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समीक्षा - कैथी लिपि : एक परिचय

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समीक्षित पुस्तक: कैथी लिपि : एक परिचय

मूल्य : 180/-रु.

प्रथम संस्करण : 2019

लेखक : ध्रुव कुमार

प्रकाशक-कम्बू टेक्नॉलोजीज़, 1360 बी, दयानन्द कॉलोनी, गुरुग्राम, हरियाणा-122001

समीक्षक : डॉ. मनोज मोक्षेंद्र

मृतप्राय कैथी लिपि को सहेजा जाए

भारतीयों में भूलने का रिवाज़ बहुत आम रहा है। मूल रूप से भारतीयों अर्थात हिंदुओं के इस महादेश में जहाँ इसका भौगोलिक विस्तार भी सिमटता रहा है और यह शस्य श्यामला भूखंड खंड-खंड, टुकड़े-टुकड़े होकर न केवल अपनी अस्मिता को खोता रहा है बल्कि इसकी अपनी विरासत और संस्कृति पर भी बट्टा लगता रहा है। अब अगर परंपराएं, रीतियाँ और संस्कार घटते रहे हैं या यूं कहिए कि मिटते रहे हैं, जो सच भी है, तो हम इसे सांस्कृतिक क्षयरोग की संज्ञा देकर संतोष करने का स्वांग रच सकते हैं जबकि यह क्षयरोग लंबे अनुभवों के आधार पर लाइलाज़ भी हो चुका है। यहाँ हमें तनिक अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के पक्ष में पक्षपातपूर्ण ढंग से बोलना लाज़मी लगता है क्योंकि जिन उल्लेखनीय तत्वों के कारण हमारा सांस्कृतिक अपक्षय होता रहा है, वे अजगरी तत्व विदेशज रहे हैं जो कई सदियों से भारतीय मूल संस्कृति पर न केवल हावी होते रहे हैं बल्कि उन्हें निगलकर उसे अपने मल-मूत में परिणत करते रहे हैं। अर्थात हमारी संस्कृति को इस तरह बरबाद करते रहे हैं कि इससे बदबू आने लगे और इस संस्कृति के अनुयायी इसे त्याज्य समझकर त्याग दें। वे हमारे अच्छे सांस्कृतिक तत्वों को हर प्रकार से समाज के लिए विघटनकारी साबित करते रहे हैं तथा कालांतर में हमारे सामाजिक जीवन पर कुछ स्वार्थी तत्वों द्वारा उगाए गए अपसांस्कृतिक तत्वों के साथ अच्छे सांस्कृतिक तत्वों का भी घालमेल करते रहा है।

हमारी भरत-भूमि न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत से ही शताब्दियों तक तौबा करती रही है बल्कि इसके मूल निवासी विदेशज संस्कृति लादने वाले आक्रांताओं की ज़बान में ही बोलने भी लगे। यह स्थिति निःसंदेह, बड़ी विषादपूर्ण और निराशाजनक रही है। इस अपघटनकारी स्थिति में हमने अपनी भाषाओं की लिपियों की भी बलि चढ़ा दी और इस भुलाने के रिवाज़ में संस्कृत जैसी सर्वशुद्ध उत्कृष्ट भाषा भी अलोकप्रिय हो गई जबकि इसे विस्मृति की गुफ़ा में दफ़्न करने के लिए इस पर अभिजात्यवर्ग की भाषा होने का दोष भी मढ़ा गया। बहरहाल, भुलाने की इस प्रक्रिया में या यूं कहिए कि तथाकथित अभिजात्यवर्ग की भाषा संस्कृत के विरोधस्वरूप कुछ जनभाषाओं अर्थात प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं का जन्म हुआ। अस्तु, प्राकृत और अपभ्रंश भी हमारी संस्कृति को मुखर करने वाली ही भाषा बनी रही क्योंकि इनके विकासकाल में विदेशी संस्कृतियों का हमला हमारी संस्कृति पर नहीं हुआ था। चुनांचे, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं के तिरोधित होने का एक बड़ा कारण स्वर्णिम गुप्तकाल के बाद से विदेशियों के आक्रमणों की शुरुआत थी। पर, हमारी मर्त्य संस्कृतियों को ज़बान देने के लिए कतिपय अन्य भाषाएँ बार-बार मुखर होती रही हैं और यह कहना अत्युक्तिपूर्ण नहीं होगा कि आज भारत में अनगिन लोकभाषाएँ और बोलियाँ हैं जिनमें से कुछेक को ही अंग्रेजी जैसी अतिअपवादात्मक भाषा की प्रभुता के कारण संविधान की आठवीं सूची में भी स्थान दिया गया है। द्वंद्वात्मक सांस्कृतिक परिवर्तनों और भाषा और लिपि-अपघटन और नवसृजन के दौर में एकाध ऐसी भाषा और लिपि का भी अभ्युदय हुआ जिसने न केवल राजदरबारों, सरकारी मोहकमों तथा जनांचलों में अपनी सकारात्मक पैठ बनाई बल्कि एक मुखर और व्याकरणनिष्ठ स्वरूप में विकसित हुईं लेकिन उन्हें सर्वस्वीकार्यता नहीं मिल सकी। हाँ, यहाँ हम ऐसी ही एक लिपि “कैथी” का विशेष उल्लेख करना चाहेंगे।

अत्यंत खेद है कि आज के स्वतंत्र भारत में अत्यल्प संख्या में लोगों को पता होगा कि कभी कैथी मध्यकालीन भारत में एक प्रमुख लिपि थी जिसे जनप्रिय होने के बावज़ूद, उपेक्षित रखने की भरपूर कोशिश की गई। बेशक, जनभाषा या जनलिपि का प्रादुर्भाव जन-जिह्वा पर सहजता से सवार होने के लिए ही होता है और कैथी भी ऐसी ही लिपि रही है। इसकी प्राचीनता और जनप्रियता के संबंध में, प्रोफ़ेसर ध्रुव कुमार का मानना है, “कैथी लिपि के ज्ञान के बिना बिहार की लोक संस्कृति, लोक संस्कार और लोक इतिहास को जानना कठिन ही नहीं, असंभव भी है। बिहार अंचल के लगभग दो हजार वर्षों का इतिहास इसी कैथी लिपि में लिखी हुई है। इस लिपि के ज्ञान के अभाव में बिहार प्रदेश के गौरवपूर्ण इतिहास के वैभव को कभी नहीं जाना जा सकता।”

प्रोफ़ेसर ध्रुव द्वारा विरचित पुस्तक “कैथी लिपि : एक परिचय” आकार-प्रकार में लघु होते हुए भी कैथी लिपि के बारे में विशद जानकारियाँ देने के लिए समीचीन है। यहाँ मैं एक बात स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि लिपि किसी भाषा-विशेष को सुबोध बनाने के लिए प्रतीकों की सिलसिलेवार प्रणाली होती है। इसलिए, जब हम कैथी जैसी लिपि के बारे में कोई जानकारी प्राप्त करते हैं तो इसके साथ-साथ वह जिस भाषा को मुखर करना चाहती है, वह उस भाषा की संवाहक भी होती है। इसलिए, कैथी एक विशेष लिपि होने के साथ-साथ एक समृद्ध भाषा की संवाहक भी है—जैसेकि मैथिल, भोजपुरी, अवधी आदि। भारतवर्ष के पूर्वांचल और पूर्वोत्तर अंचलों की भाषाएं मूल रूप से देवनागरी लिपि में उपलब्ध हैं जिन्हें स्वतंत्र भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है।

यदि हम विशिष्ट लिपि वाली कैथी पर दृष्टिपात करें तो भारतवर्ष की कई लिपियाँ ऐसी हैं जिनकी मातृभाषा संस्कृत है, लेकिन लिपि भिन्न है, पर उन्हें पूर्ण भाषा माना गया। कैथी के बारे में भी यही बात सही है कि इसकी मातृभाषा संस्कृत है जबकि इसकी भिन्न लिपि होने का दावा भी है और इस कारण इसे स्वतंत्र लिपि के जरिए मुखर करने वाली भाषा की प्रचारिका-प्रसारिका भी माना जाना चाहिए। बहरहाल, इस लिपि के लगभग मृतप्राय होने के बाद भी इस पर कोई ध्यान न दिया जाना निराशाजनक प्रतीत होता है। कैथी की वर्तमान हतावस्था में भी कुछ भाषाशास्त्रियों तथा लिपि-विशेषज्ञों ने आर्यावर्त की कतिपय भाषाओं और लिपियों का अध्ययन करते हुए इसकी महत्ता पर चर्चा की थी; पर, उस पर विरले ही ध्यान दिया गया। प्रोफ़ेसर ध्रुव, डॉ ग्रियर्सन द्वारा इस लिपि का अध्ययन किए जाने की ओर इशारा करते हुए बताते हैं कि कैथी लिपि “लगभग पांचवी-छठी शताब्दी के आसपास उत्पन्न रजवाड़ों की लिपि रही है। देवनागरी लिपि के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर आंदोलन चलाकर कैथी लिपि का विरोध किया।”

यहाँ हम यह विश्वासपूर्वक कह सकते हैं कि कैथी लिपि ने एक लंबे समय तक उपेक्षापूर्ण षड्यंत्रों को झेला है और यह अवांछित प्रवृत्ति कोई डेढ़ शताब्दियों तक लगातार बनी रही। प्रो. ध्रुव के शोध-संधान में कैथी लिपि के अस्तित्व को ईसा के समकाल में माना गया है जबकि कायस्थों की लिपि होने के कारण इसे और भी प्राचीन होने का श्रेय दिया जाना चाहिए। ऐसा संभव है कि महाकाव्य-काल में भी इसका बहुतायत से उपयोग होता रहा है क्योंकि रामज्य में भी कायस्थों के उच्च पदस्थ अधिकारियों के बारे में हमारे पास जानकारी उपलब्ध है जिनके राजकीय कामकाज में निःसंदेह, कैथी लिपि या कायस्थी लिपि का प्रयोग होता रहा होगा।

प्रोफ़ेसर ध्रुव की शोधपरक पुस्तक “कैथी लिपि : एक परिचय” में इस लिपि के संबंध में अनछुए पक्षों पर चर्चा की गई है। वह कैथी लिपि को बंगाली, मैथिली, नेपाली, असमिया तथा उड़िया के समानान्तर खड़ा करते हैं और ये सभी लिपियाँ कुटिल लिपि परिवार की सदस्य हैं। प्रोफ़ेसर ध्रुव इस बात पर विशेष रुप से बल देते हैं कि ‘मुग़लकाल के पूर्व से लेकर ब्रिटिशकाल तक संपूर्ण उत्तर भारत में बोली जानेवाली चाहे जो भी भाषा रही हो, लिपि उसकी कैथी ही रही है।’ वह यह भी स्वीकार करते हैं कि ‘प्राचीनकाल में भले ही साहित्य की लिपि संस्कृत या पाली रही हो, लेकिन सामान्य कार्यकलापों की लिपि कैथी ही थी।’ उनका यह मानना भी सर्व-समर्थनीय है कि पूर्वांचल में बड़े भू-भाग पर बोली जाने वाली ज़बान भोजपुरी की लिपि कैथी रही है। निःसंदेह, भोजपुरी ज़बान सातवीं शताब्दी के आसपास विकसित अवस्था में तो थी किंतु इस बहु-प्रयुक्त ज़बान की लिपि को कैथी मानकर हम इसके अति प्राचीन होने से इनकार नहीं कर सकते। उस दौर में इसे राजकीय लिपि होने का दर्ज़ा प्राप्त था और यह भी उल्लेख्य है कि उर्दू जैसी भाषा को कैथी में लिखने का प्रचलन था।

प्रोफ़ेसर ध्रुव अपनी पुस्तक “कैथी लिपि : एक परिचय” में कैथी के पक्ष में निष्पक्ष होकर अपने तर्कों को पुख़्ता आधार पर खड़ा करने का माद्दा रखते हैं। वह ऐतिहासिक अरण्य में जाकर कैथी लिपि की न केवल जड़ की तलाश करते हैं, अपितु इसे पुनःसिंचित करने का आह्वान भी करते हैं। यह ज़रूरी भी है ताकि हम कैथी लिपि के पीछे छिपी एक अमूल्य विरासत को फिर से सहेजने के ज़द्दोजहद में लग सकें। अपने इस महत्वपूर्ण अध्ययन में वह शिद्दत से जुटाए गए जिन साक्ष्यों पर अपनी बात को पुष्ट करने के लिए तर्काधार प्रस्तुत करते हैं, वे न केवल हममें जिज्ञासा पैदा करते हैं, बल्कि बेहद दिलचस्प भी हैं। इस समीक्षा में तो उस संपुष्ट शरीर का सिर्फ़ कंकाल ही प्रस्तुत किया गया है। इसके लिए पूरी पुस्तक को पढ़ने की आवश्यकता है। यद्यपि इतने बड़े विषय को उन्होंने कोई डेढ़ सौ पृष्ठों में समेटने की सराहनीय कोशिश की है, तथापि इस विषय पर उनके द्वारा अभी और भी बहुत कुछ शोध-संधान किया जाना है—ऐसी मेरी उनसे अपेक्षा है।

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लेखक का परिचय

प्रोफ़े. ध्रुव कुमार

जन्म: 20 अक्तूबर, 1957

जन्म-स्थान: हुमायूँपुर, सीतामढ़ी (बिहार)

शिक्षा: विधि स्नातक, स्नातकोत्तर (मनोविज्ञान)

वृत्ति: विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग, पूर्वोत्तर रेलवे महाविद्यालय, सोनपुर, सारण

प्रकाशन: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, आलेख आदि

प्रकाशित: ‘अभी कोख में ही रहेगी मेरी कविता’, ‘क्यों जन्मते हो कवि’ (दोनों काव्य संग्रह), ‘जादू कला का स्वरूप एवं उसका परिवेश’ सहित दर्ज़नों जादू विद्या पर पुस्तकें; संपादन : हम्मर बज्जिका गीत स्वर लिपि के साथ प्रोफ़े. उमाकान्त वर्मा ‘नव किरण’ (नव- साक्षरों के लिए), ‘फूल तुम खिलते हो’ (बाल कवि प्रतीक), ‘एबपीस टाइम्स’ (जादू बुलेटिन)

प्रसारण: आकाशवाणी, पटना से वार्ताओं का प्रसारण

अन्य गतिविधियाँ : जादू कला का प्रदर्शन 1965 से लगातार अब तक

जादू के क्षेत्र में कई राष्ट्रीय उपलब्धियाँ हासिल; बिहार में बाइक से सबसे लंबी दूरी की अंधी यात्रा सफलतापूर्वक पूरा करने का श्रेय

कई जादू संस्थाओं के संस्थापक और उनके प्रेरणास्रोत

कैथी लिपि में बज्जिका गीतों का देवनागरी में लिप्यंतरण

संप्रति: महाविद्यालय के प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत

पता: माध्यमिक शिक्षा संघ भवन परिसर, गाँधी आश्रम, हाजीपुर, वैशाली


इ-मेल: mg.dhrub@gmail.com

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समीक्षक

जीवन-चरित


लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लेखन}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: (स्वर्गीय) श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज़: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक़्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इंक़लाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह) ऑनलाइन गाथा, 2014; 9--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास); 11. संतगिरी (कहानी संग्रह), अनीता प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद, 2017; चार पीढ़ियों की यात्रा-उस दौर से इस दौर तक (उपन्यास) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; 12. महापुरुषों का बचपन (बाल नाटिकाओं का संग्रह) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; चलो, रेत निचोड़ी जाए, नमन प्रकाशन, 2018 (साझा काव्य संग्रह) आदि

संपादन: महेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति”

संपादन: “चलो, रेत निचोड़ी जाए” (साझा काव्य संग्रह)

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--वेब पत्रिकाओं में प्रचुरता से प्रकाशित

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा ‘साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान’ (मानद उपाधि); प्रतिलिपि कथा सम्मान-2017 (समीक्षकों की पसंद); प्रेरणा दर्पण संस्था द्वारा ‘साहित्य-रत्न सम्मान’ आदि

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

"वी विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

'मृगमरीचिका' नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, साहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमोक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, साहित्य कुंज, मातृभाषा डॉट कॉम वैचारिक महाकुम्भ, अम्स्टेल-गंगा, इ-कल्पना, अनहदकृति, ब्लिज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत

  ई-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

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