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महाशिवरात्रि पर्व पर विशेष यात्रा वृत्तांत - मढ़ के महादेव - अखिलेश सिंह श्रीवास्तव

मढ़ के महादेव: अधूरी यात्रा का पूर्ण वृतांत

(रिपोर्ताज)

अखिलेश सिंह श्रीवास्तव

पूर्णता का आनंद संतोष के साथ सच्चा सुख देता है। इस आनंद की पीठिका प्रयत्न है, पर कभी-कभी परिस्थिति जन्य अपूर्णता को भी फलश्रुति मानने का संतोष आनंद बन जाता है। इस दार्शनिक चिंतन से आज हम साक्षात होंगे इस विचार से कोसों दूर मैं, सपरिवार अपने श्वेत वाहन-से सद्धय जल बौछारों से धुले चौड़े राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक सात में भोर की किरणों का आनंद उठाते चला जा रहा हूँ। मंज़िल है नरसिंगपुर जिले की करेली तहसील-से लगे ग्राम अमगाँव के समीप सतपुड़ा श्रंग-श्रेणियों के सघन वन क्षेत्र में एक पहाड़ी गुफ़ा में स्थित प्राचीन शिव लिंग, जिसे मढ़ के महादेव के नाम से जाना जाता है। यूँ तो हर शिव रात्रि में यहाँ मेला भरता है पर हमने मेले-से कुछ दिन पहले जाने का सोचा। आमगाँव-से निकट होने के बाद भी राजस्व दृष्टिकोण से यह क्षेत्र छिंदवाड़ा जिले के पतालकोट रेंज में आता है।

मेरे स्वर्गीय ससुर साहब, महेश कुमार श्रीवास्तव का बाल्यकाल इन्हीं वादियों में बीता। अंतिम समय में उनकी इच्छा इस स्थान में जाने की थी; सर्वसाधन उपलब्धता पश्चात भी हृदय-रोग की पीड़ा ने उन्हें असमर्थ कर दिया था। उन्हें याद करते आज हम उसी दिव्य स्थली के दर्शन के लिए निकले। मढ़ के महादेव सेवा समिति के भाई संजय सोनी और अमित श्रीवास्तव के यात्रा मार्गदर्शन अनुरूप हमने छपारा-से हर्रई, कोटरा मार्ग से जाना तय किया। यह पूरा रास्ता अच्छी अवस्था में बड़ा रमणीक है, चहों ओर लंबी श्रंग-मालाएँ, स्वच्छ गाँव, सरोवर, वन-पुष्पों से आच्छादित वन्य-वीथियाँ और बीच-बीच में अपना मिजाज़ बदलता मौसम, सब बड़े अच्छे लगते हैं। हाँ, कुछ कमी भी दिखी; जैसे- मार्ग-निर्देशक बोर्ड न होने के कारण हमारे जैसे नए यात्रियों के लिए मार्ग-भ्रम और भटकाव संभव है।

इस मार्ग पर हमारे साथ जो संयोगिक आश्चर्य हुए वो साझा करता हूँ। सामने मार्ग में एक गाँव पड़ा जिसके नाम को पढ़ के हमें हिंदी गद्य साहित्य के प्रथम यात्रा-वृत्त लेखक याद आ गए। जी! आप सही समझे, भारतेन्दु हरीशचंद। इस गाँव का नाम है- 'भारतेंदवी...! 'यह क्षेत्र सर्पीले घाटों के कारण बहुत सुंदर है। हम, साहित्यकारों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विमर्श करते चले जा रहे थे कि, सहसा मेरे मुख से निकाला, "आज-कल के कई ऐसे स्वयंभू साहित्यकार हैं जिनके न तो लेखन में मर्यादा है न ही ज़ुबान में" और देखिये सामने जो गाँव का नाम मेरी छोटी बेटी ने पढ़ा वो है- 'जुबान!' हम हंस दीये! सालीवाड़ा, गोरखपुर, गोरपानी, के एकल मार्ग से होते हुए हम हर्रई-नरसिंगपुर हाइवे पर आ मिले। पूर्व एकत्रित जानकारी के अनुसार हमें रातामाटी-कोटरा के एकल मार्ग में मुड़ना है, पर पुनः वही स्थिति, कहाँ जाएँ...? कोई व्यक्ति भी नज़र नहीं आ रहा है। तभी कुछ शालेय विद्यार्थी वहाँ से गुज़रे, कोटरा का मार्ग पूछने पर उन्होंने बड़े आश्चर्य से हमारी ओर देखते हुए रास्ता बता दिया। इन बच्चों की मुख-भंगिमा ने हमें थोड़ा अचरज में ज़रूर डाला, पर हम आगे बढ़ गए।

सतत आगे बढ़ने के साथ महसूस होने लगा कि, हम गहरे वन में आदिवासी बहुल क्षेत्र में पहुँचते जा रहे हैं। हर पल जहाँ प्राकृतिक वातावरण बढ़ रहा है वहीं शहरी जीवन के स्थान पर पिछड़ा ग्रामीण जीवन दिख रहा है। गाँवों में एक्का-दुक्का घरों में काष्ठ निर्मित किवाड़ दिखे, शेष बाँस और मिट्टी के दरवाज़े ही हैं। झोपड़ियाँ भी कच्ची हैं पर विभिन्न कच्चे रंगों से सुसज्जित। खेती के पुराने तरीक़े प्रयोग में हैं, मक्का उत्पादन यहाँ प्रचुरता में दिखा, इसे सुखाने के लिए बाँस के मचानों का इस्तेमाल किया जाता है। जल संग्रहण की नाँदें भी देखने योग्य हैं। कुछ लोगों की नेत्र-भंगिमा नए यात्री देख थोड़ी लालच भारी लगी, पर हमने ऐसा ज़ाहिर किया कि, हम लोगों ने उन पर ध्यान ही नहीं दिया। बढ़ती वन सघनता के साथ घटती मानव बस्तियाँ सुनसान इलाक़े से गुज़रने का भान करा रही थीं; चूँकि हम सम्यक संकल्प ले कर निकले हैं अतः भय-भाव के परे आगे बढ़ते रहे।

दोपहर हो चली, लगभग दो घंटे से हम चाय के लिए दुकान देखते रहे पर यहाँ एक भी नहीं दिखीं। वो तो 'मम भार्या पाक-प्रबंधन' सुदृढ़ है इसलिए जल-और स्वल्पाहार हमारे पास है, अन्यथा इस वन मार्ग में पीने के लिए पानी भी नहीं दिखा। कुछ यूँ कहूँ- ''सूखी बस्तियाँ, मुरझाए चेहरे, सूखी खेत, कच्चे रास्ते बायाँ कर रहे हैं इस शिक्षित, विकसित, समानता वादी विचारधारा वाले तथाकथित सभ्य समाज के गाँधीवादी प्रयासों को कि, समाज के अंतिम व्यक्ति का भी कल्याण हो! उनका मन रो रहा है कि, लोग आ रहे हैं उनके महादेव के दर्शन को और उनके पास नहीं है, चना-गुड़-जल की खिला-पीला सकें अपने पाहुनों को। बापू भी वहाँ दुखी होंगे!" जल का क्या दुखड़ा रोएँ, हम नगर में रहते हैं और रोज़ तरसते हैं जी भर के जल-संग्रहण को। हम भारत के लोग, लोकतन्त्र की वास्तविक शक्ति (ऐसा पढ़ाया गया है।) होने के भाव से उठे सर को जल टैंकर के लिए पालिका के कर्मचारियों के समक्ष झुकाए, श्रीहीन से खड़े रहते हैं। ख़ैर जाने दें, इस वेदना नाड़ी को और न छेड़ें अन्यथा कष्ट अनुभव आपको भी होगा, आखिर मैं और आप अलग थोड़े न हैं।

मैं पूर्व में ही कह चुका हूँ इस यात्रा में संयोग संगम बहुत मिले दिखिए न विश्राम करने के लिए हम एक ग्राम्य सीमा में रुके, बदली-सी छाने लगी तो मेरे पापा ने कहा- "साथ में एक फ़ोल्डिंग छाता रखना चाहिए।" तभी वहाँ से कुछ बालक पसीने और धूल से लथ-पथ उछलते-कूदते आते दिखे, गाँव का नाम पूछने पर उन्होंने जो बताया सच! हम आश्चर्यचकित रह गए, उस गाँव का नाम था 'छाता कला।' रातामाटी, बमहोड़ी होते हुए हम इंटीरियर गाँव भौंड पहुँचे। यहाँ 'टी-मार्ग-संगम' मिलता है, आगे का रास्ता पूछने के लिए हम सामने की वन-चौकी में गए। वहाँ मात्र एक बंदा उपस्थित था और वो भी नशे में इतना धुत्त कि, 'क्या खड़े हो और क्या बात करे'। बड़ी मुश्किल से उसने बाएँ मुड़ने का इशारा किया। आगे एक शाला दिखी जहाँ दो शिक्षक धूप-छाँव में आराम से अध लेटे अपनी सरकारी नौकरी का लुत्फ़ उठाते नज़र आए। वाह रे सरकारी औपचारिकताएँ! अब हम कोटरा की ओर जा रहे थे जिसकी वन्य क्रोड़ में मढ़ के महादेव की प्राचीन कांदिरा है।

यह बिया-बान वन्य-मार्ग न केवल कच्चा है बल्की मार्ग-मध्य इतने बड़े-बड़े गड्ढे हैं कि, हमारी छोटी कार उसमें समा जाए। एक स्थान पर तो मुझे उतर कर मार्ग अवलोकन करना पड़ा। तभी वहाँ न जाने कहाँ से एक ऊंचा-पूरा आदमी पेड़ के पीछे से निकल कर आया और कहने लगा, "आगे फंस जाओगे, निकलने के लिए सहायता भी मुश्किल से मिलेगी" और वह तेज़ी से एक जंगल में चला गया। सुबह से जिस मंज़िल के लिए हम सफ़र कर रहे थे वो मात्र तीन किलोमीटर थी, लेकिन जंगल में ये दूरी क्या मायने रखती है ये आज पता चला। उदास! मुझे गाड़ी मोड़ना पड़ी। रास्ता इतना सकारा है कि, काई बार आगे-पीछे करने के बाद कार मुड़ी, वरना दोनों ओर गहरे गड्ढे मुंह बाए हैं। मन तो सभी का उदास था! जिन्होंने यहाँ से आने की सलाह दी संभवतः वे यहाँ की वर्तमान ध्वस्त अवस्था से परिचित न होंगे! हम वापिस हर्रई आ गए जहाँ सर्व प्रथम ठंडे जल-से प्यास बुझाई और गर्म चाय-से च्यास!

अब निर्णय यह लिया कि, आमगाँव, पिपरिया के पैदल मार्ग से जा कर दर्शन करना चाहिए और हम आगे नरसिंगपुर-से करेली, आमगाँव होते हुए पिपरिया ग्राम पंहुच गए। ये गाँव मेरी पत्नी प्रतिमा की जन्म स्थली है। अब यहाँ इनके परिवार का कोई सदस्य नहीं रहता; हैं तो सिर्फ़ यादें, पुराने आस-पड़ोस से संबंध और एक टूटा-फूटा बाड़ा। यहाँ प्रतिमा के पापा के बाल सखा चरण जीत चाचा मिले। जितनी देर हम उनके घर रहे लग-भग उतनी देर बातों के दौरान उनकी आँखों-से प्रेम-अश्रु छलकते रहे। प्रतिमा तो मानो अपने बचपन में चली गई, उसने वो सब स्थान दिखाए जहाँ वो खेला करती थी। क्या आनंद लेने आए थे और क्या आनंद ले रहे हैं! चाचा जी ने पैदल मार्ग से देव गुफ़ा तक जाने के लिए साफ़ मना किया और कहा अभी जाना कष्ट प्रद होगा। महाशिवरात्रि के समय दर्शनार्थियों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ रहतीं हैं अतः तभी आने की सलाह दी। उन्होंने बताया, "युवा अवस्था में प्रतिमा के पापा अकेले उस गुफ़ा में काफ़ी अंदर तक गए थे और बहुत देर बाद बाहर आए थे। वे बहुत हिम्मत वाले व्यक्ति थे। उन्हीं से पता चला था कि अंदर मीठे पाने का कुंड है।" उनकी इन बातों से हमें भान हुआ कि, क्यों मेरे ससुर जी अंत समय में इस स्थान की दर्शन अभिलाषा रखते थे। क्यों की यहाँ आज भी जीवित है उनका बचपन, संगी-साथियों के साथ वन-भ्रमण का अद्भुत आनंद, उनका गृह क्षेत्र और अदम्य साहस।

सुनहरी धूप, घरों के छज्जों से झाँकती हुई अस्तांचल गमन सूरज के साथ वैसे ही लौट रही है जैसे पिता के साथ छोटी बेटी आस-पास झूमती-ठुमकती चलती है। मढ़ के महादेव के दर्शन के लिए हमने दो स्थानों से जाने का प्रयास किया, पर क़रीब आ के भी उन तक पहुँच न सके, इसका बहुत दुख है। इस दुख के बावजूद न जाने क्यों मन एक अजीब से आनंद का अनुभव कर रहा है। शिव लिंग के दर्शन नहीं हुए पर शिवत्व को अवश्य महसूस किया। प्राकृतिक सुंदरता के रूप में, पल-पल परिवर्तित होती भाषा-भूषा के रूप में, सुनसान जंगलों में सनसनाती हवा के रूप में, मौसमी परिवर्तन के रूप में, ध्वस्त मार्गों के अवरोधों में सहायकों के मिलने के रूप में, ग्रामजीवन के दर्शन के रूप में, ऊबड़-खाबड़ पथों में पड़े उपल-अश्म-पत्थरों के रूप में, जीवन की सुंदर स्मृतियों के रूप में और अनंत आस्था के रूप में। यही हमारी अधूरी यात्रा का पूर्ण वृत्त है। दिन ढल गया, उधर बस्तियों में दीप टिम-टिमाने लगे इधर हमारी कार के हेड लाइट्स जले और पुनः आगमन की आस के साथ लॉट चले हम अपने घर को।

"ॐ पूर्णमदह पूर्णमिदम पूर्णात पूर्णमुदच्ते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥"

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अखिलेश सिंह श्रीवास्तव (कथेतर लेखक) दादू मोहल्ला, संजय वार्ड, दादू साहब का बाड़ा, सिवनी-480661(म.प्र.)

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