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कहानी - आस्था की लूट - वंदना पुणतांबेकर

"ॐ"

मई की तपती धूप गाँव की पगडंडियों पर उड़ता धूल का गुबार अपने मौसम को बयां कर रहा था। महाराष्ट्र के गर्मी की तपिश सभी को मालूम है। गर्म लू के थपेड़ों से झुलसती हुई । कमला अपनी तेज गति से घर की और जा रही थी। चलते वक्त उसकी चप्पल टूट गई। कमला खुद से ही बड़बड़ाती हुई....,"आज ही टूटना था, मुई को में काहे इसे कोस रही हु। बिचारी पुरानी भी तो हो गई हैं। तीन साल से साथ निभा रही हैं। वह टूटी चप्पल हाथ में उठाकर जल्दी-जल्दी घर जाने लगी। एक कोने में चप्पल पटककर अपने जले पैरों पर पानी डालने लगीं। अब उसे कुछ राहत मिली।

कमला एक गरीब औरत थी। उसकी दो बेटियां थी। गुंजन ओर मधु कमला का पति शहर में ठेकेदार के यहाँ काम करता था। ओर वह गाँव के जमींदार के यहां घर का काम करती थी। उसकी दोनों लड़कियां पास ही के स्कूल में पढ़ने जाती थी। रोज उसे इसी तरह उसे दौड़ते-भागते घर आना पड़ता। क्योंकि लड़कियों के आने से पहले घर आ जाय। ताकि उनके लिए गरम खाना बना कर रखे। सुबह तो टिफिन में रात के बासे पराठे या रोटियां ही अचार के साथ रखती थी। वह सोचती की घर आकर ताजा खाना तो मिले। सुबह ही उसका पति काम पर जाते समय दोनों को स्कूल छोड़ देता। कमला भी ताला लगाकर काम पर चली। जाती। इसी तरह जीवन की गाड़ी चल रही थी। आज वह बहुत खुश थी। जल्दी-जल्दी खाना बनाने लगी। उसे खाने के अलावा भी कुछ ज्यादा बनाना था। तभी दोनों लड़कियों की आवाज सुनाई दी। गाँव में छोटा सा एक कमरे का मकान था। घर के चबूतरे पर एक बड़ा सा नीम का पेड़ था। उस पर झूला टांग रखा था। लड़कियों के खेलने के लिये कभी समय मिलता तो वह भी आराम से झूलती। आज कमला बड़ी फुर्तीली ओर चुस्त दिखाई दे रही थी। जैसे उसके पैरों में पंख लग हए हो। "अम्माँ .....,ओ अम्माँ जल्दी से खाना दे दो। बड़ी भूख लगी हैं। "हां देती हूं। मेरी लाडो पहले अपना झोला तो टांग दो,डिरेस बदलो फिर तोहे खाना देती हूं। "अम्माँ जाय स्कूल बैग कहते है झोला नहीं कुछ तो सीखो गुंजन जोर-जोर से हँसने लगी।

कमला उसकी और देखकर बोली...," मोय ना सीखना जा उमर मा ,तुम्हीं पढ़ लिखकर अपने बापू का नाम रोसन कर लो जेई भोत हैं। और खुद भी हँसने लगी। "क्या बात है। अम्माँ आज तो बड़ी खुश लग रही हो। गुंजन ने पूछा। आज के दिन हाट लगत है। तो उते से कछु समान लानो हैं। "अम्माँ ये क्या बना रही हो...?'कुछ नाही थोड़े मीठे ,नमकीन सकरपारे, काहे आज कछु त्योहार है। क्या..?ना ही रे तेरे बापू आवेंगे तब बताऊँगी। मधु अभी ठीक से बोलना नहीं सीखी थी। जैसा गुंजन बोलती वैसा ही वह भी बोलती थी। दोपहर के दो बजे थे । कमला अपनी दोनों बेटियों के साथ हाट जाने के लिए निकली। उसकी चप्पल टूटी पड़ी थी। सोचने लगी अभी तो इसी से काम चला लेती हूं। चूड़ी से पिन निकालकर चप्पल में लगाकर हाट की ओर चल पड़ी। तेज गर्मी के थपेड़ों को सहते हुए वह हाट पहुंची। हाट से पति औऱ बच्चियों के लिए समान खरीदा। अपने लिए महावर रोली ,रुपये ज्यादा खर्च हो गए थे। आज ही उसने आधी पगार खर्च कर दी थी।

तपती धूप सिर पर चढ़ चुकी थी। हाथ में झोला लिए घर आते,आते वह पसीना,पसीना हो चुकी थी। साड़ी के पल्ले से कभी अपना तो कभी बच्चियों का मुँह पोंछ रही थी। उसका गला प्यास के मारे सुख रहा था ,आज कुछ ज्यादा पैसे खर्च हो चुके थे। सोच रही थी,हो पायेगा की नहीं। सामने से आइसक्रीम वाला चला आ रहा था। उसकी घंटी सुन मधु अपनी नन्ही जुबान से आइसक्रीम के लिये मचलने लगी। कमला कुछ सोचकर पल्लू में बंधे रुपये देखने लगी। उसने आइसक्रीम वाले को आवाज दी। "ये भैया नेक इते अइयो..., वह तेज गति से आइस्क्रीम का ठेला लेकर पास आ गया।

बोला ..,"कौन सी चाहिये, लाल,नारंगी,..? अरे भैया पहले बताओ कितने की है। "बस दो रुपये की भोजी, दोनों अपनी पसंद की लाल,पीली आइस्क्रीम देखने लगी,। कमला जल्दी घर आने लगी।

गुंजन अम्माँ का चेहरा देखने लगी उसे कमला पर दया आई। "अम्माँ तुमने तो अपने लिए कुछ लिया ही नहीं थोड़ी तो खालो। नाही रे , तू ही खा,म्हारी का उमर है। का आइसक्रीम खाने की,जे चीजे तो बच्चे ही खावे है। ना अम्माँ थोड़ी तो खानी पड़ेगी। गुंजन जबरन कमला के मुँह के पास आइसक्रीम ले गई। और उसे खिलाने लगी। " अम्माँ तोड़ी तोड़ लो ,ऐसे चाटो मती।

कमला ने थोड़ा टुकड़ा काट कर अपने मुँह में रखा अब उसे थोड़ी राहत मिल चुकी थी। गला थोड़ा तर हो गया था। घर आते ,आते सूरज के तेवर अब ढीले पड़ चुके थे। रास्ते में गुंजन सौ बार पूछ चुकी थी। कि अम्माँ हमें कऊ की सादी में जा नो है का..? कमला ने उस मासूम का कोई जवाब नहीं दिया। हा, हा... बताऊंगी पहले घरे तो चल,बापू आवेगें । सोई साथ में बताऊंगी। तब तुझे मालूम हो जाएगा कि का बात है। घर आकर कमला ने थोड़ा पानी पिया चेन की सांस ली। फिर पोटली खोल कर कपड़े छाटने लगी। अपनी एक साड़ी जो बड़ी पुरानी थीं। लेकिन जारी गोटे की थी । वह अलग निकाल कर रख ली। और सभी के कपड़े एक झोले में निकाल कर रख दिये। तभी गुंजन के बापू की सायकल की आवाज बाहर से आने लगी। मधु चिल्लाई ....,"अम्माँ ओ अम्माँ देखो बापू आ गये। जल्दी आओ बापू.....। दोनों बच्चीयों को खुश देख कर पूछा....," का बात है,आज तो बड़ी चहक रही हो, रोज तो ना चहके ईति, के का बात है, कहॉ है थारी अम्माँ...?

बापू आज हम अम्माँ के साथ हाट गये थे। अम्माँ ने हमें नए कपड़े दिलाये,आइसक्रीम और बापू सुनो....ना, सुनो.. ना। हा... हा.."सुन रहा हु। ,आज क्या पहली तारीख को हो अम्माँ ने दिवाला निकाल दिया। ,अभी काहे हाट से खरीददारी कर लाई। काय कहूं से खजाना मिल गया का थारी अम्माँ को,। कमला अंदर चूल्हे पर चाय चढा रही थी। और अंदर से गुंजन ओर इसके बापू की बाते सुन रही थी। फिर भी मन में एक उत्साह और चमक थी। "अंदर आके...., का बात है। गुंजन कह रही थी । तू छोरियों को लेके हाट गई थी। पहले चाय ले लो जी थोड़ी थकान निकल लो ,फिर सब बताते हैं। चाय पीकर गुंजन के बापू नीम के नीचे खाट डालकर आराम करने लगे। कमला चिल्लाकर ,"अरी ओ गुंजन जा वो झोला तो उठा ला नेक। ये सब के है। शर्ट देखकर जोर से हँसते हुये...," क्या कही की दावत का न्योता आया है । क्या? जो इतने रुपये बिगाड़ लाई। "नहीं जी,बो....बो,एक बात कहूं। हा ,बोल का बात है। जी बो मेने मान मानी थी। कि छोटी जल्दी बोलने लगे तो बाबा के दर्सन को जाऊँगी। अब तो मधु अच्छे से बोलने लगी है। सो हम काहे नाही जाकर बाबा के दर्सन कर आये। लेकिन इते रुपये कहॉ हैं ,कमला आधे से ज्यादा तो तू आज ही खरच कर लाई। "हो जायेगा.... जी,हो जयेगा आपकी हा होनी है। मैंने तो रास्ते की सारी तैयारी भी कर ली हैं मीठे,नमकीन सकर पारे भी बना लिए है। तुम कहो तो सुबह ही निकल चले । गूँजन खुशी से,अम्माँ हम शिर्डी जायेगे बस में बैठेंगे। बड़ा मजा आएगा। हाँ. हाँ, बड़ा मजा आएगा। मधु ने गुंजन की नकल की।

थोड़ी खामोशी के साथ कमला ने ही खामोशी तोड़ी,ये जी का बात है, काय तुमें हमारी बात नहीं भाइ का। ऐसा नहीं है। कमला हम बिना बताए नागा नहीं कर सकत ठेकेदार हमारी पूरे दिन की मजूरी काट लेगा। हम यही सोच रहे हैं। तुमने तो पुरी तैयारी कर ली है। तो बाबा के नाम पर हम नाही भी नहीं बोल सकत। "तो का हम नहीं जायेंगे कमला ने चिंता के भाव चेहरे पर लाकर पूछा। नाही री कल हम ठेकेदार के यहाँ जल्दी जा कर जल्दी आ जायेगे। दोपहर तक निकल लेगे दर्सन को अब तो खुस जा जाकर रोटी लगा बड़ी भूख लगी है। हव, हव करती हुई खुशी से उठ कर दौड़ती हुई कमरे में गई। सभी ने बाहर आँगन में खाना खाया। ए जी तुम भी कछु एडबन्स ले आना कही रुपये कम न पड़ जाय। देख भागबान अभी तो छुट्टी भी मंजूर नहीं हुई है। पैसे की बात तो दूर छुट्टी दे दे जेई बोत है। तीन महीना पहले ही दो महीने का एडबांस लाया था। जब मधु को बुखार आ गया था। सरकारी अस्पताल में भर्ती किया था। भूल गई का बो दिन। "हा.., हा याद हैं। कमला घबराकर पल्लू में बंधे रुपये खोल कर देखने लगी। ई देखो इते रुपये हैं। हो जायेगा का.? हा हो जायेगा संभलकर रख बस में चोर उच्चके बैठते हैं। कोई थारो पल्लू न काट ले जाय। ओर हँसने लगा। आज किसी को भी नींद नहीं आ रही थी। सुबह जाने की खुशी जो थी। सुबह,सुबह साइकल की आवाज सुनकर अचानक कमला की नींद खुल गई। जे इते सुबह बिना चाय पियें कहॉ चले गए। चिंता से वह उठ बैठी। थोड़ी देर में ही साइकल की आवाज आई। तो वह भागते हुए बाहर आई। ए गुंजन के बापू इते सुबह कहॉ गये हते म्हारो तो जी घबरा गओ न जाने कैसे ,कैसे बिचार मन मा आवत रहे ,अरी भागबान आज जानो नहीं का?बाबा के दर्सन वास्ते तो ठेकेदार से रजा की बात करने गया था। "तो का बाने रजा दे दी...? हॉ कहे ना देगा रजा, हम कोनो फालतू नागा थोड़े ही करते हैं। अब जल्दी से चाय बना दे। बासी रोटी होगी वो भी दे। बड़ी जोर से भूख लगी हैं। सभी तैयार होकर शिर्डी के लिए निकल चुके थे। पगडंडियों को पार करते हुए सड़क तक आ गए थे। सूर्य देवता के तेवर वक्त के साथ तीखे होते जा रहे थे।

वह बस का इंतजार करने लगे। उनके गांव से शिर्डी यही कोई साठ किलोमीटर दूर था। तभी दूर से एक लाल रंग की बस आते नज़र आई । दूर से आती बस देखकर कमला ने चेन की सांस ली। वह शिर्डी की ही बस थी। सभी बस में चढ़ गए। बस यात्रियों से खचाखच भरी थी। पांव रखने की भी जगह नहीं थी। ऊपर से गर्मी कमला को तो भीड़ देखकर ही दिल घबरा गया। आज तक उसने इतनी भीड़ कभी नहीं देखी थी। "ए कंडक्टर साब जब जगे नाही थी । तो कहे सवारी चढ़ा लई। ,जगह तो बन जायेगी। आगे ड्राइवर के पास की सीट पर थोड़ी सी जगह दे दी। वह मधु को लेकर वहाँ बैठ गई। गुंजन अपने बापू के साथ भीड़ में ही दबी खड़ी रही। मुसाफिरों से भरी बस अपनी तेज गति से चल पड़ी। थोड़ी दूरी पर बस फिर सवारी देख रुक जाती और सवारी चढ़ा लेती। इतनी भीड़ ऊपर से गर्मी कमला का जी घबरा ने लगा। बस दो तीन घंटों में शिर्डी पहुँची। कंडक्टर चिल्लाकर शिर्डी की सवारी आ जाओ शिर्डी आ गया। कमला का खुशी का ठिकाना ना रहा । इतनी गर्मी ओर घुटन के बाद भी कमला को ऐसा लगा। मानो किसी ने ठंडे पानी का कूलर लगा दिया हो। उसे बड़ा सुकून मिला।

बस से उतर कर कुछ कदम आगे चले ही थे। कि दो लड़के सामने आकर खड़े हो गए। "क्या आप बाबा के दर्शन के लिए आये हो। हां हम सीधे दर्शन को ही जायेंगे। वह लड़के बोले," अरे साब वहाँ तो लम्बी लाईन लगी हैं,हम आपको जल्दी से दर्शन करवा देंगे। यह बात सुनकर कमला की आँखे एकदम चमक उठी। वह पूछने लगी, तोय हमें जल्दी दर्सन कैसे कराओगे। ,"वे बोले यहां हमारी पहचान हैं। आओ हमारे साथ। कमला अपने परिवार के साथ उन दोनो लड़को के पीछे चल पड़ी। वह लड़के उन्हें एक प्रसाद की दुकान पर ले गये । ओर जबरदस्ती एक सौ इक्यावन रुपये का प्रसाद देकर बोले," इतना चढ़ावा तो बाबा को चढ़ता ही है। सही बात है ,जी कोनो बात नहीं ,पहली बार आये हैं। कोनो हिसाब किताब नाही करो,लेलो जी। पल्लू से रूपये निकल कर वह प्रसाद लेकर उनके पीछे चल पड़े। चप्पल वही रख कर सभी नंगे पांव चल पड़े। सभी के पैर जल रहे थे। लाईन में लगाकर वह लड़के गायब हो चुके थे। जलते पैरों से लाईन के आखरी में खड़े हो गए उन्हें अनुमान नहीं था। कि लाईन कितनी लम्बी हैं। "सुनो.. ,"का है गर्मी से परेशान गुंजन के बापू ने पूछा। "वे छोरे तो बोलत रहे, कि दर्शन जल्दी हो जावेंगे, इते तो कित्ती लंबी लाईन लगी हैं।

सभी इते से जा रहे हैं। यही जल्दी की लेन होगी अब शांति से खड़े रह। कमला खामोशी से लाइन में खड़ी आगे सरक रही थीं। दोनों लड़कियों को बड़ी भूख लग रही थी। उसने दोनों को सकरपारे दे दिए। चार घन्टे की लंबी लाईन में लगे रहने के बाद बाबा के दरबार में पहुँचे तो क्या देखते हैं। उनके आगे एक सेठ परिवार खड़ा था। वह साई के लिए सोने का कड़ा लाया था। पंडित जी ने आराम से मंत्र पढ़ कर उनकी पूजा अर्चना करवाई। अब इनकी बारी आई तो धक्का देते हुये कहॉ, आगे बढ़ो ,बाई आगे बढ़ो। कमला बोली,"पंडित जी हमारा प्रसाद बाबा के चरणों में नवाज दो जरा। अरे बाई देख नहीं रही कितनी भीड़ है। चलो, चलो, हो गए दर्शन वह प्रसाद की थैली उसके हाथ में वैसी ही रही। वह चारों धक्के के साथ बाहर निकल आये। कमला थक कर चूर हो गई थी। भूख के मारे उसका बुरा हाल हो रहा था। वह मन ही मन न जाने बाबा को क्या,क्या कहने आई थी। यहाँ तो नजर भर के बाबा के दर्शन भी नहीं करने दिए। "हमें बहुत भूख लगी है,कुछ खाने को मिलेगा गुंजन के बापू..? कमला ने थकी दी आवाज में पूछा। सामने ही प्रसादी भोज लिखा था। तुम हमारे ओर बच्चों के लिए कछु ले आओ जी। वह वहां गया तो चालीस रूपये की एक थाली भर पेट खाना ।

कमला पल्लू खोलकर देखती है। तो उसमें पचास रुपये के दो ही नोट बचे थे। उसने पचास का नोट देकर कहॉ तुम दोनों खालो ,यह तो बच्ची है कितना खायेगी.., ओर तू..? हम थोड़ा प्रसाद खा लेंगे, पानी पी लेंगे। प्रसाद की थैली में देखा तो नारियल, परमल, चिरोंजी दाने ओर कुछ फूल थे। दोनों बाप,बेटी ने भर पेट खाना खाया। उसने चार रोटी रुमाल में बांध कर जेब में रख ली। भीड़ होने के कारण उसे किसी ने नहीं देखा। उसने देखा तो कमला दीवार से सर टिकाकर मधु को गोद में लेकर सो गई थी। उसे एक दिन पहले वाला चहकता हुआ चेहरा नजर आ रहा था। तभी पुलिस वाला आया और उन्हें भगाने लगा। रात के दस बज चुके थे। वह सोच रहे थे। कि इतने कम पैसे में यहाँ कैसे रुक पाएंगे। सारे रुपये खत्म हो चुके थे। ,कमला हमें अभी ही घर के लिए निकलना होगा। अब तो बस के किराये के पैसे भी नहीं बचे कमला उस प्रसाद की थैली को गौर से देखकर बोली। उसने जेब से रोटी निकल कर कमला को दी। अब उसमें थोड़ी जान आ चुकी थी। चारों थक कर चूर हो चुके थे। सड़क की ओर निकल पड़े। थोड़ी दूरी पर एक टैक्टर खड़ा था। आधे में ईंटें भरी थी। थोड़ी सी जगह खाली थी। "ये क्या, तुम इसे कहे ताक रहे हो?हम का ई में जायेंगे। अरी भागबान अभी मोय ही ना मालूम ,थोड़ा धीरज धर,उतने में टेक्टर वाला आ गया। वह टेक्टर स्टार्ट करने लगा। "भाई जरा सुनो..,"क्या बात है। जब उन्हें पता चला कि उन्हीं के गांव की ओर जा रहा है। तो उन्हें थोड़ा सब्र हुआ। क्या हमें गांव तक छोड़ दोगे.?उसने सब को घूर कर देखा। ठीक है,बैठ जाओ पर ईंट रखी है। वह चारों थोड़ी सी जगह में बैठ गये। कमला आँखें बंद किये सोच रही थी। किती श्रद्धा से हम बाबा के दर्शन के लिए आये थे। कहते है सबका मालिक एक है। पर यहाँ तो पैसे वालों की पूजा है। बाकी किसी को भी एक क्षण के लिए बाबा को देखने भी नहीं देते। यहाँ लोग कितनी दूर,दूर से मुसीबतों का सफर तय करके आते है। यहां तो लोगों के "आस्था की लूट" मची हुई है।

वह बाबा के दरबार में इस नजारे को खुली आँखों से देख चुकी थी। न जाने गड़ते ईटो के टुकड़े पर कमला को कब आँख लग गई। अचानक टेक्टर रुकने की आवाज से वह जाग उठी। "उतरो टेक्टर का रास्ता यह से बदली होगा। लाओ बीस, बीस रुपये सवारी। कमला ने पल्लू से पचास को नोट उसे देते हुए कहॉ, बस इते ही है। वहअपने घर की ओर चल पड़ी। टेक्टर वाला उन्हें जाते देख सोच रहा था। रोज ऐसी सवारी मिल जाये तो चाय पानी का खर्च तो निकल ही आएगा ओर हँसने लगा । गांव की ओर जाने वाली पगडंडी पर टूटी चप्पल के साथ वह पैदल चल रही थी। "हो गए दर्सन देखा कितना फजीता हुआ ,पूरे महीने की पगार दो दिन में उड़ गई , अब क्या करेगी पूरा महीना। आप चिंता न करो जी,मालकिन को कहकर ज्यादा काम कर लूँगी, रोजनदारी पे हो जाएगा।

भोर हो चुकी थी। अलसाये कदमों से अपने परिवार के साथ(आस्था की लूट) देखकर थके कदमों से घर की ओर चली जा रही थी।

वन्दना पुणतांबेकर

इंदौर (म.प्र)

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