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बारह हाइकु - शशांक मिश्र भारती

01-
दिन गुलाब
मुरझाते चेहरे
गायब जोश।


02 :-
दिन दिवस
आकर चले जाते
हम क्या पाते।


03 :-
प्रेम दिवस
आरम्भ हो गये
थोड़ा हंसलें।


04 :-
आज दिवस
कल की है तैयारी
बातें परसों।


05 -
पाक हंसता
अपनों की वृद्धि से
पराये घर।


06-
आजादी पर्व
जुड़कर जन्मते
हमको गर्व।


07-
तिगड़मबाज
शत्रु को रिझाते
कल या आज।


08 -
भारत देश
कुछ से है अजूबा
गीदड़ी वेश।


09 -
रेश ही रेश
जयचन्द बनेंगे
हमारे देश।


10 -
देश की भक्ति
नापने का पैमाना
उनकी शक्ति।


11 -
वह बढ़ते
पांव कीचड़ में डाल
सदा कुढ़ते।


12 -
जले न बुझे
इधर न उधर
मूर्ख अन्धे।



शशांक मिश्र भारती
हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर 242401

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