रचनाकार.ऑर्ग की विशाल लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

बारह हाइकु - शशांक मिश्र भारती

01-
दिन गुलाब
मुरझाते चेहरे
गायब जोश।


02 :-
दिन दिवस
आकर चले जाते
हम क्या पाते।


03 :-
प्रेम दिवस
आरम्भ हो गये
थोड़ा हंसलें।


04 :-
आज दिवस
कल की है तैयारी
बातें परसों।


05 -
पाक हंसता
अपनों की वृद्धि से
पराये घर।


06-
आजादी पर्व
जुड़कर जन्मते
हमको गर्व।


07-
तिगड़मबाज
शत्रु को रिझाते
कल या आज।


08 -
भारत देश
कुछ से है अजूबा
गीदड़ी वेश।


09 -
रेश ही रेश
जयचन्द बनेंगे
हमारे देश।


10 -
देश की भक्ति
नापने का पैमाना
उनकी शक्ति।


11 -
वह बढ़ते
पांव कीचड़ में डाल
सदा कुढ़ते।


12 -
जले न बुझे
इधर न उधर
मूर्ख अन्धे।



शशांक मिश्र भारती
हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर 242401

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.