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इश्क़ और इंक़लाब का शायर 'फ़ैज़'

faiz

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ 


यह बात सच है कि उर्दू शायरी ने मीर-गालिब से लेकर फराज, मजाज़, जोश, साहिर से होते हुए गुलज़ार, जावेद अख्तर और बशीर बद्र तक  कई रंग देखे हैं. हर शायर ने अपनी क़लम की स्याही से शायरी के दरख़्त को सींचा है. अगर भारतीय उपमहाद्वीप में शायरी की बात हो और उसमें फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़' का नाम न आए तो यह सरासर नाइंसाफी ही है. फ़ैज़ बहैसियत एक शायर जाने जाते है. फ़ैज़ शायर होने के अलावा एक्टिविस्ट, फौजी, प्राध्यापक, संपादक और बहुत सी भूमिकाओ में रहे. एक शायर के एतबार से फ़ैज़ को याद करना 'गुलशन का कारोबार' चलाने जैसा है. 'बाद-ऎ-नौबहार' का मंजर देखने जैसा है. 'नक्श-ए-फरियादी' सुनने जैसा है. फैज़ अपने अलग ही अंदाज़ के लिए जाने गए.

वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
वो लोग बहुत खुश-किस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया

इस बात से बहुत ही कम लोग रूबरू होंगे कि भगत सिंह ने जब सांडर्स पर गोली चलाई थी, तो उस वक्त भगत सिंह और उनके साथियों की पिस्तौल से चली गोली की आवाज सुनने और सांडर्स को गोली मारते हुए क्रांतिकारियों को देखने वालों में फ़ैज़ भी शामिल थे. वह उस वक्त अपने कॉलेज के हॉस्टल की छत पर टहल रहे थे. इसी दौरान उन्हें गोली चलने की आवाज सुनाई दी और वो भारत के ऐतिहासिक पल के चश्मदीद गवाह बने. हालांकि आजादी के बाद हिंदुस्तान दो हिस्सों में तक्सीम हो गया और फ़ैज़ पाकिस्तान चले गए. लेकिन फ़ैज़ के लिए भगत सिंह का नाम मुतास्सिर करने वालों की फेहरिस्त में पहले नंबर पर हमेशा रहा. फ़ैज़ ने एक बार कहा था कि मेरे लिए धरती पर सबसे पसंदीदा और प्रभावित करने वालों में भगत सिंह है.

फ़ैज़ के बारे में एक मजेदार बात यह भी है कि वह शायर नहीं बल्कि एक टेस्ट क्रिकेटर बनना चाहते थे और एक टेस्ट क्रिकेटर न बन पाने का अफसोस उन्हें हमेशा रहा. 'नक्श-ए-फरियादी, 'दस्त-ए-सबा, 'जिंदानामा, 'दस्त-ए-तहे-संग, 'मेरे दिल मेरे मुसाफिर, 'सर-ए-वादी-ए-सिना' तमाम किताबों के शायर फ़ैज़ हिंदी, अरबी, अंग्रेजी, उर्दू और रूसी भाषाओं के भी जानकार थे। 

13 फरवरी 1911 को सियालकोट (अब पाकिस्तान) में पैदा हुए फ़ैज़ की शायरी की पहली किताब 1936 में 'नक्श-ए -फरियादी' के नाम से प्रकाशित हुई. वह 1940 में कुछ वक्त दिल्ली में रहे. उन्होंने अमृतसर कॉलेज में भी अपनी सेवाएं दी.यही पर ब्रिटिश महिला 'एलिस' के इश्क में गिरफ्तार हुए और 1941 में शादी करके एलिस की उम्र कैद हासिल की. 1942 से 1947 तक भारतीय ब्रिटिश सेना में कर्नल रहे. सेना की नौकरी में मन नहीं लगा तो इस्तीफा दे दिया.  राजनीति में भी एक्टिव रहे और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूरों के लिए भी आवाज उठाई.

उनकी नज़्म 'कुत्ते' जो उन्होंने मज़दूरों के लिए ही कही थी के कुछ अशआर  -

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
कि बख़शा गया जिनको ज़ौके-गदाई
ज़माने की फिटकार सरमाया इनका
जहां-भर की धुतकार इनकी कमाई

न आराम शब को, न राहत सवेरे
ग़लाज़त में घर, नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो इक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो

ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आकायों की हड्डियां तक चबा लें
कोई इनको एहसासे-ज़िल्लत दिला दे
कोई इनकी सोयी हुयी दुम हिला दे

पाकिस्तानी हुकूमत ने 1950 के आस पास से ही फ़ैज़ पर नजर रखना शुरू कर दी थी. हुकूमत की तानाशाही के खिलाफ उनकी शायरी इस कदर पुरअसर थी, कि कुछ लोगों को यह भी लगता था कि कहीं उन्हें फांसी न दे दी जाए. अहमद 'फ़राज़' और 'साहिर' लुधियानवी की तरह हुकूमत के ख़िलाफ़ अपनी तल्ख़ शायरी की वजह से उन्हें 1951 से 1955 तक जेल में भी वक्त गुजारना पड़ा. यहां भी वह खामोश नहीं रहे. अपनी क़लम के ज़रिये लोगों से बात करते रहे. कभी 'दस्त-ए -सबा' की किताब में छुप कर जेल से बाहर गए, तो कभी 'जिंदानामां' के अल्फ़ाज़ में लोगों तक पहुंचे. जेल से आज़ाद होकर लाहौर में पाकिस्तान आर्ट्स काउंसिल के मेंबर रहे. वह नोबेल पुरस्कार के लिए भी नॉमिनेट किए गए. वर्ष 1963 में सोवियत-संघ (रूस) ने उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार प्रदान किया। 1965 भारत-पाक युद्ध के समय वह पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय विभाग में अधिकारी थे। लियाकत अली खां की सरकार के तख्तापलट के लिए उन्हें 1977 में कई बरसों के लिए मुल्क़ से बेदख़ल कर दिया गया। 1978 से लेकर 1982 तक का दौर उन्होंने हिजरत (निर्वासन) में गुज़ारा।

निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन, कि जहां
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले, जिस्म-ओ-जां बचा के चले

फ्रांस की क्रांति के बाद पूरी दुनिया में आज़ादी की चाहतों में जो सबसे बड़ी चाहत उपजी, वह थी 'बोलने की, कहने की आज़ादी'. फ़ैज़ की शायरी उनकी मैगज़ीन ‘लोटस’ के ज़रिये फिलिस्तीन, बेरुत और अफ्रीका के लोगों तक पहुंची. फ़ैज़ सही मायनों में जम्हूरियत और आज़ादी के शायर थे. यही वजह रही कि वह बेरुत से लेकर फिलीस्तीन तक कुछ भी इंसानियत और जम्हूरियत के खिलाफ देखते तो परेशान हो जाते थे। भारत अक्सर आते थे और कभी उनकी जुबान से भारत विरोधी शायरी नहीं सुनी गई।

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले

जहां बाकी शायर गम-ए-जानां (महबूब के दुख को समझना) की बात करते रहे, वही फ़ैज़ ने गम-ए-दौरां (समाज के दुख को समझना) की बात की.

और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा


फ़ैज़ के अल्फाज को पूरी दुनिया से मुखातिब कराया मेहंदी हसन ने. हालांकि आज हमारे बीच न मेहंदी हसन हैं, न नुसरत फतेह अली खान और न ही फ़ैज़,  लेकिन फ़ैज़ के अल्फाज आज भी तन्हाई को दूर करने का दम ख़म रखते हैं.

‘तुम आये हो न शब-ए-इन्तज़ार गुज़री है
तलाश में है सहर बार बार गुज़री है’

या फिर

‘गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले’

फ़ैज़ की शायरी की दो क़िस्मे है ग़ज़ल और नज़्म। बाकी शायरों से अलग फ़ैज़ यह जानते थे कि कब कौन सी गजल कहनी है. कब ‘मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग’ कहनी है और कब 'हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे' कहनी है. गंगा जमुनी तहजीब के हिंदुस्तान के उलट, पाकिस्तान तानाशाही का भी शिकार रहा, जिसकी मुखालफत कभी अहमद फराज ने ‘अब किस का जश्न मनाते हो’ लिख कर तो कभी साहिर लुधियानवी ने ‘दबेगी कब तलक आवाज़-ए-आदम हम भी देखेंगे ‘ कहकर की है. दोनों को ही प्रतिबंध झेलना पड़ा। 1985 में  जनरल जियाउल हक ने जब पाकिस्तान में साड़ी पहनने पर पाबंदी लगाई, तब मशहूर पाकिस्तानी सिंगर इकबाल बानो ने साड़ी पहन कर ही करीब 50000 लोगों के सामने जाकर फैज़ की नज़्म 'हम देखेंगे, लाजिम है कि हम भी देखेंगे' गाई थी.

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन
कि जिसका वादा है
जो लौहे-अज़ल में लिखा है
जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे गरां
रुई की तरह उड़ जाएंगे


जो  इश्क़ करते हैं, उन्हें ज़रूरत है फ़ैज़ की--

दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुये ग़म आते हैं
जैसे बिछड़े हुये काबे में सनम आते हैं
इक इक कर के हुये जाते हैं तारे रौशन
मेरी मन्ज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं
रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो
सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो
दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं

जहां जम्हूरियत की बात करना हो, जहां तानाशाही की मुखालफत करना हो वहां ज़रूरत है फ़ैज़ की

ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं
फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़मे-दिल

फ़ैज़ की एक बेहद मशहूर नज्म
‘मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

फ़ैज़ की एक और मशहूर ग़ज़ल
गो सबको बहम साग़रो- बादा तो नहीं था
ये शहर उदास इतना ज़ियादा तो नहीं था
गलियों में फिरा करते थे दो-चार दिवाने
हर शख़्स का सद-चाक-लबादा तो नहीं था
मंज़िल को न पहचान रहे-इश्क़ का राही
नादाँ ही सही, इतना भी सादा तो नहीं था
थककर यूँ ही पल-भर के लिए आँख लगी थी
सोकर ही न उट्ठें ये इरादा तो नहीं था।


फैज़ के कुछ मशहूर अशआर
आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान
भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे

और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के

इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक
इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब
आज तुम याद बे-हिसाब आए

मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है
अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है

न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले
अपने कुछ और भी सहारे थे

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम
विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं

ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
--

faraz

शामिख़ फ़राज़

shamikh.faraz@gmail.com

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