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सुख की चिर पूर्ति - ज्योति झा

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कहानी सुख की चिर पूर्ति ज्योति झा भारत के सुदूर दक्षिण में एक छोटा सा शहर पुडूचेरी पहले पांडिचेरी के नाम से जाना जाता था. समुद्र तट पर बसा ...

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कहानी


सुख की चिर पूर्ति

ज्योति झा

भारत के सुदूर दक्षिण में एक छोटा सा शहर पुडूचेरी पहले पांडिचेरी के नाम से जाना जाता था. समुद्र तट पर बसा हुआ एक सुंदर शहर. तमिलनाडू से घिरे होने के बाबजूद अपनी अलग पहचान रखता है सामजिक रूप से भी राजनैतिक स्तर पर भी .यहाँ वैसे रहते तो अघिकांश तमिल ही हैं पर यहाँ की सभ्यता और संस्कृति काफी अलग है .भाषा वही , लिबास वही पर फ्रेंच का आघिपत्य काफी दिनों तक रहने के कारण विकास का स्तर अलग है .काफी फ्रेंच लोग भी यहीं रचे बसे हैं, जिसके कारण रहन -सहन ,सभ्यता- संस्कृति काफी प्रभावित हो गई है .कई फ्रेंच रेस्टोरेंट हैं जो फ्रेंच लोग ही चलाते हैं .आम भारतीय की तरह यहाँ के लोग वाइन विस्की पीने वाले लोगों को शराबी की संज्ञा नहीं देते हैं ,ये सब सामाजिक रूप से मान्य है .दोनों सभ्यता के बीच शादियाँ भी हुई ,कहीं दूल्हा फ्रेंच ,लडकी तमिल तो कहीं इसका उलटा .देखने में वे जोड़े इतने बेमेल लगते हैं कि हिंदी का मुहावरा याद आ जाए, कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली ,पर दिल की बात कोई जान पाया है क्या आज तक ? दिल मिलने के बाद रंग ,देश, भाषा या किसी और चीज की क्या औकात ?

उस समय हम दिल्ली में रहते थे और दिल्ली के बाहर सिर्फ एक या दो बार लखनऊ गये थे .तो जब पति को बैंक में नौकरी मिली और उन्हें पांडिचेरी जाकर ज्वाइन करने को कहा गया तो पूरे घर में ऐसा मातम छाया मानो उन्हें काला पानी की सजा हो गई हो .

पर मैं खुश थी ,दिन भर सास के तानों से छुटकारा मिल जाए तो काला पानी की सजा भी कम है .क्योंकि ये कहानी आज की नहीं उस समय की है जब अधिकाँश बहुएँ अपने सास के मुँह से अपनी तारीफ़ के एक शब्द सुनने को इस तरह तरसती थी जैसे सीप पानी के लिए तरसता है .सही है .मूर्खा थीं वें, अपना अस्तित्व मिटा कर किसी और में मिल जाना चाहती थीं पर धरा कितना भी शस्य श्यामला क्यों न हो और क्षितिज कितना भी मन को लुभावने वाला क्यों न हो पर वे कभी मिलते हैं क्या ? सिर्फ मिलने का भ्रम ही पैदा करते हैं .सो मैं भी रात दिन मेहनत करती ,घर के सभी सदस्यों के लिए उनका मनपसंद व्यंजन बनाती ,सबकी खुशियों का यथा संभव घ्यान रखती ,सबसे मीठा बोलने की कोशिश करती जिस कारण घर के बच्चे से बूढ़े मेरी प्रशंसा करते नहीं थकते मगर यही प्रशंसा सास नामी जीव के मन के आग में घी का काम करता .अगर कोई कहता भाभी के पुलाव की खुशबू ही अलग है तो झट कहती “इतना घी और केशर डालती है .” अगर कोई कहता बड़ी (मिथिला का ख़ास व्यंजन ) कितनी अच्छी तरह से फूली है तो कहती बेसन बहुत अच्छा है मगर अगर बड़ी नहीं फूलती तो कहती “ मैके से कुछ सीख कर नहीं आई .”

सो नियुक्ति पत्र एक तरह से मेरी आजादी का फरमान था ,स्वतंत्र तरीके से जिन्दगी को देखने का , समझने का सपना था क्योंकि मायके में भी कम बंदिशें नहीं थी उन दिनों .अगर कभी अकेले मायके पहुंच जाओ तो दस तरह के सवाल “ जमाई बाबू क्यों नहीं आये ? कहीं लड़ झगड़ कर तो नहीं आई ?” ............. उनके डरे सहमे चेहरे, उन सब का मुझे इस तरह घूरना मानों मेरी आँखों में छिपे किसी दर्द के एहसास को समझने की कोशिश कर रहे हों ,उनका फोन नहीं आ जाने तक घर में असामान्य सी उलझन मुझे अंदर तक हिला देता और मैं सोचती आखिर क्या कमी है मुझमें यही कि मैं लडकी हूँ ?

मगर लडकी के बिना लड़का भी तो अधूरा ही है न ,रिक्त है अपरिपूर्ण है .उसकी जिन्दगी भी तो अकेले सुचारू रूप से नहीं चल सकती . यह बात ये लोग क्यों नहीं समझते हैं ? और अगर लड़का बाहर काम करता है ,तसल्ली से ,निश्चिंतता से तो वह भी इसलिए कि उसके घर की व्यवस्था सुदृढ़ता से चलाने के लिए कोई है .फिर किस बात का डर इन्हें सताता रहता है ?

एक दिन मैंने अपने पति से कहा था ज्यादा रौब देने की जरूरत नहीं ,मैं आपकी जगह बाहर का काम आसानी से कर लूँगी पर कहीं एक दिन आपको मेरे काम करने पड़े तो छट्ठी का दूध याद आ जाएगा पति महोदय ने कहा तो यही कि अच्छा अच्छा बहुत बोलती हो पर उनकी हेकड़ी ठिकाने आ गई .

कहते हैं व्यक्ति को अपनी आने वाली ख़ुशी के बारे में ज्यादा सोचना नहीं चाहिए क्योंकि जब उसे वह ख़ुशी मिल जाती है तो उसकी चाहत समाप्त हो जाती है और उस ख़ुशी के साथ और भी कुछ आता है जिस तक व्यक्ति की सोच पहुंच नहीं पाती है . वह अपनी चाहत में इस तरह उलझा रहता है कि अगल बगल की चीजें उसे दिखतीं ही नहीं हैं या यों कहें कि वह देखना ही नहीं चाहता है .मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ .

पति ने पांडिचेरी के बहुत ही शानदार मुहल्ले बृन्दावनम में छोटा सा फ़्लैट नुमा घर लिया क्योंकि उनका मानना था कि घर छोटा हो या बड़ा बढ़ते बच्चों के लिए आसपास का माहौल ,लोग बहुत अच्छे होने चाहिए ताकि बच्चे स्वस्थ, सभ्य परिवेश में जीवन के अनुभवों को जाने समझें .

मैं बच्चों के साथ पहुंच गई उस छोटे से फ़्लैट में अपनी आजादी का उत्सव मनाने पर वह उत्सव उत्सव न रहकर अभावों का डेरा मालूम पड़ा .एक साथ कई कई अभाव ,कई कई बोझ सर पर मंडराने लगे .अकेले बच्चों को संभालना ही पूरे दिन का काम है तब जाकर समझ में आया ,उसके बाद घर का सारा काम, घर गृहस्थी की तमाम जिम्मेदारियां ,बाजार का काम .बोझ से कदम डगमगाने लगे .अपनी स्वार्थमयी सोच पर तरस आने लगा .फूल से बच्चों को जब तब डांट फटकार पड़ने लगी

पति ने ताड़ लिया पूछा “ मम्मी को कहूँ कुछ दिनों के लिए आ जाए ?” अँधा क्या माँगे दो नयन ?

मम्मी जी आ गई .आते ही उन्होंने कहा “ क्या हाल कर दिया है बच्चों का ? कितना दुबला हो गया है मेरा सोनू ? और रिया के रंग को देखो कहाँ गया इसका दुधिया गोरा रंग ? कैसी मुरझा गई है .......और भी कई कई खामियां पर दोपहर में भी चैन की नींद सोने को मिलने लगी ,तानों का क्या इस कान से सुनो उस कान से निकाल दो .

यहाँ आने के बाद से अब तक मेरा परिचय सिर्फ मकान मालिक से था .वे जिपमर में डाक्टर थे एवं उनकी पत्नी वहीं कोई काम करती थीं ,दो बेटे थे ,दोनों की शादी हो गई थी एक दिल्ली में था और एक भोपाल में .वे नीचे रहते थे बडे से घर में ,उपर उतनी ही जगह में चार फ़्लैट बना दिया गया था भाड़ा पर देने के लिए जिसमें से दो खाली पड़े थे, एक में मैं रहती थी दूसरे में जिपमर का कोई डाक्टर रहता था ,उसके तीन छोटे छोटे बच्चे थे . एक या दो बार उनकी पत्नी शैलजा से मिलना हो पाया था ,उसकी हालत भी मेरी जैसी थी सो काम से फुर्सत ही नहीं मिलता था हाँ महरी को रखवाने में उसने बड़ी मदद की ,ऐसी महरी जो थोडा बहुत अंग्रेजी जानती थी .

अगल बगल बड़ी बड़ी अट्टालिकाऍ थीं ,बड़े बड़े बंगले में रहने वाले पैसे वाले लोग थे मगर छत से से देखने पर अक्सर नौकर चाकर ,माली ही देखने को मिलते ,कभी कभार गैरेज में घुसते या निकलते गाड़ी दिखते पर बैठे लोग या उनकी शक्ल कभी नहीं दिखती .मगर मम्मी जी के आने पर आस पड़ोस की सभी खबरें मिलने लगीं .कैसे पता नहीं क्योंकि मम्मी जी को इंग्लिश नहीं आती थी और यहाँ के लोगों के लिए हिंदी तो विदेशी भाषा है .

पूछताछ करने पर पता चला कि बगल के बंगले में जो आया है वह थोडा बहुत हिंदी जानती है क्योंकि वह केरल से है और किसी बिहारी परिवार के साथ दस वर्ष रह चुकी है वही मम्मी को सारी बातें बताती है ,उसका नाम लता है यह भी पता चला कि वह कुछ काम नहीं करती है सिर्फ नौकरों और घर की देखभाल करती है और सिर्फ लता ही नहीं यहाँ लगभग सभी घरों में एक आया है जो सिर्फ घर का प्रबंध देखती है .मम्मी ने यह भी कहा कि लता की मालकिन बहुत मिलनसार है उसने कहा है बहू बच्चों को लेकर घर आने .

मुझे बहुत रश्क हुआ जिसके यहाँ कोई काम नहीं है वहाँ नौकरों की भरमार है ,घर बंगला गाड़ी है ,जहां बच्चे हैं काम है वहाँ छोटा सा घर है एक महरी सुबह शाम आती है .पति ने समझाते हुए कहा था “ नौकरी पेशा लोगों के साथ अक्सर ऐसा ही होता है , जब हमारे बच्चे भी बड़े होकर अपने अपने घरों में चले जाएँगे तब हमारे पास भी शायद ये सब सुबिधायें होंगी .” मैंने मन ही मन सोचा काश उलटा होता .

कुछ दिनों के बाद एक शाम हम उनके घर गये .घर देखकर मन प्रसन्न हो गया .घर हो तो ऐसा .वैसे हमारे मकान मालिक का घर भी अत्यंत बड़ा था पर सिर्फ बड़ा था कोई कलात्मकता नहीं थी ,सजावट के सामान तो बिखरे पड़े थे पर उनमें कोई सामंजस्य नहीं था .

यहाँ ड्राइंग रूम में घुसकर एक अजीब सा सुकून मिला ,सजावट में दिल छू लेने वाली गहराई थी .एक से एक बेशकीमती पेंटिग्स दीवारों पर सजे थे एक कोने में बड़ा सा एक्वेरिअम था ,रंग बिरंगी जीती जागती यहाँ से वहाँ भागती ,खेलती कूदती मछलियाँ कितनी आकर्षक लग रही थीं ,मानों निर्जीव वस्तुओं में जान डाल रही हों .लगभग बीस पच्चीस लोगों के बैठने का इंतजाम था .सोनू यहाँ से वहाँ दौड़ने लगा. मैं डर गई कुछ तोड़ फोड़ न दे . मैंने कहा “ दीपा आंटी हम बाहर बैठें लान में .” आंटी ने शायद मेरा डर भाँप लिया कहा “ टूटने फूटने वाली चीजें उपर है तुम बैठो आराम से .” तभी लता कुछ खिलौने ले आई ,बच्चे उसके पास भाग गए बात चीत के साथ साथ चाय नाश्ता भी हुआ , बच्चे लता के साथ व्यस्त थे सो हम आराम से बैठकर काफी पी रहे थे .बड़ी अच्छी फ़िल्टर काफी थी पर मम्मी को अच्छी नहीं लगी. मैंने कहा “ अगर अच्छी नहीं लग रही है तो छोड़ दीजिये .” आंटी ने जानना चाहा हम हिंदी में क्या बात कर रहे हैं ? मैंने आंटी को कहा उन्हें काफी उतनी अच्छी नहीं लगती है क्योंकि वे ज्यादातर चाय ही पीती हैं . तुरंत उनके लिए चाय आ गई .

बच्चे तो आना ही नहीं चाहते थे कुछ प्रलोभनों के बाद हम उन्हें मनाने में कामयाब हो पाए .घर आने पर मुझे अपने घर का अभाव बढ़ चढ़ कर लगा .एक टेलीविजन भी नहीं कि कुछ देखकर आदमी अपना मन बहला ले .

दीपा आंटी से हमारी दोस्ती बढती गई ,वे मम्मी से कुछ छोटी थीं .उनके दो बच्चे थे .बेटा मेडिकल में एम एस कर रहा था अमेरिका में, बेटी कनाडा में कोई कोर्स कर रही थी , पति सरकार में किसी बड़े पद पर थे .खर्च के लिए उन्हें वेतन का मोहताज नहीं होना पड़ता ,पूर्णमासी के चाँद के साथ साथ उनके यहाँ ऊपरी आय का बहता श्रोत था .

ऋतुएँ बदलने लगीं ,मेरा जीवन पटरी पर चल पड़ा ,बच्चे स्कूल जाने लगे .मम्मी जी दिल्ली जाती मगर बच्चों के बिना उनका मन नहीं लगता ,यहाँ आती तो दिल्ली का घर अस्त व्यस्त हो जाता सो वे दो पाटों के बीच पीसने लगीं और मैंने उनके व्यंग बानों में छिपे अपने लिए प्यार को जाना .

मम्मी के नहीं रहने पर आंटी से काफी मदद मिलती . आंटी काफी मिलनसार एवं दूसरों की मदद करने वाली थीं ,नौकरों से भी उनका व्यवहार काफी अच्छा था .आसपास के लोग उनकी इज्जत करते थे . उनकी अंग्रेजी काफी अच्छी थी. चेन्नई के विद्या मन्दिर स्कूल से उन्होंने अपने स्कूल की पढाई पूरी की थी ,फिर चेन्नई विश्वविद्यालय से तमिल में एम ए किया था पर नौकरी के बारे में कभी सोचा ही नहीं . यों तो वे हमारी हमउम्र नहीं थी पर हम दोनों का साहित्य के प्रति रुझान हमारी अंतरंगता का सबब था .हम बातें अंग्रेजी में करते ,वे मुझे तमिल साहित्य के बारे में बताती और मैं उन्हें हिंदी साहित्य से अवगत कराने की कोशिश करती .दरअसल हम अपनी अपनी भाषा को श्रेष्ट साबित करने की होड़ में लगे रहते ,पर जब विचारों में कटुता का समावेश होने लगता तो वे बड़ी चालाकी से बात का रुख पलट देती और मैं हारे हुए सिपाही की तरह कुढती रहती .

उन्हें किताबें पढने का बहुत शौक था ,उनकी किताबों की भरी आलमारी से मुझे बहुत जलन होती ,काश मेरे पास एक छोटी सी आलमारी ही होती हिंदी किताबों से भरी . वे आलमारी खोलकर बड़ी उदारता से कहतीं जो जो चाहिए ले लो मुझे लगता कोई मेरे जले पर नमक छिडक रहा है क्योंकि उसमें कुछ अंग्रेजी की पुस्तकों को छोडकर सभी तमिल की किताबें थीं . अंग्रेजी किताबें पढने को तो पढ़ लेती थी पर उनमें यह बात कहॉ ? मिटटी की खुशबू कहां ,मन को उद्वेलित करने वाले भाव कहां ? अपनी सभ्यता संस्कृति से कोसों दूर . साहित्य तो मन में रचा बसा हो तभी आत्मा को तृप्त कर सकता है . यह बात एक दिन मैंने उनसे कही .वे चुप हो गई थी , कुछ सोचने लगीं थी .

उसके कुछ दिनों के बाद एक दिन वे मेरे पास आईं और कहा “चलो तैयार हो जाओ मैं तुम्हे एक जगह ले जाऊँगी .” मम्मी जी आई थी पूछा “ कहाँ ?” उन्होंने कहा आकर बताऊंगी . मैं असमंजस में खड़ी थी . मम्मी ने कहा “ जाओ मैं बच्चों को संभाल लूंगी जब वे स्कूल से आएँगे .” उन्होंने कहा “ मैंने लता को कह दिया है वह आ जायेगी .” हम मेन रोड पर आकर रिक्शा में बैठे . मैंने जानने की कोशिश की “ आंटी हम जा कहां रहे हैं ?” तुमने एक दिन कहा था न कि तुम्हे सरप्राईज पसंद है .” हाँ हमने कहा था पर कुछ हिंट्स तो दे दीजिये .” पर वे चुप रही और मुस्कुराती रही . रिक्शा थोड़ी देर में महात्मा गांघी रोड पर पहुंच गया ,दोनों तरफ दुकाने शुरू हो गई . साड़ियों की कपड़ों की ,खिलौनों की .....मुझे लगा शायद वे किसी के लिए कोई गिफ्ट खरीदना चाहती हैं ,पसंद करवाने के लिए मुझे लेकर आईं हैं क्योंकि कई बार उन्हें कहते सुना था “ आजकल की लडकियों का पसंद ,मुझे तो कुछ समझ में नहीं आता है .” लेकिन तभी उन्होंने एक छोटी गली में रिक्शा मोड़ने को कहा .पांच छह मिनट के बाद हम उतर गये उन्होंने रिक्शा वाले को पैसे दिए और प्रसन्न होकर कहा चलो . “ मगर कहां ?” तभी हमने सामने एक बड़ा सा बोर्ड देखा “ दक्षिण भारतीय हिंदी पुस्तकालय .” और मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा . हम अंदर गये सारे हिंदी मैगजीन ,अखबार और कई कई पुस्तकें ,लगभग सभी लेखकों की .उन्होंने मुझे कार्ड बनवा दिया और कहा तुम दो किताब और एक पत्रिका ले सकती हो एक बार में . मैंने गदगद होकर उन्हें धन्यबाद कहा और कृतज्ञता के बोझ में दब गई

यों तो हम कई बार अंकल से भी मिले पर कुछ था कि मेरे पति और अंकल जब भी मिलते मानों ठान कर आये हों एक दूसरे को नीचा दिखाने की , हर बात में बहस चाहे राजनीति हो या सामाजिक कोई मुद्दा या कुछ और दोनों दो अलग अलग छोर पर टिके रहते और हम उन्हें शांत करने की कोशिश में लगे रहते .

एक बार अंकल हमें ला सेफरे रेस्टोरेंट लेकर गये . यह एक फ्रेंच रेस्टोरेंट है .पति को यह बात भी अच्छी नहीं लगी .उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा “ अगली बार से मना कर देना .” “ पर आखिर क्यों ? इतने प्यार से बुलाते हैं .” “देखो हम उन्हें इतने मंहगे रेस्टोरेंट में लेकर नहीं जा सकते हैं न इसलिए ज्यादा मेलजोल बराबरी वालों से ही ठीक होता है .”

मैंने कहा “पर उन्हें तो मेरे हाथ का नार्थ इंडियन खाना बहुत पसंद है .अंकल तो कल ही कह रहे थे “कितने दिन हो गये तुम्हारे हाथ का छोला भठूरा खाए ,कब खिला रही हो ?” “ तुम तो बात समझना ही नहीं चाहती . तुमसे तो कुछ बोलना ही बेकार है .” लेकिन मैं खूब समझती थी पति अंकल की तरक्की, ऐशो- आराम से ईर्ष्या करते थे . लेकिन जब अंकल ने हमें क्लिंजल बीच रिसोर्ट जाने का न्योता दिया तो मैं मना नहीं कर पाई “रिया और सोनू कितना खुश रहेंगे ,पूरे तीन दिनों तक समुद्र के किनारे ,होटल में रहना कितना मजा आएगा आएगा .” पति महोदय भी मुझे कुछ न कह पाए .

क्लिंज्ल बीच पांडिचेरी से लगभग तीस किलोमीटर दूर है .दूर तक रेत ही रेत ,बिल्कुल साफ़ सफेद संगमरमर की तरह .सागर का पानी भी बिल्कुल स्वच्छ क्योकि वहाँ लोगों का आवागमन ज्यादा नहीं है .

अंकल के किसी बचपन के दोस्त का रिसोर्ट है सो पैसे का तो सवाल ही नहीं. रहना ,खाना पीना सब फ्री .हम गए तो बड़े उत्साह से पर लौटते वक्त सबके चेहरे पर बारह बजे थे .

हम लगभग दोपहर के तीन बजे रवाना हुए , शाम को पहुँचे .पूरी शाम हम समुद्र के किनारे बैठे ,आंटी बहुत खुश थी .उन्होंने एक तमिल गाना गाया . अंकल ने कहा “पता है ये हमारे लिए बहुत खास गाना है ,इसी गाना को सुनकर मैं इसका दीवाना हो गया था .” आंटी झेंप गई और उठकर बच्चों के पास चली गई . हम सब हंसने लगे .बच्चों के साथ आंटी बिल्कुल बच्ची बन जाती थी ,वे बच्चों को लेकर पानी में चली गई .बड़ी देर तक बच्चों की किलकारी एवं आंटी की हँसी की आवाज गूंजती रही .

वह शाम हमारी खूब अच्छी बीती .रात भर सब ठीक रहा पर सुबह आंटी की तबीयत खराब हो गई .अंकल ने बहुत कोशिश की कि सब ठीक रहे पर दस बजते बजते आंटी आपे से बाहर हो गई .कुछ से कुछ बोले जा रही थी ,कभी जोर जोर से रोने लगती तो अगले पल हंसने लगती .

दरअसल आंटी मानसिक तनाव की रोगिणी थी ,उन्होंने मुझे बताया था एक दिन . पर मैंने उन्हें कभी ऐसे देखा नहीं था .उन्होंने मुझे बताया था कि ऱोज रात में एक दवा लेनी पडती है बस . मैंने पूछा था “ कब से है यह बीमारी ?” उन्होंने धीरे धीरे बड़े ही उदास से स्वर से बताया था “ काफी दिनों से है पर घर के बाहर किसी को मालूम नहीं है तुम भी मत बताना नहीं तो लोग पता नहीं क्या क्या सोचेंगे और न जानें क्या क्या बातें बनायेंगे ,तुम समझ रही हो न ?” मैंने हडबडा कर कहा “ हाँ हाँ आंटी आप निश्चिन्त रहें .” और मैंने बात को इतना अंदर दबा लिया था मानों मैं भी इस बात को भूल गई थी और उस दिन अचानक देख कर डर गई .

अंकल ने क्रोधित होते हुए कहा “ इतनी महत्वपूर्ण दवा आखिर कैसे कोई भूल सकता है ?” मगर आंटी तो जैसे कुछ सुन ही नहीं रही थी ,मानों उनकी दुनिया ही अलग हो .उनके दुःख सुख इस दुनिया के न होकर किसी और दुनिया से सम्बन्ध रखते हों और वे अपनी उसी दुनिया में खोई थी .किसी को डांट रही थी किसी से प्यार से बातें कर रहीं थी पर किससे ?”

अंकल ने आस पास से पूछवाया पर पता चला कि पांडिचेरी जाने पर ही उनकी दवा मिल सकेगी .तब हमने लौट जाने का निश्चय किया .बच्चे मायूस हो गये अंकल ने उनसे वायदा किया कि अगले महीने वे उन्हें लेकर अवश्य आएँगे .

रास्ते भर वे चुप थीं . हम सब भी चुप थे .अंकल अपना सारा क्रोध बेमतलब के जोर जोर से हार्न बजा बजा कर उतार देना चाह रहे थे .बड़े अनियंत्रित तरीके से गाड़ी चला रहे थे वे . अगल बगल से निकलने वालों पर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे थे .

बड़ी दूर तक समुद्र के बगल बगल ही रास्ता था . उस दिन पूर्णिमा था ,सागर में जोर जोर से हिलोरें उठ रहे थे .उसकी आवाज सायं सायं कर रही थी .शायद इतने ही हिलोरें आंटी के मन में भी उठ गिर रहे होंगे .

इस घटना के बाद कुछ दिनों तक मेरी उनसे मिलने की हिम्मत नहीं हुई .वैसे भी रिया का जन्मदिन आने वाला था और मैं उसकी तैयारी में व्यस्त थी . पति ने हिदायत दे दी थी “ उस पागल को मत बुलाना ,पूरी पार्टी खराब हो जायेगी .” मन तो हुआ चिल्ला चिल्ला कर कहूँ वे पागल नहीं हैं कोई दुःख है जो उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रहा है पर बिटिया को अपनी ओर जिज्ञासा से ताकते हुए चुप हो गई सिर्फ इतना ही कहा “ बच्चों के सामने ऐसी बातें तो न करो .”

जन्मदिन वाले दिन करीब सुबह के नौ बजे होंगे, काल बेल बजने पर मैं दौड़ी आई खोला तो सामने उन्हें देखकर मैं थोडा घबडा गई .अंदर आने को भी नहीं कहा मानो सांप सूंघ गया हो .उन्होंने ही कहा “ मुझे मालूम था ,तुम मुझे नहीं बुलाओगी इसलिए सुबह ही चली आई .” उनके हाथ में एक बड़ा सा डिब्बा था ,सहेजकर सुंदर कागज में लिपटा हुआ .उसे मुझे पकड़ाते हुए उन्होंने कहा “ रिया को दे देना और मेरी तरफ से बहुत सारा आशीर्वाद भी ........” मेरी चेतना लौट आई और मैंने कहा “ आप खुद ही दे दीजिये न आंटी और अंदर आइये न बाहर क्यों खड़ी हैं ?”

आंटी थोड़ी देर बैठी और फिर उदास मन से लौट गई .

जाने के काफी देर बाद उनके रोने की आवाज आई .जोर जोर से रोने की आवाज .यह आवाज पहले भी आती थी कभी कभी पर चारों ओर घर होने के कारण स्पष्ट नहीं हो पाता था कि आवाज किसके घर से आ रही है ? अब बहुत ही स्पष्ट सुनाई दे रहा था मानो वह दर्द हम तक सीधे सीधे पहुंच रहा हो .मन में एक टीस सी हुई ,इच्छा हुई जाकर उन्हें सांत्वना दूं ,पर क्या ? और कैसे ?

कुछ दिनों के बाद एक दिन लता का फोन आया “दीदी प्लीज जल्दी आइये ,मैडम हमसे संभल नहीं रही है .” मैंने कहा “ ये कौन सी नई बात है ? दवा दे दो न ,भूल गई होंगी रात में .” “ दीदी एक भी दवा नहीं है उन्होंने सारी दवा फेंक दी .” मैं गई ,मुझे देखकर उनकी आँखों में थोड़ी हलचल हुई और वे बैठ गई और रोने लगीं ,मैं उनके पास बैठ गई उनके हाथों को अपने हाथों में ले लिया .थोड़ी देर रो लेने के बाद वे शांत हो गई और लेट गई जैसे सोने की कोशिश कर रही हों ,लता दवा लेकर आ गई. हमने दवा को दूघ में डालकर उन्हें पिला दिया ,दवा पीकर वे बैठ गई पर उनकी आँखें पता नहीं किस ओर देख रही थी ? थोड़ी देर के बाद मैंने कहा आंटी लेट जाइए और वे एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह चुपचाप लेट गईं .

लता ने कहा “ थैंक्यू दीदी आज पता नहीं क्या हो जाता ?” “ मगर उन्होंने दवा फेंकी क्यों ? ऐसा तो उन्होंने पहले कभी नहीं किया ?” पूछा मैंने “ पता नहीं क्या हुआ ? एक किताब पढ़ रही थी .सुबह से बहुत खुश थी .किताब पढ़ते पढ़ते मुझसे कहा काफी बना दो ,जब मैं काफी लेकर आई तो मुझसे कहा “ लता मैं ठीक हो गई हूँ ,रात में मैंने दवा भी नहीं ली ,मेरी दवा फेंक दो .”

“ मेरे मना करने पर जबरदस्ती करने लगी और दवा टॉयलेट में फेंककर फ्लश चला दिया और जोर जोर से हंसने लगीं और फिर किताब उठा उठा कर फेंकने लगीं .”

लता एक बात बताओ अंकल का किसी से चक्कर वक्कर है क्या ?” “ नहीं तो आप ऐसे क्यों पूछ रही हैं ?” “ नहीं मतलब कोई गहरा दुःख कोई सदमा तो होगा न इन्हें ,अगर उस व्यथा को दूर करने की कोशिश की जाय मेरा मतलब ........” जोर जोर से हँसने लगी लता “ ओ मैं समझ गई दीदी पर ....” “ पर क्या बताओ न ,मुझे तो घर की सारी बातें मालूम है फिर बताओ न कौन सा दुःख है इन्हें ?” बहुत ही भावुक हो गई वह और बड़ी ही पुरखिन अंदाज में कहा “ दीदी इन्हें कोई दुःख नहीं है ,कोई चाह ऐसी नही बची है जो जिन्दगी में उमंग भर सके. जीने की चाह दे सके ,अंकल का प्यार ,घर गाड़ी बंगला ,अथाह पैसे, अच्छे पढ़े सुसंस्कृत बच्चे ............आप समझ रही हैं न .” “ नहीं मैं कुछ भी नहीं समझ रही हूँ .” “ मतलब इनके दुःख का कारण यही है कि इन्हें कोई दुःख नहीं है .” मेरा मुँह अचरज से खुला का खुला रह गया .घर आते आते मुझे महादेवी वर्मा की कविता याद आई “ सुख की चिर पूर्ति कर जाती जीवन निष्फल .” पर इस तरह ? इस हद तक ? घर पहुँचने पर अपने घर के अभावों से मुझे बड़ी राहत मिली और मैं सोचने लगी “ अगले दीपावली तक कुछ पैसे जमा हो जाएँगे तो सबसे पहले टेलीविजन खरीदूंगी .

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: सुख की चिर पूर्ति - ज्योति झा
सुख की चिर पूर्ति - ज्योति झा
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रचनाकार
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