नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

पथ की आस - लघु कथा - अवधेश कुमार निषाद मझवार

पथ की आस - लघु कथा

------------------------------

बसंत का मौसम बहुत सुहावना होता है। पेड़ पौधों पर नए-नए पत्ते व टहनिया निकल आयी हैं, क्योंकि फागुन का माह चल रहा है । चारों तरफ रंग ही रंग व हर किसी के हाथों में रंग-बिरंगा गुलाल दिखाई दे रहा है ।

मेरे गांव के पास ही एक गांव नारायणपुर है, वहाँ की एक रीति बहुत पुरानी है | वह यह है, वहाँ के निवासी एक-दूसरे के गांव में होली की टोली के साथ बधाई देने पहुंचते थे | इसबार देखा गांव में अंदर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था।

मैंने पूछा इस गांव में कैसे जाना होगा ? तभी गांव के एक लड़के ने बताया। इस गांव के लिए एक पगडंडी जाती है। गांव का केवल यही एक रास्ता है। फिर क्या पगडंडी से चलकर गांव में प्रवेश हो गए। सभी लोगों ने एक दूसरे के गले मिलकर होलिका माता जी के जयकारे लगाए।

उसी समय गांव के एक सज्जन आदमी ने अपने घर पर बने पकवान थाली में लेकर आए। जिसमें हिस्से-गुजिया, रंग-बिरंगे आलू के पापड़, थोड़ा सा गुलाल व साथ में पीने के लिए घर पर घुटी भांग भी साथ में लाए। उन सज्जन का नाम हाकिम सिंह था।

मैंने आलू के पापड़ खाते हुए उनसे पूछा। बाबूजी इस गांव के लिए चौड़ा रास्ता नहीं है। यह बात सुनकर हाकिम सिंह जी की आंखे नम हो गई। थोड़ी देर बाद बोले यह गांव लगभग पचास साल से बसा हुआ है। गांव सड़क के किनारे बसा हुआ है। गांव के आगे दबंगों लोगों का खेत है। मुख्य सड़क से नक्शे में 20 फुट चौड़ा रास्ता है। लेकिन वे दबंग कहते कि हम दलितों को जाने के लिए रास्ता नहीं देंगे। जैसे दलित-पिछड़े रहते हैं। वैसे ही सब गांव वालों को रहना सिखा देंगे।

जाने कितने विधायक, सांसद, प्रधान व अन्य प्रत्याशी  गांव की पगडंडी पर चलकर आए और सभी गांव वालों को आश्वासन देकर चले जाते हैं। कि आप हमें अपना वोट दें। हम आपके गांव में सड़क, ,पानी,बिजली आदि का पूर्ण रूप से विकास करेंगे। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। क्योंकि जो लोग आते हैं, वो सब रास्ता बनवाने के नाम पर झूठ बोलकर वोट ले जाते हैं। बाद में इस गांव की तरफ अब तक किसी ने लौटकर नहीं देखा।

पचास साल से कभी कोई प्रधान तो कभी कोई प्रधान हर बार एक नया चेहरा प्रधानी का चुनाव जीत जाता है। लेकिन कोई भी पथ को नहीं बनवा पाया है।

हमें तो ऐसा लगता है कि क्या हमें अपने जीवन में कभी गांव के लिए रास्ते मिल पाएगा ? फिर भी एक आस रहती है। एक दिन पथ का मुंह जरूर देखें।

आखिर पथ की आस में पूरा जीवन गुजर गया................

अवधेश कुमार निषाद मझवार

ग्राम पूठपुरा पोस्ट उझावली

फतेहाबाद आगरा

Email-avadheshkumar789@gmail.com

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.