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लघुकथा - मां की पसंद - ज्ञानदेव मुकेश

मां की पसंद

बड़े बेटे ने मां से पूछा, ‘‘मां, आज मेरी पसंद का क्या बनाओगी ?’’

मां ने कहा, ‘‘तुम ही बताओ।

‘‘मेरी पसंद का चाऊमिन बना दो।’’ बेटे ने कहा।

मां ने बेटे की पसंद का चाऊमिन बना दिया।

तभी मंझले बेटे ने कहा, ‘‘मां, मुझे आलू के पराठे पसंद है। मेरे लिए वही बना दो।’’

मां ने मंझले बेटे की पसंद का भी खयाल रखा और आलू के पराठे बना दिए।

अब छोटे बेटे की बारी थी। उसने कहा, ‘‘मां, मैंने पाव भाजी कई दिनों से नहीं खाया है। आज मेरा मन पाव भाजी खाने का है।’’

मां फिर किचन में गई और थोड़ी मशक्कत के बाद छोटे बेटे की पसंद का भी चीज बना लाई।

तीनों बेटे एक साथ मिलकर अपनी-अपनी पसंद की चीजें खाने लगे।

तभी बड़े बेटे ने मां से पूछा, ‘‘मां, तुमने अपनी पसंद का क्या बनाया ?’’

मां ने भी अपनी थाली तैयार कर ली थी। उसने अपनी थाली बच्चों के सामने कर दी। बच्चों ने देखा, मां की थाली में तीनों आईटम थोड़ी-थोड़ी मात्रा में रखी हुई थी।

बच्चों ने कहा, ‘‘मां, ये तो हमारी पसंद की चीजें हैं।’’

मां ने कहा, ‘‘ जो मेरे बच्चों को प्रिय है, वही तो एक मां को प्रिय होता है। मेरी तो यही पसंद है। ?’’

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(ज्ञानदेव मुकेश)

पता-

फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,

अल्पना मार्केट के पास,

पाटलीपुत्र रोड़,

पटना-800013 (बिहार)

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