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सुकेश की दस्तक में 72 लघुकथाकार (पुस्तक समीक्षा) समीक्षक-सुरेश सौरभ

सुकेश की दस्तक में 72 लघुकथाकार 

(पुस्तक समीक्षा)

समीक्षक-सुरेश सौरभ

हिंदी लघुकथा के क्षेत्र में सुकेश साहनी एक जाना-पहचाना नाम है। सुकेश की लघुकथाएं गहन अंधकार के घेरे को बेध कर हमेशा लोगों को रोशनी देने का काम करती रही हैं। तीन दशक से अधिक समय हो चुका है, सुकेश जी को साहित्य साधना करते हुए। अपनी जादुई कलम से सैकड़ों लघुकथाएं अपने अजीज पाठकों को परोस कर उन्हें आत्मिक रूप से तृप्त करने का सुफल करतें रहें हैं। देश-विदेश के पाठकों तक न सिर्फ इनकीं लघुकथाओं ने गहरी पैठ बनाई है बल्कि कई भाषाओं में अनूदित होकर बहुत दूर तक और देर तक का सफर कर रहीं हैं या करतीं रहेंगी। सुकेश जी संपादन के क्षेत्र में ऐसी लगन से उतरते हैं, मानो समुंदर की गहराई में उतर कर कोई कुशल गोताखोर मोती तलाश लेता है। कविता कोश के सौजन्य से अयन प्रकाशन दिल्ली के सहयोग से आप ने दस्तक नाम से एक लघुकथा संग्रह का संपादन किया है। इसका विमोचन इस साल जनवरी के दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में सम्पन्न हुआ था। संपादक सुकेश पुस्तक के प्रारंभ में अपनी बात में लिखते हैं यथा सोशल मीडिया हो या पत्र-पत्रिकाएं, सभी में लघुकथाएं बहुतायत में दिखाई देती हैं।

पिछले चार पांच-वर्षों में इस विधा में लिखने वालों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। आकारगत लघुता के कारण इसे आसान विधा समझकर इसमें तुरत-फुरत लेखन अधिक हुआ, जिससे इस विधा को नुकसान भी हुआ। वहीं कुछ ऐसे रचनाकार भी दिखें, जो इस विधा के प्रति गंभीर थे, उनमें सीखने की ललक थी। इन रचनाकारों ने पूर्व प्रकाशित लघुकथा साहित्य को गम्भीरता से लिया। अपनी प्रतिभा और अध्ययन के बल पर इनका सशक्त लेखन सामने आया....... निश्चित रूप से सुकेश जी का कथन सौ फीसदी सही और सत्य है। आज पत्र-पत्रिकाओं की बाढ़ में तमाम अपरिपक्व रचनाएं आ रहीं हैं, जो आने वाले समय में लुगदी साहित्य के रूप में निरर्थक ही साबित होंगी। कभी प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने कहा था कि सत्तर फीसदी साहित्य कूड़ा लिखा जा रहा है। तब एक जिम्मेदार सम्पादक का यह नैतिक दायित्व बन जाता है कि पछोर-पछोर कर रचनाओं का चयन करते हुए श्रेष्ठ रचनाएं ही पाठकों को सौंपे, समीक्ष्य संग्रह दस्तक में ऐसी जिम्मेदारी निभाते हुए सुकेश जी दीख पड़ते हैं।

देश के कोने-कोने से ,बहत्तर लघुकथाकारों की चुनिंदा लघुकथाओं से, आर्कषक रंगीन कवर से, नवोढ़ा दुल्हन सी सजी-संवरी इस किताब में हर समाजिक ताने-बाने के सूक्ष्मता से दर्शन किए जा सकते हैं। इस संग्रह की अधिकतर लघुकथाएं सामाजिक सरोकारों की गहरी पड़ताल करतीं हैं। लघुकथा तर्पण में लेखिका भावना सक्सेना ने इस बात की पुरजोर वकालत की है कि आदमी चाहे जितना भी आधुनिक हो जाए लेकिन झूठों-आडम्बरों को नहीं छोड़ता। सिन्हा साहब जब अपनी बेटी के मरने की सूचना पाते हैं, तो कहतें हैं-हमारे लिए वह तीस बरस पहले ही नहीं रही थी।’ लेकिन जब कब्रिस्तान में दफन करने की बात सुनते हैं, तो आनन-फानन में अपने धर्म की रक्षा के लिए दौड़ पड़तें हैं। हरीश कुमार ‘अमित‘ की लघुकथा अपना-अपना ईमान में पांच सौ के नकली नोट के माध्यम से लेखक ने इस बात को मुखर होकर कहने का प्रयास किया है कि अमीर से ज्यादा गरीब व्यवहार कुशल और ईमानदार होतें हैं। नीता सैनी की लघुकथा 'फेसबुक' सोशल मीडिया के ढंके सच को संजीदगी से उघाड़ती है।

"आईना" लघुकथा में बच्चों के वार्तालाप के माध्यम से अमीरी में गरीबी के दंश को लेखिका अर्चना राय ने दर्शाया है। "वंश बेल" लघुकथा में बहुत कम शब्दों के कथानक से लेखिका डा0 ज्योत्स्ना शर्मा ने स़्त्री विमर्श को व्यापकता दी है। लघुकथा के कुशल शिल्पी चित्तरंजन गोप की लघुकथा "हजार साल बाद" में भविष्य के भंयकर जल संकट को अभी से रोकने के लिए आगाह किया है। माला झा की लघुकथा "काला पानी" में बुजुर्गों की  अंतरव्यथा को बड़ी बरीकी से पाठकों के समक्ष रखा गया है। आज प्रेम पर अपनों के बहुत पहरे हैं, यह पहरे कितने भयानक हैं, इस बात को आप अर्चना तिवारी की लघुकथा "पूर्वाभास", से ये गहन आभास और अनुभव कर पायेंगे। ज्ञानदेव मुकेश की लघुकथा "स्मृति" में पुरानी पीढ़ी के लिए नई पीढ़ी के कोमल उद्गार व्यवस्थित रूप से प्रकट होकर पाठकों भावुक कर देते हैं और बहुत कुछ सोचने-समझने को विवश  कर देते हैं। इक्यासी पेज पर रामकरन की लघुकथा "हिसाब" से यह हिसाब लगता है कि आधुनिक व्यवसायिक युग में लोग-बाग जन्म-मरण में भी आने-जाने का हिसाब भी रखने लगे हैं।

रामकरन खो रहे संस्कारों की जमीन को फिर से तलाशते हुए बड़ी शिद्दत से दिखाई पड़ते हैं। चंद्रेश कुमार छतलानी की बत्तीस पृष्ठ पर लघुकथा "दायित्वबोध" बुजुर्गों के संस्कारों को सहेजने की रचनात्मक पहल करती है। छतलानी की यह लघुकथा यूट्यूब पर मैंने सुनी थी, पर पढ़ने में दूसरा ही मजा है। सरिका भूषण की लघुकथा "नशा" में महानगरीय जीवन में मोबाइल, टीवी और आधुनिकता आदि की बाहरी आडम्बरों की आड़ में, शराब में डूबी जिन्दगियों की घुटन-टूटन में छटपटाती एक सहनशील धैर्यवान स्त्री की व्यथा को बड़ी बरीकी से उकेरा गया है। इसी तरह मानवी वहाणे की लघुकथा ’स्त्रीवादी पुरूष’ में भी आज खूब हो रहे स्त्री विमर्श के नाम पर पुरूष की छद्म चालाकियों और कीमियागीरियों को दर्शाया गया है। लवलेश दत्त की लघुकथा "सुरक्षा" प्रशासन की ही सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा संजीदा सवाल खड़ा करके बहुत कुछ सोचने पर विवश करती है। वही कान्ता राय की लघुकथा "शगुनिया कौआ" ढ़ोंगी कर्मकांडी पंडितों को सामाजिक कटघरे में खड़ी करती है। डा० सुषमा गुप्ता की लघुकथा ’पूरी तरह तैयार’ और दीपक मशाल की लघुकथा ‘वह तीसरा’ में  बहुत गूढ़ता से कथानक तथा कथ्य को रचा गया है, जिससे ये लघुकथाएं फैन्टेसी सी प्रतीत होती है। प्रायः ऐसी लघुकथाएं आम पाठक के लिए बोझिल सी होने लगती हैं।

इसके अलावा अरूण कुमार, राधेश्याम भारतीय, माला वर्मा, सीमा सिंह , डा सन्ध्या तिवारी, मीनू खरे ,श्याम बाबू, डा पूरन सिंह , डा लता अग्रवाल, कुमार गौरव, वीरेन्दर 'वीर' मेहता, स्नेह गोस्वामी आदि लघुकथाकरों की बड़ी प्रेरक, मारक, मार्मिक और चर्चित लघुकथाओं का चयन करके सुकेश जी ने लघुकथा साहित्य के क्षेत्र में भागीरथी महनीय प्रयास किया है। जिसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की जानी चाहिए। अगर सुकेश जी सब रचनाकारों की लघुकथाओं के साथ उनका पता और फोन नंबर भी दे देते, तो हर लघुकथा पर पाठक अपनी प्रतिक्रिया सीधे लेखकों को प्रेषित कर सकता था। फिलहाल यह संग्रह बेहद पठनीय और वंदनीय है।

पुस्तक-दस्तक (लघुकथा संग्रह)

संपादक- सुकेश साहनी

प्रकाशक- अयन प्रकाशन नई दिल्ली।

मूल्य-200/

समीक्षक-सुरेश सौरभ

निर्मल नगर लखीमपुर-खीरी

पिन-262701


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