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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020 प्रविष्टि क्र. 9 - मैं पायल... गीतिका वेदिका

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रचनाकार.ऑर्ग नाटक / एकांकी / रेडियो नाटक लेखन पुरस्कार आयोजन 2020

प्रविष्टि क्र. 9 - मैं पायल...

गीतिका वेदिका


पात्र परिचय

सूत्रधार प्रथम महेन्द्र भीष्म

सूत्रधार द्वितीय

किन्नर गुरु पायल सिंह

नन्ही जुगनी

अम्मा शान्ति

भाई राकेश

बहन कमलेश

पिता राम बहादुर

पड़ोसन पण्डिताइन भौजी

प्रौढ़

पुलिसकर्मी

सफाईकर्मी

महिला यात्री

यात्री एक, दो व तीन

भिखारी

--


मैं पायल...

दृश्य प्रथम मंच

किन्नर गुरु पायल अपने वर्तमान स्वरूप में मंच पर गोल रोशनी के घेरे में है, शेष मंच पर अंधेरा है।

नमस्ते! मैं पायल... आज की किन्नर गुरु, लेकिन मैंने किस तरह ये सफर तय किया? मैं अपने बारे में आपको बताऊंगी, सब कुछ बताऊंगी। बस मेरे साथ शांति से, मन लगाकर मेरी बात सुनियेगा। मेरे घर में तीन लड़कियों के बाद जब मैं पैदा हुई (बच्चे की रोने की आवाज़ नेपथ्य से) तो घर में दुःख छा गया। सबने कहा कि लड़की हुई है। लेकिन कुछ दिनों बाद सबको पता चला कि मैं न लड़की हूँ न लड़का... मैं किन्नर हूँ। तो समाज वालों ने मेरा जीवन दुश्वार कर दिया।

श्रोताओं से आवाज़ आती है-

पहला- ए! तुम तो हिंजड़ा हो। हम हिंजड़े का नाटक देखने नहीं आये।

दूसरा- हाँ हाँ हम तो पायल को देखने आए हैं। पायल कहाँ है?

(तभी महेन्द्र भीष्म मंच पे आते हैं, मंच पर पायल सुबकती है, महेन्द्र भीष्म श्रोताओं से बात करते हैं)

महेन्द्र भीष्म- चुप हो जाइए। रुक जाइये। मैं आप लोगों से पूछता हूं कि आखिर किन्नर आते कहाँ से हैं? वे आसमान से टपके हैं या दूसरे ग्रह से आये हैं? बताइये? इन्होंने भी हमारी और आपकी तरह अपनी मां की कोख से जन्म लिया है। हमारे भाई बहन हैं ये, और आपको अधिकार किसने दिया कि आप इन्हें हिंजड़ा कहें? हम इनको क्यों किन्नर या मंगलमुखी नहीं कहते? हम आप इनका सम्मान क्यों नहीं करना चाहते? इनको अपनाना क्यों नहीं चाहते? मेरा स्वप्न है इनको समाज मे स्थान दिलाना, इन्हें मुख्यधारा में लाना... इसलिए पायल को बोलने दीजिये। (पायल को सम्बल देते हुए) बोलो पायल!

पायल- महेंद्र भीष्म जी! ऐसी ही तानों ने मेरे माता-पिता, भाई, बहन का समाज में रहना मुश्किल कर दिया था। मेरा स्कूल छूट गया, मेरे भैया घर छोड़कर चले गए और यहाँ तक कि मेरे पिता ने मेरी हत्या करने की कोशिश की, (पायल सुबकने लगती है) पिताजी मुझे रोज़ मारते पीटते और मुझे लड़कों की तरह रहने को कहा....मुझ पर क्या क्या गुज़री? मैं आपको सब कुछ बताऊंगी।

बस आप लोग शांति से साथ बने रहिये, अपने मोबाइल फोन शांत कर लीजिये।

(प्रकाश का गोल घेरा महेंद्र भीष्म पर केंद्रित होता है, पायल नेपथ्य में चली जाती है।)

महेंद्र भीष्म- मैं किन्नर की पीड़ा से छटपटा रहा था। मैं इस पीड़ा से मुक्त हो जाना चाहता था, तब हज़ारो प्रेरणाओं से संचालित होकर मैने लिखी "किन्नर कथा" तब किन्नर मन की पीड़ा जानी, पायल को जाना तब "मैं पायल..." उपन्यास लिखा, जो आज आप सबके सामने गीतिका वेदिका के निर्देशन और उन्हीं के नाट्य रूपांतरण में आप सब लोग साक्षी होंगे।

मैं ही पायल बना। मैंने उसके सब रिश्तों को जिया।

मैं ही उसका बड़ा भाई राकेश बना (राकेश का प्रवेश- अम्मा! मैं उन्नाव के सेठ की गाड़ी चलाकर पचास रुपये लाया हूँ, ये लीजिये। राकेश मूर्तिवत हो जाता है।)

मैं ही उसकी छोटी बहन कमलेश बना। (कमलेश का प्रवेश- अम्मा! भैया आ गए। भैया मेरे लिये क्या लाये? कमलेश मूर्तिवत हो जाती है।)

मैं ही नन्ही जुगनी बना। (फ्रॉक, कंगन पहने हुए, एक चोटी का रिबिन खुला है।)

जुगनी का प्रवेश- भैया! आ गए, भैया आ गए। हम साथ खेलेंगे। (सब मूर्तिवत हो जाते हैं। महेन्द्र भीष्म स्वगत) फिर उसका पिता बना, अंत में उसकी माता बना, (जुगनी अम्मा को पुकारती है- अम्मा! आओ ओ! अम्मा! आओ, (अम्मा अंदर से उत्तर देती हैं) आई! और अम्मा का प्रवेश, अम्मा महेन्द्र भीष्म के चारों ओर घूमकर निकलती हैं और मूर्तिवत हो जाती है| महेन्द्र भीष्म स्वचेतना से बोलते हैं) तब जाना कि बच्चे और माँ का स्नेह अटूट है। चाहे समाज किन्नर बच्चे को अलग कर दे, लेकिन एक माँ अपने बच्चे को कभी अलग नहीं करती।

तो चलिए मेरे साथ, मन बनाकर, तन्मय और एकाग्रता से, और देखिये 'मैं पायल...' (धीरे-धीरे प्रकाश मद्धिम होता है। महेन्द्र भीष्म मंच से उतरकर श्रोताओं में बैठ जाते हैं)

भीष्म के मंच से उतरते ही प्रकाश तेज़ हो जाता है और सब पात्र जीवित हो उठते हैं।

राकेश- अम्मा! ये रुपये रसोई के लिये, (शान्ति रुपये लेकर ब्लाउज में ठूँस लेती है।) ये अपनी बहन कमलेश के लिये फ्रॉक (कमलेश फ्रॉक पाकर खुश हो गयी।) और जुगनी ये तेरे लिए पेण्ट शर्ट (जुगनी ने मुंह बना लिया) अम्मा- (कमलेश से) जा बेटा भैया के लिये पानी ला, दो दिन बाद आया है। (कमलेश पानी लेकर आती है।)

राकेश- अम्मा! पिताजी नहीं आये? आज अभी बाहर खाना खाकर आया हूँ, देर रात में खाऊंगा। और जुगनी तेरा मुंह क्यों सड़ा है?

जुगनी- भैया मुझे फ्रॉक पहनना अच्छा लगता है, चोटी बनाना, बिंदी लगाना और कड़े पहनना अच्छा लगता है।

(कमलेश के हाथ से गिलास लेकर राकेश पानी पीता है।)

कमलेश- माँ अपनी जुगनी कितनी प्यारी लगती है न? एकदम परियों के देश की राजकुमारी!

अम्मा- (जुगनी का रिबिन बांधती हुई) जुगनी तो है ही मेरी जान,

राकेश- (नाराज़ जुगनी को मनाने की कोशिश करते हुए) अच्छा जुगनी छोटा अ बड़ा आ सुनेगी?

(जुगनी मुँह बनाती है।)

राकेश- (नाटकीय अंदाज़ में बहन को मनाने की कोशिश करता है।) छोटा अ आम का बड़ा आ अनार का,

(सब हँसने लगते हैं, जुगनी खुश हो जाती है।)

जुगनी- (नन्हीं जुगनी हँसते हुए) अरे भैया! छोटा अ अनार का, बड़ा आ आम का।

अम्मा- अरे मेरी जुगनी तो बड़ी हुशियार है।

राकेश- अम्मा! अपनी जुगनी एकदम लड़की लगती है न?

जुगनी- लड़की ही हूँ, देखो मेरी फ्रॉक, मेरी छोटी...

अम्मा- सब कुछ तो भगवान ने भरा पूरा दिया, सुंदर रंगरूप, अच्छा ऊंचा कद, नैन नक्श, लेकिन न जाने भगवान को क्या सुझा जो तुझे इस तरह अधूरा बना दिया? न लड़का न लड़की। (अम्मा दुःखी हो जाती है।)

राकेश- (बात काटकर) क्या अम्मा? तुम भी वही किस्सा लेकर बैठ जाती हो? चल कमलेश जुगनी खेलते हैं

जुगनी और कमलेश एक साथ बोलती हैं- हाँ! हाँ!

(अम्मा जाने लगती हैं तो जुगनी बुलाती है)

जुगनी- अम्मा! तुम भी खेलो न!

अम्मा- अरे नहीं भाई! मुझे रोटी बनानी है, तुम्हारे पिताजी आते होंगे।

जुगनी- खेलो न अम्मा!

अम्मा- बेटा मेरी बूढ़ी हड्डियाँ, मैं भाग नहीं पाऊंगी। न बाबा न। मेरे से नहीं होगा।

सब मिलकर बोलते हैं- अम्मा खेलो न खेलो न!

अम्मा- अच्छा ठीक! लेकिन एक शर्त पर

जुगनी- अब क्या अम्मा?

अम्मा- धीरे-धीरे भागना,

सब हँसते हैं।

अम्मा- तो मैं आऊँ? एक... दो... तीन...

सब खेलते हैं। अम्मा कमलेश को पकड़ लेती है। जुगनी खुश होकर ताली बजाने लगती है।

जुगनी- अम्मा हार गई अम्मा हार गई (ताली बजाती है) अचानक जुगनी के पिता राम बहादुर आ जाते हैं। जुगनी को पकड़कर मारने लगते हैं।

राम बहादुर- कितनी बार कहा शांति के इसे लड़के के कपड़े पहना कर रख। जब देखो तब लड़कियों के जैसे सिंगार करके रखती हो इसे? ताली बजा-बजा कर इसने मेरा जीना दूभर कर रखा है।

शांति- अरे अरे अरे, मार ही डालोगे क्या? तुम्हारा अपना ही बच्चा है।

राम बहादुर- अपना बच्चा है तो क्या करूँ? है तो एक किन्नर ही। तुमको क्या? तुम तो घर मे ही रहती हो। बाहर तो मुझे ही सुनना पड़ता है। वो देखो किन्नर का बाप जा रहा है। जाने कौन जन्म के कर्मों की सज़ा मिली है मुझे जो तूने इस किन्नर को जन्मा।

शांति- छोड़ो न।

राम बहादुर- नहीं! आज मैं इसे नहीं छोडूंगा। आज मैं इसे मार ही डालूंगा, अगर इसने लड़को की तरह रहना शुरू नहीं किया तो।

राम बहादुर जुगनी को मारने लगता है। कमलेश बचाती है तो वह भी पिट जाती है। राकेश भी पिट जाता है। अंत मे अम्मा बचाती है तो राम बहादुर सब बच्चों को छोड़ अम्मा को पीटने लगता है। इतने में राकेश और कमलेश जुगनी को लड़को के कपड़े पहना कर ले आते हैं। राम बहादुर देखकर खुश हो जाता है।

राम बहादुर- शाबास जुगनी! अब से तेरा नाम जुगनी नहीं जुगनू होगा जुगनू सिंह, आज से तू लड़का बन के रहेगा।

शांति- चलो जी! बहुत दिनों के बाद घर आये हो। रोटी खा लो। गर्मागर्म बनाई है।

राम बहादुर- (शांति को एक तरफ ले जाकर) देखो शांति! एक बात मैं साफ साफ बता दूं। जुगनी को लड़के की आदत सिखाओ। उसे लड़का बनाकर रखो। ऐसे लड़की बनकर जब वह बड़ा होगा तो लोग शादी ब्याह की बात करेंगे। जुगनी जुगनू बनकर रहेगा तो हमारी ही मुसीबतें कम होंगी। समझा कर शांति।

(कमलेश पानी लाती है। राकेश आसानी बिछा देता है। शांति रोटी लाती है।)

राम बहादुर- ला रोटी ला। फिर सुबह ही मुझे लखनऊ से नागपुर निकलना है चिकन के कपड़े लेकर, फिर नागपुर से संतरे लेकर वापस लखनऊ आना है। कुल सात-आठ दिन तो लग ही जायेंगे।

शांति- (थाली परसते हुए) वैसे भी तुम महीने में पच्चीस रोज तो बाहर ही रहते हो। मेरे मन मे कैसे-कैसे डर रहा करते हैं? मैं कहती हूँ कि छोड़ क्यों नहीं देते य्ये नॉकरी?

राम बहादुर- (गिलास से पानी थाली के चारों ओर डालता है|) अच्छी खासी सरकारी रोडवेज की बस चलाता था, लेकिन जब से किन्नर ने जन्म लिया तो मैंने नशा करना चालू किया और मेरी नौकरी भी गयी। (पहला कौर तोड़ता है, शांति इशारे से रोकती है)

शांति- तो ये पीना क्यों नहीं छोड़ देते? मैं तो कहती हूँ यही सारे झगड़े की जड़ है।

राम बहादुर- (थाली में कौर छोड़ देता है, गुस्से से थाली खिसका देता है|) पीना छोड़ क्यों नहीं देती? अरे तुझे क्या पता कि मैं किन तकलीफों से गुज़र रहा हूँ? एक यही पीना ही तो मेरे जीवन का सहारा है। वरना वह किन्नर तो मेरे सारे सुख खा के बैठा है। अब जा य्ये रोटी ले जा... चखना लेकर आ।

शांति- तुमसे तो बात ही करना बेकार है। जैसे तुम ट्रक पर सवार रहते हो ये दारू तुम पर सवार रहती है।

राम बहादुर- चल जा। अब ज्यादा लेक्चर मत झाड़।

(पण्डिताइन भौजी का प्रवेश होता है। उनके प्रवेश पर घण्टे का संगीत बजता है|)

पंडिताइन भौजी- (चिल्लाती हुई आती है।) राकेश की अम्मा! ओ राकेश की अम्मा! मैं ने तो पहले ही कहा था राम बहादुर भैया! ये जुगनू जुगनी जो भी, तुम्हारा भाग फोड़ दिया है इसने तो...

राम बहादुर- पंडिताइन भौजी! तुम्हारे घर मेहमान आये होंगे? (चिल्ल्ला कर) ऐ! शान्ति इसको भी शक्कर चायपत्ती ला देना।

पण्डिताइन भौजी- चाय पत्ती शक्कर न चाहिए मेको, अदरक चाहिए।

राकेश- लहसुन तो नहीं चाहिए?

(पण्डिताइन भौजी मुंह बनाकर चली जाती है। शांति चखना लाकर देती है। राम बहादुर शराब पीते हुए एकओर लुढ़क जाता है। मंच पर प्रकाश बुझता है, दृश्य समाप्त होता है।)

दृश्य द्वितीय जुगनी का घर / शाम का समय

(मंच पर धीरे-धीरे प्रकाश होता है, जुगनी धीरे से मंच पर देखती है, बहन कमलेश को बुलाती है।)

जुगनी- कमलेश जीजी! ओ कमलेश जीजी पिताजी नहीं हैं घर में, आ जाओ बाहर। (कमलेश डरती-डरती आती है, दोनो बाएं नेपथ्य में जाकर दाहिने नेपथ्य से निकल आते हैं। बीच में शांति मंच पर आकर बच्चों को देख जाती है। माँ के जाते ही बच्चे आ जाते हैं।)

अम्मा- अरे! जुगनी कमलेश कहाँ गए? अभी तो यहीं थे दोनी बच्चे? बच्चे भी न... (शांति नेपथ्य में जाती है, उसके जाते ही दूसरी तरफ से बच्चे निकल आते हैं।)

जुगनी- देखा दीदी! देखा पूरा घर देख लिया न। मैनें कहा था न कि पिताजी घर पर नहीं हैं। अब चलो खेलते हैं। (दोनो खेलने लगते हैं कि पंडिताइन भौजी फिर आती हैं।)

पण्डिताइन भौजी- राकेश की अम्मा ओ राकेश की अम्मा! घर में मेहमान आये हैं, चाय चढ़ी है थोड़ी शक्कर तो देना। ( झल्लाकर शक़्कर देती है। इतने में गाजर खाता हुआ राकेश आ जाता है।)

राकेश- गाजर चाहिए? (भौजी गुस्सा होकर चली जाती है। बच्चे खेलने लग जाते हैं। अम्मा! ये लो रुपये। पिताजी पता नहीं तक आएंगे? तब तक के लिये राशन मंगवा लेना। अच्छा माँ बहुत भूख लग रही है। चलो जल्दी खाना खिला दो। फिर आज रात भरपूर आराम करके कल उन्नाव निकलूंगा।

शांति- अच्छा! तू रुक! मैं तेरे लिये मैं रोटी लाती हूँ। (रोटी लाने चली जाती है।)

राकेश- अच्छा अम्मा! मैं जब तक अपने जुगनू सिंह के साथ खेल खेलूंगा।

(दोनो बच्चियाँ भैया के आने की खुशी मनाती हैं।)

राकेश- अरे जुगनू! आज तूने फिर लड़कियों के कपड़े पहन लिए? पिताजी अगर आ गए तो तुझे पीटेंगे। तेरे साथ हम सबको भी पीटेंगे। जा तू कपड़े बदल कर जुगनी से जुगनू बन के आजा जल्दी।

कमलेश- (स्नेहिल स्वरों में) जुगनी को जुगनी रहने दो न भैया। आज मैंने खुद जुगनी की चोटियां की हैं। चलो खेलते हैं।

पंडिताइन भौजी- राकेश की अम्मा ओ राकेश की अम्मा! जरा चायपत्ती देना। खत्म हो गयी है। (अचानक जुगनी को देखते हुए) हायराम! तुझे कितनी पिटाई लगती है? फिर भी तुझे समझ नहीं आता। तेरे रंग ढंग समझ नहीं आते। तू न लड़का लगती है न लड़की लगती है।

राकेश- (चिल्लाकर) अम्मा!

शांति- (डलिया लेकर आती है) पंडिताइन भौजी! हमारी बिटिया को ताने देकर दुःख न दिया करो। लो तुम्हारी चायपत्ती, शक़्कर दूध, अदरक क्या चाहिए? लो औऱ जाओ।

पण्डिताइन भौजी- हुँह! हमको क्या? मुहल्ले वाले सब जानते हैं कि तुमने किस पाप को जन्म दिया है? ये सब न चईये, माचिस चईये। (चली जाती है।)

शांति- लोगों का क्या है? लोग तो कहते ही रहते हैं। तू तो मेरी प्यारी बिटिया है। अच्छा खेलो तुम लोग।

तीनो खेलने लगते हैं। शांति अंदर चली जाती है। थोड़ी देर में बच्चे चुप हो जाते हैं। तभी राम बहादुर आ जाता है और जुगनी को घूरने लगता है। सब सहम जाते हैं। अंदर से शांति आवाज़ लगाती है।

शांति- अरे क्या हुआ? कौन है? कौन आया है जुगनी? अरे कुछ बोलते क्यों नहीं? (बाहर आती है और जड़वत रह जाती है।)

शांति- अरे क्या हुआ? कौन है? कौन आया है जुगनी? अरे कुछ बोलते क्यों नहीं? (बाहर आती है और जड़वत रह जाती है।)

राम बहादुर- आज मैं इसे मार ही डालूंगा। आज मैं इसे इस पापी शरीर से मुक्त कर दूंगा। न रहेगा बांस न बजेगी बाँसुरी। (राम बहादुर धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। सब बचाते हैं। राम बहादुर सबको दरवाज़े में बंद कर देता है। अंत मे जुगनी और शांति बचते हैं। शांति की खूब पिटाई करते हुए वह उसे भी कमरे में ले जाता है। फिर जुगनी को गमछे से मार डालने का प्रयास करता है। पंडितानी भौजी का प्रवेश होता है।)

पण्डिताइन भौजी- राकेश की अम्मा! ओ राकेश की अम्मा! (अचानक डरे हुए स्वर में) ये क्या कर रहे हो राम बहादुर भैया? मार डालोगे क्या बच्ची को?

राम बहादुर- हाँ मार डालूंगा। और जो इसे बचाने आया, उसे भी मार डालूंगा।

भौजी कटोरी छोड़कर 'बचाओ बचाओ' बोलकर भाग जाती है।

राम बहादुर- (अट्टाहस करते हुए) हा! हा! हा! अब तू नहीं बचेगा। तू मरेगा। मैं तुझे मार डालूंगा किन्नर। फिर मुझे कोई किन्नर का बाप नहीं कहेगा।

(जुगनी नहीं नहीं पिताजी बोलती जाती है और राम बहादुर उसे मार डालता है।)

राम बहादुर- हा... हा...हा... मार डाला मार डाला... मार डाला! (खुद बेहोश होकर गिर जाता है। दरवाज़ा तोड़कर शांति और कमलेश और राकेश आते हैं। करुण संगीत बजता है। जुगनी को गोद मे लेकर शांति चीखने लगती है। तभी राकेश बताता है कि जुगनी की सांस चल रही है।)

राकेश- जुगनी ज़िंदा है अम्मा!

(जुगनी धीरे से उठती है फिर दोनों माँ बेटी बहुत रोते हैं।)

शांति- आह! मेरी बिटिया! कसाई ने तो मार ही डाला था। कमलेश! जा तो जल्दी से हल्दी वाला दूध लेकर तो आ।

(कमलेश दूध का गिलास लेकर आती है।)

जुगनी- अम्मा! मेरा क्या कुसूर है? पिताजी मुझे क्यों प्यार नहीं करते?

शांति- पी ले बेटा! तेरे ज़ख्मों को आराम मिलेगा।

जुगनी- अब नईं अम्मा! पिताजी? (पिताजी को देखती है, पिता राम बहादुर नशे में गिरे पड़े हैं।)

(कमलेश दूध का गिलास लाती है, बिस्तर लाती है। राकेश कमलेश के साथ बिस्तर लगाता है।)

राकेश- मुझे माफ़ कर दे जुगनी! मेरी वजह से तुझे मार पड़ी।

जुगनी- (रोते हुए) भैया!

राकेश- तुझे मैं पढ़ाऊंगा, चाहे जुगनी बनाकर या जुगनू बनाकर?

(माँ सबको सुला देती है। सब सो जाते हैं। नेपथ्य में संगीत बजता है, संगीत बजते ही जुगनी उठ बैठती है। "अधूरी देह क्यों मुझको बनाया?

बता! ईश्वर तुझे ये क्या सुहाया?

किसी का प्यार हूँ, न वास्ता हूँ

न तो मंज़िल हूँ मैं रास्ता हूँ,

कि अनुभव पूर्णता का हो न पाया

जिसे मौक़ा मिला उसने सताया

अधूरी देह क्यों मुझको बनाया?

नहीं नारी हूँ मैं औ' नर नहीं हूँ

विवश हूँ मूक हूँ, पत्थर नहीं हूँ

उचित पथ क्यों नहीं मुझको दिखाया?

सभी ने रक्त के आँसू रुलाया

अधूरी देह क्यों मुझको बनाया?

बहिष्कृत और तिरस्कृत त्रासदी हूँ

भरी जो पीर से, जीवन नदी हूँ

मिलन सागर को ही कब रास आया?

वही एकाकीपन मुझमें समाया

अधूरी देह क्यों मुझको बनाया?

गीत के पूर्ण होते-होते जुगनी रात के अंधेरे में निकलकर पूरे घर को देखती हुई, भाई राकेश, बहन बहन और अम्मा को प्यार करती हुई पिताजी के पाँव छू के निकल जाती है। अंधेरा हो जाता है। दृश्य समाप्त होता है।)

दृश्य तृतीय कानपुर जंक्शन/रेलवे स्टेशन (सुबह का समय)

(मंच पर कानपुर जंक्शन का दृश्य है। बैंच लगी है, रात घर से भागी हुई जुगनी की सुबह हो चुकी है। रेलवे स्टेशन से सावधानी और सफाई रखने की घोषणा सुनाई दे रही है। नेपथ्य से चाय, समोसा और दातुन बेचने की आवाज़ें आ रहीं हैं और मंदिर से घण्टियों के स्वर सुनाई दे रहे हैं। धीरे-धीरे प्रकाश तीव्र होता है। जुगनी एक बैंच पर बैठी हुई है, अपना पेट पकड़कर धीरे-धीरे चल के जाने लगती है। तभी एक प्रौढ़ यात्री दातुन चबाते हुए मंच पर आता है, जुगनी को देखता है और गाना गाने लगता है।)

प्रौढ़- तुमसे मिली नज़र के मेरे (जुगनी को देखता है, दातुन फेंक देता है।) होश उड़ गए... कहाँ जा रही है? रुक तो ठहर तो...

जुगनी- अंकल जी काँटा!

प्रौढ़- (विस्मित स्वर में) काँटा? (जुगनी को कुर्सी पर ले जाकर बिठालता है।) आ बैठ जा बैठ जा... ला दिखा! अरे ये तो बहुत बड़ा काँटा है, ला निकाल दूँ। (जुगनी का पैर छूता है, फूँकता है।)

जुगनी- (रोकर) अंकल जी! लगता है।

प्रौढ़- अरे आजकल बड़ा इंफेक्शन हो रहा है। काँटा न निकला तो तेरा पैर काटना पड़ेगा और पैर कटा तो तू लूली-लँगड़ी हो जाएगी। फिर तो तू प्यारी नहीं लगेगी। नहीं लगेगी न?

(जुगनी न में सर हिलाती है।)

प्रौढ़- आजा बैठ जा! निकाल दूँ। (प्रौढ़ उसके पैर को छूता है तो जुगनी पैर झटक के उसे गिरा देती है।)

प्रौढ़- अरे! क्या हुआ? नहीं निकलवायेगी क्या काँटा? (कुछ सोचकर) अच्छा... समझा... शर्म कर रही है। चल आ जा बाथरूम में, अच्छे से तेरा काँटा निकाल दूँ। (उसके हाथ में पैसे देता है, आगे जाता है तो जुगनी पैसे फेंक देती है।)

प्रौढ़- अरे! पैसे फेंक दिए? कम हैं? अरे चल तो सही मैं तेरे को मालामाल कर दूंगा।

(एक महिला यात्री का प्रवेश, प्रौढ़ भाग जाता है। महिला यात्री पूड़ी निकालकर खाती है तो जुगनी को उसे देखकर अम्मा की याद आती है। वे उसे पड़े पैसे दिखाती हैं।)

महिला यात्री- बिटिया! तेरे पैसे पड़े हैं। (जुगनी पैसे उठा लेती है फिर उनकी तरफ देखती है। वे उसे पुड़ी देती हैं) ले खा ले बेटा! तेरी अम्मा कहाँ हैं?

जुगनी- अम्मा!

(कह के हरसांस् भरती है, महिला यात्री चली जाती है। दोपहर से रात हो जाती है। जुगनी सिकुड़ के सो जाती है। प्रकाश मध्दिम होता है। स्टेशन के एक किनारे बैंच पर पायल सिकुड़ के लेटी हुई है। प्रकाश धीरे-धीरे तीव्र होता है। स्टेशन पर घोषणा सुनाई पड़ती है। 'कृपया यात्रीगण ध्यान दें, गाड़ी नम्बर12533 पुष्पक एक्सप्रेस लखनऊ से चलकर कानपुर,झाँसी,भोपाल होते हुए मुम्बई के लिये जाने वाली प्लेटफ़ॉर्म नम्बर तीन पर आ चुकी है।' एक सिपाही का नेपथ्य से मंच पर प्रवेश होता है।)

सिपाही- मेरे नैना सावन भादों, फिर भी मेरा मन प्यासा अअअअ फिर भी मेरा मन प्यासा... ऐं लड़की, (जुगनी को देखता है, पास जाता है) इक लड़की भीगी भागी सी, सोती रातों में सोती सी, मिली हम अजनबी से कोई आगे न पीछे, (जुगनी कुनमुनाती है और इस तरफ़ से उठकर दूसरी तरफ करवट कर लेती है, सिपाही तेज़ी से डण्डा बेंच में बजाता है) तुम ही कहो ये कोई बात है?

(जुगनी सहम कर उठ बैठती है। डर के पुलिस वाले की तरफ देखने लगती है।)

सिपाही- ए बिना दुपट्टे वाली तेरा नाम तो बता, टें नें नें, नाम तो बता तेरा काम तो बता तेरा गाँव तो बता?

जुगनी- (डरती हुई) बहराजमऊ!

सिपाही- हम्म! न जाने कहाँ से आई है? न जाने कहाँ को जाएगी? दीवाना किसे बनाएगी ये लड़की?(जुगनी सहमती है। सिपाही उसके पास बैठकर उसे पकड़ने की कोशिश करता है।) आ बैठ मेरे पास, तुझे देखता रहूँ, तू कुछ कहे न मैं कुछ कहूं... (जुगनी उठ के जाने लगती है, सिपाही उसके आगे आ जाता है।) अकेले-अकेले कहाँ जा रहे हो? हमें साथ ले लो जहाँ रहे हो...

(तभी सफाईकर्मी आता है और सिपाही को टोकता है।)

सफाईकर्मी- अरे हवलदार! तुम यहाँ सुबह-सुबह बच्ची के साथ गाने गा रहे हो। वहाँ तुम्हें कोई बड़े राइटर-वाईटर पूछ रहे थे, लखनऊ से आये है, अरे क्या नाम हैं उनका? हाँ महेन्द्र भीष्म, सुना है कि वो किन्नरों के सम्मान में कोई 'अथ किन्नर कथा' प्रोग्राम चला रहे हैं।

सिपाही- (डरते हुए, सावधान होते हुए) जिसका मुझे था इंतज़ार, वो घड़ी आ गयी आ गयी (अपने पेण्ट शर्ट टोपी ठीक करते हुए) जाने दो जाने दो मुझे जाना है, वादा जो किया है वो निभाना है। (जाने लगता है, जाते जाते लौटता है, जुगनी से कहता है) तुम जो चले गए तो, होगी बड़ी ख़राबी, तुम्हें दिल मे बन्द कर लूँ, दरिया में फेंक दूँ चाबी... अच्छा तू यहीं रुकना, तेरी लिए मिठाई लेके आऊँगा... चमचम! (फिर...चलना चमेली बाग में, मेवा खिलाऊंगा (चुटकी बजाते हुए) यूँ गया और यूँ आया। (गाते हुए जाता है) न जाओ सैयां छुड़ा के बैयाँ... कसम तुम्हारी मैं रो पडूंगा।

(चला जाता है। जुगनी उठकर ज़मीन पर बैठ जाती है। शाम हो चुकी है। घोषणा होती है। "कृपया यात्रीगण ध्यान दें, गाड़ी नम्बर12533 पुष्पक एक्सप्रेस लखनऊ से चलकर कानपुर, झाँसी, भोपाल होते हुए मुम्बई के लिये जाने वाली प्लेटफ़ॉर्म नम्बर तीन पर आ चुकी है।" प्रकाश मद्धिम होता है। जो कि सुबह से शाम हो जाने का संकेत है।)

(तीन यात्री आते हैं। घोषणा होती है- "ग्वालियर बरौनी मेल 11124 ग्वालियर से चलकर बरौनी जाने वाली ट्रेन प्लेटफार्म नम्बर 3 पर आ चुकी है।)

यात्री 1- ट्रेन यहीं आएगी यहीं।

यात्री 2- ट्रेन वहाँ से यहाँ तक नहीं आएगी।

यात्री 1- ट्रेन यहीं आएगी यहीं।

यात्री 3- ट्रेन आ चुकी है पागलों।

(तीनों नेपथ्य में चले जाते हैं, जुगनी उन्हें देखती रहती है। ट्रेन का अनाउंसमेंट फिर होता है, तीनो मुंह लटकाकर वापस आ जाते हैं। उनकी ट्रेन छूट चुकी है।)

यात्री 1- ट्रेन तो यहीं आती थी न? वहाँ कैसे गयी?

यात्री 2- इधर तो शाम से रात होने वाली है और तुम हो भेजा जाए जा रहे हो यार!

यात्री 3- तुम लोग जो चाहे खाओ या न खाओ मैं तो खाना खा रहा हूँ। दोपहर ही खाना खाया था तब से नहीं खाया। ट्रेन आये तो मुझे बता देना।

(तीनो खाना खाने लगते हैं। जुगनी उनको दूर से आशा में देखती है। इशारे से भोजन माँगती है।)

यात्री 1- क्या खाएगी?

यात्री 2- क्या रे? अभी तू ट्रेन के पीछे पड़ा था, फिर इस लड़की के पीछे पड़ गया? क्या उसको घर लेकर जाएगा? हट रे!

(अचानक बास आती है, 2 यात्री के पास से काले धागे में बंधी रोटी निकलती है, उसे फेंक देते हैं। जुगनी झपटकर उसे उठा लेती है, तीनो हँसते हुए भोजन करते हैं, जुगनी मुश्किल से खाती है। नेपथ्य में गाना बजता है "जीवन तुमने दिया है, संभालोगे तुम!" अचानक ट्रेन का अनाउंसमेंट होता है, तीनो हड़बड़ी में भागते हैं।)

यात्री 3- चलो ट्रेन आ रही है।

यात्री 1- ट्रेन यहाँ नहीं आएगी क्या?

यात्री 2- ट्रेन यहाँ नहीं आएगी। अब यहाँ-यहाँ के चक्कर में फिर निकल जायेगी। घर की गाड़ी नहीं है।

यात्री 3- बहरे हो क्या? सुन नहीं रहे? ट्रेन पांच पर आ गयी है। हम यहाँ दो पर हैं।

यात्री 1- (भागते हुए) ट्रेन यहाँ वास्तव में नहीं आएगी? (उसे जबरन खींच के ले जाते हुए वे भागते-भागते अपना झोला छोड़ देते हैं। जुगनी देखती है। फिर उनके पीछे-पीछे भागती है, चिल्लाती है।)

जुगनी- अंकल जी अंकल जी आपका झोला।

(वे लोग नहीं सुनते और सीधे चले जाते हैं। जुगनी झोले से सामान निकालकर देखती है, एक पेंट शर्ट और टोपी है। वह इधर-उधर देखकर बाथरूम में जाकर पहन लेती है। तभी मंच पर दूसरी ओर से भिखारी का प्रवेश, भिखारी अपने पैसे गिन रहा है। दूसरी तरफ से सिपाही उसे पैसे गिनते देख लेता है।

भिखारी- पाँच, दस, पन्द्रह, बीस, पच्चीस और जे पूरे तीस (सिपाही को देखकर मुँह मोड़कर पैसे छुपाता है।)

सिपाही- (गाते हुए) हफ्ते वाला आया चल हफ्ता निकाल... चल आज का हफ्ता निकाल।

भिखारी- (गिड़गिड़ाते हुए) माई बाप आज कमाई नहीं हुई... (सिपाही उसकी जेब मे हाथ डालता है।)

सिपाही- फिर ये क्या है?

भिखारी- हें हें हें... वही बता रहा हूँ साहेब। आज इससे ज्यादा कमाई नहीं हुई।

सिपाही- चल टैक्स दे। (भिखारी गिन के पन्द्रह रुपये सिपाही को देता है।)

सिपाही- अच्छा इक बात बता तू! इन पन्द्रह रुपयों का क्या करेगा?

भिखारी हें हें हें साहेब! दस रुपये की दारू पियूँगा और पाँच बसन्ती को दूंगा।

सिपाही- अबे! दारू तो समझ में आती है लेकिन बसन्ती?

भिखारी- साहेब अपनी न कोई लुगाई न औलाद... कभी-कभी मुहब्बत को जी हो जाया करता है तो पाँच रुपये उसे दे आया करता हूँ। उसे भी रोज़गार मिलता है। ऐसे ही तो देश का रोज़गार बढ़ेगा। है कि नईं?

सिपाही- हम्म! बसन्ती से याद आया कि तुमने थोड़ी देर पहले ही(गाते हुए)इक लड़की भीगी भागी सी सोती रातों में जागी सी, मिली थी हम अजनबी से कोई आगे न पीछे, तो तुमने हमारी जान को जाते हुए देखा है?

भिखारी- लडक़ी को तो नहीं साहेब! एक छिछोरा जरूर बहुत देर से खड़ा है। उससे पूछ लो।

(सिपाही उसकी तरफ आता है, उसे ऊपर से नीचे तक देखता है।)

जुगनी- सलाम साब! (सिपाही खुश हो जाता है।)

सिपाही- (गाते हुए) गुडबाय नमस्ते सलाम सतश्री अकाल! अच्छा ये बता। एक कन्या कुँवारी कोई मीठी कटारी देखी यहाँ?

(जुगनी इशारे से नहीं बोलती है, फिर उसे एक तरफ जाने को कहती हैं सिपाही उसे पाँच रुपये देकर विंग में गाते हुए चला जाता है।)

सियाही- (गाते हुए) सात समुंदर पार मैं तेरे पीछे-पीछे आऊंगा। (चला जाता है। जुगनी उसे देखकर चैन की सांस लेती है, फिर ऊपर का बटन लगा लेती है। फिर वहीं बैठ जाती है। भिखारी भी जब तक बैठ चुका होता है।)

भिखारी- (जुगनी को देखते हुए) ए... इधर आ!

(जुगनी उसे देखती है, कोई प्रतिउत्तर नहीं देती।)

भिखारी- ए... इधर आ न! ठण्ड में काँपते मर जायेगा। (जुगनी तेज़ काँपने लगती है। भिखारी कोमल स्वर में बोलता है) अरे! काँप क्यों रहा है? इधर आ न बेटा! (जुगनी न में सिर हिलाती है। भिखारी कहता चला जाता है) क्या मैं इतना जनावर लगता है कि तू मेरा पास नई आएगा? हाँ रे! तू भी ठोकरें खाया होगा। वैसे तेरी उमर तो नहीं लगती। जरूर कोई और बात रही होगी। तुझे एक बात बताऊं? (ऊपर देखता है) बिल्कुल तेरे जैसा मेरा भी एक बेटा था। कहता था बाबा! भीख माँग के जब मेरे पास बहुत पैसा आएगा तो मैं तुम्हारे लिये बड़ा सा बंगला बनाऊंगा। एक बड़ी सी गाड़ी खरीदूंगा फिर तुम्हे उसमें बिठाउँगा... मेरी तरफ देखता जा रहा था और कहता जा रहा था कि अचानक रफ़्तार से एक गाड़ी आयी और उसे कुचलती हुई निकल गयी। मैं चीखता रह गया... चिल्लाता रह गया... लेकिन किसी ने न सुना। ख़ैर छोड़! तू सुना! (जुगनी को बिस्किट का पैकेट दिखाता है। जुगनी धीरे-धीरे उठती है और दौड़ कर उसके पास आ जाती है। बिस्कुट दो ले लेती है और भिखारी के आँसू पौछती है।

भिखारी- तू भूखा सा लग रहा है।

जुगनी- हाँ बाबा!

भिखाती- तूने कुछ खाया है कि नहीं?

जुगनी- नहीं बाबा!

भिखारी- (बिस्कुट का पैकेट देते हुए) अच्छा तू ये खा। (भिखारी उसे टाट का बोरा देता है।)

जुगनी- इसका मैं क्या करूँगा बाबा?

भिखारी- अरे! बेटा! इसका करना क्या है? ठण्ड लगे तो इसमें घुस के सो जाना। और न लगे तो इसे सिर के नीचे तकिया बना के सो जाना और अम्मा को सपने में देखना।

जुगनी- (साँस भरते हुए) अम्मा!... (रुककर) फिर तुम क्या करोगे बाबा?

भिखारी- अरे मेरा! मैं क्या करेगा? मैनें तो बहुत ज़माना देखा है। अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता, क्या ठण्ड क्या गर्मी क्या बरसात? सब कुछ एक सा लगता है। अब इन हड्डियों को सहने की तो आदत हो गयी है। अच्छा तू बिस्कुट खा और इस लोटे को रख (छोटा सा पीतल का लोटा देता है) वहाँ सीढियो के नीचे नल लगा है, पानी भर के पी लेना। रात में पानी भर के सिरहाने भी रख लेना। और चैन की नींद सोना। मैं यहाँ का टैक्स देता है। जब तक रहना मौज़ करना। और कोई परेशानी हो तो मैं वहाँ मिलेगा सीढ़ियों के पास... जब मर्ज़ी आये, भूख लगे आ जाना (जुगनी मुस्कुराते हुए सिर हिलाती है) अच्छा मैं चलता है। (उठते हुए जुगनी के सर पर हाथ फेरते जाता है, नेपथ्य में 'वैष्णव जब तो तेने कहिए जे, पीर परायी जाणे रे' बजता है। गाना ख़त्म होते होते भिखारी नेपथ्य में चला जाता है। जुगनी नल से पानी पीती है और लोटा सिरहाने रखकर बोरे में घुसकर सो जाती है। प्रकाश मद्धिम होता है, गीत बजता है, जुगनी सपने में अम्मा को देखती है, अम्मा उसे लाड़ कर रही है, उसकी चिंता कर रही है।

गीत

'दुनिया कुछ याद करे न करे तू याद मग़र करती होगी

मिलने की लाड़ जताने की ख़ाहिश हो पर डरती होगी

क्या दोष मेरा बतला दो माँ?

हो दोष तो कोई सज़ा दो माँ!

उठकर माथे पर प्यार करो

सो जाऊँ लोरी गा दो माँ!

कुछ चैन मिले आराम मिले

दुनिया के दुःख तमाम मिले

मुझ पर जो गए उछाले हैं

उपनय पैरों में छाले हैं

सब घाव हमी ने पाले हैं

उपनय पैरों में छाले हैं।'


गीत समाप्त होते-होते अम्मा जुगनी को बोरे में यथावत सुलाकर नेपथ्य में चली जाती है। दो क्षणों के बाद जुगनी उठकर इधर-उधर देखती है।)

जुगनी- अम्मा अम्मा (तेज़ रोने लग जाती है, प्रकाश बन्द हो जाता है। कुछ क्षण में बाद वर्तमान पायल पहले दृश्य के अनुसार उसी स्थान पर घुटनों पर सिर रखे बैठी है, सिर उठाकर सम्वाद बोलती है।)

पायल- ये थी आपकी "मैं पायल...' (महेन्द्र भीष्म श्रोताओं के बीच अपने स्थान से उठते हैं, मंच पर आकर पायल के कंधे पर हाथ रखते हैं एक हाथ हाथों में लेते हैं।)

महेन्द्र भीष्म- मैं तुम्हारे साथ हूँ पायल... मैं वादा करता हूँ तुम्हारी पीड़ा एक दिन सब जानेंगे, किन्नर एक दिन मुख्यधारा में आएंगे। मैं तुम्हारे साथ हूँ।

(नेपथ्य से सारे कलाकार धीरे-धीरेआते हैं। "मैं भी तुम्हारे साथ हूँ पायल" (श्रोताओं से आवाज़ आती है 'हम सब तुम्हारे साथ हैं पायल' अन्त में पण्डिताइन भौजी आती हैं।)

पण्डिताइन भौजी- ए! राकेश की अम्मा! हम भी तुम्हारी पायल के साथ हैं।

महेन्द्र भीष्म- (द्वितीय सूत्रधार से) महोदया जी! आपकी भौजी को अब क्या चाहिए? पूछ लीजिये।

(सब हँसने लगते हैं। पर्दा गिरता है। नाटक का पटाक्षेप होता है।)

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नाट्य रुपान्तरण, सम्वाद तथा मंचपरिकल्पना

गीतिका वेदिका


samrpyami@gmail.com

1 टिप्पणियाँ

  1. बहुत मार्मिक नाटक है स्तब्ध हूँ पढ़कर | हार्दिक शुभकामनाएं | ये सार्थक लेखन का सफर चलता रहे |

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रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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