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विवशता - ज्ञानदेव मुकेश


        
      
                विवशता  
                              
एक बड़े पुलिस अधिकारी प्रेस से मुखातिब थे। स्थानीय विधायक पर कई तरह के आरोप थे। उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट निकल चुका था। प्रेस के प्रतिनिधि उन आरोपों को विस्तार से जानना चाह रहे थे। वहां आम लोग भी मौजूद थे। एक धर्मनिष्ठ और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी जनता के उस प्रतिनिधि और संविधान-पुरुष के कुकृत्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘माननीय विधायक जी के विरुद्ध बलात्कार और हत्या के आरोप हैं। माननीय विधायक जी के खिलाफ यह भी केस दर्ज हुआ है कि गांव के पुल निर्माण में उन्होंने घोर धांधली की है। कुछ ग्रामीणों ने पिछले सप्ताह हुए आगजनी और दंगे में माननीय विधायक जी का सीधा हाथ होने का दावा किया है। माननीय विधायक जी..............’’


तभी एक आदमी ने बीच में टोकते हुए पूछा, ‘‘इस व्यक्ति ने इतने अमानवीय कार्य किए, फिर भी आप उनको माननीय, माननीय क्यों कह रहे हैं ?’’
कुछ देर के लिए चुप्पी छा गई।


पुलिस अधिकारी ने धीमे स्वर में जवाब दिया, ‘‘दरअसल, जबतक वे विधायक हैं, मुझे माननीय शब्द का इस्तेमाल करना ही पड़ेगा। यह हमारी संवैधानिक विवशता है।’’
कुछ देर के लिए फिर चुप्पी छा गई।


तभी एक दूसरा आदमी उठ खड़ा हुआ और उसने बेलाग पूछा, ‘‘साहब, यह क्यों नहीं कहते कि उसी विधायक ने आपकी मलाईदार पोस्टिंग कराई है ?’’


                                                -ज्ञानदेव मुकेश 
                                              
                                               फ्लैट संख्या-301,
                                                  साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                  अल्पना मार्केट के पास़, पाटलीपुत्र रोड,
                                                  पटना-800013 (बिहार)

e-mail address - gyandevam@rediffmail.com

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