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महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण - डॉ रानू मुखर्जी

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महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण - डॉ रानू मुखर्जी । बड़ौदा भारतीय साहित्य जगत में आधुनिक युग के प्रारंभ से ही ना...

महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण - डॉ रानू मुखर्जी । बड़ौदा

भारतीय साहित्य जगत में आधुनिक युग के प्रारंभ से ही नारी लेखन को प्रधानता दी जाने लगी । बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान अपनी रचना धर्मिता के साथ उभरकर आई। इसके प्रभाव स्वरूप स्वाधीनता के पश्चात साहित्य जगत में विशेषतः कथा साहित्य के क्षेत्र में अनेक नवोदित महिला रचनाकारों ने अपना विशेष योगदान दिया। इन्होंने नारी मुक्ति अभियान को अधिक महत्व दिया। इसके साथ-साथ अस्मिता के संघर्ष से शुरू हुए लेखन में मानव जीवन के सभी पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया। इन सभी में मूल रूप से नारी जीवन को ही प्रधानता दी गई । जिसमें नारी चेतना, शोषण , आपसी भेदभाव , आदि सवालों के साथ दलित आदिवासी एवं मजदूर समाज के वर्ण वर्ग संबंधी मजदूर या भूमिहीन किसान औरतें आदि के चित्र लेखिकाओं की कलम से उभरकर आई ।

भारतीय नारी विमर्श अपने चरित्र में पश्चिम के नारीवाद जितना न तो अतिवादी है और न ही वह पुरूष को अपना एक मात्र शत्रु समझता है। वह नारी के व्यक्तित्व जितना ही पुरूष के व्यक्तित्वचा को महत्वपूर्ण मानता है । नारी की प्रगतिशील मानसिकता के लिए एक सबसे बडी समस्या वे स्त्रियां है जो अभी तक प्रगतिशीलता की अवधारणा से परिचित नहीं हैं या पुरूष मानसिकता से ग्रस्त हैं। व्यवहारिक स्तर पर प्रश्न यही है कि नारी को उसकी प्रगतिशीलता से परिचित करवाकर उन्हें अपने हक और अधिकारों के प्रति कैसे जागरुक बनाया जाय और उनकी मुक्ति की दिशा में उनकी शक्ति का कैसे सकारात्मक उपयोग किया जाए। इसी दिशा की ओर कदम बढाती हुई महिला उपन्यासकारों ने अपनी कलम को इस दिशा की ओर मोड़ा ताकि नारी मानसिकता की तह तक जाकर उसे सशक्त बनाएं।

अर्जित धन के प्रति पुरूषों का मोह इतना अधिक होता है कि मृत्यु के बाद भी वह किसी और के हाथों न जाए - उनके अपनी औरत, अपने संतान के हाथों ही रहे - इसकी व्यवस्था उन्होंने स्रियो की स्वतंत्रेता पर पहरे बिठाकर और परिवार का दुर्ग और मजबूत बनाकर किया। बाद में औरतें जब स्वयं अपना धन अर्जित करने लगी तब और शारीरिक मानसिक रूप से अपने निर्णय लेने लगी तब इन प्रतिबंधों का अर्थ कुछ खास रहा ही नहीं। इन विषयों को आधार बनाकर महिला उपन्यासकारों ने समाज मे जागृति लाने के लिए अपनी लेखनी का माध्यम बनाया। ऐसा नहीं है कि जीवन शैली , उन्नत सोच और आर्थिक स्वतंत्रता के कारण स्त्रियों का स्नेह ममत्व मर गया है । पहले स्त्रियां संबंध निभाती थी तो आर्थिक परतंत्रताजन्य विवशता उनके साथ रहती थी , पति आदि से विरोध भी है तो चुप चाप सहना है , निभाना है , हाथ पांव बंधे है। अब आर्थिक स्वतंत्रता है तो उपाय बहुतेरे हैं। शिक्षित होने के कारण आत्मिक - बौद्धिक और नैतिक परिष्कार भी उनमें आया है। इस स्थिति का भरपूर प्रयोग उपन्यासों मे मिलता है।

डॉ निर्मला अग्रवाल का कहना है कि उपन्यास लेखन मुक्ति का मार्ग खोजती हुई आधुनिक स्त्री के जीवन के विविध पहलुओं को परत दर परत बडी ताकत के साथ उजागर करता है। अपने व्यक्तित्व की स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने की छटपटाहट हो , पुरूष की अनाधिकृत भावनाओं का शिकार होती हुई स्री की प्रतिक्रियावादी आक्रोश हो , विवाहेतर या विवाह पूर्व पर पुरूष से संबंध की बात हो आदि प्रगतिशील विषयों से भरे उपन्यास हमारे समक्ष आ रहें है। मैत्रेयी पुष्पा के " झूला नट" में नायिका पति द्वारा छोडे जाने पर अपमानित करने के विरूद्ध समाज व परिवार के आगे झुकने के बजाय , दुर्बल दिखने की जगह अपनी दूरदर्शिता व बौद्धिकता के बल पर निर्णय करती है कि - " वह देहर के साथ संबंध रखेगी किन्तु बिछिये न पहनकर , कानूनी रूप से पहले पति की पत्नी रहने से उसकी जायदाद की स्वामिनी और देवर की पत्नी जैसी बनी रहने से उसकी संपत्ति की भी मालिक रहेगी। "

प्रारंभिक दौर में उस समय की सामाजिक स्थितियों के अनुसार नारी पुरुष के संबंधों का चित्रण भिन्न रूप से मिलता है । जबकि 20 वीं सदी में नारी शिक्षा के प्रचार प्रसार के कारण आधुनिक कथा साहित्य में शिक्षित और समझदार प्रबुद्ध नारी चरित्रों का संधान हुआ जो बुद्धि विवेक में पुरुषों के समकक्ष रही। खोखली भावनाओं के बहाव में ना बहते हुए आज नारी व्यावहारिक दृष्टिकोण को लेकर आगे बढ़ रही है। परंपरागत संस्कारों में जकड़े समाज में अपनी दक्षता से आगे बढ़ने में विश्वास रखती है। हिंदी साहित्य में महिला उपन्यासकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय नारी के विभिन्न समस्याओं को स्वर प्रदान किया। परंपरा एवं रूढ़ियों को तोड़ती , स्वतंत्रता के लिए अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती एवं सफलता प्राप्त करती अनेक महिलाओं के सशक्त व्यक्तित्व को इन उपन्यासकारों ने आकार प्रदान किया । अपने लेखन का माध्यम बनाया।

इन महिला उपन्यासकारों में अनेक ऐसे अनेक उपन्यासकार हैं जो नारीवादी चेतना को वहन करते हैं । नारी में जागृति की चेतना का संचार करने वाली महिला उपन्यास कारों में सूर्य वाला , शिवानी, कृष्णा सोबती , मृणाल पांडे, मालती जोशी, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा , चित्रा मुद्गल आदि प्रमुख है। इन उपन्यासकारों ने स्त्री की समस्या , संघर्ष और समस्याओं को नियति मानकर उसे स्वीकार करने वाली स्त्री , समस्याओं से मुक्ति के प्रयास तथा सफलता प्राप्त करने वाली स्त्रियों के विषय मे महिला उपन्यासकारों ने अपनी कलम चलाई है। इसके साथ ही स्त्रियों का मानसिक संसार, उनके जीवन यात्रा के विभिन्न पडावो में बदलती हुई उनकी रिश्तेदारिया , उनकी निजी भावनाएँ , प्रेम, अनुभूति, वात्सल्य, आशंका, दुविधा का समावेश भी उनकी रचनाओं का अंग बन गया।

अपने मूल में जाकर महिला लेखन एक विचारधारा सा आगे जाकर एक स्री द्वारा जो अपने और दुनिया के बारे में अलग तरह से सोचने का एक ऐसा तरीका है जो स्त्री तथा पुरूष दोनों के लिए बनाई परंपरा के समानान्तर कुछ नयारचने और सोचने की नई-नई राहें खोलता है।

महिला उपन्यासकारों की रचनाओं के मूल में वे जीवन मूल्य हैं जो नारी समेत पूरी मानवजाति के हित में है। उनका लेखन एक उदार संवेदनशील और संतुलित बुद्धि से अपने चारों ओर के उस परिवेश का जायजा लेगा जो उसे प्रगति की राह की ओर ले जाता है। आज की नारी स्वतन्त्र रहना अधिक पसंद करती है। नौकरी पेशा नारियों की मुख्य समस्या तथा उलझन है - घर और बाहर दोनों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने की। नासिरा शर्मा उपन्यास " शाल्मली " में नायिका शाल्मली स्वतंत्र चेतना और नई सोचके साथ उभरी है। शिक्षित होने के साथ साथ वह उच्च पदस्थ भी है। मेधावी शाल्मली पति के शारीरिक , मानसिक और आर्थिक दबाव के बावजूद वह सामाजिक दायरे को नकारती नहीं है। सरोज के साथ तलाक संबंधी संवाद के उत्तर में वह कहती है ," फिर एक बार मै बता दूं कि मैं पुरूष विरोधी न होकर अत्याचार विरोधी हूँ। अत्याचारी का कोई नाम और धर्म नहीं होता , समूह में हो या ईकाई मे वह हमारे सामने होते हैं और उसी अत्याचारी से हमें जूझना है "

उपन्यास के अंत में समस्या को परिस्थिति का हवाला देकर अपने व्यक्तित्व को संवारने में लग जाती है । अपनी विस्तृत दृष्टि और सोच को संकुचित करना या समस्या से उलझना नहीं चाहती है । वह कहती है " तुम्हारे सामने समस्या केवल पति से निपटने और उससे मुक्त होने की है मगर मेरी नजर में नारी की प्रगति और स्वतन्त्रता समाज की सोच और स्थिति को बदलने में है।घर में रहो या बाहर निकलो हर जगह सामना पुरूष से होगा , चाहे वो सब्जीवाला हो या तुम्हारा बाँस , अखबारवाल हो या तुम्हारा पति , होगा वो पुरूष ही ।"

नासिरा जी ने शाल्मली के माध्यम से समाज में प्रतिष्ठित, शिक्षित और विवेकशील विचारों वाली नारी की सामाजिक समस्याओं का चित्र खींचा है। नासिरा जी ने न केवल नारी की समस्याओं को चित्रित किया है अपितु बडी दक्षता से शाल्मली के माध्यम से उससे उबरने की राह भी सुझाई है। एक प्रगतिवादी विचाधारा जो विद्रोह नहीं एक आपसी सुलह की राह भी दिखाती है। रामकुमार गौतम जी विश्वास व्यक्त करते हुए कहते हैं, " समाज में और विशेषतः स्वदेशी परिवेश के मध्यवर्गीय समाज में व्याप्त नारी पौरूष संबंधो के बीच फैली विकृति को कैश न कराकर उसे गांभीर्य प्रश्न कर एक गरिमा युक्त तलाश के लिए " शाल्मली " को काफी लम्बे समय तक याद किया जाएगा।"

नासिरा जी की " ठीकरे की मंगनी " उपन्यास में मुस्लिम परिवार की नारी की संवेदना , अनुभव ,अविवाहित नारी के अस्तित्व का बोध और मुस्लिम समाज की धार्मिक आचार संहिताओ को नासिरा जी ने अपने चिंतन का विषय बनाया है। उपन्यास की नायिका महरूख इस रूढि का शिकार वनी हुई है। उसका पति अपने परिवार का पालन-पोषण न करके विदेश में जाकर किसी दूसरी लडकी के साथ बंध जाता है। महरूख गाँव के स्कूल में नौकरी करके परंपरागत मूल्यों को नकारते हुए प्रशन्नता से अविवाहित रहकर भी यह संदेश प्रेषित करती है कि ---" यदि पुरूष अविवाहित रहकर सुख संतोष पा सकता है तो नारी को सहारे की क्या आवश्यकता है? "

मेहरुन्निसा परवेज़ का उपन्यास " कोरजा" ( 1972 ) मे नायिका कम्मो अपना और चाची का पेट भरने के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाती है शान से नौकरी करती है। डॉ शशिप्रभा शास्त्री के उपन्यास " नावें "( 19874) की मालती पढाई समाप्त करने के पश्चात घर की हालत को संभालने के लिए दिल्ली से गाजियाबाद नौकरी करने के लिए जाती है। यही हाल उषा प्रियंवदा के उपन्यास " पचपन खम्भे लाल दिवारे" ( 1961) की नायीका का है। परिवार के भरण-पोषण के लिए आजीवन अविवाहित रहकर स्मृतियों के दंश को सहकर मौन साध लेती है।

स्वतन्त्र व्यक्तित्व के विकास में बाधक होने के कारण विवाह संस्था के प्रति पूर्णतया अनास्थावान होते हुए भी विवाह द्वारा मिलने वाली समाजिक , मानसिक, आर्थिक सुरक्षा ने हमेशा उसे दुर्बल बनाया है। परन्तु अपने दृढ मनोबल का परिचय देते हुए नारी निरंतर अपनी प्रतिभा के बल पर अग्रसर होती रही । समाज में अपना निर्धारित स्तर , एक सम्मान जनक परिस्थित को बनाए रखने के लिए नारी सर्वदा प्रयत्नशील रही। मृदुला गर्ग की " उसके हिस्से की धूप" , कुसुम अंसल का " उसकी पंचवटी ", उषा प्रियंवदा का " रूकोगी नहीं राधिका" , मन्नू भंडारी का " आपका बंटी", अमृता प्रीतम का " रसीदी टिकट " , कृष्णा सोती का " मित्रों मरजानी " , मृणाल पाण्डे " का " लडकिया" , नासिरा शर्मा का " ठिकरे की मंगनी" , चित्रा मुदगल का " आवा" आदि की नायीका प्रगतिशील विचारधारा की होने के कारण कभी ठहरती या रूकती नहीं। परिस्थितयों से जूझती लगातार अपने आगे बढने का रास्ता निकाल लेती है। " माई " गीतांजली श्री का प्रथम उपन्यास है आजादी और कैद के प्रश्न को लेखिका ने इस उपन्यास में बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया है।

मैत्रेयी पुष्पा की नारी अपनी सर्व सत्ता से स्वतन्त्रा की मांग करती है। ईदन्नमम उपन्यास में नारी जीवन की विडम्बनाओ, यातनाओ से चलकर उसकी बेमीशाल शक्ति और साहस को शिलालेख के रूप में स्थापित किया , कहा जा सकता है। चित्रा मुदगल जी का उपन्यास " एक जमीन अपनी " की नायिका स्वतन्त्रता, समानता के अधिकार बोध से जागृत हो नारी समाज के लिए एक नए रास्ते का निर्माण करती है। महानगरीय जीवन , विज्ञापन जगत में होनेवाले नारी शोषण को सार्थकता से कथासूत्र में बांधना उपभोगवादी संस्कृति का चित्रण है । " आवा" को नारी विमर्श का महान आख्यान बताया है और आगे चलकर इसे दलित विमर्श का भी महाकाव्य माना है । डॉ शिवकुमार मिश्र जी ने " आवा " को " औरत " के वजूद से जुड़े दहकता सुलगता दस्तावेज और एक बडे आकार का विचारोत्तेजक उपन्यास कहा है। अनीता की रंगीन दुनिया में उसे शोषण छल नजर आता है। अंकिता की दृष्टि में नारी का आत्मनिर्भर होना सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं बल्कि उसका बहुआयामी रूप से सफलता हासिल करना है। प्रभा खेतान का " छिन्नमस्ता" नारी जीवन की पीडा , आभाव ,डर , पराजय, अपमान , आत्मग्लानी , शोषण से भरा हुआ है। परन्तु अंततः उपन्यास के सभी पात्र अपनी निराशाजनक परिस्थितयों से उभरकर एक उज्जवल भोर के सम्मुखिन होते हैं। प्रगति की ओर।

मृदुला गर्ग का उपन्यास "कठगुलाब " में नारी के संघर्ष और उससे उबरकर स्वंय को प्रतिष्ठित कर अपनी प्रतिभा प्रदर्शन करने का सफल प्रयास परिलक्षित होता दिखता है। डॉ रोहिणी अग्रवाल का कहना है " आज की नारी प्राचीन नारी से कई अर्थों में भिन्न है। पुरूष के झुके कदमों को सहारा देने के लिए वह स्वयं अर्थोंपार्जन में कूद पडी है।" भारतीय महिला तमाम बनी- बनाई रूढियों को नकार कर अपनी अर्धमानव स्थिति को अस्वीकार कर पूर्ण मानव बनने और चेतना को संघर्षरत रखने के लिए प्रयत्नशील है।

चित्रा मुदगल जी के अनुसार, " स्त्री का आत्मसंघर्ष अपनी निरंतरता में प्रत्येक युग में विद्यमान रहा है। समय के बदलते तापमान में , बदलते सामाजिक संदर्भों में अपनी अधीनस्थ की भूमिका, शोषण , असमानता से मुक्ति के प्रयत्न एवं दोहरे मानदंडों के बीच अपनी बदलती सामाजिक भूमिका के बावजूद स्त्री के प्रश्न नहीं बदले हैं। पर फिर भी वह बढती गई । अपने को होम नहीं होने दिया। प्रगति के लिए प्रयत्न करती गई।"

आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में डॉ शरद सिंह का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास " पिछले पन्ने की औरतें " से हिन्दी कथा के क्षेत्र में अपना कदम रखा। परमानंद जी ने उनके उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का "टर्निग प्वाइंट" कहा है। यह हिन्दी में रिपोतार्जिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमे आकडो और इतिहास के संतुलित समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक महत्व दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के " फिक्शन उपन्यासों " के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। शरद सिंह के चारों उपन्यास " पिछले पन्ने की औरतें " , " पचकौडी" , " कस्बाई सिमोन " , " शिखण्डी" के कथानकों में परसपर भिन्नता के साथ इनमें शैलीगत भिन्नता भी है। " पिछले पन्ने की औरतें " मे जहाँ वे बेडियाँ समाज की स्त्रियों के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालती है, वही " पचकौडी " में बुन्देलखण्ड के सामंतवाद परिवेश में स्रीजीवन की दशा का चित्रण करते हुए वर्तमान समाज , राजनीति एवं पत्रकारिता पर बडी गहराई से लिखती हैं। " कस्बा ई सिमोन " मे वे एक अलग ही विषय उठाती हुई "लिव इन रिलेशन " को अपने उपन्यास का आधार बनाती है। हाल ही मे उनका चौथा उपन्यास " शिखण्डी " प्रकाशित हुआ है जो महाभारत के एक प्रमुख पात्र शिखण्डी के जीवन पर नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इन सभी उपन्यासों मे नारी के जीवन , संघर्ष और उससे उपर उठकर आगे बढने की प्रकृया को विभिन्न दृष्टिकोण से रेखांकित करती है।

कवयित्री और गद्यकार अनामिका जी ने कई उपन्यास लिखे हैं। उनके उपन्यास लेखन के इस कडी में उनका नवीनतम उपन्यास " आईनासाज " आया है उनकी रचनाओं में स्वभावतः स्री स्वभाव के कई प्रमाणिक और आत्मपरक रंग देखने को मिलतें हैं , जिसके पीछे की संवेदनशीलता से सहज ही पाठक मुग्ध हो जाते हैं। विदित है कि दो खंडों में विभाजित उनका " दस द्वारे का पिंजरा " उपन्यास "पंडित रामबाई " ( पहले खंड में ) और " ढेलाबाई " ( दूसरे खंड में) के जीवन संघर्षों को बयां करते हैं। जिनके बहाने नारी की प्रगतिशीलता और संघर्ष को उजागर किया है। यह उपन्यास परस्पर विपरीत स्थितियों से आते स्त्रियों के समक्ष होने वाली एक जैसी चुनौतियों को सामने रखता है। रमाबाई जहाँ एक विदुषी नारी है वही ढेलाबाई एक वेश्या की बेटी है और अनपढ है।

दोनों का संघर्ष एक जैसा है। उपन्यास के अंत में हम पाते हैं कि दोनों पात्र अंततः एक ही कार्य के लिएजुट जातें हैं । उद्येश्य भी अंततः एक ही है - स्री मुक्ति। इस उपन्यास की सफलता की वजह यह है कि दोनों क्रमशः स्री की चेतना, स्वाभिमान और उसके अस्तित्व के समानताकारी आन्दोलन से जुड जाती हैं। अनामिका जी की रचनाओं मे स्री प्रमुख स्थान रखती है और प्रगति दूसरे स्थान पर होता है।

इस उपन्यास के बहाने अनामिका जी ने न सिर्फ एक लेखक के महत्व को और उसकी रचनाओं में झलकती इतिहास की विभिन्न छवियो को रेखांकित किया है बल्कि उसके आत्मसंघर्ष और उद्वेलन को भी चित्रित किया है

समकालीन जीवन में नारी के अधिकारों की वृद्धि हो रही है , परन्तु वह अपनी सुरक्षा और मानसिक शांति एधीरे -धीरे खोती जा रही है। अपने अधिकारों की दौड में आज नारी अनेक कुचर्चाओ , कुशंकाओ ,समाज की क्रूरता का शिकार होती जा रही है। पर आज की प्रबुद्ध नारी इन सब भावनाओं से परे है। आगे बढते जाना ही उसका ध्येय है। " प्रगतिशीलता " के मायने भी बदल रहें हैं। भारतीय समाज समय के साथ साथ अज्ञानता को भी दूर करे। शिक्षित नारी ही समाज में ज्ञान के साथ संतुलित विकास की दिशा की ओर हमें ले जा सकती है।

अभी अभी मेरे हाथ में उभरती हुई सशक्त कथाकार डॉ रजनी मोरवाल का सद्य प्रकाशित उपन्यास " गली हसनपुरा " आया है । जिसमे लेखिका ने हसनपुर की गलियों में रहनेवाली स्त्रियों का संघर्ष परिस्थितयों से लडने का जज्बा और पुरानी परंपराओ से मुक्ति के अदम्य साहस को उभारा है। उन्ही के शब्दों में , " उपन्यास " गली हसनपुर " का श्रेय वहाँ रहनेवाले एक ऐसे वर्ग को जाता है जो पेट से ही सोचता है, पेट के लिए ही जीता है और पेट के कारण ही मर जाता है। पेट से उपर उठकर यदि यह वर्ग बौद्धिकता के स्तर पर कुछ सोचने की हिमाकत करे तो उसे सामाजिक, आर्थिक , धार्मिक व राजनैतिक षडयंत्रों मे फंसाकर कुचल दिया जाता है।" फिर भी एक रोशनी है जिसकी ओर बढती हुई महत्वाकांक्षा के साथ कुछ कर गुजरने चाहत से वे सब बढती जाती हैं। रजनी मोरवाल जी से हिन्दी साहित्य को अभी और अनेक अपेक्षाएं है।

आधुनिक नारी की बढती हुई महत्वाकांक्षा, समत्व तथा स्वतंत्रता की कामना ने उनमें कर्मठता , संघर्षशीलत , विपरितताओ से जमकर लोहा लेने का साहस जगाया है। महिलाएं यथार्थ की ठोस धरातल पर खडी है और नई जमीन तोडना भी जानती है। कुछ लेखिकाए ही ऐसी हैं जिन्होंने दायरे और दीवारें तोडने का साहस दिखाया है।

उपरोक्त सभी उपन्यासकारों के साथ-साथ और अनेक लेखिकाओं ने अपनी कलम से उपन्यासों में प्रगतिवादी विचाधारा को और अधिक मजबूत किया है।

संदर्भ ग्रंथ----

1. हिन्दी उपन्यासों में नारी -- डॉ शैली रस्तोगी।

2. स्त्रीवाद और महिला उपन्यासकार --- डॉ वैशाली देशपांडे।

3. चित्रा मुदगल - आवा ।

4. अनामिका , बीजाक्षर , पृ . 44.

5. मृदुला गर्ग के कथा साहित्य में नारी --- डॉ रमा नवले ।

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डॉ रानू मुखर्जी

A 303 , दर्शनम् सेन्टर पार्क A 303 , परशुराम नगर ,

परशुराम रोड, सूर्या पैलेस के पास

सयाजीगंज। pin - 390020

email - ranumukharji @yahoo.co.in

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परिचय – पत्र

नाम - डॉ. रानू मुखर्जी

जन्म - कलकता

मातृभाषा - बंगला

शिक्षा - एम.ए. (हिंदी), पी.एच.डी.(महाराजा सयाजी राव युनिवर्सिटी,वडोदरा), बी.एड. (भारतीय

शिक्षा परिषद, यु.पी.)

लेखन - हिंदी, बंगला, गुजराती, ओडीया, अँग्रेजी भाषाओं के ज्ञान के कारण आनुवाद कार्य में

संलग्न। स्वरचित कहानी, आलोचना, कविता, लेख आदि हंस (दिल्ली), वागर्थ (कलकता), समकालीन भारतीय साहित्य (दिल्ली), कथाक्रम (दिल्ली), नव भारत (भोपाल), शैली (बिहार), संदर्भ माजरा (जयपुर), शिवानंद वाणी (बनारस), दैनिक जागरण (कानपुर), दक्षिण समाचार (हैदराबाद), नारी अस्मिता (बडौदा),नेपथ्य (भोपाल), भाषासेतु (अहमदाबाद) आदि प्रतिष्ठित पत्र – पत्रिकाओं में प्रकशित। “गुजरात में हिन्दी साहित्य का इतिहास” के लेखन में सहायक।

प्रकाशन - “मध्यकालीन हिंदी गुजराती साखी साहित्य” (शोध ग्रंथ-1998), “किसे पुकारुँ?”(कहानी

संग्रह – 2000), “मोड पर” (कहानी संग्रह – 2001), “नारी चेतना” (आलोचना – 2001), “अबके बिछ्डे ना मिलै” (कहानी संग्रह – 2004), “किसे पुकारुँ?” (गुजराती भाषा में आनुवाद -2008), “बाहर वाला चेहरा” (कहानी संग्रह-2013), “सुरभी” बांग्ला कहानियों का हिन्दी अनुवाद – प्रकाशित, “स्वप्न दुःस्वप्न” तथा “मेमरी लेन” (चिनु मोदी के गुजराती नाटकों का अनुवाद 2017), “बांग्ला नाटय साहित्य तथा रंगमंच का संक्षिप्त इति.” (शिघ्र प्रकाश्य)।

उपलब्धियाँ - हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2000 में शोध ग्रंथ “साखी साहित्य” प्रथम

पुरस्कृत, गुजरात साहित्य परिषद द्वारा 2000 में स्वरचित कहानी “मुखौटा” द्वितीय पुरस्कृत, हिंदी साहित्य अकादमी गुजरात द्वारा वर्ष 2002 में स्वरचित कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को कहानी विधा के अंतर्गत प्रथम पुरस्कृत, केन्द्रिय हिंदी निदेशालय द्वारा कहानी संग्रह “किसे पुकारुँ?” को अहिंदी भाषी लेखकों को पुरस्कृत करने की योजना के अंतर्गत माननीय प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयीजी के हाथों प्रधान मंत्री निवास में प्र्शस्ति पत्र, शाल, मोमेंटो तथा पचास हजार रु. प्रदान कर 30-04-2003 को सम्मानित किया। वर्ष 2003 में साहित्य अकादमि गुजरात द्वारा पुस्तक “मोड पर” को कहानी विधा के अंतर्गत द्वितीय पुरस्कृत। 2019 में बिहार हिन्दी- साहित्य सम्मेलन द्वारा स्रजनात्मक साहित्य के लिए “ साहित्य सम्मेलन शताब्दी सम्मान “ से सम्मानित किया गया। 2019 में स्रजनलोक प्रकाशन द्वारा गुजराती से हिन्दी में अनुवादित पुस्तक “स्वप्न दुस्वप्न” को “ स्रजनलोक अनुवाद सम्मान” से सम्मनित किया गया।

अन्य उपलब्धियाँ - आकशवाणी (अहमदाबाद-वडोदरा) को वार्ताकार। टी.वी. पर साहित्यिक

पुस्तकों क परिचय कराना।

संपर्क - डॉ. रानू मुखर्जी

A.303.Darshanam Central Park.Pararashuramnagar.

Sayajigaunj.BARODA-390020. GUJARAT. EMAIL-ranumukharji@yahoo.co.in

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फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण - डॉ रानू मुखर्जी
महिला उपन्यासकारों के उपन्यासों में उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण - डॉ रानू मुखर्जी
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रचनाकार
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