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संतोष की शुद्धि - लघुकथाएँ - ज्ञानदेव मुकेश

संतोष की शुद्धि

एक मिठाई की दुकान थी। उसका मालिक एक बड़ा ही नेक आदमी था। उसकी मिठाइयों में आशातीत मिठास रहती थी। इसके पीछे का सच यह था कि उसकी मिठाइयों में उसकी ईमानदारी की चाशनी रहती थी। वह मिठाइयों में भूलकर भी कोई मिलावट नहीं करता था। वह बेहद विशुद्ध मिठाइयां बनाया करता था। जिन ग्राहकों को विशुद्धता की पहचान थी, वे मक्खियों कर तरह उसकी दुकान पर मंडराते रहते। मगर जिन ग्राहकों का दुकानों के रूप-रंग-सौंदर्य ज्यादा भाते थे, वे उस तरफ देखते भी नहीं थे, क्योंकि उसकी दुकान देखने में बेहद साधारण थी। इस कारण उसकी दुकान बहुत चलती नहीं थी।

मैं भी उन मक्खियों में था, जो उस दुकान का दीवाना था। मैं उसके मालिक से बड़ा प्रभावित था। मैंने एक दिन उससे कहा, ‘‘तुम अपनी दुकान का विस्तार करो। तुम इसे चमक-दमक वाले दुकान के रूप में विकसित करो। इससे तुम्हारे दुकान पर भीड़ बढ़ जाएगी और तुम देखते-ही-देखते एक धनी व्यक्ति बन जाओगे।’’

वह हंसने लगा। उसने कहा, ‘‘तब मेरी मिठाइयां अब जैसी नहीं रह जाएंगी और आप जैसे विशुद्धता के प्रेमी मेरे पास भूले-भटके भी नहीं आएंगे।’’

मैंने पूछा, ‘‘ऐसा क्यों होगा ?’’

उसने समझाया, ‘‘अभी मैं अपनी सीमित आय से संतुष्ट हूं और आप जैसे प्रेमी ग्राहकों को पाकर बड़ा खुश रहता हूं। जैसे ही मेरी आय बढ़ेगी मेरे स्वभाव से संतोष गायब हो जाएगा और लालच बढ़ती जाएगी। मेरी बढ़ती हुई लालच एक दिन मिठाइयों की विशुद्धता छीन ही लेगी। अब आप ही बताइए, क्या यह ठीक रहेगा ?’’

मैं निरुत्तर हो गया।

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धर्म की दुविधा

एक लड़का कसाई की दुकान के आगे खड़ा था। तभी उसने देखा, कसाई ने अपनी हंसिया उठाई और एक मिमियाते बकरे को काटने के लिए आगे बढ़ा। लड़के के रोंगटे खड़े हो गए। वह लपककर कसाई के पास गया और पूछा, ‘‘तुम इतनी निर्ममता से इसे काट रहे हो। क्या तुम्हें पता है कि इसका धर्म क्या है ? कहीं यह तुम्हारे धर्म का हुआ तो ?’’

कसाई के हाथ रुक गए। वह घोर असमंजस में डूब गया। लड़का वहां से हटकर एक दूसरी दुकान के आगे आकर खड़ा हो गया। वहां भी एक कसाई बकरे को काटने की तैयारी में था। लड़के ने उसके पास जाकर वही सवाल दुहराया, ‘‘क्या तुम्हें इसका धर्म ज्ञात है ? यह तुम्हारा धर्मवाला हुआ तो ?’’

यह कसाई जोर से हंसा और उसने पलक छपकते ही हंसिया चला दी। बकरे का धड़ अलग होकर दूर छिटक गया।

लड़का बुरी तरह सिहर गया और दोनों दुकानों के दृश्यों को अपनी आंखों में समेटे हुए दौड़ता-फांदता अपने पिता के पास आया। उसने पिता को दोनों घटनाएं सुनायीं और पूछा, ‘‘पापा, मैंने धर्म का वास्ता देकर दोनों को नृशंसता करने से रोकना चाहा। लेकिन मेरी समझ में नहीं आया कि दोनों का व्यवहार अलग-अलग क्यों था ?’’

पिता भी हंसने लगे। उन्होंने बेटे को समझाते हुए खुलासा किया और कहा, ‘‘बेटा, पहले व्यक्ति ने धर्म की बेड़ियों को ज्यादा तरजीह दी और उस चक्कर में पड़कर अपनी रोजी-रोटी का धर्म भी भूल गया। मगर दूसरा ज्ञानी और समझदार था। उसे भली-भांति ज्ञात था कि जानवरों का कोई धर्म नहीं होता। उसने अपनी रोजी-रोटी के धर्म को तरजीह दी और निश्चिंत होकर हंसिया बेलाग चला दी।’’

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-ज्ञानदेव मुकेश

पता-

फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,

अल्पना मार्केट के पास,

न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी,

पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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