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चमकता सितारा - संजय कर्णवाल की कविताएँ

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जो अपना हो नहीं सकता ,
उसे अपना बनाय क्यूँ।
जो मन की दुनिया है अपनी
उसे हम तड़पाय क्यूँ।।
ये सारा जग जो दिखता है
चमकता सितारा सा।
सितारों की चमक दिखती हैं
दूर से उसे पास लाए क्यूँ।

ज़मी आसमां में लगता है,
नहीं कोई हमारा है।
किसे समझें हम अपना
कोई भी न मन को भाय क्यूँ।।

समझ में क्यूँ नहीं आता
नहीं कोई मुझे समझता
चुन चुन कर मोती की माला
बनाऊं पर टूट जाय क्यूँ।।

2

बात अपनी हम समझाय कैसे सबको।
ज़ख्म अपने सब दिखाय कैसे सबको।।
जो न खिल पाएँ फूल बहारो में
उन फूलो को फिर से हम खिलाएं कैसे सबको।।

जो न मिल सका कभी हमको
कोई तो कारण न मिलाए कैसे ऐसे सबको।

क्यूँ बेचैनी बढाती है मेरी धड़कन को
ये बेचैनी इतना बेचैन कर जायं कैसे सबको।।

3

बड़े वीराने से लगते हैं ये मौसम पतझड़ के
हवाएं सर्द रहती है ये कैसे सितम पतझड़ के
मगर उम्मीद बाकी है गुजर जायेंगे ये दिन भी
अभी खामोश है नये रंग दिखाएंगे ये दिन भी
इंतजार के बाद आयेगा जीने का अंदाज नया
समझ आयेगा हमको ये जिंदगी का राज नया।


4

हर एक पल बीत ही जाता है धीरे से
फिर एक नया पल आता है धीरे से
कुछ नया सिखाता है
कुछ नया दिखाता है
आता है जाता हैं
नई खुशियां लाता है
कभी गम भी दिखाता है
कभी कोई गीत गुनगुनाता है धीरे से
सोच नहीं पाते हैं हम
खुद को भी नहीं समझाते हैं हम
ये आँखें हो जाती है नम
जो रुलाती है ज्यादा कभी कम
होता है कोई करम
वो भी पल गुजर जाता है धीरे से।

5

सपनों की उड़ान भरे
नेक जग में काम करे
हम सुधरे और सब सुधरे
अच्छा जग में नाम करे
झूम झूमकर गाए गीत
सबसे अपनी बनी रहे प्रीत
विचलित न कर पाए हार जीत
बजता रहे सदा जीवन संगीत


6
जब हम समझ जाय खुद को
एक अनोखा सा अनुभव होता
कोई तो बात अपनी जो हमको
सिखलातीऔर महत्व होता
बेहतर हम समझे,बेहतर कर जाय
हो कर्म ऐसे जो मन को हरदम भाय

पक्का यकीं हम कर ले,
अपना कदम आगे रखले
जो समझा अब तक
थोड़ा हम और समझले।

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