराबाद।

(कहकर सब मंच से निकल जाते हैं)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

इंस्पैक्टर साहब का घर। मंच की प्रतीकात्मक सज्जा। शुभांगी मंच के अग्रभाग में आकर बार-बार इधर-उधर देखती है।,

मिसेज कपूर - ‘‘चलो बेटी शुभांगी खाना खा लो। मम्मी-पापा जब आएँगे तो घर में ही आएँगे।’’

कविता - ‘‘मम्मी शुभांगी के पापा से ट्रीट लेंगे।’’ (उत्सुकता से कहती है)

सागर - ‘‘हाँ ट्रीट तो बनती है। पहले ट्रीट लेंगे फिर जाने देंगे। (शुभांगी के चेहरे पर आज वर्षों बाद मुस्कान आयी है। मंच पर मद्धिम रोशनी फैल जाती है।)

इंस्पैक्टर - ‘‘बेटे सब सो जाओ। मेरठ काफी दूर है। फिर अर्जेन्ट में फ्लाइट के टिकट लेने हैं। आने में समय लग जायेगा। (सब सो गये लेकिन शुभांगी के मानस पटल पर विचारों का अवागमन जारी रहता है। मंच पर प्रकाश कम हो जाता है बस रंगीन प्रकाश शुभांगी के चेहरे पर रहता है वह ख्यालों में माता-पिता से बातें करती है।)

(शुभांगी आँखें खोलकर लेटी रहती है। नेपथ्य से आवाज आती रहती है)

मजिस्ट्रेट - चलो अमिता कहीं पिकनिक मनाने चलते हैं। ऐसा लग रहा है जैसे बिटिया युगों बाद मिली हो।

अमिता - शुभांगी बेटी ही तय करेगी कहाँ चलना है।

शुभांगी - हाँ पापा, हम मसूरी घूमने चलेंगे।

मजिस्ट्रेट - तैयारी कर लो। (दिन निकलते ही चलते हैं) मसूरी घूमने की तैयारी करते हैं। इन्हीं विचारों में उलझे-उलझे रात बीत गई।

(धीरे-धीरे मंच पर प्रकाश फैलता है पूर्ण प्रकाश फैल जाता है। शुभांगी ब्रुश कर रही है। नेपथ्य में तभी डोरबैल बज उठती है। मंच पर मजिस्ट्रेट, अमिता और ड्राइवर प्रवेश करते हैं शुभांगी मम्मी कहते हुए अमिता से लिपट जाती है। माँ बेटी दोनों की आँखें नम हो जाती हैं।)

मजिस्ट्रेट - ‘‘मत रोओ बेटी। भगवान ने बहुत कृपा की है। हमारी बेटी मिल गई। तुम्हारी माँ तो तुम्हारे गम में बीमार रहने लगी थी।’’

रामसिंह - ‘‘हाँ बिटिया ! बहुत मुसीबत आई थी हम पर।’’

कविता - (अमिता का हाथ पकड़ते हुए) ‘‘आओ सब अन्दर चलकर बैठते हैं।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘मैं जरा शुभांगी से अलग में बात करना चाहता हूँ।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘व्हाय नोट। करिये करिये।’’

(सब मंच के पिछले हिस्से में चले जाते हैं, मजिस्ट्रेट और शुभांगी मंच के अग्रभाग में खड़े रहते हैं।)

मजिस्ट्रेट - बेटा कहाँ चली गई थी तुम ? मैंने तुम्हें कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा ?’’

शुभांगी - ‘‘शक्तिसिंह नामक आदमी किडनैप करके ले गया था।’’ पापा।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘कौन शक्तिसिंह ?’’ (आश्चर्य से आँखें फैल जाती है और याद करने की कोशिश करते हैं और स्वयं में की फुसफसाते हैं) कौन शक्तिसिंह ?

शुभांगी - ‘‘एक मुजरिम का भाई।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘क्यों ?’’

शुभांगी - ‘‘क्योंकि आपने उसके भाई को फांसी का हुकुम दिया था।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘कहाँ रखा उसने तुम्हें ?’’

शुभांगी - ‘‘वहाँ; पापा जहाँ का नाम सुनते ही आपके होश उड़ जायेंगे जहाँ एक शरीफ आदमी कदम रखना भी पसंद नहीं करता।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘तो शक्तिसिंह ने उस दुनिया में पहुँचा दिया तुम्हें।’’

(मजिस्ट्रेट साहब के चेहरे पर कठोरता आ गई उनके चेहरे की हवाइयाँ उड़गई) अमिता भी बात सुन लेती है और उन दोनों के पास आ जाती है। (जज साहब मौन खड़े हैं)

शुभांगी - ‘‘आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे पापा ?’’

अमिता - आप किस सोच में पड़ गए हो जी। जो हुआ सो भूल जाओ हम अपनी बेटी को इतना प्यार देंगे कि सारे दुखों को भूल जाएगी। अब आप सी० बी० आई० जाँच कराना और अभियुक्तों को कड़ी से कड़ी सजा दिलाना।’’

मजिस्ट्रेट - (शून्य में ताकते हैं। जैसे पत्थर की मूर्ति हों) ‘‘गन्दगी को दबा ही रहने दिया जाये तो बेहतर है। खुलने पर चारों तरफ बदबू फैल जाएगी।’’

अमिता - ‘‘क्या कह रहे हो ? जरा खुलकर कहो।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘हम शुभांगी को अपने साथ नहीं ले जा सकते।’’ (शब्दों में दर्द किन्तु दृढ़ता है)

शुभांगी - ‘‘आप क्या कह रहे हैं पापा।’’ (शुभांगी के माथे पर बल पड़ जाते हैं)

मजिस्ट्रेट - ‘‘बेटी! आप हमारी मजबूरियों को समझने की कोशिश करो, भगवान राम को इस समाज की मर्यादा रखने के लिए माता सीता को घर से निर्वासित करना पड़ा था जबकि वे उनकी पवित्रता के प्रति पूर्ण आश्वस्त थे।’’

शुभांगी - ‘‘पा-पा! आप क्या कह रहे हैं ?’’ (आवाज काँपती है।)

मजिस्ट्रेट - (चेहरे पर कठोरता) ‘‘बेटी ! तुम बहुत समझदार हो। आपको तो खुद ही सोचना चाहिए था अपने खानदान के बारे में। क्या रुतबा है मेरा शहर में; क्या मुँह लेकर तुम्हें अपने साथ लेकर जाऊँगा ? पूरे परिवार का जीना दूभर हो जायेगा।

शुभांगी - (रोते हुए) ‘‘पापा ! आप अपनी उस बेटी को छोड़ देंगे जो पल-पल आपकी प्रतीक्षा करती रही। आप इतने कायर निकलोगे कि बेटी के लिए समाज का मुकाबला नहीं कर सकते। भगवान के बाद यदि मैं किसी पर विश्वास करती हूँ तो वे आप हैं पापा आप।’’ फिर पापा मैंने तो गलत काम नहीं किया। मेरे साथ तो बहुत ज्यादा अन्याय हुआ है।

अमिता - (दृढ़ता से) ‘‘यह हमारी बेटी है। समाज की गलती की सजा हम अपनी बेटी को क्यों दें ?’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘जबकि ऐसी लड़की को ओर उसके परिवार को भी हमारा समाज स्वीकार नहीं करता।’’

शुभांगी - (दुख व क्रोध मिश्रित आवाज में) ‘‘एक अपराधी की करनी का फल नहीं, बल्कि पापा की करनी का फल है।’’

अमिता - ‘‘मैं अपनी बेटी के बिना नहीं जा सकती। यह मेरा खून है, मेरा गुरूर है।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘ऐसा नहीं हो सकता अमिता।’’

शुभांगी - ‘‘नहीं मम्मी ! अब मैं भी साथ नहीं जाऊँगी। मुझे शर्म आती है कि मैं एक बुजदिल और कायर आदमी की बेटी हूँ।’’

अमिता - ‘‘नहीं बेटी, तुम मेरे साथ चलोगी।’’ शरीर से परछाई कैसे अलग हो सकती है ?’’

शुभांगी - (भावहीन चेहरा) ‘‘जाइये अमिता जी, जाइये मजिस्ट्रेट साहब। आपका मेरे साथ खड़ा होना शोभा नहीं देता। लेकिन याद रखिये, मैं उन्नीसवीं सदी की कायर, डरपोक, बुजदिल लड़की नहीं हूँ। मैं इक्कीसवीं सदी की लड़की हूँ। सिद्ध कर दूँगी कि आपका फैसला गलत था। (आँखों से आँसू पोंछती है लेकिन चेहरे पर दृढ़ता है)

अमिता - (चेहरे पर दृढ़ता) ‘‘इनके साथ चलूँगी तो इज्जत का दिवाला निकलेगा। मैं तुम्हें साथ लेकर और कहीं रह लूंगी। जहाँ मेरी बेटी का साया भी इनकी इज्जत और रूतबे पर न पड़े।’’

शुभांगी - ‘‘अब मैं आपके साथ जाऊँगी भी नहीं। प्लाज मुझे अकेला छोड़ दीजिए।’’

(ऊँची आवाज सुनकर सब मंच के अग्रभाग में आ जाते हैं।)

इंस्पैक्टर - कैसा है आपका कानून ? रात दिन टी० वी० पर सूचनाएँ प्रसारित कराते रहे। और अब मिल गई है तो अपनाने के बजाय त्याग रहे हैं। सर ! आप उसे उस जुर्म की सजा दे रहे हैं, जिसमें उसका जरा भी दोष नहीं। सजा तो अपराधी को मिलनी चाहिए। आप तो निर्दोष को सजा दे रहे हैं।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘मैं समाज के नियम नहीं बदल सकता।’’ (आवाज भावहीन, शान्त)

इंस्पैक्टर - ‘‘ठीक है। आप निश्चित होकर जाइए। आज से शुभांगी मेरी बेटी है। मेरे घर में रहेगी। मुझे तो नाज है अपनी इस बहादुर बिटिया पर।’’ (शुभांगी के सिर पर हाथ रखते हैं) मजिस्ट्रेट कैब में बैठने का नाटक करते हैं और अन्य लोगों को आवाज लगाते हैं।

मजिस्ट्रेट - ‘‘चलो अमिता, रामसिंह चलो।’’

रामसिंह - (सिर झुकाते हुए क्रोध मिश्रित आवाज में) ‘‘हमने आपका नमक खाया है। लेकिन आज हम लाचार हैं। हम नमकहाम नहीं हैं लेकिन बिटिया के बिना हम नहीं जाएँगे।’’

मजिस्ट्रेट - ‘‘तुम सब एक थैली के चट्टे-बट्टे हो।’’ (गुस्से से गाड़ी से उतरकर शुभांगी का हाथ पकड़कर खींचते हुए) ‘‘चलो शुभांगी चलो।’’ ये लोग मुझे जीने नहीं देंगे। मरने नहीं देंगे।

शुभांगी - ‘‘नहीं, जज साहब नहीं। अब दुनिया की कोई भी ताकत मुझे तुम्हारे साथ चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।’’ (हाथ छुड़ा लेती है)

अमिता - ‘‘तुम क्या कह रही हो बेटी। मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी।’’

शुभांगी - ‘‘यदि आप यहाँ रूकी तो मैं यह स्थान छोड़कर चली जाऊँगी।’’

(अनमने मन से अमिता गाड़ी में बैठती है लेकिन पीछे मुड़कर देखती रहती है अमिता की आँखों से अविरल आँसू बह रहे हैं। जैसे ही गाड़ी चलती है। शुभांगी आवाज लगाती है)

शुभांगी - ‘‘रूकिये जज साहब। आप अपनी शर्त तो पूरी करते जाइए।’’

जज - कौन सी शर्त ?’’ (कुछ याद करते हैं)

शुभांगी - ‘‘अपनी लाडली बेटी पर जो दो लाख रु० का इनाम रखा था वो तो देते जाइए।’’

जज - ‘‘मगर किसको ? तुम्हारा पता तो मुझे किसी ने नहीं बताया।’’

शुभांगी - ‘‘बताया, शुभांगी ने। ये इनाम दिए बिना आप यहाँ से नहीं जा सकते।’’

जज - ‘‘बेटा ! हम मन से छोड़कर तुम्हें नहीं जा रहे। मैं हर माह तुम्हारे लिए खर्चा भेज दिया करूँगा। बल्कि खर्च से फालतू। मिलने आया करूँगा।’’

शुभांगी - ‘‘अन्जान लोगों का पैसा मैं स्वीकार नहीं करूँगी। मेरा जिस पर हक है, केवल वो ही पैसा चाहिए।’’ और हाँ मुझसे कभी मिलने मत आना। मैं समाज से नहीं डरती ना ही दोहरी जिन्दगी जीती हूँ।

जज - ‘‘ठीक है, मैं कल पैसे भिजवा दूँगा।’’

शुभांगी - ‘‘यहाँ उधार नहीं चलता जज साहब। अपने घर फोन कीजिए और बेटे तुषार से पैसे मँगवाइए।’’

जज - ‘‘इतना भी विश्वास नहीं ?’’

शुभांगी - ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है कि इतने बड़े आदमी पर विश्वास ना हो। वैसे भी उस व्यक्ति पर, जो सबका न्याय करते हो, न्यायमूर्ति हो। विश्वास तो मुझे अपने आप पर नहीं। अपनी किस्मत पर नहीं।

जज - ‘‘क्या तुम मुझे पापा नहीं कह सकती ?’’

शुभांगी - (व्यंग्य से) ‘‘पापा तो मेरे अभी-अभी एक निर्दयी जज के हाथों मारे गए।’’ (वह बिलख-बिलख कर रोने लगी।)

जज - ‘‘बेटी ! मैं हर माह तुमसे मिलने आया करूँगा।’’

शुभांगी - ‘‘नहीं तुझे आपसे मिलने की तमन्ना नहीं।’’ आपके लिए आपकी बेटी मर गई है।

इंस्पैक्टर - ‘‘धन्यवाद जज साहब। आपने मुझे एक बेटी दे दी।’’

जज - (क्रोध से) ‘‘आप मुझे नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘यह आपका कोर्ट नहीं, मेरा घर है। यहाँ आपके कानून नहीं चलेंगे, मैं आपकी तरह खोखले आदर्शों में नहीं जीता।’’

(जज साहब फोन पर तुषार को 2 लाख रु० लाने का निर्देश देते हैं। तभी मंच पर शुभांगी का भाई तुषार रु० लेकर आता है।)

शुभांगी - ‘‘तुम आ गये तुषार। चलो अच्छा हुआ। तुमसे मिलने की इच्छा रह जाती।’’ (तुषार के गले लगकर फफक-फफक कर रो पड़ती है।)

तुषार - ‘‘हम साथ रहेंगे दीदी। पापा की यह भूल है।’’

शुभांगी - ‘‘यदि शरीर में कैंसर हो जाए तो अंग काट ही दिया जाता है। भाई।’’

तुषार - नहीं दीदी, इलाज किया जाता है।

शुभांगी - जिस फूल को माली तोड़ कर फेंक दे उसको कोई बहार नहीं बचा सकती भाई।’’

(तुषार व अमिता की आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। जैसे ही गाड़ी स्टार्ट हुई शुभांगी बिलख पड़ी। मंच से मजिस्ट्रेट, अमिता और तुषार चले जाते हैं।)

दृश्य समाप्त

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शुभांगी अब भी रो रही है। इंस्पेक्टर साहब उसे सांत्वना दिलाते हैं।,

इंस्पैक्टर - ‘‘बेटे, ऐसे नहीं रोते। यह तो कायरों का काम है।’’

शुभांगी - ‘‘बात यह नहीं अंकल। एक बाप अपनी बेटी को ऐसे कैसे छोड़ सकता है।’’ समाज की सताई बच्ची को ऐेसे गिद्धों द्वारा नोचने को कैसे छोड़ सकता हूँ। पिता तो आसमान होता है जो अपने बच्चों को हर गम से बचाने के लिए सिर पर छाता बनकर खड़ा रहता है।

इंस्पैक्टर - ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ। अच्छे बच्चों की तरह मुस्कराओ, तुम्हारा यह बाप तुम्हारे साथ है।’’ (अपने सीने पर हाथ रखता है)

इंस्पैक्टर - बेटा ! कुछ लोगों के लिए खानदान की मर्यादा, इज्जत, समाज लोकलाज ही सब कुछ होता है। वो अपने झूठे आदर्शों के अहं में जीते हैं।

शुभांगी - ‘‘अब मैं क्या करूँगी अंकल।’’ ‘‘अंकल ! आप मुझे लॉ में एडमिशन दिला दीजिए।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘पहले मुझे एक कप चाय पिलाओ। तब कराऊँगा।’’

शुभांगी - (हँसकर) ‘‘लाती हूँ।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘शाबाश बेटी ! ऐसे बच्चे होते हैं काबिल-ए-तारीफ। हर मुसीबत एक नया उद्देश्य दे जाती है। लॉ करने से पहले तुम्हें बी० एस० सी० फाइनल करना होगा। इसके लिए मेरठ विश्वविद्यालय से माइग्रेशन सर्टिफिकेशन लेना होगा। शिक्षा से सम्बन्धित सभी कागजात मँगवाने होंगे।’’

शुभांगी - ‘‘अंकल ! मैं मेरठ में कदम भी नहीं रखना चाहती।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘नो प्रॉब्लम, मैं वहाँ जाऊँगा, पेपर्स लाऊँगा।’’

शुभांगी - ‘‘अकल ! आप मुझे हॉस्टिल में जगह दिलवा देना। फिर न मुझे कोई खतरा रहेगा न आपको कोई परेशानी। क्योकि कॉलेज में रहना, कॉलिज में पढ़ना।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘नहीं मैं रोजाना कॉलिज छोड़कर आऊँगा।’’ मेरे रहते हुए खतरा कैसा ? किस खतरे की बात कर रही हो। किसी की है इतनी हिम्मत जो तुम्हारे अंकल के रहते कोई तुम्हें हाथ लगा दे।

शुभांगी - ‘‘अंकल ! सच्चाई से मुँह मत मोडिए। मैं कहाँ रहकर आई हूँ आप अच्छी तरह जानते हैं। आप मुझे हर सैटरडे हॉस्टल से ले आया करना और मनडे की सुबह छोड़ आया करना।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘जैसी तुम्हारी मर्जी।’’ लेकिन किसी से डरकर नहीं रहना, हॉस्टिल में।

परदा गिरता है।

दृश्य समाप्त

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परदा खुलता है।

जज साहब का बंगला। प्रतीकात्मक सज्जा, एक ओर सूखे फूलों का बगीचा। सारा बंगला सुनसान। न मालकिन का पता, न तुषार का। बंगले के बगीचे के पौधे भी सूख गए। मंच पर जज साहब आते हैं चारों ओर देखकर चिल्लाते हैं।,

जज - ‘‘कोई है ? कहाँ गए सब ?’’ (तभी घर का नौकर श्यामसिंह मंच पर प्रवेश करता है।)

श्यामसिंह - ‘‘साहब ! मालकिन मंदिर गई हैं।’’

जज - ‘‘लेकिन तुम्हारी मालकिन तो कभी मंदिर नहीं जाती।’’

श्यामसिंह - ‘‘साहब ! बड़े मन्दिर के पुजारी ने कहा है कि सवा महीने तक रोज शाम को देशी घी के दीये जलाओ तो आप शुभांगी बिटिया को घर ले आएँगे।’’

(तभी मंच पर पूजा की थाली लिए अमिता प्रवेश करती है। दूसरी ओर से तुषार भी प्रवेश करता है।)

दृश्य समाप्त

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(मंच पर पड़े पलंग पर लेटती है पत्नी की तबियत के कारण जज साहब परेशान हैं। मंच के अग्रभाग में जज और तुषार आते हैं।)

जज - बेटा तुषार ! कभी-कभी आप अपनी मम्मी को भी समय दे दिया करो। वो बहुत उदास रहने लगी हैं।’

तुषार - ‘‘हाँ पापा ! देख तो मैं भी रहा हूँ। वो दीदी के गम में चलती-फिरती लाश बन गई हैं।’’

जज - ‘‘इन्हें खुश रखने का कोई उपाय सोचो।’’

तुषार - ‘‘पापा उपाय आप भी जानते हैं और मैं भी। अब मैं लड़की तो नहीं हूँ जो चौबीस घंटे इनके पास बैठा रहूँ। मुझे भी अपने काम होते हैं।’’

जज - ‘‘क्यों न हम तुम्हारी मम्मी के लिए गवर्नेस रख दे। जो देखभाल भी करेगी और कम्पनी भी देगी।’’

तुषार - ‘‘हाँ अच्छा आइडिया है। असली की अनुपस्थिति में रबड़ के खिलौनों से ही जी बहलाया जाता है।’’

जज साहब - ताना दिए बिना नहीं रह सकते।

(तुषार निकल जाता है। जज साहब अमिता के पास बैठते हैं और बातें करते हैं।)

मजिस्ट्रेट - ‘‘तुम बहुत कमजोर हो गई हो। अपने सेहत का ध्यान रखा करो।’’

अमिता - ‘‘मुझे कुछ नहीं हो सकता। इससे बड़ी बात क्या होगी कि मैं बेटी के गम में भी मरी नहीं।’’

मजिस्ट्रेट - (अमिता के मुँह पर हाथ रखते हैं) ऐसा नहीं कहते अमिता।

(तभी डॉ० हाथ में बैग लिए मंच पर प्रवेश करता है। अमिता का अच्छी तरह परीक्षण करते हैं कुछ दवाइयाँ लिखते हैं और मजिस्ट्रेट से अलग में बात करते हैं।)

डॉक्टर - शारीरिक रूप से इन्हें कोई बीमारी नहीं है इन्हें कोई मानसिक तनाव है और यह तनाव घातक सिद्ध हो सकता है।

(मजिस्ट्रेट साहब डॉक्टर को शुभांगी के बारे में सब कुछ बताते हैं)

डॉक्टर - आपको बिटिया को घर ले आना चाहिए। आपने उन्हें कैसे छोड़ दिया। कैसे विश्वास कर लिया कि सीता को वाल्मीकि मिल जाएगा। और अपनी कुटिया में सुरक्षित शरण देगा।

मजिस्ट्रेट - ठीक है मैं शुभांगी को घर वापिस लाता हूँ।

(प्रसन्न मुद्रा में मंच पर ही उपस्थित के पास आते हैं)

मजिस्ट्रेट - अमिता ! मै। शुभांगी को लेने जा रहा हूँ।

अमिता - मैं भी आपके साथ चलूँगी।

मजिस्ट्रेट - नहीं, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। मैं परसों तक अपनी प्यारी बिटिया को ले आऊँगा।

(कहकर मंच से निकल जाते हैँ)

परदा गिरता है।

दृश्य समाप्त

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परदा खुलता है।

मंच पर होटल के कमरे का दृश्य। मंच से रोशनी धुंधली। अपने मन में ही बड़बड़ाते हैं। क्यों न मैं हैदराबाद न जाकर किसी होटल में ठहर जाऊँ। (होटल में प्रवेश करते हैं और स्वागत कक्ष के काउण्टर पर बैठे व्यक्ति से बात करते हैं।),

मजिस्ट्रेट - मुझे दो दिन के लिए कमरा चाहिए।

(मंच पर पड़े पलंग पर लेट जाते हैं)। लेटते ही सो जाते हैं। तभी वो एक भयानक स्वप्न देखते हैं।

बैरा - ‘‘सर ! इस होटल में एक नई लड़की आई है। आपके लिए लाऊँ सर।’’

जज - तुम्हारा दिमाग खराब है। क्या मैं तुम्हें ऐसा-वैसा लगता हूँ।’’

(इतने में होटल में रेड पड़ जाती है। भगदड़ मच जाती है। मंच खाली हो जाती है स्वप्न में है। सुबह को जब अदालत लगी तो एक-एक कर लड़कियाँ पेश की गई।)

वकील - ‘‘मी लॉड। ये लड़की किसी ऊँचे खानदान की लगती है। सभ्यता की जीती जागती मिसाल।’’

(तभी पीछे से आवाज आती है)-‘‘अरे ये तो जज साहब की बेटी है। तभी भीड़ धिक्कार कर उठकर चली जाती है।’ अरे चलो यहाँ से, इन बड़े लोगों के धन्धे ही ऐसे होते हैं। अपने लिए अलग कानून और दूसरों के लिए अलग कानून।’’

जज साहब हड़बड़ा कर उठे उनका सारा शरीर पसीने से सरोबार था। (उन्होंने अपने कानों पर हाथ रख लिया। वो पलंग से उठे और मंच पर बड़ी व्यग्रता से जल्दी-जल्दी इधर-उधर चक्कर काटने लगे।)

मजिस्ट्रेट - नहीं, नहीं, नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूँगा। नाम बनाने में युगों लग जाते हैं। मिटाने में एक सेकण्ड लगता है। मैं सदियों से चली आ रही परम्परा पर दाग नहीं लगने दूँगा। सोचकर वापिस घर की ओर चल पड़े।

(मंच पर अमिता प्रवेश करती है।)

अमिता - (उत्साहपूर्वक) कहाँ है शुभांगी। (देखते ही पूछती है)

मजिस्ट्रेट - (मुँह लटकाए हुए) शुभांगी अब इस दुनिया में नहीं रही।

(सुनकर अमिता मूच्छिर्त हो जाती है) जज अमिता को चेहरे पर पानी डालकर होश में लाते हैं और समझाते हैं।

दृश्य समाप्त

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जज साहब - ‘‘अमिता ! बेटी तो पराया धन ही होती है। आज नहीं तो कल तो उसे इस घर से जाना ही था।’’

अमिता - (नफरत से जज साहब को घूरती है) तुमने उसे आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया। ‘‘मेरी किस्मत में बेटी को दुल्हन बनाकर विदा करना कहाँ ? वैसे भेजने में तो मैं खुशी से फूली न समाती।’’ बेटी को उसके घर भेजना तो हर माँ का सपना होता है और रोने लगती है।

जज - चुप हो जाओ अमिता, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है। (कहकर मंच से निकल जाते हैं)

दृश्य समाप्त

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इंस्पैक्टर साहब का घर। वही प्रतीकात्मक सज्जा शुभांगी प्रसन्नतापूर्वक घर में प्रवेश करती है और अपना रिजल्ट दिखाती है। वह लॉ में प्रथम श्रेणी में पास होती है।,

मिसेज कपूर - अरे वाह ! हमारी बेटी तो प्रथम श्रेणी में पास हुई है।

शुभांगी - आंटी कविता के रिजल्ट का क्या रहा ?

मिसेज कपूर - उसकी एम० ए० भी क्लियर हो गई है पर 59ँ् रह गये।

शुभांगी - कोई बात नहीं आँटी, वो है कहाँ ?

मिसेज कपूर - वो अपनी एक फ्रैंड के घर गई है।

शुभांगी - अच्छा तो मैं चलती हूँ।

इंस्पैक्टर - (बाहर से घर में प्रवेश करते हैं) अरे हमारी बिटिया हमसे मिले बिना जा रही है।

शुभांगी - नहीं अंकल, मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रही थी। (बढ़कर पैर छूती है) आपका आशीर्वाद है अंकल ! देखो मैं लॉ में फर्स्ट आई हूँ।

इंस्पैक्टर - तो हमारी बेटी ने बाजी मार ली है। तो अब मैं अपने दोस्त मणिराम वकील से बात कर लेता हूँ। उसके अन्डर में प्रैक्टिस शुरू कर दो। ताकि शीघ्र ही हमारी बेटी का नाम शहर के बड़े-बड़े वकीलों में शामिल हो सके।

शुभांगी - धन्यवाद अंकल ! अच्छा अंकल अब चलती हूँ।

इंस्पैक्टर - मगर धन्यवाद किस बात का। अपने बच्चे भी अब धन्यवाद करने लगे।

(शुभांगी जैसे ही घर से बाहर निकलकर थोड़ी दूर चलती है कि रास्ते में सागर मिल जाता है।)

शुभांगी - ‘‘हैलो सागर ! मैं घर से आ रही हूँ। कहाँ थे तुम ?’’

सागर - ‘‘मैं तुम्हारी यहाँ वेट कर रहा था।

शुभांगी - ‘‘क्यों ?’’

सागर - ‘‘तुमसे मिलने के लिए। तुम मेरी जिन्दगी बन चुकी हो।’’

शुभांगी - ‘‘क्या कहा तुमने सागर ? जिन्दगी; जो स्वयं की लाश ढो रही है वो दूसरों की जिन्दगी क्या बनेगी। मैं माता-पिता से परित्यक्ता हूँ और कहाँ से आई हूँ। सब जानते हो सागर।’’

सागर - ‘‘हाँ सब जानता हूँ तुम्हारे बारे में, तुम अप्सरा हो, स्वर्ग से आई हो, पवित्रता से अधिक पवित्र हो। तुम्हें एक घमण्डी, खोखले आदशर्ों में उलझे हुए बाप ने त्यागा है।

शुभागी - (आश्चर्य से) ‘‘तुम क्या बात कह रहे हो। मेरे तुम्हारे प्यार को तो आंटी-अंकल भी नहीं स्वीकारेंगे। किसी पर दया करना, उसे आश्रय देना अलग बात है जबकि घर की लक्ष्मी बनाना अलग।’’

सागर ॢ ‘‘मेरे पापा सबसे अलग हैं। खुली हवा में साँस लेने वाले हैं। वे सड़-गले रिवाजों की जड़ों को पानी नहीं देते।’’

शुभांगी - ‘‘मैं तुम्हारे पापा से नहीं डरती। अपनी किस्मत से डरती हूँ।’’

सागर - ‘‘तुममें अपनी किस्मत लिखने का हौसला है। शुभांगी हाथ बढ़ाकर कहो ‘आई लव यू’।’’

शुभांगी - ‘‘मैं तुम्हारा प्रस्ताव मंजूर करती हूँ। लेकिन मेरी एक शर्त है। सफल वकील बनना चाहूँगी। उसके बाद संबंध बढ़ाना पसंद करूँगी।’’

सागर - ‘‘मंजूर, बाबा मंजूर। कहो तो कोरे कागज पर साइन कर दूँ।’’

शुभांगी - ‘‘मेरे रिजल्ट के बारे में नहीं पूछोगे ?’’

सागर - ‘‘कालिज से पता करके आ रहा हूँ। फर्स्ट आयी हो। तभी तो ट्रीट देना चाहता हूँ। वैसे मैंने इन्टरनेट पर भी देख लिया था।’’

शुभांगी - ‘‘चलो।’’

सागर - ‘‘अब तुम्हें तो डिग्री मिल गई। पता नहीं हमें डिग्री कब मिलेगी ?’’

शुभांगी - तुम्हें तो एम० बी० ए० की डिग्री मिल गई , फिर कौन सी डिग्री ?’’

सागर - ‘‘अरे लाइफ की डिग्री की बात कर रहा हूँ।’’

शुभांगी - ‘‘जब दोनों कमाने लगेंगे।’’ (दोनों हँस पड़ते हैं)

सागर - अच्छा चलो तुम्हें हॉस्टल तक छोड दूँ।

(शुभांगी बाइक पर बैठने का अभिनय करती है)

ख्सागर शुभांगी को छोड़ने के लिए कॉलिज जा रहा है। बाइक फुल स्पीड पर है। शुभांगी मना करती है और अधिक तेज चलाने के लिए मना करती है। लेकिन सागर शरारत करता है तभी शुभांगी उसे कसकर पकड़ लेती है। तभी उनकी गाड़ी को एक भद्दा सा व्यक्ति पूरे प्रयत्नों से बलात रोकने का प्रयास करता है। मोटर साइकिल रुकते ही वहाँ चार व्यक्ति आकर खड़े हो जाते हैं।,

पहला व्यक्ति - ‘‘कहो, कहाँ लिए जा रहे हो बुलबुल को ?’’

सागर - ‘‘कौन है बुलबुल ? कहाँ है बुलबुल। भाई बुलबुल मुझे कहीं दिखाई नहीं दे रही।’’

दूसरा व्यक्ति - (रूमाल घुमाते हुए, पान को विशेष अंदाज में चबाते हुए) ‘‘अच्छा बुलबुल दिखाई नी दे रही।’’

शुभांगी अपना चेहरा सागर के पीछे छिपा लेती है।

तीसरा व्यक्ति- ‘‘इन्हें शराफत से हमें दे दीजिए। इनके बिना हमारा कोठा सूना हो गया।’’

(सागर ने ढिशुं ढिशुं करके चारों की पिटाई शुरू की।)

सागर - ‘‘याद रखना यह मेरी मंगेतर है यानि मेरे घर की इज्जत और लक्ष्मी है।’’

व्यक्ति - ‘‘तू जानता है कौन है यह। अरे ये नागिन है नागिन। कपूर साहब को पता चल गया तो इसकी शक्ल देखना भी पसंद नहीं करेंगे।’’

सागर - ‘‘जानता हूँ। यह सितारा है सितारा। लेकिन तुम जैसों के कारण। और कुछ बताना है। ........ चल फूट यहाँ से।’

(आपस में झगड़ा-मारपीट देखकर तभी दो कांस्टेबल आ जाते हैं। गुण्डे भाग जाते हैं)

दृश्य समाप्त

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मंच पर इंस्पैक्टर व मिसेज कपूर बात कर रहे हैं। इंस्पैक्टर साहब का घर सभी खुश हैं।,

इंस्पैक्टर - ‘‘सागर ! अरे आज शुभांगी को हॉस्टिल से घर ले आना। मैंने उसके बारे में वकील मणीराम से बात कर ली है।’’ वो उन्हीें के अण्डर में प्रैक्टिस कर लेगी।

मिसेज कपूर - ‘‘अरे, तुम उसे घर बुलाने की बात कर रहे हो। मैं तो उसे घर की बहू बनाने के बारे में सोच रही हूँ।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘तुमने तो मेरे मुँह की बात छीन ली।’’

मिसेज कपूर - ‘‘फिर दुल्हा-दुल्हन एक छत के नीचे कैसे रहेंगे ?’’

इंस्पेक्टर - ‘‘चलो आज दोनों से पहले बात कर लेते हैं।’’

(तभी शुभांगी मंच पर प्रवेश करती है।)

मिसेज कपूर - लो बेटे ! मीठा मुँह करो। (मिठाई देती है)

शुभांगी - (हाथ में लेती है) किस खुशी में आंटी ?

मिसेज कपूर - बेटे ! हम चाहते हैं तुम हमेंशा के लिए अपने घर में आ जाओ, बहु बनकर, घर की लक्ष्मी के रूप में।

शुभांगी - ‘‘नहीं, आंटी जी ऐसा नहीं हो सकता।’’

मिसेज कपूर - ‘‘क्यों ? क्या सागर तुम्हारे काबिल नहीं ?’’

शुभांगी - ‘‘ऐसा मत कहिए आंटी, सागर तो लाखों में नहीं करोड़ों में एक है। इस घर की चौखट मेरे लिए मन्दिर के समान है, पर मैं इस घर के लायक नहीं हूँ।’’

मिसेज कपूर - ‘‘हमारे लिए भी तुम करोड़ों में एक हो। फिर तुम्हारी हाँ क्यों नहीं ?’’

शुभांगी - ‘‘मेरा कुछ उद्देश्य है। मेरी मंजिल अभी दूर है।’’

मिसेज कपूर - ‘‘तुम्हारी मंजिल पाने में हम पूरा सहयोग करेंगे।’’

मि० कपूर - ‘‘मैंने तुम्हारी प्रैक्टिस की बात एक प्रसिद्ध वकील से कर ली है।’’

शुभांगी - थैंक-यू अंकल, ‘‘लेकिन अंकल ! शादी के बाद ध्यान बंट जाता है। कुछ जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं। शायद शादी के बाद मैं ही मंजिल तक ना पहुँच पाऊँ।’’

मिसेज कपूर - ‘‘तो फिर क्या फैसला है ?’’

शुभांगी - ‘‘फैसला तो अंकल मेरा आज भी वही है जो कल था अच्छा नमस्ते आंटी, अंकल। हो सके तो मुझे माफ कर देना।’’

मि० व मि० कपूर- ‘‘नमस्ते बेटा।’’

(शुभांगी मंच से निकल जाती है। अग्र भाग में आ जाती है। पर्दा गिर जाता है और शुभांगी मंच के अग्रभाग में धीरे-धीरे घूमती रहती है और मन में सोच रही है।)

(स्वागत) नहीं शुभांगी तूने यह अच्छा नहीं किया। तूने भगवान का दिल तोड़ा है। तुझे चुप रहना चाहिए था। जो आज तेरे पास है, वो सब उनका दिया ही तो है। तूने बहुत बड़ा पाप किया है। साफ बताना चाहिए था कि कुछ दिनों के बाद शादी के लिए हाँ है। वह विचारों में डूबी अपने को धिक्कारती जा रही थी कि झटके से उसके पास आकर रुकता है।

शुभांगी - (झटके से सिर उठाते हुए) ‘‘कौन है ? मैं तो डर गई थी देखो मेरा दिल धक-धक कर रहा है। मैंने सोचा आज भी वो दुष्ट मिल गया।’’

सागर - (हँसते हुए हा हा) चलो मेरे साथ।

शुभांगी - ‘‘क्यों ?’’

सागर - ‘‘मैं कहता हूँ इसलिए।’’

(शुभागी बिना कुछ कहे चल दी। बाइक पर बैठने का अभिनय करती है। कुछ दूर जाकर सागर ने गुस्से में शुभांगी का हाथ पकड़ा और मीनार के पास ले गया।’’) क्या बात है शुभांगी ?’’

शुभांगी - ‘‘तुम क्या पूछना चाहते हो सागर ?’’

सागर - ‘‘ऐसे भोले बन रहे हैं मेरे सरकार, जैसे कुछ पता ही न हो।’’ मम्मी-पापा से क्या कहकर आई हो ?

शुभांगी - ‘‘सागर मैंने अपनी मंजिल के लिए ही इतने कष्ट उठाए हैं। तुम सबको कष्ट दिए हैं। उसी से मुझे दूर ले जाने के लिए कह रहे हो।’’

सागर - ‘‘तुमने तो मुझे और मंजिल को एक दूसरे का दुश्मन बना दिया। ठीक है मैं अब तुम्हारी जिन्दगी में नहीं आऊँगा, कभी नहीं।’’ और शादी की बात को सपने में भी नहीं करूँगा।

शुभांगी - तुम शादी की बात नहीं करोगे तो मैं करूँगी। शादी हम दोनों की ही होगी, लेकिन थोड़ी प्रतीक्षा और, जहाँ इतना साथ दिया है थोड़ा-सा और। तुम मेरी मंजिल के दुश्मन नहीं तुम तो मंजिल पाने का साधन हो।’’ लेकिन शादी के बाद मेरे लिए असम्भव हो जायेगा मंजिल पाना।

सागर - ‘‘ठीक है, प्यार खुशी देने का नाम है, खुशी प्राप्त करने का नहीं यदि इसी में खुश हो तो मुझे और कोई आपत्ति नहीं। मैं तुम्हारी प्रतीक्षा वर्षों तक कर सकता हूँ। चलो मैं तुम्हें छोड़ दूँ।’’

सागर - ‘‘तो तुमने मम्मी-पापा से मना क्यों किया ?’’

शुभांगी - आंटी, अंकल के मुँह से अपनी शादी की बात सुनकर नर्वस हो गई और घबराहट में मुँह से निकल गया। सॉरी-सॉरी-सारॅी (कान पकड़ती है)

सागर - ‘‘माफी मुझसे नहीं उनसे माँगो।’’

शुभांगी - ‘‘ठीक है, मैं कल ही घर आती हूँ और कान पकड़कर माफी माँगती हूँ।’’

दृश्य समाप्त

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(इंस्पैक्टर साहब का घर। सागर घर आता है)

मिसेज कपूर- कहाँ से आ रहे हो ?

सागर - रास्ते में शुभांगी मिल गई थी।

मिसेज कपूर - ‘‘मत लो उसका नाम। उसने हमारे प्यार का यही जवाब दिया। अहसान फरामोश।’’

मि० कपूर - ‘‘ऐसा कहकर हमारे प्यार को स्वार्थी मत बनाओ अंजली मैं तो अपने बेटे से शादी की बात इसलिए कर रहा था क्योंकि अतीत व्यक्ति का कभी पीछा नहीं छोड़ता।’’ वो जिन्दगी के किस मोड़ पर मिल जाये पता नहीं चलता।

सागर - ‘‘पापा ! उसने शादी से इंकार नहीं किया। बल्कि स्वप्न पूरा करने के बाद वह शादी करने के लिए तैयार है। वह अपने पिता से अन्याय का बदला लेना चाहती है।’’

मिसेज कपूर - ‘‘लेकिन हम इतना इंतजार नहीं कर सकते।’’

सागर - (दृढ़ता से) ‘‘लेकिन मैं उसे वचन दे आया हूँ।’’

मि० कपूर - ‘‘गुस्सा थूक दो। उसे हमारे प्यार की सख्त जरूरत है।’’

कविता - ‘‘मम्मी ! शुभांगी के अलावा हमारे घर की बहू और कोई नहीं बन सकती।’’

सागर - ‘‘पाले में मरे पौधे को प्यार की छतरी से बड़े यत्न से बचाया जाता है मम्मी। शुभांगी तुम्हारे घर की हर बहू बनेगी।

दृश्य समाप्त

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स्थान - मजिस्ट्रेट साहब का निवास।

समय - पाँच वर्ष बाद सुबह के 10 बजे हैं।

कुर्सी पर बैठे मजिस्ट्रेट अखबार पढ़ रहे हैं। पास में एक पलंग पर अमिता लेती है। अचानक जज साहब खड़े होकर इधर-उधर घूमते हैं। अपने-आप में बड़बड़ाते हैं),

मजिस्ट्रेट - (जीवन बबार्द हो गया) पत्नि घर में जिन्दा लाश बन गई है। औलाद के नाम पर अब तुषार है वो भी भटक गया-क्या वास्तव में मेरा निर्णय गलत था। तभी डॉ० प्रवेश करते हैं।

मजिस्ट्रेट - आओ डॉ० साहब।

डॉक्टर - भाभी जी कैसी हैं ?

मजिस्ट्रेट - बस साँस अटक रही है।

डॉक्टर - ‘‘तुम अपनी जिद छोड़ क्यों नहीं देते यार। बिटिया को ले आओ। भाभी को कोई बीमारी नहीं है। जमाने की खातिर आपने अपने जिगर के टुकड़े को छोड़ दिया। दुनियावाले क्या कह रहे हैं आपके लिए ? किसको तुम्हारी पत्नि की चिन्ता है ? बताओ।’’

जज - ‘‘धीरे बोलो, अमिता सुन लेगी तो उसकी साँस शरीर से निकल जायेगी। अभी-अभी बड़ी मुश्किल से सोई है। और मैं करता भी क्या ?’’

डॉक्टर - ‘‘व्यक्तिगत फैसले में बड़े कमजोर निकले शर्मा जी आप। कम से कम आप जैसों से, समाज के उच्चतम वर्ग से इस युग में ऐसी आशा नहीं की जा सकती जज साहब।’’

जज - ‘‘तुम मेरी मजबूरी नहीं समझ सकते डॉक्टर। शुभांगी मेरा खून है, मेरी प्रतिछाया है, सब सोचते हैं कि मैं इंसान नहीं पत्थर हूँ, लेकिन मेरे अंदर झाँककर किसी ने नहीं देखा। मैं बहुत कमजोर और लाचार बाप हूँ। और कुछ नहीं।’’

डॉक्टर - ‘‘आपको अपनी जिद ने ही तोड़ दिया है। दोष दें तो किसे दें ?’’

जज - ‘‘हाँ, आप ठीक कहते हो डॉक्टर। मैं तो किसी को दोष भी नहीं दे सकता।’’ (शर्मा जी निढाल से कुर्सी में घंस गये।)

डॉक्टर - (खामोश हो जाते हैं) (अपने आप में बड़बड़ाते हैं।) समझ नहीं आ रहा है कि शर्मा जी को समझाऊँ या ताना दूँ इनकी जिद ने इन्हें तोड़ दिया है।

(स्पष्ट) शाम हो चुकी है। चारों ओर अंधेरा छा गया है। अच्छा अब मैं जाता हूँ।

पर्दा गिरता है।

दृश्य समाप्त

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कचहरी में वकील मणिराम का ऑफिस। शुभांगी पास में बैठी है।,

मणिराम - ‘‘शुभांगी बेटी ! यह तुम्हारी जिंदगी का सबसे बड़ा केस है। केस जरा पेचीदा है। लेकिन मैं चाहता हूँ कि इस केस को तुम लड़ो और जीतो। बस इतना याद रखो कि कोई भी लड़ाई लड़ो, उसे अपनी समझकर लड़ो। बस ध्यान रखो कि कोई निर्दोष व्यक्ति फाँसी पर न चढ़ जाये और दुष्ट व्यक्ति आजाद न घूमे।’’

शुभांगी - ‘‘इस केस का थोड़ा विषय बता दो अंकल ! मैं तो अभी बिल्कुल अनाड़ी खिलाड़ी हूँ।’’

मणिराम - ‘‘यह केस एक औरत अपने पति के खिलाफ लड़ रही है। वह अपने होने वाले बच्चे के प्राणों की रक्षा का वचन और खर्चा माँग रही है।’’

शुभांगी - ‘‘वो कैसे अंकल ! जो दुनिया में आया ही नहीं, उसके प्राणों का संकट कैसे सता रहा है उसे ?

मणिराम - ‘‘बेटे स्त्री के पास पहले से एक बेटी है। दूसरी बेटी को उसके पति ज्वालाप्रसाद ने अल्ट्रासाउण्ड कराकर गर्भ में ही समाप्त करवा दिया था। तीसरी बार भी बेटी की सूचना पर पति पत्नि से तलाक लेने का दबाव बना रहा है। स्त्री अपने गर्भस्य शिशु की जान की सुरक्षा तथा अपने और अपनी दोनों बेटी के भरण पोषण के लिए खर्चा चाहती है।

शुभांगी - ‘‘बड़ा इन्ट्रेस्टिंग केस है। लेकिन औरत की माँग सही है।’’

मणिराम - ‘‘बेटा ! इस प्रकार का केस कोर्ट में पहली बार लड़ा जाएगा। अब देखते हैं कि तुम्हारा टेलेन्ट इसे क्या रूप देता है।’’ गहन स्टडी करके आना।

शुभांगी - ‘‘इसे जीतने में मैं अपना तन मन लगा दूँगी।’’

मणिराम - ‘‘बेठा ध्यान रखना प्रतिपक्ष बहुत पैसे व शोहरत वाला है। वह बड़े से बड़े सबूत खरीद सकता है मुँह माँगी रकम पर वकील खड़ा कर सकता है। वह जीतने के लिए कुछ भी हथकंडे अपना सकता है।’’

शुभांगी - आप चिंता न करें अंकल। उसके पास पैसा है हमारे पास हिम्मत, हौंसला और सच्चाई है।’’

दृश्य समाप्त

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जज साहब का घर। जज साहब गुस्से से तुषार को बुलाते हैं।,

जज साहब - ‘‘तुषार ! तुम्हारे कालिज से लैटर आया है। तुम कॉलिज में पढ़ने नहीं जाते, गुण्डागर्दी करने जाते हो।’’

तुषार - ‘‘मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता।’’

जज - ‘‘तडाक ! से एक थप्पड़ जड़ देते हैं।’’ बड़ों से तमीज करने करने की अक्ल नहीं। क्या यही संस्कार दिये हमने ?’’

तुषार - ‘‘पापा सभ्यता, संस्कार में पड़कर ही हमारा घर बर्बाद हो गया। दीदी घर से चली गई, मम्मी बीमार रहने लगी क्या मिला संस्कारों से।’’ (तुषार की आवाज में गर्मी थी।)

जज - ‘‘मैंने कभी जीवन में मर्यादा नहीं तोड़ी।’’

तुषार - ‘‘लेकिन अपना घर तोड़ दिया।’’

जज - ‘‘अब तुम कॉलिज नहीं जाओगे। कोई बिजनेस कर लो, मैं पैसा लगाने के लिए तैयार हूँ।’’

तुषार - ‘‘चलो अच्छा हुआ।’’ तुषार बड़बड़ाते हुए मेज में लात मारकर घर से बाहर निकल जाता है।

दृश्य समाप्त

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वकील मणिराम का ऑफिस।,

वकील - ‘‘वाह शुभांगी ! बेटी तुमने तो कमाल कर दिया। तुमने मुकदमा पूरे आत्म-विश्वास से लड़ा।’’

शुभांगी - ‘‘आखिर शिष्या किसकी हूँ ?’’ अंकल !

वकील - ‘‘ना बेटी ! व्यक्ति की सफलता में उसकी अपनी लगन, मेहनत और आत्मविश्वास ही काम आता है।’’

शुभांगी - ‘‘अच्छा, अब मैं चलूँ अंकल।’’

वकील - ‘‘ओ० के० बेटा।’’

शुभांगी - ‘‘नमस्ते अंकल।’’

दृश्य समाप्त

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शुभांगी अपनी पहली जीत का समाचार को लेकर सबसे पहले इंस्पैक्टर के घर पहुँचती है। शाम का समय है और घर में सभी मौजूद हैं।,

शुभांगी - ‘‘हैलो अंकल ! नमस्ते, अंकल। आज आपकी बेटी अपना पहला मुकदमा जीत गई। ये सब आपके आशीर्वार्द से हुआ। आगे भी आपका आशीर्वाद चाहिए।’’

इंस्पैक्टर - ‘‘बड़ों का आशीर्वाद तो हमेशा ही बच्चों के साथ रहता है।’’

कविता - ‘‘आज तो स्वयं बहार का मौसम घर चलकर आ गया।’’

शुभांगी - ‘‘क्यों भई ! आना तो मुझे स्वयं ही पड़ता।’’ (हँस पड़ती है)

सागर - ‘‘क्यों ? हुक्म कर देती बंदा हाजिर हो जाता।’’ (सागर थोड़ा सा झुककर, मुस्कराकर कहता है)

मिसेज कपूर - ‘‘असली खुशी तो तब होती जब यह गुलाब हमेशा के लिए इस गुलदस्ते में सज जाए।’’

शुभांगी - ‘‘अब इसका भी समय आ गया आंटी। बस थोड़ी सी इंतजार और।’’

मिसेज कपूर - ‘‘तू सच कह रही है शुभांगी। फिर तो डबल मिठाई खाने का दिन है।’’

शुभांगी - ‘‘आपकी आज्ञा टालने की जुर्रत कैसे कर सकती हूँ। बस एक बार अपने पिता के सामने वकील बनकर पेश हो जाऊँ।’’ इसलिए प्रैक्टिस मेरठ में करूँगी।

सममेत स्वर में- ‘‘हम सबकी दुआएँ तुम्हारे साथ में।’’

शुभांगी - ‘‘अच्छा नमस्ते आंटी।’’

मिसेज कपूर - (शैतानी भरे अंदाज में कहती हैं) अब आंटी नहीं मम्मी कहे।

(कपूर साहब की ओर देखकर) ‘‘मैं चाहती हूँ कि मेरठ जाने से पहले सगाई कर रस्म हो जाए।’’ पता नहीं कब हवा का रुख बदल जाये।

मि० कपूर - ‘‘तो ठीक है कल सागर का जन्मदिन है। उसी में सगाई भी हो जायेगी।’’

सुनकर शुभांगी मुस्कराकर सिर झुका लेती है।

सममेत स्वर में- तो अभी से जन्मदिन और सगाई की तैयारी शुरू करते हैं।’’

दृश्य समाप्त

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जज साहब - (बेचैनी से सिगार पीते हुए अपने कमरे में इधर-उधर चक्कर लगा रहे हैं और बड़बड़ा रहे हैं) शुभांगी इस शहर में आ गई है और वकालत में जम गई है अब उसकी माँ को क्या उत्तर दूँगा। जिसके सामने मैंने उसे मृत घोषित कर दिया। अमिता की वैसे ही दिमागी हालत ठीक नहीं है। तुषार का आचरण भी बिगड़ गया है।’’ इस बारे में शुभांगी से बात की जाए।

जज की आत्मा-‘‘तुम कौन-सा मुँह लेकर जाओगे शुभांगी के सामने, यदि अमिता को पता लग गया तो जीते जी मर जाएगी। तुषार भी तुझे कभी माफ नहीं करेगा।

मन-‘‘तू चिन्ता मत कर, शुभांगी के पास जा और यहाँ से हमेशा हमेशा के लिए जाने के लिए राजी कर।’’ बेटी होने का वास्ता देकर उसे मना ले। नहीं तो जो बचा है वह भी बिखर जायेगा।

आत्मा - तूने बाप होने का अर्थ तो समझा नहीं और अब बाप का अधिकार कैसे थोपेंगे उस पर। बेटियाँ बलि चढ़ाने के लिए होती है क्या ? गर्मी की धूप में बच्चे झुलस न जाएँ बाप छाता बनकर तन जाते हैं तुमने तो उसके अस्तित्व को तार-तार होने के लिए सड़क पर छोड़ दिया। अब किस मुँह से उसके पास जाओगे।

मन - उसकी भी माँ है वो, उसी के प्राणों की रक्षा के लिए बेटी के पास जाऊँगा।

तभी मंच पर दीनू प्रवेश करता है।

जज - ‘‘दीनू ! भूख लगी है, जल्दी खाना लाओ।’’

दीनू - ‘‘लाया साहब ! आप हाथ मुँह धोकर फ्रेश हो जाइए मैं खाना लगाता हूँ।’’

जज - ‘‘दीनू ! आज बड़ा स्पेशल खाना बनाया है, आज कोई त्यौहार है ?’’

दीनू - ‘‘नहीं साहब ! मालकिन हर बार शुभांगी बिटिया का श्राद्ध मनाती है।’’ आज बिटिया का श्राद्ध है। इसीलिए खीर, पूड़ी, हलुवा और मिठाइयाँ बनवाई हैं।

(जज साहब बिना खाना खाए ही टेबिल से उठ जाते हैं)

दीनू - ‘‘क्या हुआ साहब ? हमसे कोई गलती हो गई क्या ?’’

जज - ‘‘नहीं, मुझे याद आ गया मेरा व्रत है।’’ (कहकर कमरे से बाहर चले जाते हैं और अमिता के कमरे में जाते हैं। ‘‘मि० शर्मा अमिता के पास बैठते हैं और पूछते हैं।) ‘‘टकटकी लगाए क्या देख रही हो अमिता ?’’

अमिता - ‘‘तुम्हें याद है आज क्या दिन है ?’’ (रोशनी अमिता के चेहरे पर)

जज - ‘‘पन्द्रह सैप्टेम्बर।’’

अमिता - ‘‘आज के दिन तुमने शुभांगी के बारे में मनहूस खबर सुनाई थी।’’

जज - ‘‘तुम्हें कितनी बार कहा है अमिता। अपने मन को शांत रखो। पढ़ी-लिखी हो समझदार हो।’’

अमिता - ‘‘हाँ पढ़ना-लिखना भी मेरे लिए अभिशाप बन गया है बार-बार समझदार होने का ताना दिया जाता है।’’ जोर से बोलती है। (साँस फूल जाती है)

जज - ‘‘सॉरी सॉरी ! अब चुप हो जाओ।’’ तुम्हारी तबियत पहले से ही खराब है और खराब हो जायेगी।

अमिता - ‘‘मुझे तो भगवान मौत भी नहीं देता, पता नहीं किन कर्मों की सजा भुगत रही हूँ।’’

दृश्य समाप्त

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दृश्य शुभांगी के फ्लैट पर खुलता है। सुबह सुबह ही जज साहब शुभांगी के घर आते हैं। शुभांगी स्वागत करती है।,

शुभांगी - आप ठंडा लेंगे या गर्म ?

जज - कुछ नहीं, बस बैठकर दो बातें कर लो।

शुभांगी - ‘‘मेरे घर का और मेरे हाथ का खाने में ऐतराज है जज साहब ! क्योंकि मैं आपके दर्जे की नहीं।’’

जज - ‘‘पिछली कड़वाहट भूली नहीं हो बेटी ? लेकिन मैं मजबूर था।’’

शुभांगी - ‘‘कैसी कड़वाहट, जज साहब !् आपने तो मुझे मकसद दिया है। मेरी मंजिल निश्चित की है, मेरे इरादों में इतनी दृढ़ता दी है। छोड़िये इन बातों को। आप क्या कहना चाह रहे हैं मुझसे, वो बताइये ?’’

जज - ‘‘तुम मुझे पापा नहीं कह सकती एक बार ?’’

शुभांगी - (सिर झुका लेती है) ‘‘दुर्भाग्य से मेरे पापा नहीं हैं, वो पाँच साल पहले मुझे छोड़ कर चले गए थे।’’

जज - ‘‘क्या तुम मुझे माफ नहीं करोगी ?’’

शुभांगी - ‘‘नहीं, कभी नहीं। आप क्या बात करने आए थे, प्लीज वो बताइए।’’

जज - तुम्हारी माँ बहुत बीमार है। मैं उसकी जिंदगी माँगने आया हूँ।’’

शुभांगी - ‘‘मैं....मैं क्या कर सकती हूँ ? बताइए।’’

जज - ‘‘मैं चाहता तो नहीं, ........... लेकिन मजबूर हूँ। तुम ..... तुम ..... तुम ये शहर छोड़कर चली जाओ। मेरी शुभकामनाएँ हमेशा तुम्हारे साथ होंगी। क्योंकि तुम्हारी माँ को यदि पता चल गया तो वो फौरन मर जायेगी।’’

शुभांगी - ‘‘क्यों ? क्या वो भी आपके आदर्शों पर चलने लगी है। जो मेरा नाम सुनकर या मुझे देखकर मर जाएँगी।’’

(जज साहब कुछ कहना चाह रहे हैं लेकिन जबान साथ नहीं दे रही। वे कभी पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने का असफल प्रयास करते हैं, कभी छत की ओर देखते हैं। रोशनी उन्हीें पर फोकस रहती है।)

शुभांगी - ‘‘बताइये जज साहब ! क्या बात है। वैसे भी इतनी तुच्छ लड़की के सामने बोलने में संकोच कैसा ?’’

जज - ‘‘नहीं, मैंने अमिता के सामने तुम्हें मृत बताया था तभी से वो पलंग पर पड़ी है। उसे पता चलेगा जो बर्दाश्त नहीं कर पायेगी।’’

शुभांगी - ओह ये बात है (ठंडी आह भरती है) ‘‘आपको पता है मम्मी की तबियत सुनकर मैं पसीज जाऊँगी फिर भी बताइए मुझे क्या करना होगा ?’’

जज - तुम्हें यह शहर छोड़कर जाना होगा।’’

शुभांगी - ‘‘आ गये न अपनी असलियत पर। जज साहब। मैंने अपना सर्वस्व लगा दिया हैं मंजिल पाने में। यदि भगवान भी आकर कहे तो भी मैं उनकी आज्ञा का उल्लंघन करूंगी।’’

जज - बेटी ! समझने की कोशिश करो। मैं बहुत मजबूर हूँ।’’

शुभांगी - ‘‘मुझे कुछ समझने की जरूरत नहीं। मुझे अपनी मर्यादा लांघने के लिए बाध्य न करें।’’ (कहकर शुभांगी कमरे से बाहर चली गई)

दृश्य समाप्त

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शुभांगी मंच पर बेचैनी से इधर-उधर चक्कर लगा रही है और अपने आप में बड़बड़ा रही है। बाहर बहुत तेज वर्षा हो रही है। अंधेरी रात में बादल घुमड़-घुमड़ कर बरस रहे हैं। सड़क बिल्कुल सुनसान है। नेपथ्य के पीछे से केवल कुत्तों के भौंकने का स्वर सुनाई देता है। तभी खटखटाने का स्वर आता है। वर्षा व तेज हवा के कारण बिजली भी अपना साथ छोड़ गई है। मंच पर बहुत हल्की रोशनी है। बाहर झाँककर देखती है एक लड़की खड़ी है। शुभांगी डरते-डरते दरवाजा खोलने का अभिनय करती है।,

शुभांगी - (कड़ककर) ‘‘कौन हो तुम ?’’

आगत - ‘‘मैं एक दुखियारी लड़की हूँ। आपकी शरण में आयी हूँ।’’

शुभांगी - ‘‘ये नारी निकेतन या महिला आश्रम नहीं है। तुम गलत जगह आ गई हो।’’

आगत - ‘‘मेरी बात सुनिए प्लीज। अगर आपने मेरी बात नहीं सुनी तो मैं आत्महत्या कर लूँगी।’’

शुभांगी - ‘‘मैं एक वकील हूँ। आपकी क्या मदद कर सकती हूँ ?’’

आगत - ‘‘केवल आप ही मेरे लिए कुछ कर सकती हैं।’’

शुभांगी - (दरवाजा खोलती है। सामने एक सिर से पैर तक भीगी हुई लड़की सामने खड़ी है।) अरे तुम तो पूरी भीग गई हो। इस खराब मौसम में यहाँ क्या कर रही हो।

शुभांगी - ‘‘अच्छा चलो पहले अंदर चलो और अपने कपड़े बदल डालो।’’

आगत - ‘‘नहीं, मेम साहब! ऐसे ही सूख जाऐगे।’’

शुभांगी - जिद मत करो, बीमार पड़ जाओगी। पहले कपडे बदलो। अपने बाल सुखा लो। (अपने कपड़े और तौलिया देती है) आग्रह करने पर लड़की कपड़े बदल लेती है।

शुभांगी - ‘‘अच्छा, सबसे पहले अपना नाम बताओ।’’

आगत - ‘‘सुगंधा।’’

शुभांगी - ‘‘बड़ा प्यारा नाम है। अच्छा अब अपने बारे में बताओ।’’

सुगंधा - दीदी मैं एक अच्छे घर की लड़की हुआ करती थी। पापा की असामयिक मृत्यु व व्यापार ठप्प होने के कारण बीमार माँ का इलाज व छोटे भाई-बहन की पढ़ाई लिखाई की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर आ गई। तभी मैंने अखबार में एड देखा कि एक बीमार महिला के लिए ट्रेंड या अन्ट्रेंड नर्स की आवश्यकता है। मैं वहाँ गई और मैंने सर्विस के लिए हाँ कर दी। लेकिन मेरी मजबूरी का फायदा उठाकर उनके लड़के तुषार ने मेरे साथ बलात्कार किया। मैं अब आपकी शरण में आई हूँ।

शुभांगी - किसके यहाँ तुमने सर्विस की सुगंधा ?

सुगंधा - इस शहर के प्रसिद्ध जज बी० पी० शर्मा जी के यहाँ।

(अपने पापा का नाम सुनकर शुभांगी के होश उड़ जाते हैं)

शुभांगी - पहले हादसे को विस्तार से बताओ।

सुगंधा - ठीक है दीदी ! मैं विस्तार से बताती हूँ। (बताना प्रारम्भ करती है)

मैं जब जज साहब के बंगले पर उनकी पत्नी की सेवा के लिए नियुक्त हुई। मैं रोजाना सुबह आठ बजे बंगले पर पहुँच जाती थी। बोलते-बोलते मंच के अग्रभाग में आ जाती है तभी पीछे मंच पर पर्दा खुलता है।

दृश्य समाप्त

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दृश्य जज साहब के बंगले का। सुगंधा को थोड़ी देर हो जाती है। तुषार उसे डांटता है। सॉरी कहकर सुगंधा जल्दी-जल्दी मम्मी की सेवा-सुश्रूषा में लग जाती है। गर्म पानी से स्पंज करती है। बिस्तर की चादर बदलती है। सहारा देकर व्हील चेयर पर बैठा देती है माली काका से ताजे फूल लाकर गुलदस्ते में सजाती है। इस व्यवहार से अमिता बड़ी प्रसन्न होती है। सारा काम निबटा कर सुगंधा तुषार के पास दवाई पूछने के लिए जाती है। तुषार दवाई समझाते समय उसके कंधे पर हाथ रखता है। जैसे ही वह तुषार की ओर देखती है वह सहम जाती है।,

सुगंधा - (स्वगत) मन तो करता है नौकरी छोड़ दूँ। लेकिन आवश्यकता प्रबल होने के कारण मजबूर हो, दूसरी नौकरी मिलते ही मैं यहाँ से काम छोड़ दूँगी। पर ड्यूटी भी तो इतने लम्बे समय की है नौकरी तलाश करने का समय ही नहीं मिलता।

(सिर झटककर) जहाँ मन में शंका हो वहाँ काम नहीं करना चाहिए। हादसे सेकण्ड में हो जाते हैं। कभी-कभी उनकी भरपाई महीनों में, वर्षों में होती है। कभी-कभी तो होती हीं नहीं है। (तभी अमिता पुकारती है।)

अमिता - बेटी ! तुमने तो जादू कर दिया। मेरी तबियत में काफी सुधार है। ‘‘अच्छा बेटी ! किसी बात की चिंता मत करना। किसी चीज की जरूरत पड़े तो हिचकिचाना नहीं।’’ तुमने तो मेरे जीवन को ही बदल दिया है। मन करता है तुम्हें अपने पास से पल भर के लिए भी जाने न दूँ। तुम तो मेरी बेटी जैसी हो।

सुगंधा - ‘‘अच्छा आंटी जी। अब आप आराम कीजिए।

अधिक बोलने के लिए डॉक्टर ने मना किया है।’’ ये सब ईश्वर की कृपा है। आप धीरे-धीरे ठीक हो रही हैं।

अमिता - ‘‘ये डॉक्टर तो अच्छे आदमी को भी मरीज बना देते हैं मुझे केवल अपनी बेटी का गम है। बेरहम काल ने उसे मौत के बिना ही मार डाला। (कहते-कहते आँखों से आँसू छलक आए)

सुगंधा - ‘‘आई एम सॉरी आंटी जी।’’

अमिता - ‘‘माफी किस बात की बेटी। ये तो मेरे दिल का नासूर बन गया है।’’

सुगंधा - ‘‘अच्छा, आंटी जी अब चलूँ।’’

(तभी मंच पर तुषार प्रवेश करता है)

तुषार - ‘‘हैलो मिस सुगंधा। हम ऑफिस से आए और आप चल दिए।’’

सुगंधा - ‘‘सर ! मेरा समय हो गया है।’’

तुषार - ‘‘चलो छोड़ दूँ रात के आठ बजे हैं।’’

सुगंधा - ‘‘ये तो मेरा रोज का समय है सर।’’

तुषार - ‘‘तो क्या हुआ ? रोज छोड़ दिया करूंगा।’’

सुगंधा - ‘‘नहीं सर ! धन्यवाद।’’

तुषार - ‘‘तुम लड़कियों में एक कमी है तुम सोचती ज्यादा हो। यदि बाइक पर बैठने से एतराज है तो कार निकाल लेता हूँ।’’ (बाइक की चाबी उँगली में घुमाता है।)

सुगंधा - ‘‘नहीं सर ! मैं एक साधारण घर की लड़की हूँ। कोई मुझे कार में बैठे देखेगा तो सोचेगा ‘‘ये लड़की कहाँ पोस्टेड है जो कार इसे छोड़ने आती है।’’

तुषार - ‘‘अरे समाज से डरोगी तो जिंदगी में क्या करोगी ?’’ जिन्दगी जीनी मुश्किल हो जायेगी।

(हाथ पकड़ लेता है)

सुगंधा - ‘‘मेरा हाथ छोड़ दीजिए सर।’’

(वह हाथ छुड़ाकर भाग लेती है। तुषार उसे देखता रहता है)

देखता-देखता मंच से चला जाता है।

ख्मंच पर सुगंधा की माँ प्रवेश करती है,

माँ - ‘‘इतनी देर कैसे लगा दी मैं देखने के लिए जाने वाली थी।’’

सुगंधा - ‘‘मम्मी ! अचानक कोई पार्टी आ गई और तुरंत कागज तैयार करने पड़े।’’

माँ - ‘‘हाँ बेटी! फूटी किस्मत कि बेटी की कमाई पर जीना पड़ रहा है।’’

सुगंधा - ऐसा मत कहो मम्मी।

माँ - अच्छा बेटा खाना खा लो।

सुगंधा - हाँ मम्मी! मुझे सुबह आफिस जल्दी जाना है।

माँ - हाँ तो समय पर सो जाना।

दृश्य समाप्त

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सुगन्धा बंगले पर जाने के लिए तैयार हो रही है (स्वगत) मन तो नहीं करता जाने का। चलो नेट पर कोई काम ढूँढ़ती हूँ। नई नौकरी मिलते ही यहाँ से नौकरी छोड़ दूँगी। वैसे मांजी तो बहुत अच्छी हैं बस थोड़ा सा तुषार से डर लगता है। तभी पर्दा खुलता है। दृश्य जज साहब के बंगले का।,

अमिता - (सुगन्धा को देखते ही) ‘‘आओ बेटी। आज बड़ी देर कर दी। बहुत देर से तुम्हारा इंतजार कर रही थी। तुम्हें देखती हूँ तो मुझे अपनी बेटी की याद आती है। उसके बिना तो जिंदगी अधूरी है।

सुगंधा - ‘‘अधूरापन तो प्रत्येक प्राणी की किस्मत बन गई है। अब हमारे पापा नहीं रहे तो क्या हम सब मर जाएँ। हमने हिम्मत धैर्य और परिश्रम को अपना पापा मान लिया है।’’ आप भी किसी ओर जगह अपनी खुशियाँ ढूँढ़ने की कोशिश कीजिए। भगवान को हम माता-पिता कहते हैं तो उसका हर बंदा हमारा अपना हुआ ना। ईश्वर के फैसले को तो मंजूर करना ही पड़ता है, मांजी। और कोई विकल्प भी तो नहीं।

अमिता - ‘‘तुम ठीक कहती हो बेटी। इतनी बात को तो मुझे किसी ने समझाया ही नहीं। मैं ठीक होते ही अनाथ बच्चों को गले से लगा लूँगी।

सुंगंधा - ‘‘आप ठीक हो गई आंटी जी। आपका मन निरोगी हो गया तो तन को निरोगी होने में देर नहीं लगेगी।’’ सब कुछ मन पर ही निर्भर करता है।

(कहकर कुछ लाने के लिए रसोई में जाती है।)

दृश्य समाप्त

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तभी तुषार मंच पर आता है और अमिता के पास बैठता है। सुगंधा आती है,

तुषार - हैलो सुगंधा ! मुझे देखकर यहाँ हैरान हो गई हो। तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठा का हम तुम्हें इनाम देना चाहते हैं। वैसे तो ये तोहफा पापा अपने हाथों से देना चाहते थे लेकिन वे किसी काम से बाहर चले गए।’’ लेकिन मैं प्रतीक्षा नहीं कर सकता। (हाथ में एक छोटा सा पैकेट देता है)

सुगंधा - ‘‘क्या है यह ?’’

तुषार - ‘‘खोलकर देख लो।’’

सुगंधा - (खोलकर देखती है) ‘‘यह तो बड़ी कीमती घड़ी है।’’

तुषार - ‘‘तुमसे कीमती नहीं। चलो अब मेरे साथ।’’

सुगंधा - ‘‘कहाँ ?’’

तुषार - ‘‘रेस्टोरेन्ट। भई मम्मी की सेहत का सवाल है।’’

अमिता - ‘‘जाओ बेटा ! घूम आओ, तुषार बड़ी तम्मना से कह रहा है।’’

सुगंधा - ‘‘नहीं आंटी जी। आपको दवाइयाँ समय पर मिलनी जरूरी है। मेरे बाद आपका कौन ध्यान रखेगा।’’

अमिता - ‘‘कोई बात नहीं बेटा, जाओ घूम आओ। एक-डेढ़ घण्टे के लिए ही तो जाओगे मैं सब मैनेज कर लूँगी।’’

सुगंधा - ‘‘अच्छा माँ जी।’’ आप कहती हैं तो चली जाती हूँ।

(वह गाड़ी में बैठ तो जाती है लेकिन मन से कहीं ओर उलझी हुई है तभी एक रेस्टोरेन्ट में दोनों खाना खाते हैं। मॉल में शॉपिंग करते हैं)

तुषार - (उसके कंधे पर हाथ रखते हुए) मैं तुमसे बहुत दिनों से एक बात कहना चाहता हूँ।

सुगंधा - ‘‘कहिए सर।’’

तुषार - ‘‘आई लव लव यू।’’

सुगंधा - ‘‘देखिए सर ! मैं आपकी बहुत इज्जत करती हूँ। हमारी इज्जत बड़ी कमजोर और नाजुक होती है जिसकी हम बड़े यत्न से रक्षा करते हैं। हम गरीब लोगों का सबसे बड़ा गहना इज्जत होती है।’’ आई डोन्ट यू।

तुषार - ‘‘तुम अपने दिमाग में जबरदस्ती अमीर-गरीब का भेदभाव रखती हो।’’

सुगंधा - ‘‘हकीकत को झुठलाया नहीं जा सकता।’’

तुषार - ‘‘प्यार मेरी हकीकत है। मैं अपनी जिद को पूरा करता हूँ। इसके लिए मुझे कोई भी मार्ग क्यों न अपनाना पड़े ?’’

सुगंधा - ‘‘तुम्हारे दिल की हसरत दिल में रहेगी। बाय मैं घर जा रही हूँ।’’

तुषार - ‘‘चलो सारा मूड ऑफ हो गया। गाड़ी में बैठो।’’

सुगंधा - ‘‘मैं अकेली चली जाऊँगी।’’

तुषार - ‘‘साथ आयी हो साथ ले जाऊँगा।’’

तुषार की आँखों में खून उतर आया था। इस रूप को देखकर सुगंधा का दिल अनजान आशंका से भयभीत हो उठा है।

तुषार - (हाथ पकड़कर खींचते हुए) बैठती हो या जबरदस्ती करूँ ?’’

कहना ना मानने पर तुषार हाथ पकड़कर जबरदस्ती कार में बैठाता है। तुषार पत्थर की मूर्ति के समान चुपचाप कार चला रहा है। उसका चेहरा तमतमा रहा है। कार एक झटके से एक कोठी के बाहर रुकती है।

तुषार - ‘बाहर निकलो’ (चिल्लाता है)

सुगंधा - ‘‘कहाँ ले आये मुझे ?’’

तुषार - ‘‘जहन्नुम में।’’

सुगंधा - ‘‘तुम मुझसे चाहते क्या हो ?’’

तुषार - ‘‘आवाज नीची करो। इतनी तेज आवाज सुनने की मुझे आदत नहीं।’’

सुंगधा - ‘‘मुझे भी तुम जैसों की आज्ञा मानने की आदत नहीं।’’

तुषार - ‘‘तुम यहाँ से नहीं जा सकती। हम यहाँ घर से दस किलोमीटर दूर हैं। यहाँ मेरे खिलाफ कोई नहीं बोलेगा। इसलिए चुपचप चली आओ। कोई नाटक मत करना।करोगी तो कोई तुम पर विश्वास नहीं करेगा। क्योंकि कोई भी लड़की सज-धज कर अकेले लड़के के साथ बिना मर्जी के नहीं आ सकती। चुपचाप चली आओ।’’ (न जाने क्या सोचकर सुगंधा आज्ञाकारी शिष्या की भांति उसके पीछे-पीछे हो ली।)

तुषार - ‘‘यह आलीशान मकान पापा ने पर्सनल मेरे लिए बनाया है। सोच रहा था इस कमरे का मुहूर्त सुहागरात से करूँगा।’’

सुगंधा - ‘‘मैं तुम जैसे सिरफिरों की बातों को पानी नहीं देती। कहकर सुगंधा भाग लेती है।’’

(सुगंधा चिल्लाती रही लेकिन तुषार पर न जाने क्या भूत सवार हो गया था। कुछ देर बाद)

तुषार - ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ। उठो हाथ-मुँह धो लो।’’

(सुगन्धा शून्य में ताक रही थी।)

‘‘चलो सुगन्धा घर चलो।’’

सुगंधा - ‘‘घर, कौन सा घर ? तुमने मुझे घर जाने के लायक छोड़ा कहाँ ?’’

तुषार - ‘‘हम शहर से दूर, घर से दूर हैं। किसी को कुछ पता नहीं चलेगा।’’

सुगंधा - ‘‘पता न चलना और पता चलने की चिन्ता तुम करते हो। तुम्हारी निगाहों में केवल वो ही पाप है जो दुनिया की निगाह में हो।’’

तुषार - ‘‘मैं फिलोस्फर नहीं।’’

सुगंधा - ‘‘तुम जानवर हो।’’

तुषार - ‘‘मैं तुम्हें प्यार करता हू जानवर तुमने बनाया है।’’

सुगंधा - ‘‘प्यार जैसा पवित्र शब्द तुम्हारे मुँह से अच्छा नहीं लगता।’’ प्यार करने वाले नारी की इज्जत करते हैं। तुम यहाँ से चले जाओ। (चिल्लाकर कहती है तुषार चुपचाप गाड़ी लेकर चला जाता है।)

ख्सुगंधा मंच पर निरर्थक घूमती है। सुगंधा अनजान डगर पर बढ़ती है तभी विचार उसके मस्तिष्क में उथल-पुथल मचा देते हैं (स्वगत) माँ, बहन, भाई का क्या होगा ? हिम्मत है तो बदला लेकर दिखा।,

सुगंधा का मन- ‘‘सुगन्धा ! तू उससे बदला कैसे लेगी ? चींटी हाथी से बदला लेने का इरादा कर रही है।’’

आत्मा - ‘‘सुगंधा ! कभी-कभी चींटी हाथी की मृत्यु का कारण बन जाती है।’’

मन - ‘‘पैसे की ताकत बहुत बड़ी होती है। पैसे के बिना आदमी मरे के समान होता है।’’

आत्मा - ‘‘सुंगधा आज उसने तेरे साथ गलत करने की हिम्मत की है कल किसी और के साथ अवश्य करेगा। तू कुछ और नहीं कर सकी तो उसका चेहरा बेनकाब तो कर ही देगी।’’

मन - ‘‘लेकिन यह सोच । यह काम आग से खेलना है। वो बदनाम होगा तो तू भी बदनाम होगी।’’

(यह सोचकर सुगंधा फूट-फूटकर रो पड़ती है और बड़बड़ाती है) माँ भी मेरी ही गलती बताएगी क्योंकि उन्हें गवर्नेस की सर्विस नहीं क्लर्क की सर्विस बताई थी।

(तभी मंच पर शुभांगी प्रकट होती है।)

काफी देर सोचने के बाद मैं नारी उत्थान संस्था में गई उन्होंने (आपका) शुभांगी नाम सुझाया। ‘‘प्लीज मेरी सहायता कीजिए। मैं बहुत गरीब लड़की हूँ।’’ कहते-कहते सुगंधा रोने लगती है और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाती है।

शुभांगी - ‘‘चुप हो जाओ। यह बलात्कार तुम्हारे साथ, नहीं, मेरी भावनाओं के साथ हुआ है।’’ मैं तुम्हारा केस लड़ूंगी बिना फीस लिए।

सुगंधा - ‘‘थैंक यू दीदी। (कहकर शुभांगी के दोनों हाथ अपने माथे से लगाती है और चूम लेती है) अच्छा दीदी चलूँ।’’

शुभांगी - ‘‘इस तूफानी रात में कहाँ जाओगी ?’’

सुगंधा - ‘‘लेकिन मम्मी बहुत परेशान होगी। इसलिए जाना तो जरूरी है।’’

शुभांगी - ‘‘चलो मैं अपनी गाड़ी से छोड़ आती हूँ।’’

सुगंधा - नहीं दीदी मैं चली जाऊँगी । (कहकर सुगंधा मंच से चली जाती है।)

(शुभांगी पास रखी कुर्सी पर बेजान लाश की भाँति निढाल बैठ जाती है और भावनाओं के भँवर में झूल जाती है।)

मन - ‘‘नहीं, मैं नहीं लड़ सकती अपने भाई के विरुद्ध।’’

आत्मा - ‘‘वकील का फर्ज याद करो शुभांगी। वो लड़की गरीब है परिवार का एकमात्र सहारा है। तुमने भाई के विरुद्ध नहीं, अपराधी के विरुद्ध लड़ना होगा।’’ (दानों हाथों से सिर पकड़ती है और मन-मन में बड़बड़ाती है) मेरा सिर फटने को तैयार हो रहा है। (तभी ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन घण्टी बज उठती है।) दरवाजा खोला तो सागर सामने खड़ा था।

सागर - (शुभागी को अपनी बांहों में उठाकर खुशी से घूमने लगता है) ‘‘मेरी सर्विस लग गई है। अब तुम्हारे मंगेतर स्टेट बैंक के मैंनेजर बन गए हैं। देखो ये एपाइंटमैंट लैटर।’’ (दिखाता है)

शुभांगी - ‘‘मेरे पास भी एक न्यूज है।’’ (शून्य में ताकते हुए)

सागर - ‘‘जो स्टेनलेस स्टील का खंभा हमारी शादी के बीच खड़ा था वो हट गया क्या ?’’

शुभांगी - ‘‘हाँ हट गया। लेकिन ये पूछो केस किसका मिला है ?’’

सागर - ‘‘मुझे मत घसीटा करो यार इस कोर्ट कचहरी में। इतनी दूर से आया हूँ। कचहरी बचहरी का चक्कर छोड़ो, प्यार की बात करो बस।’’

शुभांगी - ‘‘जज साहब के बेटे ने अपने घर की गवर्नेस के साथ रेप किया है।’’

सागर - ‘‘क्या-क्या ? तुम्हारा मतलब है तुम्हारे भाई ने।’’ (आश्चर्य से आँखें फटी की फटी रह जाती है)

शुभांगी - (मुँह लटकाकर) ‘‘हाँ बदकिस्मती से मेरे भाई ने।’’

सागर - ‘‘तुम लड़ोगी उसके खिलाफ ?’’

शुभांगी - ‘‘हाँ लड़ूंगी।’’

सागर - ‘‘होश में आओ शुभांगी। तुम दोनों का खून एक है।’’

शुभांगी - ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो सागर। मेरा मनोबल मजबूत करने के बजाय तोड़ रहे हो। न्याय तो न्याय है।’’ मैंने इस मुकदमे को लड़ने के लिए अपने आप को बड़ी मुश्किल से तैयार किया है। बहुत लड़ी हूँ स्वयं से भी।

सागर - मैंने कहा न, मुझसे न्याय अन्याय की बात मत करो। तैयार हो जाओ। साथ में मूवी देखते हैं। बाहर डिनर करते हैं और कल सुबह मैं हैदराबाद के लिए निकल जाऊंगा। (शुभांगी प्यार से सागर का हाथ पकड़ती है और दोनों मंच से चले जाते हैं)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

शुभांगी के घर का दृश्य। शुभांगी और सुगंधा बैठी हैं। माहौल से लग रहा है किसी गम्भीर विषय पर चर्चा हो रही है,

शुभांगी - ‘‘सबसे पहले तो पुलिस में रपट लिखानी होगी।’’

सुगंधा - ‘‘इससे तो मेरी बदनामी होगी।’’

शुभांगी - ‘‘बदनामी तो केस लड़ने से भी होगी।’’ न्याय पाना है तो कार्यवाही तो करनी होगी।

(सुगंधा और शुभांगी पुलिस थाने में रपट लिखाने के लिए जाती हैं।)

दृश्य समाप्त

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जज साहब का बंगला। डाइनिंग टेबल पर बैठकर सभी लंच कर रहे होते हैं कि दरवाजे पर दस्तक होती है। दरवाजा खोलने पर इस्पैक्टर अतुल मिश्रा दो कांस्टेबल के साथ खड़े मिलते हैं।,

मि० शर्मा - आइये इंस्पैक्टर साहब। कैसे आना हुआ ?

अतुल मिश्रा - ‘‘नमस्ते सर । किसी सिरफिरी वकील साहिबा ने आपके बेटे तुषार के खिलाफ रपट लिखाई है।’’

मि० शर्मा - ‘‘लेकिन किस जुर्म में ?’’

मिश्रा - ‘‘बलात्कार के आरोप में।’’

शर्मा - ‘‘किसके साथ ?’’

मिश्रा - ‘‘आपके यहाँ रहने वाली गवर्नेस सुंगंधा के साथ।’’ हमने एफ. आई. आर. लिखने को मना भी की थी लेकिन वकील साहिबा अड़ गई। बड़ी धाकड़ वकील हैं साहब।

शर्मा - (तुषार को आश्चर्य मिश्रित क्रोध से घूरते हुए) ‘‘ये मैं क्या सुन रहा हूँ ?’’

तुषार - ‘‘मुझे कुछ नहीं पता। इसमें कोई षडयन्त्र है। किसी की चाल है ।’’

(सुनते ही अमिता मूर्च्छित हो जाती है)

इंस्पैक्टर - ‘‘सॉरी जज साहब। मुझे पता होता तो मैं अलग से बात करता।’’

जज - ‘‘कोई बात नहीं। झूठी तसल्ली देने से अच्छा है हकीकत का पता चल जाए।’’ वैसे भी दुर्गन्ध को कितना भी दबा लो, वो अपना पता स्वयं बता देती है।

इंस्पैक्टर - ‘‘प्लीज सर ! मैं ड्यूटी से मजबूर है। तुषार को मेरे साथ चलना होगा।’’

ख्इंस्पैक्टर, दो कांस्टेबल और तुषार मंच के अग्र भाग में दो चक्कर लगाते हैं। पर्दा खुलता है दृश्य थाने का। शुभांगी तुषार से मिलने आती है। केस के बारे में बात करती है। शुभांगी को सामने देखकर तुषार हक्का-बक्का रह जाता है। और शुभांगी के सामने अपना अपराध कबूल कर लेता है। शुभांगी मंच से चली जाती है। तभी मंच पर जज साहब प्रवेश करते हैं और इंस्पैक्टर को जमानत के कागज दिखाते हैं।,

इस्पैक्टर - (कांस्टेबिल से) तुषार को लाओ। (तुषार बाहर आता है)

इंस्पैक्टर - तुषार ! आप जा सकते हैं। आपके पापा ने आपकी जमानत करा ली है।

तुषार - (आश्चर्य से) ‘‘पापा ! आपने मेरी जमानत कराई।’’

जज - ‘‘क्यों इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? पिता हूँ, अपना फर्ज पूरा किया है।’’

तुषार - ‘‘पापा ! पाँच साल पहले अपना फर्ज निभाना भूल गए थे।’’

जज - ‘‘कौन से फर्ज की बात कर रहे हो ?’’

तुषार - ‘‘याद करिये पापा, आपके फर्ज भूल जाने के कारण मैं अपने बारे में सफाई बिल्कुल नहीं दूँगा। प्रायश्चित के रूप में सजा भुगतूँगा।’’

जज - ‘‘मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। किस फर्ज की बात कर रहे हो ?’’

तुषार - ‘‘बात याद नहीं आ रही है या जानबूझकर याद नहीं कर रहे ?’’

जज - ‘‘साफ-साफ कहो, पहेलियाँ मत बुझाओ।’’

तुषार - ‘‘पता है पापा ! वकील कौन है ?’’

जज - ‘‘कौन ?’’

तुषार - ‘‘शुभांगी दीदी। मेरी बहन, आपकी बेटी शुभांगी। आप आदर्शवादी नहीं, आप तो स्वार्थी निकले। पापा ! अब आप मम्मी को क्या जाब देंगे ? जब उन्हें पता चलेगा। वो तो जीते जी मार जायेंगी।’’

(मि० शर्मा से कोई उत्तर नहीं बन रहा। वो चुपचाप सिर नीचे किये पक्के फर्श को कुरेदने का निरर्थक प्रयास कर रहे हैं।)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

दृश्य अदालत में खुलता है। अदालत खचाखच भरी है। जज साहब के बेटे का केस होने के कारण केस ज्यादा दिलचस्प है।,

जज - ‘‘कार्यवाही शुरू की जाये।’’

शुभांगी - ‘‘सबसे पहले तो मैं अदालत से दर्खास्त करूंगी कि मुकदमा किसी ओर माननीय जज की देख-रेख में सुना जाये क्योकि जज साहब का मि० तुषार से पारिवारिक ही नहीं वरन् खून का रिश्ता है।’’ पर्दा गिरता है पुनः उठता है।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

चार दिन बाद अदालत में एक ओर विटनेस बॉक्स में सुगंधा और दूसरी ओर विटनेस बॉक्स में तुषार खड़ा है। मुकदमा श्री श्यामनारायण पाण्डे जज की अदालत में चलता है। स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट आँखों पर चश्मा, मुखमुद्रा गम्भीर। उम्र कोई पचपन वर्ष।,

शुभांगी - ‘‘हाँ तो गीता पर हाथ रखकर कसम खाइये मैं जो कुछ कहूँगा सच कहूँगा और सच के सिवा कुछ न कहूँगा।’’

तुषार - ‘‘मैं जो कुछ कहूँगा सच कहूँगा सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा।’’ गीता पर हाथ रखकर तुषार ने कसम को दोहराया।

शुभांगी - ‘‘हाँ तो मिस्टर आपका नाम क्या है ?’’

तुषार - ‘‘मेरा नाम तुषार है।’’

शुभांगी - ‘‘यह जो सामने विटनेस बॉक्स में लड़की खड़ी है, क्या आप इसे जानते हैं ?’’

तुषार - ‘‘यस बहुत अच्छी तरह से यह हमारे यहाँ गवर्नेस का काम करती थी।’’

शुभांगी - ‘‘इसका व्यवहार आपके घर में कैसा था ?’’

तुषार - ‘‘अच्छा था मैडम।’’

शुभांगी - ‘‘अच्छे से मतलब।’’

तुषार - ‘‘यही कि जिस काम के लिए रखी गई थी, इसने उसे ईमानदारी व लगन से पूरा किया।’’

शुभांगी - ‘‘किस काम के लिए रखी थी आपने इसे अपने घर में।’’

तुषार - ‘‘मेरी मम्मी यानि कि श्रीमती अमिता शर्मा बहुत बीमार रहने लगी थी। घर में कोई देखभाल के लिए नहीं था इसलिए।’’

शुभांगी - ‘‘अब भी काम करती है या नहीं।’’

तुषार - ‘‘नहीं मैडम अब नहीं करती।’’

शुभांगी - ‘‘क्यों नहीं करती ?’’

तुषार - ‘‘मैडम स्वतन्त्र देश है, हर नागरिक को यह अधिकार है कि वो अपनी इच्छानुसार कहीं भी कभी भी काम करें और कभी भी छोड़ दें।’’

शुभांगी - ‘‘इसने काम अपनी इच्छा से छोड़ा या इसे छोड़ने के लिए मजबूर किया गया।’’

दिनकर - ‘‘आई ऑबजेक्ट मी लार्ड। यह प्रश्न इस केस से कोई सम्बन्ध नहीं रखते। ये अदालत का कीमती वक्त बेकार के प्रश्नों में जाया कर रही हैं।’’

शुभांगी - ‘‘सम्बन्ध रखता है माई लार्ड, सम्बन्ध रखता है।’’ शुभांगी ने अपने बात पर जोर दिया।

जज - ‘‘ओबजेक्शन सस्टेन।’’

शुभांगी - ‘‘थैंक यू सर।’’ हाँ तो मैं पूछ रही थी कि इसने सर्विस स्वयं छोड़ी या छोड़ने के लिए बाध्य किया गया।’’

तुषार - ‘‘स्वेच्छा से सर्विस छोड़ी। इसने बी. ए. का फार्म भरा हुआ था और इनकी माता जी की तबियत खराब रहने लगी थी और मेरी मम्मी की तबियत में काफी सुधार आ गया था। अतः इन्होनं सर्विस करने में समर्थता व्यक्त की और हमने इसकी बात मान ली।’’

शुभांगी - ‘‘यह किस दिन से तुम्हारे घर नहीं आयी।’’

तुषार - ‘‘मैडम सत्रह अगस्त से।’’

शुभांगी - (जज की ओर देखकर) यह पाइंट नोट किया जाये मी लार्ड सोलह अगस्त का ही यह केस है और सत्रह अगस्त से सुगन्धा काम पर नहीं गयी।’’

दिनकर - मेरे काबिल दोस्त वकील साहिबा को इसमें क्या खास बात नजर आ रही है। मेरा क्लाइन्ट स्वयं पहले ही बता चुका है कि सुगंधा ने सर्विस छोड़ दी थी फिर उसके आने का सवाल ही हीं उठता।’’

शुभांगी - ‘‘यदि उसने सर्विस छोड़ दी थी तो उसका रेजिनेशन लैटर दिखाइये। उसने रिजाइन तो अवश्य किया होगा।’’

तुषार - ‘‘वह फाइल में लगा हुआ होगा।’’ मेरे पास नहीं है।

जज - ‘‘आप वह रिजाइन लैटर एक्जीबिट के तौर पर पेश करें।

शुभांगी - ‘‘योर विटनेस प्लीज।

दिनकर - ‘‘मिस सुगन्धा आप कब से मेरे क्लाइन्ट अर्थात् मिस्टर तुषार के यहाँ सर्विस कर रही हैं ?’’

सुगंधा - ‘‘लगभग नौ महीने से।’’

दिनकर - ‘‘तो नौ महीने की अवधि में आपको ऐसा एक दिन भी नहीं लगा कि मि० तुषार चरित्रहीन हैं।’’

सुगंधा - ‘‘कई बार इनकी हरकतों से लगा कि शायद कुछ गलत न कर बैठें।’’

दिनकर - ‘‘फिर आपने इनके यहाँ से सर्विस क्यों नहीं छोड़ दी।’’

सुगंधा - ‘‘क्योंकि मेरे घर के हालात मुझे सर्विस करने के लिए मजबूर कर रहे थे।’’

शुभांगी - ‘‘मी लार्ड। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं लगता कि हरकतें कई बार देखकर भी यह वही सर्विस करती रही और और आज चरित्र की दुहाई लेकर अदालत का दरवाजा खटखटा रही है। यह पॉइन्ट नोट किया जाये। मी लार्ड कि मि० तुषार की हरकतें देखने के बाद भी इसने सर्विस नहीं छोड़ीं। इसका अर्थ है कि मिस सुगंधा अपनी सुन्दरता का चैक भुनाती रही और बाद में जब कैश मिलना बन्द हो गया तो मेरे क्लाइन्ट पर कीचड़ उछालने लगी।

शुभांगी - ‘‘आई ऑब्जेक्शन मी लार्ड।’’ बिना सबूत के मेरे क्लाइन्ट पर चरित्रहीन का आरोप लगा रहे हैं।

जज - ‘‘मिस्टर दिनकर ऐसे शब्दों का मत प्रयोग कीजिए जो सीधे चरित्र पर वार करते हैं।’’ जज ने आदेश दिया।

दिनकर - ‘‘यस मी लार्ड सॉरी, लेकिन एक लड़की खूबसूरत (जैसा कि आप देख रहे हैं) की ओर एक लड़का जाल फेंकता है और लड़की फिर भी वहीं काम करती हैं, मै पूछता हूँ कि उसकी बदतमीजियों को बर्दाश्त करती रहीं, क्यों ? व्हाई ?

सुगन्धा - ‘‘नहीं यह सब झूठ है। जज साहब मेरे पिता नहीं, छोटी बहन की पढ़ाई, बड़े भाई का अभाव, पूरे घर की जिम्मेदारी मुझे सर्विस न छोड़ने के लिए मजबूर कर देती थी।’’

दिनकर - ‘‘लेकिन जब आप सर्विस कर रही थीं यहाँ पर, जो आप कहीं भी सर्विस कर सकती थीं। यहाँ पर आपसे किसी ने बॉण्ड तो नहीं भरवाया था।’’

सुगन्धा - ‘‘आप ठीक कह रहे हैं वकील साहब।’’ लेकिन सर्विस मिलनी इतनी आसान होती है क्या ?

शुभांगी - ‘‘मेरे काबिल दोस्त। मेरे क्लाइन्ट पर इल्जाम पर इल्जाम लगाये जा रहे हैं, शायद वकील साहब को पता नहीं कि गरीबी क्या होती है ? पता भी कैसे होगा, कभी गरीबी ही पाला ही नहीं पड़ा। ये क्या जाने मजबूरी क्या होती है ? उस लड़की के लिए सर्विस करना शौक नहीं मजबूरी था।’’ शुभांगी ने दलील दी।

दिनकर - ‘‘इस बात पर ध्यान दिया जाये मी लार्ड। वकील साहिबा ने अभी तक कोई गवाह या सबूत पेश नहीं किया मेरे क्लाइन्ट के खिलाफ।

शुभांगी - ‘‘हर चतुर आदमी सबूत न छोड़ने की बात करता है लेकिन कहीं न कहीं भूल हो ही जाती है।’’ (गिलास दिखाती है) यह गिलास पर फिंगर प्रिन्ट मिस सुंगंधा के हैं जो इसने मि० तुषार के सिर पर मारने की कोशिश की और ये बात को सिद्ध करता है कि मिस सुगन्धा उस दिन मि० तुषार के साथ थी।’’

दिनकर - ‘‘तो इस फिंगर प्रिन्टर से वकील साहिबा क्या साबित करना चाहती हैं। भई फिंगर प्रिन्ट तो हो सकते हैं जब मुविक्कल वहाँ सर्विस करती थी तो वहाँ की प्रत्येक चीज पर इनके फिंगर प्रिन्ट होंगे।’’

शुभांगी - ‘‘लेकिन ये ‘‘शर्मा सदन’’ में काम करती थी ‘‘तुषार हाउस’’ में नहीं, तुषार हाउस में अभी किसी का निवास नहीं है और वह शर्मा सदन से लगभग 10 मील दूर है। वहाँ के सामान पर सुगंधा के फिंगर प्रिन्ट हैं, मेरी अदालत से दर्खाश्त है कि वो उस कमरे को सील करने का आदेश दे तथा उसका पूर्ण निरीक्षण कराये क्योंकि जिस कमरे में यह शर्मनाक घटना हुई है अवश्य ही वहाँ कोई न कोई ऐसा सुराग होगा जो इस अपराध की चीख-चीख कर गवाही दे रहा होगा।’’

जज - ‘‘उस कमरे व स्थान को सील किया जाये यह आदेश हम पुलिस को देते हैं तथा फिंगर प्रिन्ट के मिलने व कमरे की जाँच होने तक यह केस मुअक्किल किया जाता है।’’

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

जज साहब का बंगला। जब साहब के कमरे में तुषार आता है।

तुषार - ‘‘पापा ! देखा आपने। वो शुभांगी दीदी है, जो मेरे खिलाफ केस लड़ रही हैं। और उन्होंने आज तक कोई केस हारा नहीं है।’’

जज - ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं शुभांगी के पास जाऊँगा।’’

तुषार - ‘‘किस शुभांगी के पास पापा ! जो मर चुकी है। जिसकी याद में तड़प-तड़प कर मम्मी बीमार रहने लगी। वो अब वकील है किसी की बहन या बेटी नहीं। उन्होंने सोच समझकर ये केस हाथों में लिया है। अनजाने में केस नहीं लड़ रही वो।’’

जज - ‘‘धीरे नहीं बोल सकते। वह इसी शहर और इसी अदालत में आठ माह से वकालत कर रही है। अच्छी तरह जानता हूँ उसकी काबलियत को। तेरी माँ ने सुन लिया तो हंगामा खड़ा हो जाएगा।’’

तभी मंच पर अमिता आती है।

अमिता - ‘‘मैंने सब सुन लिया। पहली बार ऐसे कसाई बाप को देख रही हूँ जिसने जीते जी अपनी बेटी का मार दिया। यदि समाज ने उसके साथ अन्याय किया उनसे शिकायत नहीं है। वो सब तो गैर थे। तुमने तो अपने खून पर अत्याचार किया। (कहते-कहते अमिता जी बेहोश हो जाती हैं।)

दौरा पड़ते ही जज साहब डॉ० साहब को फोन करके बुलाते हैं।

जज साहब का फैमिली डाक्टर हाथ में ब्रीफकेस लिए मंच पर प्रवेश करता है। अमिता को चैकअप करने का नाटक करता है।

डॉक्टर - कोई खास बात नहीं। दिल पर माइनर सा अटैक हुआ है। इनके सामने कोई अधिक खुशी या गम की बात न हो। नहीं तो खतरा हो सकता है। दवाइयाँ मैंने लिख दी हैं। खाना हल्का-फुल्का दे (तुषार डॉक्टर साहब को छोड़ने जाता है)

तुषार औा डॉक्टर मंच से चले जाते हैं।

मि० शर्मा - (पास ही कुर्सी पर बैठते हैं) अब कैसा महसूस कर रही हो अमिता।

(अमिता क्रोध से मुँह फेर लेती है)

अमिता - ‘‘मैं तुम्हारी नाराजगी जानता हूँ।’’

(अमिता अब भी पत्थर की बेजान मूर्ति के समान उन्हें क्रोध से घूरती रहती है।)

मि० शर्मा - ‘‘प्लीज अमिता कुछ तो बोलो। जो कहोगी मैं सब सुन लूँगा लेकिन तुम इस तरह मत देखो मेरी तरफ। मैं समझ गया हूँ मैं ....... कितना गलत था। ......... मेरा निर्णय कितना संकुचित और आत्मघाती था। बस एक बार मुझे मौका दे दो। मैं अपनी बेटी के सारे गम भुला दूंगा।’’

अमिता - ‘‘नहीं जज साहब ! तुम उसके पास नहीं जाओगे। अब मैं तुम्हें छोड़कर जाऊँगी और शुभांगी के पास रहूँंगी। तुम अपने इस आलीशान बंगले में अपने उसूलों, आदर्शों के साथ रहना।’’ कहकर अमिता फूट-फूटकर रो पड़ती है। तभी तुषार दवाइयाँ लेकर लौट आया।

तुषार - पापा ! मम्मी क्यों रो रही हैं ?’’

जज - ‘‘कुछ नहीं बेटा।’’

तुषार - ‘‘लो मम्मी आप एक खुराक ले लो और शांति से सो जाओ।’’

अमिता - ‘‘मुझे किसी खुराक की जरूरत नहीं है। मुझे एक बार शुभांगी के पास ले चलो।’’

तुषार - ‘‘मम्मी ! तुम अगर दीदी के पास अब जाओगी तो क्या दीदी यह नहीं मानेगी कि तुम बेटे की फरियाद के लिए आयी हो।’’

अमिता - ‘‘नहीं बेटा, मैं किसी वकील के पास नहीं, अपनी बेटी के पास जा रही हूँ।’’

तुषार - लेकिन मम्मी ! मैं चाहता हूँ कि दीदी के पास आप इस मुकदमे के फैसले के बाद जाएँ। शायद इस मुकदमे से उनके जख्म भर जाए। और मेरी भगवान से प्रार्थना है कि वो मुकदमा जीत जाएँ।

अमिता - ‘‘तुम्हारा प्रेम व समर्पण देखकर मैं धन्य हो गई। लेकिन दुनिया के झंझट और झमेलों से मुझे कोई मतलब नहीं।’’

तुषार - प्लीज मम्मी, मेरे कहने से मान जाओ। मुकदमे का फैसला होने के बाद दीदी से मिलना। इसी बात को सोचकर मैं भी नहीं मिला उनसे।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

शुभांगी के घर का दृश्य। रात के नौ बजे हैं। दरवाजे पर दस्तक होती है।,

शुभांगी - (शून्य में ताकते हुए)

शुभांगी - कौन ?

मजिस्ट्रेट - दरवाजा खोलो बेटी।

(दरवाजा खोलने का अभिनय करती है)

शुभांगी - नमस्ते इस अपवित्र घर में कैसे आना हुआ जज साहब।

मजिस्ट्रेट - ऐसा मत कहो बेटी।

शुभांगी - प्लीज बेटी मत कहो मुझे। शुभांगी मेरा नाम है, वकालत मेरा पेशा है। आप चाहें तो ‘वकील’ बुला सकते हैं।

मजिस्ट्रेट - क्या कभी खून के रिश्ते बदलते हैं ?

शुभांगी - खून के रिश्ते तो पाँच साल पहले बदल गए थे जज साहब। (भावुकता से शून्य में ताकते हुए) खैर छोड़िए उन बातों को। आप यहाँ क्यों आए हैं यह बताइए।

जज - (शुभांगी की ओर अटैची बढ़ाते हुए) इसमें पूरे जीवन की कमाई है मेरी। प्लीज ये सब ले लो, तुषार को बचा लो। (हाथ जोड़ते हुए)

शुभांगी - मैं इतने सारे धन का क्या करूँगी ? मैंने कभी रिश्वत नहीं ली। प्लीज मेरे सामने हाथ मत जोड़िए। मैं केवल केस लड़ रही हूँ हार भी सकती हूँ जीत भी सकती हूँ। वैसे उसने अपराध किया है मैंने उससे बात की है।

जज - वकील के हाथों में केस की जान होती है।

शुभांगी - प्लीज आपके सामने मैं बहुत छोटी हूँ, मैं हाथ जोड़ती हूँ ऐसे मत गिड़गिडाइए।

जज - तुम्हारे सामने एक जज नहीं, पिता गिड़गिड़ा रहा है।

शुभांगी - कुछ असामाजिक तत्वों ने एक नन्हीं सी अबोध लड़की के साथ अन्याय किया। उसने आपसे न्याय की माँग की। लेकिन खोखले आदर्शों की दीवारों में उसकी पीड़ा सुनाई नहीं दी। उसकी निर्दोषता दिखाई नहीं दी। आज पुत्र ने अपराध किया है तो उसका परित्याग क्यों नहीं कर देते। वह समाज का सताया हुआ नहीं है लेकिन हाँ, आपका बेटा है। उसके लिए तो आप दिन को रात और रात को दिन बना देंगे।’’

जज साहब - ‘‘बस बेटी ! बस मुझसे ओर बर्दाश्त नहीं हो रहा, प्लीज चुप हो जाओ।’’

शुभांगी - बर्दाश्त तो करना ही पड़ेगा, क्योंकि उसने भी समाज के, माँ-बाप के जुल्मों को बर्दाश्त किया है।

जज - ‘‘लेकिन तुम सजा अपने भाई को, मेरे बेटे को दे रही हो। अपराध तो मैंने किया है सजा भी मुझको दो।’’

शुभांगी - बात तुषार की नहीं जज साहब। बात लड़के और लड़की की है। लड़की का फैसला करते समय आपके हाथ लड़खड़ा जाते हैं। उसूल और आदर्श आड़े आ जाते हैं और लड़के के समय उन्हीं आदर्शों को ताक पर रख देते हैं। आप गलत दरवाजे पर फरियाद लेकर आये हैं। (कहकर दरवाजा बन्द कर लेती है और फूट-फूटकर रोती है)

(जज साहब मंच से निकल जाते हैं।)

(शुभांगी मंच पर इधर-उधर बड़ी बेचैनी से घूमती है कभी उनके सामने पिता का चेहरा आता है कभी माता का, कभी भाई तुषार का, कभी निर्दोष सुगंधा का। नेपथ्य में हलचल उत्पन्न करने वाला संगीत गूंजता है। तभी सुगंधा मंच पर प्रवेश करती है)

सुगंधा - ‘‘दीदी आज शायद केस का फैसला सुनाया जायेगा।

शुभांगी - (स्थिर मुदा में) हाँ सुगन्धा ! आज मेरे जीवन का सबसे बड़े मुकदमे का फैसला होगा।

पर्दा गिरता है।

मि० शर्मा अटैची लिए घर की ओर बढ़ते हैं। शुभांगी के शब्द उनके कानों में गूँजते रहते हैं। नेपथ्य के पीछे शुभांगी के शब्द गूँजते रहते हैं।

दृश्य समाप्त

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दृश्य अदालत का। अदालत खचाखच भरी हुई है। सागर के माता-पिता, शुभांगी के माता-पिता, सुगंधा की माँ बहनें भी अदालत में मौजूद हैं। पैरवी शुरू होती है। प्रतिपक्ष का वकील सुगंधा पर आरोप लगाता है।,

वकील - सुगंधा गरीब घर की लड़की है। अपने रूप का जाल फेंका। जब तुषार साहब फंसते हुए नजर नहीं आये तो यह रेप का आरोप लगाकर अदालत तक खींच लाई।

शुभांगी - आई आबजैक्शन मी लार्ड। क्या सबूत है इनके पास। बहुत अच्छी कहानी गढ़ी है। कृपया मुझे सबूत जुटाने के लिए दो दिन का समय और चाहिए।

जज - अदालत वकील शुभांगी को दो दिन का समय देती है और इसी के साथ बदालत बर्खाश्त की जाती है।

(मंच पर शुभांगी बड़ी बेचैन है। रंग-बिरंगी रोशनी मंच पर आ रही है। मैं-मैं सबूत ढूँढने के लिए कहाँ जाऊँ। क्या करूँ’’ बड़बड़ाते हुए मुट्ठी भींच लेती है। अचानक चुटकी बजाती है-मिल गया आइडिया।)

शुभांगी - मैं तुषार के बंगले पर पहुँचकर सबूत ढूँढ़ती हूँ। शायद कुछ मिल जाये।

(शुभांगी मंच पर जल्दी-जल्दी इधर-उधर चलती है तभी मंच पर एक प्रौढ़ व्यक्ति प्रवेश करता है। वह शुभांगी को देखकर आश्चर्यचकित होता है और शुभांगी से पूछता है।)

नौकर - ‘‘तुम कौन हो बिटिया ?’’

शुभांगी - ‘‘मैं एक वकील हूँ और तुमसे कुछ पूछना चाहती हूँ।’’

नौकर - ‘‘हमसे क्या पूछोगी ?’’

शुभांगी - ‘‘तुमने इस लड़की को देखा है।’’ (सुगंधा की ओर इशारा करती है)

नौकर - ‘‘याद नहीं आ रहा बिटिया।’’

शुभांगी - ‘‘जज साहब के बेटे तुषार के बंगले पर काम करते थे न ?’’

नौकर - ‘‘हाँ बिटिया।’’

शुभांगी - ‘‘आज से पन्द्रह दिन पहले तुम्हीं थे न वहाँ पर ?’’

नौकर - ‘‘हाँ बेटी।’’

शुभांगी - ‘‘तो इतनी जल्दी कैसे भूल गये ?’’

नौकर - (रूखे स्वर में) ‘‘पर जबरदस्ती क्यों ?’’

शुभांगी - ‘‘यह लड़की तुम्हारी बेटी के समान है। यदि तुम्हारी बेटी के साथ ऐसा होता तो क्या तुम खामोश रहते ?’’ (सुनकर नौकर कुछ देर चुप रहता है फिर शुभांगी के शब्दों से पिघल जाता है )

नौकर - (दबी आवाज में) ‘‘हाँ हम जानते हैं इसे। लेकिन छोटे साहब ने हमें नाश्ता लाने के लिए भेज दिया था लेकिन जब आये तो चीखने की आवाज आ रही थी। हमने झरोखे से झाँककर देखा तो तुषार बाबू जानवरों के जैसा व्यवहार कर रहे थे। अगले दिन हमें शहर वाले बंगले पर बुलाया और दो महीने की तनख्वाह देकर कहा-कि ‘‘अब तुम आराम करो।’’ हम रोए गिड़गिड़ाए लेकिन हमारी एक न सुनी।

शुभांगी - अब तुम एक काम करो। तुम्हारी रोजी-रोटी फिर मिल जायेगी।

नौकर - ‘‘क्या ?’’

शुभांगी - ‘‘तुम गवाह बन जाओ।’’

नौकर - ‘‘नहीं, हम मालिक के साथ गद्दारी नहीं कर सकते।’’

शुभांगी - ‘‘तुम गद्दारी कर रहे हो काका, अपने फर्ज से, न्याय से, इस लड़की से, जो तुम्हारी तरह ही गरीब है। (थोड़ी देर तक सन्नाटा छा जाता है)

नौकर - (हाथ जोड़कर) ‘‘ठीक है बिटिया, हम गवाह बनने के लिए तैयार हैं।’’

दृश्य समाप्त

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सुगन्धा के घर का दृश्य। प्रतीकात्मक मंच सज्जा। सुगन्धा की माँ बैठी है सामने सुगन्धा खड़ी है। सुगंधा की माँ क्रोध में कभी जोर से बोलती है, कभी प्यार से समझाती है।,

माँ - ‘‘अरे पहाड़ में टक्कर मारोगी तो सिर फूटेगा ही।’’

सुगंधा - ‘‘माँ, दीदी हमारा कितना साथ दे रही है और आप कैसी बातें कर रही हो ?’’

माँ - ‘‘इस पढ़ाई ने बदतमीज बना दिया है लड़कियों को।’’

सुगंधा - ‘‘पढ़ाई को गाली मत दीजिए मम्मी। न्याय के प्रति जागरूक होने को बदतमीजी कहती हो। प्लीज मम्मी ऐसा मत कहिए।’’

माँ - ‘‘अब तुम घर से बाहर गई तो टाँग तोड़ दूँगी।’’

सुगंधा - ‘‘प्लीज मम्मी, अब केस फाइनल स्टेज में पहुँचने वाला है।’’

माँ - ‘‘तुम समझने की कोशिश करो। कोर्ट में वकील कितने अपशब्दों का प्रयोग करता है। बर्दाश्त नहीं होता।’’ (कहकर रोने लगती है)

सुगंधा - ‘‘मम्मी ! जब सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं तो मार्ग में कांटे भी चुभते हैं।’’ कहकर सुगंधा मंच से चली जाती है। पीछे-पीछे माँ भी पैर पटकते हुए चली जाती है।

दृश्य समाप्त

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पर्दा खुलता है मंच पर अंधेरा पसरा है तभी तुषार अपने कमरे में अंधेरे में बैठा छत को घूर रहा है। तभी जज साहब कमरे में प्रवेश करते हैं। जज बल्ब जलाने का अभिनय करते हैं सारा मंच रोशनी से नहा जाता है।,

जज - ‘‘तुषार ! अंधेरे में क्यों बैठे हो।’’

तुषार - ‘‘कुछ नहीं पापा, बस ऐसे ही।’’

जज - ‘‘मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूँ। पर, चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। जानता हूँ। जवानी के जोश में बच्चों से गलती हो जाती है। मैंने तीन गवाह तैयार किए हैं जो केस का रूख मोड़ देंगे और तुम बाइज्जत बरी हो जाओगे।’’

तुषार - (वैसे ही शून्य में घूरते हुए) ‘‘नहीं पापा ! मैं दीदी को हारते हुए नहीं देख सकता।’’

जज - (कड़क आवाज में) ‘‘पागल हो तुम। सजा होगी तुम्हें तो अखबारों में चर्चे होंगे। घर बदनाम हो जायेगा, मेरा नाम मिट्टी में मिल जायेगा।’’

तुषार - (अचानक उठकर भड़क जाता है) झुझलाकर ‘‘नाम-फिर नाम। दीदी सच के लिए लड़ रही है।’’ नाम के लिए कब तक निर्दोर्षों को शूली पर चढ़ाते रहोगे ?

जज - ‘‘तुम नादान हो। लड़ाई में सब कुछ जायज है। उसमें जीत अहम् होती है।’’

तुषार - ‘‘प्लीज पापा ! आप अपने दाँव-पेंच भूल जाइए।’’

जज - ‘‘तुम अपना विनाश करने पर तुले हो।’’

कहकर जज साहब चले जाते हैं। पीछे-पीछे तुषार भी चला जाता है।

दृश्य समाप्त

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पर्दा उठता है मंच पर पहले से ही अमिता, विपक्ष के वकील बैठे हैं नेपथ्य के पीछे से आवाज आती है, जज साहब अदालत में पधार रहे हैं। तभी मंच पर जज साहब प्रवेश करते हैं तत्पश्चात् मंच पर शुभांगी भी प्रवेश करती है। शुभांगी को देखकर अमिता की आँखों में आँसुओं की झड़ी लग जाती है। माँ को देखने के बाद भी समय की नाजुकता को समझते हुए शुभांगी संयम में रहती है।,

जज साहब - ‘‘कार्यवाही शुरू की जाए।’’

शुभांगी - ‘‘यस मी लार्ड ! आज मैं एक चश्मदीद गवाह पेश करूंगी।’’

जज साहब - ‘‘पेश किया जाय।’’

शुभांगी - ‘‘दीनानाथ काका।’’

शुभांगी - ‘‘क्या तुम बिटनेस बॉक्स में खड़ी इस लड़की को जानते हो ?’’

दीनानाथ - ‘‘हाँ साहब।’’

शुभांगी - ‘‘तुमने इसे कहाँ देखा ?’’

दीनानाथ - ‘‘यह लड़की जज साहब के यहाँ मालकिन की देखभाल किया करती थी।’’

शुभांगी - ‘‘यह चाल-चलन में कैसी है ?’’

दीनानाथ - ‘‘जब हम बंगले पर जाते थे तो मालकिन इसकी बड़ी बड़ाई करती थी।’’

शुभांगी - ‘‘और क्या जानते हो ?’’

दीनानाथ - ‘‘साहब इसे शहर से दूर वाले बंगले पर लाये हमें नाश्ता लेने भेज दिया। जब आये तो दरवाजा बंद था और चीखने-चिल्लाने की आवाज आ रही थी।’’ (सुगन्धा चिल्ला पड़ती है) जज साहब तुषार की कलाई पर मेरे दाँतों के निशान भी होंगे, मैंने काटा था।

जज साहब - ‘‘अदालत ये हुक्म देती है कि डॉक्टर को बुलाकर निश्चित किया जाये कि निशान दांतों के हैं या नहीं।’’

शुभांगी - ‘‘अब मैं दूसरा गवाह पेश करती हूँ मिस शालिनी (मिस शालिनी विटनेस बॉक्स में आती है) ‘‘हाँ तो आप कितने समय से काम करती हैं तुषार के साथ ?’’

शालिनी - ‘‘छः माह से।’’

शुभांगी - ‘‘आप कैसा महसूस करती हैं ऑफिस में, तुषार के बारे में कुछ बताइये।’’

शालिनी - ‘‘मैडम ! वो मेरे सपनों का राजकुमार था लेकिन जब मैंने शादी का दबाव बनाया तो नौकरी से निकालने की धमकी दे रहे हैं।’’

शुभांगी - ‘‘ये प्वावंट नोट किया जाये मी लार्ड। स्त्री इनके लिए भोग विलास की वस्तु है।’’ (यस मी लार्ड पक्ष के वकील से-यू कैन प्रोसीड नाउ कहकर अपनी सीट पर बैठ जाती है। विपक्ष का वकील दिनकर शालिनी से बात करता है।)

दिनकर - ‘‘हाँ शालिनी जी आप इनसे कब से प्यार करती हैं ?’’

शालिनी - ‘‘चार माह से।’’

दिनकर - ‘‘आप सर्विस करने आई थीं या प्रेम करने। कहीं ऐसा तो नहीं इनका पैसा देखकर अपने रूप जाल में फंसा लिया हो।’’

शालिनी - ‘‘माइंड योर लैंग्वेज। आप गरीबों पर हमेशा यही घटिया आरोप लगाते हैं।’’

दिनकर - ‘‘ये आश्चर्य की बात नहीं क्या कि सर्विस के लिए आई लड़कियाँ मालिक से ही प्यार करती हैं।’’

शालिनी - ‘‘प्रेम प्रस्ताव इन्होंने रखा था मैंने नहीं।’’

दिनकर - ‘‘और आपने मान लिया। क्या सबूत है आपके पास ?’’

शालिनी - (मोबाइल के मैसेज दिखाती है)

ख्तमाम सबूतों के आधार पर यह सिद्ध होता है कि तुषार एक अय्याश लड़का है और सुगंधा का अपराधी है। यदि सुगंधा राजी है तो तुषार शादी करने के लिए बाध्य है। सुगंधा को सोचने के लिए दो दिन का समय दिया जाता है। अन्यथा तुषार को निर्धारित सजा भुगतनी होगी।,

(मंच से सभी चले जाते हैं अमिता ने शुभांगी को बाँहों में भर लिया और आँसुओं की झड़ी लगा दी। शुभांगी की आँखों से भी आँसू बह रहे हैं।)

शुभांगी - (अपने और माँ के आँसू पोंछते हुए) ऐसे नहीं रोते मम्मी, आप इतनी कमजोर नहीं हैं। मम्मी मैं अपने कर्तव्य, धर्म के मजबूर थी। मैंने अपने जान से प्यारे भाई को सजा दिला दी। माफ कर दो मुझे।’’ (बच्चों की भाँति बिलख पड़ती है)

अमिता - ‘‘आई प्राउड ऑफ यू। तू तो बहादुर, न्यायप्रिय और पक्षपात रहित है।’’

सुगंधा - (अमिता तुषार की ओर इशारा करती है) ‘‘दीदी ये सब कौन हैं ?’’

शुभांगी - ‘‘ये मेरी माँ है। तुषार मेरा सगा भाई है।’’

सुगंधा - (आश्चर्य से मुँह खुला और आँख फटी की फटी रह जाती है।) ‘‘आपने एक गरीब लड़की के लिए इतना सब कुछ किया और हवा भी नहीं लगने दी।’’

शुभांगी - ‘‘कर्तव्य का मार्ग बड़ा कठिन होता है सुगंधा।’’

‘‘शुभांगी ने लड़की और लड़के के भेदभाव की लड़ाई लड़ी है।’’

अमिता - ‘‘अब तू हमारे साथ रहेगी। मैं तुझे लेने आऊँगी।’’

शुभांगी - ‘‘पापा मान जायेंगे।’’

अमिता - ‘‘हाँ वो बहुत शर्मिन्दा हैं। तुमसे कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं इसलिए दूर खड़े हैं। उन्हें माफ कर दो और चलने के लिए हाँ कर दो।’’

शुभांगी - ‘‘अच्छा मम्मी ! दोनों मुझे लेने के लिए आना। मै तैयार रहूँगी।’’

(सुनकर जज की आँखों से आँसू बह निकले वे दौड़ कर आए और शुभांगी को गले लगा लिया। सागर तो खुशी के मारे बोल ही नहीं पाता है। तभी शुभांगी की आँखों से आँसू बह निकलते हैं)

पर्दा गिरता है।

पर्दा खुलता है।

दो दिन बाद इंस्पैक्टर साहब का घर, मंच पर प्रतीकात्मक सज्जा। मंच पर इंस्पैक्टर, मिसेज कपूर, कविता बैठे हैं और सागर इधर-उधर बेचैनी से घूम रहा है। मिसेज कपूर जोर-जोर से अखबार पढ़ती हैं।,

मिसेज कपूर - शुभांगी अपने भाई के खिलाफ केस जीत गई।

कविता - अब तो शुभांगी शादी के लिए भी हाँ का देगी।

मिसेज कपूर - अरे सगाई तो हो ही चुकी है, अब तो सात फेरों की रस्म पूरी कर शुभांगी को घर जाना है।

इंस्पैक्टर - ठीक है तो हम दो-चार दिन में मेरठ चलते हैं और शादी की बात चलाते हैं।

सागर व कविता- दो चार दिन में क्यों ? कल ही चलते हैं।

मि० कपूर - अरे बेटा, हम तुम्हारे उतावले पन को समझ सकते हैं लेकिन सोचो; शुभांगी इतने वर्षों बाद माँ से मिली है दोनों का मन तो भर जाने दो।

दृश्य समाप्त

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जज साहब के बंगले का दृश्य। माँ-बेटी पलंग पर बैठी हैं।

अमिता - ‘‘बेटा शुभांगी, मैं एक बात कहना चाहती हूँ शायद मेरी बात अटपटी लगे।’’

(शुभांगी माँ की गोद में लुढ़क जाती है। अमिता उसके बालों में उँगलियाँ घुमाने लगती है।)

शुभांगी - ‘‘कहो, मम्मी।’’

जज - ‘‘हाँ अमिता, कहो क्या कहना चाहती हो ?’’

अमिता - ‘‘सुगंधा बहुत अच्छी लडकी है। उसने नर्स बनकर नहीं, बेटी बनकर मेरी सेवा की है। मैं उसे घर की बहू बनाना चाहती थी, चाहती हूँ। वैसे तुषार भी उसे प्यार करता है। वो तो पागल निकला। मैं तो उसका हाथ माँगने उसकी माँ के पास चली जाती।

जज साहब - ‘‘हाँ मैं भी यही सोच रहा हूँ लेकिन हमें पहले सुंगंधा से पूछना होगा।’’

अमिता - ‘‘हाँ इस केस के बाद उसकी शहर में बदनामी भी हो गई होगी पता नहीं कोई अपनायेगा या नहीं।’’

शुभांगी - ‘‘ये सब मुझ पर छोड़ दो। सुगंधा को मनाना मेरा काम है। मुझे पता होता तो मैं केस को इतना बढ़ने ही नहीं देती।’’

अमिता - ‘‘मैंने तो तुमसे कई बार मिलने की कोशिश की लेकिन तुषार ने जाने ही नहीं दिया।’’

शुभांगी - ‘‘क्यों ? क्या वो नहीं चाहता था कि माँ बेटी मिले ?’’

अमिता - ‘‘वो तुम्हारी हार नहीं चाहता था। उसने इस केस को प्रायश्चित के तौर पर लिया है।’’

शुभांगी - ओह ! ये क्या पागलपन किया उसने। यदि मुझे पहले पता चलता तो चुपचाप शादी कर लेते। शहर में ढिंढोरा भी न पिटता।’’

जज - अच्छा तुम दोनों गपशप करो। मुझे तो किसी काम से कचहरी जाना है।

शुभांगी - नहीं पापा, मुझे भी वहाँ जाना है। कहकर मंच से निकल जाती है। तभी गाड़ी के हार्न की आवाज सुनाई देती है।

जज - लगता है हमारे यहाँ गाड़ी आकर रूकी है देखू तो कौन है ? (जज साहब मंच के अग्रभाग में जाते हैं इधर-उधर देखते हैं तभी मि० कपूर, मिसेज कपूर मंच पर आते हैं। जज साहब उन्हें पहचानने के लिए गौर से देख रहे हैं।)

मि० कपूर - क्या बात है बरखुरदार। हमें पहचान नहीं पाए या अब भी नाराज हो।’’

जज - .......... आ..........प। मि० कपूर और मिसेज कपूर। (जज साहब ने चुटकी बजाते हुए कहा।)

मि० कपूर - (हँसते हुए) ‘‘दो मिनट के लिए तो मैं डर ही गया था कि कहीं उल्टे पाँव हैदराबाद ही न जाना पड़े।’’

जज - ‘‘क्यों शर्मिन्दा कर रहे हो। हमारा घर तो धन्य हो गया आपके पवित्र कदम रखने से। (आवाज लगाते हैं) अरे अमिता, शुभांगी देखो तो घर में कौन आया है ?’’

(सुनते ही अमिता आती है।)

अमिता - ‘‘ओहो, हमारा घर तो धन्य हो गया। आइये।’’

(आवाज लगाते हुए) रामू काका पानी लाओ। (मिसेज व मि० कपूर से) और बताइये कैसे हैं आप लोग।

मिसेज कपूर - ‘‘हम सब तो बिल्कुल ठीक हैं। हम तो आपके घर की रौनक को चुराने आये हैं।’’

अमिता - ‘‘पहले उन दोनों की कुण्डली मिलवा लेते हैं।’’

मि० कपूर - ‘‘उनकी कुण्डली तो भगवान ने मिलाकर ही भेजी है। ये पंडित लोग क्या मिलाएंगे। दिल मिल गया, विचार मिल गए फिर कुंडली क्या चीज है ?’’

जज साहब - ‘‘फिर भी कुण्डली मिलवा ही लेते हैं।’’

मि० कपूर - लीजिए ये रही दोनों की कुण्डली। हमने मिलवा ली है।

जज - ‘‘आपको शुभांगी की जन्मपत्री कहाँ से मिली ?’’

मि० कपूर - ‘‘कम्प्यूटर बाबा से।’’

जज साहब - ‘‘आप तो बड़ी स्पीड से चलते हैं।’’

मि० कपूर - ‘‘हमारा घर सूना हो रहा है जज साहब। कविता के भी हाथ पीले करने हैं (इधर-उधर देखते हुए) वैसे कहाँ गई शुभांगी ?’’

जज साहब - ‘‘वो आपके आने से दो मिनट पहले ही कहीं गई है ?’’

मि० कपूर - ‘‘अच्छा तो हमने आने में दो मिनट देर कर दी।’’

(सुनकर सब हँस पड़ते हैं। मि० शर्मा भी कोर्ट जाना स्थगित कर देते हैं।)

पर्दा गिरता है।

मंच पर शुभांगी कार से जाने का अभिनय करती है।)

शुभांगी - वाह पाँच मिनट बाद ही कार सुगंधा के घर के सामने पहुँच गई है।

(तभी मंच पर सुगंधा प्रवेश करती है।)

शुभांगी - (आवाज लगाते हुए) हैलो सुगंधा। कहाँ जा रही हो ?

(कार लॉक करते हुए शुभांगी ने सुगंधा से पूछा।)

सुगंधा - दीदी। आप, नमस्ते, बस काम की तलाश में जा रही हूँ। इस हादसे के बाद मम्मी बाहर निकलने ही नहीं देती। लेकिन काम तो करना ही पड़ेगा न।

शुभांगी - ‘‘चलो घर चलते हैं। (मंच का चक्कर लगाकर कुर्सी पर बैठ जाती है घर जाकर पहले इधर-उधर की बातें करती है।)

‘‘सुगंधा मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं।’’

सुगंधा - अभी आई दीदी (पानी के गिलास ट्रे में रखे हुए) दीदी पानी लो।

(तभी मंच पर सुगन्धा की माँ भी प्रवेश करती है।)

शुभांगी - ‘‘आंटी जी ! मैं आपसे एक बात करने आई हूँ प्लीज बुरा मत मानना।’’

माँ - अब क्या बुरा मानूँगी। सारे शहर में तो इज्जत उछल गई है।

शुभांगी - ‘‘मैं आज यहाँ तुषार की बहन, सुगंधा की सहेली और आपकी बेटी बनकर आई हूँ।’’

माँ - ‘‘कहो बेटी, निःसंकोच कहो।’’

शुभांगी - ‘‘मैं आपसे सुगंधा का हाथ माँगने आई हूँ, तुषार के लिए। यदि आपको व सुगंधा को कोई ऐतराज न हो तो।’’ (एजराज शब्द पर जोर देती है)

माँ - ‘‘बेटी ! सुगंधा बिन बाप की बेटी है। हममें ओर बदनामी सहने की शक्ति नहीं। दुनिया यही कहेगी जब शादी करनी थी तो यह कोर्ट कचहरी का नाटक क्यों ?’’

शुभांगी - ‘‘मेरा नैतिक कर्तव्य बनता है। हमारे घर में सब तैयार हैु, तुषार भी।’’

सुगंधा - ‘‘दीदी ! आप तरस खाकर कर रही हैं ऐसा।’’

शुभांगी - ‘‘नहीं, तरस की बात मत करना। कम से कम मेरे सामने तो नहीं। स्त्रियों के सम्मान के लिए तो मैंने अपना जीवन लगाने की कसम खाई है। तुम्हारी पूर्ण स्वीकृति हो तो आगे की बात चलेगी अन्यथा नहीं। अब ............. फैसला तुम्हारी मर्जी पर है। क्योंकि सभी शब्दों का अर्थ अपने विचारानुसार लगाते हैं। तुम्हें अपने घर की बहू बनाने का निर्णय हम सबका है। वेसे तुषार तुम्हें बहुत प्यार करता है। पवित्र रिश्तों में जरा सा भी शक जीवन की बुनियाद को खोखला कर देता है। इसमें जरा सा भी दया, लालच या प्रतिशोध नजर आए तो मना कर देना प्लीज।’’ (सुगंधा का हाथ पकड़ लेती है)

सुगंधा - अच्छा दीदी एक-एक कप चाय हो जाये।

शुभांगी - किसी और दिन। चाय, वो भी नाश्ते के साथ ड्यू रही। ओ. के. बाय।

(कहकर शुभांगी मंच से निकल जाती है)

(पर्दा खुलते ही तुषार नजर आता है। जो बड़बड़ाते हुए मंच पर इधर-इधर चक्कर काट रहा है) तुषार-(स्वगत) कैसा पागल हो गया था मैं जो मैंने यह नीच, कुत्सित कदम उठाया। कितनी बदनामी हो गई मम्मी, पापा और दीदी की, केवल मेरी नासमझी के कारण। मम्मी (कहकर दायें हाथ की मुट्ठी बनाकर बायें हाथ की हथेली पर मारता है) कितनी कोमल हृदय है। वो दीदी को लेकर ही कितनी परेशान थी। मैंने उनकी तरफ भी ध्यान नहीं दिया। कितना स्वार्थी, नीच, लालची हो गया था। (कुछ सोचकर चुटकी बजाता है) सुगंधा को अपनी जीवन संगिनी बनाकर इस पाप का प्रायश्चित किया जा सकता है। पर सुगंधा माने तब न। वो बड़ी स्वाभिमानी लड़की है। और अमीरी-गरीबी की खाई उसके मन में घुसी पड़ी है। इस पैसे ने, रुतबे ने भी बहुत सारी समस्यायें पैदा की हैं। रुतबे की वजह से पापा ने दीदी को स्वीकार नहीं किया। पैसे और प्रतिष्ठा के कारण ही सुगंधा ने मेरी तरफ कदम नहीं बढ़ाया। सबको छोड़ो ना यार। हम सब सबसे पहले मानव हैं बस मानव। धन तो जीवन जीने के लिए साधन मात्र है। किसी के पास ज्यादा है किसी के पास कम है। प्रतिष्ठा से डरकर किसी के जीवन को नष्ट नहीं किया जा सकता। मैं प्रायश्चित करूंगा, जरूर करूंगा पर कैसे (कहकर दोनों हाथों से सिर पकड़कर बैठ जाता है)।

पर्दा गिरता है

तभी शुभांगी मंच पर प्रवेश करती है। जज, अमिता, इंस्पैक्टर, मिसेज कपूर पहले से ही मंच पर बैठे हैं। आपस में बातचीत कर रहे हैं।

शुभांगी को देखते ही जज साहब बोल पड़ते हैं।,

जज - शुभांगी बेटा, देखो तो घर में कौन आया है ?

शुभांगी - ‘‘आप ही बता दीजिए पापा कौन आया है ?’’

जज - ‘‘तेरे होने वाले सास-ससुर।’’

शुभांगी - (मि० कपूर व मिसेज कपूर के पाँव छूकर) मम्मी पापा। आप कब आये ?’’

दोनों - ‘‘बस तुम गई और हम आ गए।’’

शुभांगी - ‘‘और कविता कैसी है ? उसे भी अपने साथ ले आते। मिलने का बड़ा मन कर रहा है।’’

मिसेज कपूर - ‘‘थोड़े दिनों में तो तुम स्वयं कविता के पास जाने वाली हो।’’ (शुभांगी मुस्कराकर मुँह नीचा कर लेती है।) अच्छा बेटा अब तो हम बारात लेकर ही यहाँ आएँगे।

पर्दा गिरता है।

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

दृश्य सुगंधा के घर का। पर्दा खुलते ही सुगंधा काम में व्यक्त है लेकिन उसके मन में विचारों का द्वन्द्व चल रहा है। कहीं तुषार बदला लेने के विचार से तो शादी के लिए तैयार नहीं हो गया है।,

लेकिन दीदी और माँजी ऐसा नहीं होने देगी। ........ लेकिन जीवन तो उसके साथ बिताना होगा। .......... तरस वाली बात तो हो नहीं सकती। दीदी व माँजी की नैतिकता को तो मैं जानती हूँ। ........ मैं कुछ भी निर्णय नहीं कर पा रही हूँ। ......... हे भगवान तू ही मेरी सहायता कर। (ऊपर की ओर देखती है, तभी मंच पर माँ आती है और पूछती है), तेरी आँखें लाल हो रही हैं बेटा। लगता है रात में सोई नहीं ......... अवश्य ही तूने भी ‘‘रात में शुभांगी की बातों पर विचार किया होगा मैंने भी बहुत सोचा। तूने क्या निर्णय किया ?

सुगंधा - ‘‘पहले आप बताओ मम्मी।’’

माँ - ‘‘नहीं पहले तू बता। मैं अपनी इच्छा नहीं लादना चाहती तुझ पर।’’

सुगंधा - ‘‘मेरा मन तो हाँ कर रहा है। अब आप बताइए, जो होगा मैं प्रसाद मानकर शिरोधार्य करूंगी।’’

माँ - ‘‘मेरा मन भी हाँ में गवाही दे रहा है।’’ कहकर मंच से चली जाती है।

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पर्दा खुलता है।

मंच पर तुषार कुर्सी पर बैठा है तभी शुभांगी उसके पास आती है और पूछती है।,

शुभांगी - ‘‘एक बात का सही-सही उत्तर दोगे तुषार क्या तुम सुगंधा को प्यार करते हो ?’’

तुषार - ‘‘लेकिन वो तो नफरत करती है केवल नफरत।’’ मेरे प्यार करने से क्या होता है ?

शुभांगी - ‘‘तुमने उसके साथ जो गलत काम किया है उसकी सजा तो मिलनी ही चाहिए तुम्हें।’’

तुषार - ‘‘और कितनी बार सजा मिलेगी ?’’

शुभांगी - ‘‘उस लड़की के बदनुमा जीवन का क्या होगा ? इसलिए हमने मिलकर निर्णय लिया है कि तुम्हें उसका हाथ थाम लेना चाहिए।’’

तुषार - ‘‘लेकिन दीदी सुगंधा की मर्जी भी तो जान लेनी चाहिए।’’

शुभांगी - ‘‘वो सब तुम मुझ पर छोड़ दो।’’

तुषार - ‘‘अगर सुगंधा मन से मुझे स्वीकार करती है, तो मुझे ये मेरा सौभाग्य होगा।’’

(कहकर शुभांगी व तुषार मंच से चले जाते हैं।)

दृश्य समाप्त

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शुभांगी ससुराल जाने के लिए मायके से विदा हो रही है, दृश्य जज साहब के बंगले का। बंगला दुल्हन ही तरह सजा हुआ है। शुभांगी व अमिता दोनों की आँखों से अश्रुओं की धारा बह रही है। शुभांगी के अश्रु कह रहे हैं। (हृदय की संकीर्णता के कारण अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा) अमिता के अश्रु कह रहे थे (बेटी आयी तो कितने कम समय के लिए) तुषार के अश्रु अपनी बहन के गुणों का बखान कर रहे थे।,

ऐसी बेटी, बहन जिस घर में हो वो घर कभी डूब नहीं सकता। दीदी ने सच के मार्ग पर चलते हुए सबको सही रास्ते पर ला दिया। न जाने किस भय, लालच, स्वार्थ के कारण हम निर्दोष बेटी को ही सजा देते हैं। पर मेरी दीदी तो अजेयता है अजेयता। आज से मेरी दीदी का नाम है अजेयता।

जज साहब अपने अश्रुओं को उंगली पर लेकर मंच पर फेंक देते हैं। और कहते हैं। बेटियाँ बेटों से बढ़कर।

पर्दा गिरता है।

दृश्य समाप्त

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