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स्टेण्ट --- अरुण अर्णव खरे ---

स्टेण्ट

--- अरुण अर्णव खरे ---

बृजभूषण का पूरा परिवार चिन्तानिमग्न था - कारण डॉक्टर ने तत्काल एंज्योप्लास्टी कराने की सलाह दी थी। डॉक्टर सुधाकर पंचोली के शब्द शशिबाला के कानों में बज रहे थे - "पेशेण्ट की एक आर्टिरी में नब्बे परसेण्ट ब्लॉकेज है और दूसरी में पेंसठ परसेण्ट - तत्काल एंज्योप्लास्टी करना जरूरी है - आप शीघ्र ही दो लाख रुपए जमा करा दें -"

नब्बे परसेण्ट ब्लॉकेज की बात सुनकर पूरा परिवार सन्न रह गया था। पत्नि शशिबाला तो जैसे अपनी सुध-बुध ही खो बैठी थीं। बेटी सुगंध डाक्टर की सलाह के अनुसार तुरन्त एंज्योप्लास्टी कराने की पक्ष में थी जबकि बेटा सुयश एंज्योप्लास्टी कराने से पहले किसी दूसरे विशेषज्ञ डाक्टर की सलाह लेना चाहता था। वह सुगंध को समझाने की कौशिश कर रहा था - "पापा की स्थिति स्थिर है अब और वह सबसे बात भी कर रहे हैं - दर्द भी विल्कुल नहीं है - मैने अपने एक दोस्त को बुलाया है उसके चाचा कस्तूरबा में डॉक्टर हैं -- उसके साथ जाकर मैं उनसे मिलकर आता हूँ -- पैसे भी निकालने हैं -- इसके बाद क्या करना है निर्णय करेंगे।

सुगंध भाई से सहमत नहीं हो रही थी - बार बार वह यही दोहरा रही थी - "भैया हार्ट का मामला है - याद करो डॉक्टर ने क्या कहा था - जितनी जल्दी हो सके एंज्योप्लास्टी करना जरूरी है -- यदि पापा को कुछ हो गया तो -- नहीं -- नहीं हम रिस्क नहीं ले सकते -- मेरी सहेली नैना के पापा को तो जरा सा दर्द हुआ था और वह अस्पताल तक भी नहीं पहुँच सके थे -- रास्ते में ही उनकी मृत्यु हो गई थी -- भाई आप क्यूँ टाइम खराब कर रहे हैं-- माँ को देखो कैसी विक्षुब्ध सी बैठी हैं -- कुछ बोल ही नहीं रहीं हैं"

इस बीच दो घण्टे में नर्स तीन बार आकर पूँछ चुकी थी - क्या निर्णय किया - पैसे जल्दी जमा करा दीजिए। डॉक्टर ने भी केथेटर अभी निकाला नहीं था - हाथ में टेपिंग करके उसे बाँध दिया था। उनका कहना था कि एक बार केथेटर निकाल दिया तो फ़िर पैर की धमनी से दोबारा केथेटर डालकर एंज्योप्लास्टी करनी होगी।

सुयश ने कुछ दिनों पूर्व ही व्हाट्सएप पर वायरल हुए हार्ट-सर्जरी से सम्बन्धित एक वीडियो देखा था - जिसे देख कर वह आश्वस्त था कि पापा को कुछ नहीं होगा पर वह बहिन को नहीं समझा पा रहा था -- बहिन ने भी वह वीडियो देखा था परन्तु वह भावनात्मक आवेग में कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। उसके लिए यह निश्चित करना मुश्किल हो रहा था कि वह किस डॉक्टर पर विश्वास करे - - वीडियो वाले या पापा का इलाज करने वाले। डॉक्टर तो ईश्वर का प्रतिरूप होता है - डॉ० पंचोली ने तो पापा के सभी टेस्ट कर एंज्योप्लास्टी की सलाह दी है -- उन पर वह कैसे अविश्वास कर सकती है। उसने निश्चित कर लिया - डॉ० पंचोली का कहा ब्रह्म वाक्य के समान है -- उनकी सलाह पर सेकेण्ड थॉट की कोई गुंजाइश नहीं है। हार कर सुयश ने दो लाख का चेक और अनुमति पत्र काउण्टर पर जमा करा दिए। उसी दिन शाम को डॉक्टर ने बृजभूषण की एंज्योप्लास्टी कर दी। सुयश को बाद में डॉक्टर ने बताया कि विलम्ब हो जाने से दूसरी आर्टिरी में ब्लॉकेज पचहत्तर प्रतिशत हो गया था इसलिए दो स्टेण्ट लगाने पड़े थे। एक लाख रुपए सुयश को और भरने पड़े। एक सप्ताह अस्पताल में रखने के बाद नियमित चेक-अप कराने की सलाह के साथ बृजभूषण को छुट्टी दे दी गई।

दो सप्ताह के विश्राम के बाद बृजभूषण ने ऑफिस जाना भी शुरूं कर दिया। उनकी दिनचर्या भी थोड़े बदलाव के साथ पूर्ववत हो चली। डॉक्टर की सलाह अनुसार वह नियमित रूप से घूमने जाते, व्यायाम करते और समय पर दवाएँ लेते। शशिबाला के चेहरे पर भी रंगत लौट आई थी और सुगंध भी बड़ी खुश थी। पर सुयश ना जाने क्यूँ खुद को संयत नहीं कर पाया था -- बार-बार उसे वीडियो में बताई गई बातें कचोटती रहती थी कि किस तरह अनेक डॉक्टर आवश्यक ना होने के बावजूद कमीशन के लिए कई-कई टेस्ट करा डालते हैं और मोटी फीस के लिए आपरेशन करने से नहीं झिझकते। जरूरी दवाइयों के साथ कुछ गैर जरूरी दवाईयां लिखना तो बहुत कॉमन सा है। पर जो हुआ सो हुआ - अब पापा स्वस्थ हैं -- खुश हैं तो ज्यादा सोच-विचार क्या करना। जब उसने सुगंध के मुँह से यह सुना कि उसने आज पापा को गुनगुनाते देखा है तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ। ऑपरेशन के बाद धीर- गम्भीर हो चुके पापा फिर से अपने पुराने ह्युमरस मूड में इतनी जल्दी आ जाएँगे -- यह उसने सोचा भी नहीं था।

तीन माह के अन्दर ही सब कुछ सामान्य हो चला था। बृजभूषण दो-एक बार गोष्ठियों में भी भाग ले आए थे। एक बार सपरिवार सिने पेलेस में बाजीराव मस्तानी भी देख आए थे। सुगंध को एम०बी०ए० के तीन हफ्ते के स्टडी टूर पर हैदराबाद जाना था पर वह उन्हें छोड़ कर जाने को विल्कुल भी इच्छुक नहीं थी। उन्होंने ही उसे मनाया। सुयश भी अपनी एम०टेक० की पढ़ाई में पूरा ध्यान लगाने लगा था। शशिबाला भी कॉलोनी की किटी पार्टियों में सक्रिय हो गईं थी। यानी कि जिन्दगी पहले की तरह पटरियों पर लौट आई थी अपनी पूरी ठसक के साथ।

बृजभूषण घूमने के बहुत शौकीन थे। हर साल पूरा परिवार गर्मियों अथवा सर्दियों की छुट्टियों में किसी न किसी हिल-स्टेशन या फिर किसी दर्शनीय स्थल पर घूमने अवश्य जाता था। बच्चों ने बीमारी में जिस तरह उनका ख्याल रखा था वह उन्हें अक्सर याद आता। वह चाहते थे कि इस बार भी कहीं बाहर जाकर कुछ समय बच्चों के साथ बिताया जाए। सुगंध के एग्जाम के बाद उन्होंने एक सप्ताह के लिए ऊंटी जाने का कार्यक्रम बना लिया। सुयश के प्रोजेक्ट का काम चल रहा था लेकिन वह भी इस अवसर को मिस करने के मूड में नहीं था। एक सप्ताह तक उसने दिन-रात एक कर अपने हिस्से का काम निपटाया।

छुट्टियों को सबने खूब एन्जॉय किया। पायकारा लेक पर बच्चों की फरमाइस पर बृजभूषण ने अपना पसन्दीदा मस्ती वाला गाना भी गाया - "समन्दर में नहा कर और भी नमकीन हो गई हो -- अभी आया है प्यार का मौसम और रंगीन हो गई हो" -- बेचारी शशिबाला - "अरे ये कौन सा गाना लेकर बैठ गए" - कहते हुए शर्म से लजाती रही। बच्चों ने इन अनूठे पलों का वीडियो भी शूट किया। बोटैनिकल गॉर्डन, मुदुमलाई वाइल्ड-लाइफ सेंक्चुरी, कुन्नूर सभी स्थानों पर सबने खूब मस्ती की। बच्चे पापा को पुरानी रंगत में देखकर बहुत खुश थे। इस खुशगवार टूर से लौटते हुए सब तरोताजा थे और असीम ऊर्जा से भरे हुए थे।

दस दिन बाद ही परिवार को एक और शुभ सूचना मिली। बृजभूषण का प्रमोशन हो गया और उनको वहीं हेड ऑफिस में ही पदस्थ कर दिया गया। इस खुशी में उन्होंने एक छोटी सी पार्टी दी -- सुयश और सुगंध के कुछ दोस्त भी पार्टी में शामिल हुए -- डॉक्टर पंचोली को भी बुलाया था पर वो नहीं आए -- पर सुयश के दोस्त राघव के साथ उसके अंकल डॉ० नीरज अवस्थी अप्रत्याशित रूप से पार्टी में आए। पार्टी से जाते समय उन्होंने सुयश को बुलाकर कहा - "योर पापा इज रियल जीनियस एण्ड फुल ऑफ़ इनर्जी -- ऐसे जिन्दादिल इंसान को दिल की बीमारी कैसे हुई -- आश्चर्य होता है -- तुम अगले हफ्ते गुरुवार को उनकी रिपोर्ट लेकर हमारे क्लीनिक पर आ जाओ -- मैं भी उनकी सारी रिपोर्ट देखना चाहता हूँ"

सुयश नहीं चाहता था कि पापा या सुगंध को इस बारे में कुछ पता चले -- पापा अपनी सामान्य जिन्दगी जीने लगे हैं उन्हें वह फिर से किसी तरह के तनाव में डालना नहीं चाहता था -- और सुगंध पता नहीं क्या-क्या सोचने लग जाएगी। उसने चुपचाप बृजभूषण की सभी रिपोर्ट्स निकाल कर अपने पास रख लीं।

एक हफ्ता यूँ ही गुजर गया। शाम को सुयश रिपोर्ट दिखाने डॉक्टर नीरज अवस्थी के पास गया। बृजभूषण घर पर लौटे तो कोई नहीं था -- सुगंध कोचिंग से नहीं आई थी और सूर्यबाला अपनी मासिक किटी पार्टी में गईं हुई थी। उन्होंने कपड़े बदले और सान्ध्यकालीन अखबार जो वह प्रतिदिन ऑफिस से लौटते हुए खरीद लेते थे, लेकर अपने कमरे में आ गए।

सुयश लौटा तो विचलित था और गुस्से से भरा हुआ भी। सुगंध उसे बाहर ही मिल गई। भाई को परेशान सा देखा तो बोली - "क्या हुआ -- भैया, प्रोजेक्ट में कोई समस्या है क्या"

"नहीं -- डॉक्टर नीरज अवस्थी से मिलकर आ रहा हूँ -- पापा की रिपोर्ट देखकर पता है उन्होंने क्या कहा"

"क्या कहा" - सुगंध किसी आशंका से सुयश का मुँह ताकने लगी।

"उन्होंने कहा - पापा को कोई बड़ी समस्या ही नहीं थी - सब कुछ सामान्य था -- नब्बे परसेण्ट ब्लॉकेज की बात झूठी थी -- एक माह की दवा से सब ठीक हो जाता -- एंज्योप्लास्टी की आवश्यकता ही नहीं थी"

सुयश की बातें सुनकर सुगंध को साँप सूँघ गया। उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था क्या बोले। वह हतप्रभ सी भाई को निहारे जा रही थी। तभी शशिबाला भी आ गईं। दोनो को वहाँ देखा तो पूँछा -- "तुम लोग बाहर क्यूँ खड़े हो -- पापा नहीं आए क्या अब तक"

"पापा तो बहुत पहले ही आ गए थे -- घर पर कोई नहीं था तो नींद लग गई है उन्हें- मैं अभी उनको चादर उड़ा कर आई हूँ" - सुगंध ने कहा।

"आज बहुत देर हो गई -- सात बज गये -- किटी पार्टी के बाद सविता के घर जाना पड़ा -- अगले माह उनकी बेटी की शादी है -- गहने और कपड़े खरीद कर लाई हैं तो वही दिखाने ले गईं - देखो पापा जाग रहे हों तो उनके लिए चाय बना दें" - शशिबाला ने कहा।

सुगंध बृजभूषण के कमरे में देखने गई -- वहाँ से उसकी चीख सुनाई दी - "भैया देखो - पापा को क्या हो गया है"

सब बदहवास से उनके कमरे में पहुँचे - देखा बृजभूषण पलंग पर निष्तेज से लेटे हुए हैं, सिर तकिए से नीचे की ओर ढुलका हुआ है -- सीने पर सान्ध्य कालीन पेपर रखा है -- सुयश ने छूकर देखा-- शरीर ठण्डा पड़ चुका था -- नाड़ी भी गायब थी।

सभी किसी अनहोनी की आशंका से काँप उठे। सुयश ने डॉक्टर नीरज अवस्थी को फोन किया। फिर पापा के सिर के नीचे ठीक से तकिया जमाया। पेपर को उठाकर एकतरफ रखना चाहा तो उसकी नजर एक हेडलाइन पर अटक गई - "पंचोली क्लीनिक पर छापा - अनेक गड़बड़ियाँ उजागर"। वह पेपर उठाकर पढ़ने लगा - "आज सुबह स्वास्थ्य विभाग और विजीलेंस की टीम ने संयुक्त रूप से पंचोली क्लीनिक पर छापा मारा। कुछ दिनों से क्लीनिक में अनियमितताओं की अनेक शिकायतें प्राप्त हुईं थी। पिछले छह माहों में क्लीनिक में हार्ट सर्जरी और एंज्योप्लास्टी करानेवाले मरीजों की संख्या आश्चर्यजनक रूप से चार गुनी बढ़ गई थी - ह्रदयरोगियों की संख्या में अचानक हुई इस वृद्धि से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी सकते में थे। जाँच के दौरान रिकॉर्ड में जहाँ भारी गड़बड़ियां मिलीं वहीं स्टॉक में नकली और एक्सपायरी डेट के स्टेण्ट पकड़े गए। इन स्टेण्ट की डेट पिछले साल नवम्बर में ही समाप्त हो चुकी थी। पिछले सात माह से यही स्टेण्ट मरीजों को लगाए जा रहे थे ---" खबर पढ़ते हुए सुयश को चक्कर आ गए -- वह गिरते गिरते बचा। एक नजर उसने बृजभूषण के चेहरे पर डाली और जोर से चीख मारकर रो पड़ा।

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अरुण अर्णव खरे

डी-1/35 दानिश नगर,

होशंगाबाद रोड, भोपाल

पिन: 462 026


ई मेल: arunarnaw@gmail.com

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