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अनुपमा ठाकुर की कहानियाँ

स्वाभिमान

कई दिनों से सोच रही थी कि एस. बी.आई बैंक में अपने पति के साथ ज्वाइंट अकाउंट खोलूं। सर्दियों की छुट्टियां चल रही थी , सोचा आज कैसे भी करके यह काम कर लिया जाए। मैं अपनी दोनों बेटियों को लेकर सुबह 12:00 बजे तक बैंक पहुंच गई। बैंक में काफी भीड़ थी, समझ में नहीं आ रहा था कि किस से मिलना चाहिए। मैं सिक्योरिटी से पूछ ही रही थी कि उतने में 70- 75 वर्ष की एक वृद्धा मेरे सामने आकर मुझे इशारों से छोटी डायरी नुमा किताब दिखाने लगी। मैं हैरान थी। दुबली -पतली सी उसकी काया, चेहरे पर झुर्रियां साफ नजर आ रही थी। आंखों पर जो चश्मा था उसे नाक के ऊपरी भाग के मध्य में कपड़े से बांधकर जोड़ा गया था। हल्की सी जगह -जगह फटी हुई महाराष्ट्रीयन साड़ी पहने वह मुझे किताब दिखा कर हाथ जोड़ने लगी।मैं ने पूछा, "इसका क्या करना है ?" उसने अपने कान पर हाथ रखकर इशारों में कहा, सुनाई नहीं देता। मैंने गड़बड़- गड़बड़ से उसकी किताब हाथों में ली और उसे खोल कर देखा। वह बैंक की पासबुक थी। उसमें एक फ़ार्म रखा हुआ था। मेरी समझ में कुछ नहीं आया करना क्या है? मैंने उसे इशारा करके पूछा, "क्या करना है?" उत्तर में उसने फिर से हाथ जोड़े। मैंने फिर एक बार समझने की कोशिश की पर शायद मेरा पूरा ध्यान अपने काम की ओर था अतः वृद्धा की मदद करने के लिए मैंने सिक्योरिटी गार्ड को आवाज लगाई और उसकी मदद करने के लिए कहा। सिक्योरिटी गार्ड ने बिना जाने ही उसे कतार में बिठा दिया। मैं अपना काम करने में लग गई। आधे घंटे के बाद जब मैं वहां से लौट रही थी तो देखा वृद्धा उसी कतार में बैठी हुई है। अब मेरे पास समय भी था। मैंने उससे वह किताब मांगी और अपनी बेटी को उसका फॉर्म भरने के लिए कहा। मेरी बेटी ने पासबुक में से जानकारी लेकर फॉर्म भर दिया। इतना तो समझ में आ गया था कि वृद्धा उस फॉर्म के माध्यम से पैसे निकालना चाहती है। मेरी बेटी को उसने हाथों के इशारों से और बहुत बारीक आवाज में पाँच कहा। शायद उसे 500 रुपये चाहिए थे। बेटी फ़ार्म में 500 रुपये भर दिए। मैंने वृद्धा से पूछा, "तुम्हारे घर पर कौन- कौन है ?" बहुत ही बारीक आवाज में उसने कहा - "कोई नहीं।" मैने वृद्धा को कुर्सी पर बैठने के लिए कहा। और मैं वह पासबुक और फॉर्म लेकर पैसे निकालने वाली खिड़की की ओर गई। पैसे देने वाली मैडम दोपहर का भोजन करने के लिए गई हुई थी। पास ही खड़ी एक महिला ने जब देखा कि मैं वृद्धा का फॉर्म और पासबुक लेकर खड़ी हूं तो उसने मुझसे कहा , "पहले देख तो लो पासबुक में पैसे शेष है या नहीं। बाहर मशीन में डालने पर बैलेंस पता

चलेगा।" मैंने अपने बेटी को पासबुक अपडेट करवाने के लिए भेजा और मैं वृद्धा के साथ खड़ी होकर महिला अधिकारी के लौटने की प्रतीक्षा करने लगी। काफी देर तक मेरी बेटी नहीं लौटी तो मैं बाहर आगई। देखा मशीन पर काफी भीड़ थी। मैं भी कतार में लग गई। दो ही नंबर बचे थे। मशीन में पासबुक डालकर अपडेट कराने का एक नया अनुभव मैंने सीखा। जब पासबुक अपडेट हो गया तो खोल कर देखा उसमें केवल 38 रुपये शेष थे। अब मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि वृद्धा से कैसे कहें कि उसके खाते में पैसे नहीं है। मैंने सोचा कि मैं ही उसे 500 रुपये दे देती हूं। सबसे पहले मैं उस महिला के पास गई जिसने पासबुक अपडेट करने की सलाह दी थी। मैंने उससे कहा - " इसके खाते में तो कुछ भी नहीं है।" उस महिला ने कहा- "मुझे तो पहले ही यह लगा कि उसके खाते में पैसे नहीं है।" मैंने वृद्धा को पासबुक देते हुए उँची आवाज में कहा - "पैसे नहीं है इसमें। "

वह एक शब्द भी नहीं बोली। केवल मेरी और देख रही थी। मैंने अपने पर्स में सौ सौ के पाँच नोट निकालकर उसके हाथ में थमाए। मुझे लगा कि वह खुश होगी और मुझे धन्यवाद देगी। पर मेरी अपेक्षाओं के विपरीत वृद्धा ने कहा- "नाही -नाही मला तुपले पैसे नाही पाहीजे।" अर्थात मुझे तेरे पैसे नहीं चाहिए। मैं दंग रह गई। उसे पैसे देते वक्त शायद मैं कहीं ना कहीं अभिमान महसूस कर रही थी पर उसके स्वाभिमान ने जैसे मेरे अभिमान को चकनाचूर कर दिया था। मैं बार-बार उस से विनती करने लगी, "रहने दे, तेरे काम आएंगे।" "तुम्हारे पैसे मै क्यों लू?" यह कहकर

वृद्धा ने मेरे पैसे जमीन पर फेंक दिए। आसपास के सभी लोग देखने लगे। मैंने चुपचाप अपने पैसे उठाये और बैंक के बाहर आ गई। वृद्धा वहाँ से लाठी टेकते जा रही थी। मैंने उससे फिर एक बार विनती की। उसने कहा- "नहीं, नहीं, उधर एक खड्डा है , वहां मुझे मेरी पगार मिलेगी।" मुझे अपने रवैये पर बहुत पछतावा होने लगा। मेरे मन में द्वंद चल रहा था।काश! मैंने उसे उसके पगार के पैसे कह कर दिए होते तो वह आवश्य ले लेती थी। वृद्धा का तो कोई नहीं है। कहां जाएगी वह?

मैंने उसे क्यों बताया कि उसके खाते में पैसे नहीं है? कहीं मुझे उस पर अहसान तो नहीं जताना था। यह एक अच्छा चाँटा था। मेरा गर्व चूर करने का।"

मेरा मन विचलित था। जाने किस बात से पता नही? वृद्धा ने मेरी मदद ठुकराई या फिर मैं वृद्धा के लिए कुछ नहीं कर पा रही हूं। कुछ समझ में न आ रहा था।यह एक सच्ची करुणा थी।

मैं स्कूटी धीरे-धीरे चलाने लगी और वृद्धा के पीछे- पीछे जाने लगी। मेरी बेटियाँ मुझे डांट रही थी। वे कह रही थी- "मम्मी कहीं वृद्धा कुछ और ना समझ ले।" पर फिर भी मैंने नहीं सुना। कुछ दूर जाकर वृद्धा रुक गई और एक दुकान के पास खड़ी होकर इधर-उधर देखने लगी। मैं फिर स्कूटी उसके निकट ले गई तो उसने मुझसे कहा, "पिछली बार उसे यहीं से पगार के पैसे मिले थे।" वहाँ एक लड़का खड़ा था। मैंने उससे पूछा, "क्या यहाँ कोई बैंक है जो निराधार के पैसे देता है?" उसने कहा, "नहीं। " मैंने उस लड़के से कहा, "इससे कहो , यह नहीं मान रही है और ना हीं मेरी मदद ले रही है।" उस लड़के ने उसे ऊंची आवाज में कहा , "येथे बैंक नाही आजी। ते मदद करत आहे तर घे ना।" मैंने डरते -डरते अपनी बेटी के हाथ में 100 रुपए दिए और कहा, "देकर देख, लेती है क्या?" मेरी बेटी ने निकट जाकर कहा- "इतने तो रख लो, रिक्शा के लिए काम आएंगे। " आखिर में उसने वे 100 रूपए रख लिए और मैं तुरंत वहां से निकल गई पर यह पछतावा रहा कि उसे तो 500 रुपये चाहिए थे। पर मैं उसकी मदद नहीं कर पाई। कठिन परिस्थितियों में भी कुछ लोग अपना स्वाभिमान नहीं खोने देते। मैनतमस्तक थी वृद्धा की ईमानदारी एवं स्वाभिमान पर।

काजोल

एक दिन संध्या समय जब मैं और मेरी बेटियाँ पाठशाला से लौटी तो देखा घर के आँगन में दरवाजे के पास एक बिल्ली विश्राम कर रही थी। उसे देखते ही मेरी छोटी बेटी खुशी के मारे उछल पड़ी। गेट खोलने पर वह हमसे डरकर पीछे-पीछे सरकने लगी। मेरी बेटी उसे हाथ लगाने का प्रयास करती पर वह डरकर पीछे सरकती। उतने में मेरी बड़ी बेटी तुरंत भीतर से दूध ले आई और उसके सामने रख दिया। दूध को देखते ही वह म्याऊं म्याऊं करते हुए समीप आकर दूध पीने लगी। उसका डर अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका था। वह अब खुशी -खुशी मेरी बेटियों को हाथ लगाने दे रही थी।

रात होने तक वह वहीं बैठे रही , किसी काम से मैं बाहर आती तो वह मेरी ओर मुँह किए माँऊ- माँऊ कर चिल्लाती और अपने शरीर को मेरे पैरों से रगड़ने लगती। अब यह उसका नित्य का क्रम बन चुका था। रात में पता नहीं वह कहां निवास करती परंतु जैसे ही हम स्कूल से लौटते वह हमारी प्रतीक्षा में व्याकुल हमारे स्वागत के लिए तैयार रहती। जब तक दूध ना मिले कोलाहल मचा देती। कभी दरवाजा खोलने में देरी हो तो वह जोर-जोर से आकात कर मेरी परिक्रमा करने लगती और धीरे से मेरे पैर के अंगूठे को अपने मुंह में लेकर काटने लगती तथा अपना क्रोध प्रकट करती। उसकी काली एवं गहरी आंखों को देख कर मैंने उसका नाम काजोल रखा। काजोल का शरीर दिन-ब-दिन मुझे भारी प्रतीत होने लगा था। मैंने अनुमान लगाया कि कहीं इसके पेट में बच्चे तो नहीं है। शायद मेरा अनुमान सही था, वह दूध पीकर थके हुए स्त्री के समान सीधे ठंडे फर्श पर लेट जाती।

कुछ दिनों बाद ग्रीष्मावकाश प्रारंभ हो गया और काजोल का आना अचानक बंद हो गया। एक- दो बार मुझे उसकी याद अवश्य आई पर धीरे-धीरे मैं भी उसे भूल गई। पाठशाला की छुट्टियां चल रही थी मेरी ननंद भी छुट्टियां मनाने मायके आई हुई थी। बच्चे खूब उधम मचा रहे थे। उनको काम में व्यस्त करने के लिए मैंने अपनी बड़ी बेटी से छत पर जाकर कपड़े सुखाने के लिए कहा। पहले तो उसने मना कर दिया पर जोर से आवाज निकालने पर पूरी पलटन को साथ में लेकर वह छत पर चली गई। घर में थोड़ी शांति हुई। मैंने और मेरी ननंद ने थोड़ा आराम करने का सोचा ही था कि छत से बच्चे जोर- जोर से चिल्लाने लगे, "मम्मी जल्दी ऊपर आओ, जल्दी ऊपर आओ।" हम दोनों घबरा गए और तुरंत सीढियों की ओर दौड़ पड़े। छत पर पहुंचे तो देखा कि दो छोटे- छोटे बिल्ली के खूबसूरत बच्चे मेरी बड़ी बेटी के गोद में थे। हमें देखती ही वे खुशी से बताने लगे, "देखो ना माँ कितने सुंदर बच्चे हैं।" मैंने कहा, "इन्हें इस तरह गोद में मत लो, उनके बाल कपड़े पर लग जाते हैं।" पर किसी ने भी मेरी एक न सुनी और सभी बच्चे उन्हें गोद में लेने के लिए उतावले हो रहे थे, यहाँ तक कि मेरी ननद ने भी वही किया। सचमुच बच्चे थे भी बड़े खूबसूरत। छोटा सा मुंह और बड़ी-बड़ी पानीदार आंखें, रोए दार सुनहरे बाल तथा झब्बेदार पूंछ। उनका लघू गात देख कर लग रहा था जैसे दो-तीन दिन पहले ही उनका जन्म हुआ हो। बला की चंचलता थी उनके शरीर में। एक क्षण भी वे बच्चों के हाथ में टिक नही रहे थे

इधर से उधर दौड़ रहे थे। काजोल वहीं चुपचाप बैठकर सब कुछ देख रही थी। जैसे बच्चों के परवरिश की सारी जिम्मेदारी हम पर छोड़ दी हो। बच्चों के मन में बार-बार यह प्रश्न उठ रहा था कि यह छत पर कैसे रहेंगे? वे दौड़कर एक टोकरा ले आए। टोकरी में कपड़ा बिछाया और दोनों शावकों को उस में बिठाया और साथ ही हिदायत भी दी कि यहां से कहीं ना जाना परंतु दूसरे क्षण में वे टोकरी से बाहर निकलकर इधर-उधर दौड़ने लगे। मैंने बच्चों को समझाया, "क्या तुम एक जगह बैठे रह सकते हो, जो इन्हें एक जगह बैठने के लिए कह रहे हो। जैसे -तैसे मैं अपने बच्चों को नीचे लेकर आई। बच्चे नीचे आकर अपने खेल में मग्न हो गए। कब संध्या हुई और फिर रात, इसका पता ही नहीं चला। आधी रात में अचानक तेज वर्षा प्रारंभ होगई और बिजली भी चली गई। बाहर साँय -साँय कर तेज हवाएं चलने की आवाज सुनाई दे रही थी। मुझे काजोल का स्मरण ही आया। मैने अपने पति से कहा, "छत पर बिल्ली के बहुत छोटे बच्चे हैं, वे बारिश में मर जाएंगे।" पति हंसने लगे और कहा, "पागल हो क्या ? पशुओं को खराब मौसम का पता चल जाता है।उनकी माँ पहले ही उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गई होगी। वह ड़ान्टगे इसलिए मैं चुप रही। जैसी ही भोर हो गई, मैं और बच्चे भी कौतूहलवश छत पर पहुंच गए। वहां न काजोल थी न काजोल के बच्चे। टोकरी और उसमें रखा हुआ कपड़ा गिला हो चुका था। मैंने बच्चों से कहा, "शायद, वह बच्चों को कहीं और ले गई है।" हम सब थोड़े से चिंतित एवं मायूस होकर नीचे आ गए। दोपहर का भोजन करने के बाद बच्चे ऊपर के कमरे में खेलने चले गए और मैं अपने ननंद के साथ आराम करने लगी। तभी मेरी बड़ी बेटी जोर से दौड़ते हुए नीचे आई और कहा, "मां अपने रेन हार्वेस्टिंग पाइप में से बिल्ली के बच्चों की आवाज आ रही है।" मुझे धक सा हुआ। मैं दौड़कर दीवार से सटे पाईप के पास जाकर नीचे की और कान लगाकर सुनने लगी। सचमुच अंदर से बिल्ली के बच्चों की आवाज आ रही थी। मैंने सोचा अब ये बच्चे नहीं बचेंगे।

वर्षा जल संचयन का पाईप छत से प्रारंभ होकर सीधा जमीन तक पहुंचा हुआ है और ओवरफ्लो ना हो इसलिए बीच में से ज्वाइंट देकर कुछ हिस्सा बाहर रास्ते पर निकाला हुआ है। मन में विचार आया कि अगर ये बच्चे हारवेस्टिंग वाले गड्ढे में चले गए तो? इस बुरे विचार को मैने मन से बलपूर्वक निकाल दिया। हम सब परेशान थे। समझ में नहीं आ रहा था उन्हें कैसे निकाले? मैं , मेरी ननंद और बच्चे हम सब परेशानी में नए-नए उपाय सोच रहे थे कि उतने में काजोल भी वहां आ कर जोर से चिल्लाने लगी। वह बार-बार मेरा पैर काटने लगती और इधर उधर पूँछ फुला कर घूमती, जोर -जोर से आवाज करने लगती। उसकी आंखों मे चिंता एवं निराशा, करुणा स्पष्ट झलक रही थी। वह चिल्ला- चिल्ला कर मेरी परिक्रमा करने लगी। मैने उसके सिर पर हाथ फेरकर उसे शान्त करने का प्रयास किया।

पाईप कई जगह से जुड़ा हुआ था मैंने मन बना लिया था कि प्लंबर को बुलाकर पाइप काटेंगे। नुकसान हुआ तो चलेगा। पर बच्चे बचने चाहिए। मैंनें बाहर जाकर रास्ते पर निकले पाईप में झाँका पर कुछ दिखाई ना दिया। केवल आवाज़ सुनाई दे रही थी। हमारा शोर सुनकर पड़ोसी भी वहां आगए। पड़ोसी के घर आए हुए दो लड़कों ने मुझसे कहा, "आंटी इस जॉइंट को खोल कर देखते हैं। मुझे तो घबराहट के मारे कुछ सूझ नहीं रहा था। मैंने उन्हें पूरी स्वतंत्रता दी। उसने जोर लगाकर जॉइंट खोलने का प्रयास किया पर जॉइंट इतना मजबूत था कि खुल ही नहीं रहा था।उस लडके ने कहा, "आंटी पाइप तोड़ना होगा। मैंने कहा, "ठीक है। तोड़ दो।" मैंने उसे हथौड़ा लाकर दिया। उसने धीरे से ज्वाइंट पर मारा और फिर हाथ से खींचने लगा अचानक जॉइंट में से पाईप अलग हो गया। मैंने राहत की सांस ली। पाइप दो हिस्सों में बंट चुका था। मैने पाईप के पहले हिस्से में झांक कर देखा तो पूँछ नजर आई। मैंने थोड़ा सा हाथ अंदर डालने पर पूँछ हाथ में आ गई। मैंने जोर से पकड़ कर खींचा। काजोल का बच्चा जोर से चिल्ला रहा था। मैंने उसकी परवाह नहीं की। जैसी ही बच्चा बाहर आया, सभी बच्चे खुश हो गए और उसे लेने दौड़े। अभी भी दूसरा बच्चा अंदर ही था। हमने दूसरे सिरे में झांक कर देखा तो वह वहां नहीं था। मेरी बेटी ने कहा, माँ आप इस तरफ से लकड़ी डालकर उसे डराओ ताकि वह बाहर रास्ते के सिरे से निकले और पाईप के मुहाने आ जाए। मैंने ऐसे ही किया बच्चा डर के आगे जाने लगा और रोड की तरफ निकले पाइप के मुहाने आ गया। मेरी बेटी ने अंदर हाथ डालकर उसे खींच लिया। दोनों बच्चे बहुत ही सहमे और डरे हुए नजर आ रहे थे। अब उन्हें देखकर उनकी मां का चिल्लाना भी बंद हो गया था। उसके समीप छोडने पर वह उनके शरीर को वत्सल्य से चाटने लगी। दोनों पैर पसारे आँगन में वह शान्त बैठे गई।लग रहा था अब उसे कोई चिंता नहीं है। मेरी बड़ी बेटी बच्चों को छत पर लेकर गई, क्यो कि आँगन में छोड़ने पर बच्चे बाहर रास्ते पर आ जाते और हमारे गेट के बाहर हमेशा दो-तीन कुत्ते बैठे रहते हैं। छत पर छोड़कर उसने सबसे पहले पाइप के मुँह पर कपड़ा ठूँस दिया ताकि बच्चे फिर से पाइप में न जाए।

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