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गुड़ की गंध - सीताराम पटेल 'सीतेश' की कविताएँ

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गुड़ की गंध


माघ की माह
सुर्रा का प्रवाहना
गौटिया बारी
चरखा का गाड़ना
कैन का बट्टू
बरछा से काटना
बारी में लाना
हँसिया से छीलना
एक दूसरे
आनंद से कहना
कर परस
नयनों का मिलना
गदगदाना
अति आनंद पाना
गन्ना पेराई
घनवारी त्यौहार
अति रौनक
चमकता चेहरा
गुड़ की गंध
गली गली में फैली
चींटी सा लोग
खींचे चले आ रहे
भैसों की जोड़ी
चंदवा औ भुरवा
नंबर एक
दोनों की बनी जोड़ी
घरर घर्र
चल रहा चरखा
झरर झर
गिर रहा है पीपा
बहुत मीठा
सभी यहाँ कहते
गन्ना का रस
गरमी का दुश्मन
पान पतई
किसान मजदूर
लाये नरई
पका रहे हैं गुड़
गुड़ की गंध
चारों तरफ फैली
सूंघते सभी
चाहे नाक हो मैली
रस को ढार
चुल्हा में आग बार
डबका रस
करहा में उबाल
ऊपर छाने
बटार से चलाते
रस गढ़ाते
उतारकर उसे
मिट्टी के भाड़ा
हाथ से लोढ़ियाते
गुड़ बनाते
लार को चुचवाते
लार ढोंकते
बहुत मुस्कराते
बचे हैं गुड़
लाई उसमें साने
गुड़ ओंखरा
सबको है बाँटते
गाँव के लोग
आपस में मिलते
खिलखिलाते
स्वस्थ सभी लगते
सीताराम पटेल 'सीतेश'


(1)


जेहन में अत्यधिक गुस्से भरे है।
फिर होठों से फूल कहाँ झरे हैं।।


बचपन के दिन होते हैं सुहावने,
बस्ता के बोझ से बच्चे डरे हैं।।


दिखाने की होड़ लगी है जगत में,
कचरा ज्ञान मोबाइल में भरे हैं।।


बड़ी लाड़ दुलार से पली बेटियाँ,
दहेज के लिए ये दुल्हन जरे हैं।।


उदास है सुन्दर पढ़ी लिखी दुल्हन,
दिव्यांग दुल्हे मंडप में अड़े हैं।।


कृषक बाट जोहते रहे बादल के,
महाजन कोठियों में धान धरे हैं।।


पशु भूख से मरते रहे अकाल में,
उनके चारा यहाँ नेता चरे हैं।।


श्रम किये बिन खाते रहे वे खाना,
अपथ्य में बेचारे सारे मरे हैं।।


ईमान आज बिक रहा बाजार में,
'शुक्र' में सच सोलह आना खरे हैं।।

(2)


आप ओखली में सिर कूटते रहे।
भाई ही भाई को लूटते रहे।।


मात्र पाँच गाँव की मांग पांडव की,
इतनी पर भी कौरव घूटते रहे।।


निमंत्रण मिला सारी दुनियाभर को,
कुरुक्षेत्र में वे सभी जूटते रहे।।


महाभारत हमारा इतिहास यहाँ,
रिश्ते-नाते सारे टूटते रहे।।


पाप का भार सहन नहीं करती,
इन पापियों के प्राण छूटते रहे।।


युद्ध में लोग खोज रहे यहाँ शाँति,
पाप के भरती घड़े फूटते रहे।।


कौन साथ खड़े, बड़ी बात है नहीं,
'शुक्र' के रहते मूल्य टूटते रहे।।

(3)


उधार चुकाने के लिए घर तेरे आया।
चुका लिया मैंने फिर उसने मुझे बुलाया।।


कई प्रकार के प्राणी रहते दुनिया में,
किस्मत से कुदरत ने हमें तुमसे मिलाया।।


प्रेम कर परस्पर चार दिन के जिन्दगी में,
खुदगर्जी ने यहाँ तो अपना गुल खिलाया।।


दाद, खाज, खुजली संसार के ये कोढ़ में,
उसने आकर मेरे तन मन को खुजलाया।।


नर-नारी, मानव-मानव, सभी एक समान,
'शुक्र' है सभी को उस एक ने ही बनाया।।

(4)


जितने ज्यादा फल लगे तरु़वर झुक गए हैं।
ज्ञान बोझ में ज्ञानी के कमर टूट गए हैं।।


दादी मेरी पढ़ा रही है भारी पोथी,
उसके कथाओं के नीर अब सूख गए हैं।।


पद्मावती यौवन सौन्दर्य की महामारी,
रत्नसेन की खोज में हीरामन शुक गए हैं।।


तुम्हें देखने को लालायित है कायनात,
वसंत जानकर वसंतदूत हूक गए हैं।।


अपने कर्म को कर्मवीर कभी न गिराना,
महाराजाओं के यहाँ कर्म चुक गए हैं।।


सविता को भी ये ढँक लेते हैं मेघदूत,
थूकने वालों ने चाँद पर भी थूक गए हैं।।


हम यहाँ इतराते रहते हर घड़ी हर पल,
'शुक्र' हमारे पूर्वजों कान फूँक गए हैं।।

(5)


जोड़ों में हुए पीड़ा, बुढ़ापे आने वाले हैं।
होठों से मुस्कान खत्म, यौवन जाने वाले हैं।।


चेहरों में अति चमक हो और मन में उत्साह हो,
तो समझो दोस्तों, बचपन फिर से आने वाले हैं।।


दूज के चाँद के समान दाँत दिखे बोले दादा,
समझो बसंतदूत यहाँ फिर से गाने वाले हैं।।


हर रितु में भूमि का सीना चीरकर उगाते फसल,
वास्तव में भूमिपुत्र सभी को जिलाने वाले हैं।।


अटारी के अंदर सो रहे हैं हम चैन के नींद,
धरती के ईश्वर ये हमारे कमाने वाले हैं।।


कायनात में हर तरफ छाई हुई है हरियाली,
कर्मवीर ही इस भूमि पर स्वर्ग लाने वाले हैं।।


काम करना अतिआवश्यक है,इस धरती लोक में,
'शुक्र' करो बचेंगे नहीं खाली खाने वाले हैं।।

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सोमरस


धरती के आँचल में
चू गया था
केशरिया चाशनी
सोमरस
जिसे अपनी हथेली पर लेकर
आहिस्ता आहिस्ता
इस सोमरस को
चाटना चाहता हूँ
यह सोमरस
शरीर में शक्ति भर देता है
मन को मतंग कर देता है
मतंग जीवन की चाहत
संसार के हर प्राणी को रहता है

पिता


कंपकंपाती भोर में
कर्त्तव्य पथ पर जाते पिता को
ठंड कहाँ लगती है
उसे कर्त्तव्य तो याद है
एक ही है उसका लक्ष्य
कर्त्तव्य के राशि से ही
अपना परिवार का पेट
भरता है
इसलिए इतनी सुबह
वह चलता है
पिता पिता पिता
परिवार से पलायन कर
पूरा परिवार को पालता है
बुढ़ापे में उसकी प्रेयसी
उसको त्याग देती है
कर्त्तव्य प्रेयसी का त्याग
सह सकता है
जब उसे उसका
परिवार नहीं त्याग करता
तो मतंग रहता

छक छका छक


छक छका छक
चल रही है एक्सप्रेस रेलगाड़ी
ठसाठस धान बारदाना सा भरे
आमजन, साधारण डिब्बा
मूंगफली के छिलके, चनाबूट
बिस्किट, मिक्चर के पन्ने, कचरा फैले हुए
परस्पर संटकर सोये यात्री
स्त्री पुरूष से ऊपर उठे हुए
पलायन किए मजदूर
लौट रहे हैं अपना गाँव
न जाने कितने साल बाद
पिछले पांच साल पहले
चुनाव के समय आये थे
इस समय फिर सरपंच ने बुलाया है
इन मतदाता देवों के ऊपर
सोने के नारीयल चढ़ाया है

दिल आया


सूरज ने धरती को धूप दिखाया।
बहुत दिवसों के बाद रूप दिखाया।।
वसुंधरा प्रसन्न हुई, खिलखिलाई,
उसे देखकर दिनकर का दिल आया।।

दिव्या


होठों की लाली, दाँतों की रजत चमक
गाल का गोरापन, नाक की नथुली
बाल गाल पर आई, नथुली हिली
मुख सौन्दर्य चार चाँद सा खिली
छत्तीसगढ़ी हरी साड़ियां, खिलखिलाती आवाज, संगीत की साज
सबका भाषा, हाथ कर्म से कठोर
नख में लाली नेलपॉलिश, स्वेटर गुलाबी
नाभि दर्शना, मृगनयनी
हंसिनी की चाल, कमर लचकाकर चलती है
ऐसे दिव्या का दर्शन कर
बस खटारा खलती है

सास बहू


आज सास बहू को नहीं सिखाती है
उल्टा बहू अपने सास को सिखाती है
कलाई से कोहनी तक
चूड़ी पहने नई नवेली दुल्हन
बता रही है अपनी सास को
केला खाने का ढंग
छिलका पूरा नहीं उतारते हैं
ऐसे पूरा छिलका उतारकर खाओगी
तो देखकर हँसेगे दूसरे लोग
छिलका ऊपर से थोड़ा थोड़ा उतारते हैं
थोड़ा उतारे, फिर खाए, फिर खाते हैं ऐसे,
खाकर बताती है ऐसे
सीताराम पटेल 'सीतेश'

दोहे


दसों दिशाओं देश के, भिखारियों के भीड़।
यही हमारे प्रगति के, तोड़ रहे हैं रीढ़।।


गीता मेरी गाँव की, हो रही बलात्कार।
देख रहे चुपचाप हैं, भारत मोहन द्वार।।


चिन्ह हमारे देश के, कंकाल सा किसान।
दलाल से भयभीत हो, देते अपनी जान।।


खाते और खिसोरते, हाथी के दो दाँत।
हाथों को जोड़कर ही, दे देते हैं मात।।


गोलक तेरे नयन के, मारे मुझे गुलेल।
दिल मेरा घायल हुआ, समझा तुमने खेल।।


सपना अच्छा दिवस का, लिए हुए हैं आस।
बेरोजगार देश के, छील रहे हैं घास।।


बिगाड़ देते आदमी, जुआ, शबाब, शराब।
भुलाना नहीं भोग में, दुनिया बड़ा खराब।।


फूल बाण हैं काम के, कोयल की आवाज।
आम चार बौरा गए, वसंत है रितुराज।।


बौराया है बाग भी, बौराया परिवेश।
कहता दूत वसंत का, हमको ये संदेश।।


जब कोयल है कूकती, आता यहाँ वसंत।
योग को फिर तरस रहे, सीधा साधा संत।।


अज्ञानियों के भीड़ में, ज्ञानी हुए कबीर।
परमसच को प्रकट किया, अपना सीना चीर।।


जैसे लगते दूर से, सुहावने ये ढोल।
वैसे सुहावने लगे, नेताओं के बोल।।

​​

जो जाते आगे चले, रख काँटों पर पाँव।
उसी मानवों को मिले, सफलता की छाँव।।

​​

कुंदन है अति चमकता, तपता है जब आग।
ऐसे तपकर आदमी, लाये जग में राग।।

​​

भिखारियों धनवान है, माँग माँग कर भीख।
कूटनीतियाँ कलयुगी, भोला तू भी सीख।।

​​

परोपकार हम करते, दे दें अपनी जान।
सत्कर्म हमेशा करें, सिखाते हैं महान।।

​​

जो लीन रहे कर्म में, बने वही भगवान।
ठंडी गरमी सहन कर, करते काम किसान।।

​​

राम नाम के दीप से, जग सारा उजियार।
भक्तजनों के पीर को, पल में लेत उबार।।

​​

सीमा होवे स्नेह की, लखन जानकी राम।
इनके सुमिरन से यहाँ, बनते बिगड़े काम।।

​​

मध्यप्रदेश दिल अपना, कौशल प्रदेश बाण।
आधा नारी देव की, भारत की पहचान।।

​​

अजगर सा बैठे यहाँ, जग में आदमखोर।
आम आदमी के यहाँ, कब आयेगी भोर।।

​​

प्रेम एकता देखकर, दुनिया जाए हार।
आपस में मिलकर रहे, सारा जग परिवार।।

​​

संसाधन जन है युवा, भारत के तकदीर।
बदलेगी प्रौद्योगिकी, भारत की तस्वीर।।

​​

मच्छर आकर चूसते, शरीर का सब खून।
देकर हमें मलेरिया, लेता छीन सुकून।।

​​

गंगा तेरे देश में, भाँति भाँति के लोग।
दूषित करके जगत को, फैलाते हैं रोग।।

​​

दिल में आग सुलग रहे, पक्का खायें प्यार।
धूम उठा आकाश में, काजल है संसार।।

​​

जो जीते अपने लिए, कहलाते हैं ढोर।
जो खाते हैं श्रम बिना, कहलाते हैं चोर।।

​​

पेड़ सभी देते हमें, जीवनदायी गैस।
हम उसको हैं काटते, कुल्हाड़ी से लैस।।

​​

पेड़ सब हमारे लिए, करते विष का पान।
तरु संरक्षण के लिए, करिए श्रम का दान।।

​​

देना माँ आप मुझको, गर्भाशय में मार।
सहा न जाए जगत में, नारी अत्याचार।।

​​

सभी यहाँ से एक दिन, जायेंगे उस पार।
जीवन में चार दिन के, करें नहीं तकरार।।

​​

महल अटारी अति मिला, मिला नहीं घर गाँव।
जाएँ तो जाएँ कहाँ, बीच फँसी है नाव।।

​​

मानवता है सिसकती, लाश बिछी अनुराग।
फैल रही संसार में, हिरोशिमा की आग।।

​​

सता रहे कमजोर को, कहते इसे रिवाज।
बकरी सा है मेंमिया, जनता की आवाज।।

​​

जैसे चारा खोजती, तालाबों में मीन।
वैसे खोजे सर्वदा, दाल भात को दीन।।

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अपने को ज्ञानी समझ, करते पर अपमान।
ऐसे ज्ञानी से बचें, करते खुद का गान।।

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पर आते ही चीटियाँ, आय बाँस पर फूल।
फल आते ही कदलियाँ, मिल जाते हैं धूल।।

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जीवन रथ के चक्र दो, चले एक ही साथ।
ऊपरवाला का रहे, इनके सिर पर हाथ।।

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कोयल मीठी बोलती, काग बोलता काँव।
ठगिनी माया दे सुला, भोर जगाए गाँव।।

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अपने तकरार करते, मौज उड़ाते आन।
किसान से मजदूर हो, खोते सब सम्मान।।

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प्रतीप प्रवृत्ति से हमें, अब तो हुआ लगाव।
छोड़ चुका है आदमी, कुदरत की अब छाँव।।

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कुंजर जीते पिपलिका, चढ़ते पंगु पहाड़।
राम दया से आपकी, मिट्टी बनते भाड़।।

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एकता अरु अखंडता, नजर रखेंगे गौर।
आतंकवाद जब मिटे, देश बने सिरमौर।।

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भाग्य देश के कक्ष से, लेता है आकार।
विकास पथ में देश का, शिक्षक हैं आधार।।

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स्नेह सजायी सजनियाँ, श्वेत सुमन की सेज।
सरसों सेमल सुमन के, सौरभ सभी सहेज।।

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घोंसलों के पास में, घूम रहे हैं चील।
दुश्मन के चढ़ छातिया, उनमें गाड़े कील।।

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जीए अंतिम आदमी, यहाँ मान सम्मान।
कसम करें उसके लिए, देंगे अपनी जान।।

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प्यारा होता बहुत है, राजनीति का खेल।
रिश्वतखोरों का यहाँ, होता अच्छा मेल।।

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सब कामों को छोड़कर, देने आना वोट।
लोकतंत्र त्यौहार में, काम न आए नोट।।

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आ जाए देख तुझको, कमजोरों में जोश।
रचना कर गोरी तुझे, ब्रह्म हुआ बेहोश।।

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ज्यादा करेंगे जितना, तरुवर का हम नाश।
होगा अत्यधिक उतना, बंदर सभी विनाश।।

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भारतीय हैं हम सभी, हिन्दी सबकी जान।
सर्व धर्म सम भाव ही, हम सबकी पहचान।।

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परचम प्यारा है हमें, कहे वतन के वीर।
भारत के गद्दार का, देंगे सीना चीर।।

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हिन्दी भाषा विश्व में, सबकी है सरताज।
हिन्दी में अपनी सभी, हो सरकारी काज।।

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माटी मेरे देश की, सौंधी उनकी गंध।
फसल लहलहाते यहाँ, किसान स्वेद सुगंध।।

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सीताराम पटेल 'सीतेश'

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