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कहानी - उपनिवेश - प्रताप दीक्षित

कहानी -

उपनिवेश -

प्रताप दीक्षित

मेरी आखिरी पोस्टिंग उसी पुराने शहर में हो गर्इ थी, जहां पढ़ार्इ लिखार्इ, नौकरी की शुरुआत हुर्इ। एक अव्यक्त लगाव जैसा तो होता ही है। दफ्तर में इतनी व्यस्तता रही, पूरे साल, किसी से मिलना-जुलना न हो सका। सुना था, प्रो0 व्यास यहीं हैं, कुछ बीमार भी। उनसे मिलने की बहुत इच्छा थी। रिटायर तो वह तभी हो गए थे, जब मैं यहां तैनात था। मेरे ट्रांसफर के बाद वे सपत्नीक सैन फ्रांसिको चले गए थे। पुत्र ने टिकट भेजे थे। इमीग्रेशन रेजीडेंट कार्ड छह महीने के लिए था, जिसकी मियाद बढ़वार्इ जा सकती थी। बेटी-दामाद भी तो वहीं हैं, वहां भी जाना होगा। वे सभी मित्रों से मिले, मालूम नहीं कब लौटना हो। लेकिन वे एक माह बाद ही वापस लौट आए थे। यह सब मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ।

नौकरी का मेरा अंतिम एक-डेढ़ साल कब बीत गया, पता नहीं चला। दफ्तर में फेयरवेल की औपचारिकताएं, हिसाब-किताब, देना-पावना निपटाने के बाद अगली सुबह, मेरे सामने समय का अंतहीन विस्तार था, अनन्त आकाश की तरह फैला हुआ, कितने ब्लैकहोल निगलने को तत्पर। वर्षों से टलते जा रहे उत्तरदायित्वों की प्राथमिकताएं गड्-मड् हो गयी थीं। मकान, बेटी का विवाह, पुत्र की कहीं ढंग की नौकरी। देर रात तक नींद आंखों से गायब रही। सुबह उठने में देर हो गर्इ। याद आया-आज दफ्तर तो जाना नहीं है, कदमों की रफ्तार अपने आप धीमी हो गर्इ, भूल गया कि जाना कहां था।

चौराहे पर अनायास प्रो0 व्यास से मुलाकात हो गयी। उनका आकर्षक व्यक्तित्व ढल गया था। चेहरे की झुर्रियों से झांकती उम्र, चेहरे पर थकावट, परंतु चुस्ती बरकरार थी, ‘हलो यंग ब्वाय, हाऊ आर यू?’ उनका सदाबहार जुमला कानों में गूंजा, ‘तुमको तो वापस आए एक साल हो गया न?’ मुस्कराने की कोशिश के बाद भी आवाज बेजान सी थी।

इसका मतलब मेरे ट्रांसफर की खबर उन्हें थी। इतने दिन उनसे न मिल पाने पर मुझे अपराध बोध महसूस हुआ।

‘जी सर, दफ्तर में वही काम का बोझ।’ मैंने सफार्इ देने की कोशिश की, ‘लेकिन आपका यह यंग ब्वाय अब रिटायर हो चुका है, एक हफ्ते पहले।’ मैं हंसा।

‘वेल, बट नॉट टायर्ड! अब तो अपनी शामें खूब गुजरेंगी।’ उनकी बुझी सी आंखों हंसी झलकी थी। शाम को उनके घर जाने पर वे बहुधा ड्रिंक करते मिलते। मुझे आग्रह करके बैठाल लेते। उनके प्राध्यापक रहे होने का मुझे लिहाज रहता, आदत भी नहीं थी। परंतु उनके जोर देने पर कभी साथ देना ही पड़ जाता। ज्यादातर बॉरबॉन, ब्लैन्टन्स् या रायल स्टैग। सिगरेट भी उनकी न्यू पोर्ट या मार्लबोरो।

‘चलो इस समय चाय ही सही।’ उन्होंने मेरे कंधे को अपनी बांह के घेरे में ले लिया था। उनका आवास ज्यादा दूर नहीं था। तीसरी मंजिल पर सुन्दर, खुला हुआ, हवादार थ्री बेड रूम फ्लैट। प्रोफेसर व्यास ने इसे कर्इ वर्ष पहले लिया था।

एपार्टमेंट में लिफ्ट नहीं थी। मैं पहली बार उनको रैलिंग पकड़ कर, आहिस्ते आहिस्ते, सीढ़ियां चढ़ते देख रहा था। पहले हमेशा वे बिना किसी सहारे के सीधे चढ़ते जाते, आगन्तुक के पहले ऊपर पहुंचते। ड्राइंगरूम में फर्नीचर-सजावट पुरानी थी। सब पर धूल की एक अदृश्य सी परत, यत्न से छिपाने के बाद भी, झलक रही थी। शायद घर, दीवालों, साज-सामान पर भी उम्र का प्रभाव पड़ता है, हमारी तरह। वही झुर्रियां, थकान और उदासी। रोज रोज देखते पता नहीं चलता। दस साल पहले जब भी मैं आता, वे घर में आर्इ, नर्इ वस्तु शौक से दिखाते, कैमरा, अवन, कॉफ़ी मेकर, मिक्सर.-जूसर या वैक्युम क्लीनर, क्रॅाकरी, कट-ग्लास के व्हिस्की टम्बलर जाने क्या क्या।

मिसेज व्यास आर्इं, कुछ बीमार सी, चुप चाप। पहले वे इतने दिन न आने का उलाहना देतीं, बच्चों, पत्नी के संबंध में पूछतीं। व्यास साहब के लिए नीबू की चाय थी, बिना चीनी की। चाय पीते हुए मैंने ध्यान दिया इन गहरे रंग के प्यालों में पहले भी कर्इ बार चाय पी चुका हूं। दस सालों पहले, हर बार आने पर चाय नए कपों में आती। पोस्टमैन या व्यास साहब के कॉलेज से चपरासी भी आता तो नर्इ क्रॉकरी निकलती थी।

व्यास साहब अपने में खोए हुए थे। उन्हें बातचीत के लिए विषय न तलाशना होता। राजनीति, समाज, विज्ञान और विकास, कुछ नहीं तो छेड़-छाड़ ही। दामाद ने कॉर्डलेस फोन भेजा था। घंटी बजने पर उन्होंने पत्नी से रिसीवर देने को कहा। लाल रंग का छोटा सा खिलौना जैसा। वे बात करते हुए बालकनी तक चले गए थे। लौट कर अंदर रिसीवर क्रेडिल पर रख कर वापस आए, ‘‘अब देखिए कॉर्डलेस से कितनी सुविधा है। आप पूरे घर में टहलते हुए बात कर सकते हैं, बिस्तर पर बैठे हुए भी। यदि ऐसी कॉल जिससे, इनके सामने बात नहीं करना चाहता’’, उन्होंने पत्नी की देख कर मजाक किया, ‘‘तो बाहर बालकनी में बात की जा सकती है।’’

‘‘ मुझे नहीं फर्क पड़ता, चाहे जहां बात करें। लेकिन तब इनको यह हैंडसेट जवानी के दिनों में लेना था।’’ पत्नी ने उन्हें सुनाते हुए तुरुप जड़ा था। उम्र और बुढ़ापे की ओर इंगित करना उनका कमजोर बिंदु था।

डा0 जनार्दन कृष्ण व्यास महाविद्यालय में फिजिक्स विभाग में थे, जहां से मैंने हिन्दी में एम0ए0 किया था। नौकरी मेरी पढ़ार्इ के दौरान ही लग गर्इ थी। अध्यापक मुझे छात्रों से अलग मानते। छात्र कल्याण समिति में मुझे नामांकित कर दिया गया था। अनुशासन के नियम यहां कुछ ज्यादा ही सख्त थे। छात्रों में शुरुआती दौर में असंतोष रहता, फिर अभ्यस्त हो जाते। उस बार कुछ छात्रों ने, किसी बात पर, आन्दोलन-धरना जैसा किया था। चिन्हित छात्रों को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। इनमें बी0ए0 अंतिम वर्ष का एक सीधा-सादा छात्र भी था। मैं कुछ साथियों के साथ प्रोक्टोरियल बोर्ड के पास निष्कासित छात्रों का प्रतिवेदन लेकर गया था। डॉ0 व्यास बोर्ड के अध्यक्ष थे। निर्दोष छात्रों के मामले में पुनर्विचार की बात को लेकर उनसे बहस और विवाद हो गया था। वे किसी तर्क को मानना तो दूर, सुनने को ही तैयार नहीं थे। उन्होंने मुझे धमकी दी कि ज्यादा बोलने पर मुझे भी निकाला जा सकता है। मेरे विभागाध्यक्ष महोदय ने हस्तक्षेप किया, मेरे और मेरी बैंक की नौकरी के विषय में बताया।

कॉलेज और उनके कर्मियों का एकाउंट मेरे ही बैंक में था। वेतन उनके खातों में जमा होता। तब ए0टी0एम0 तो होते नहीं थे। भुगतान लेने हेतु बैंक में आना होता। पहली तारीख के आस पास भीड़ हो जाती। उन्हें लाइन में न लगना पड़े, नए नोट या ड्राफ्ट आदि जल्दी बनवाने, एरियर आदि के बिल ट्रेजरी से पास करवाने में, जो कुछ मुझसे हो सकता, मदद कर देता। धीरे-धीरे हमारे संबंध, छात्र-अध्यापक से बदल कर, मित्रवत हो गए थे।

उस दिन उनके घर से जल्दी लौट आया। पहले वे देर तक उठने नहीं देते थे। मेरे पास पूछने को बहुत बातें थीं- उनकी अमेरिका यात्रा के संस्मरण, बेटे-दामाद के हाल, उनकी इतनी जल्दी वापसी आदि। घर लौटने पर पत्नी ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा, ‘‘मिला कोर्इ मकान?’’

‘‘ओह’’, मुझे याद आया। निकला तो मकान की तलाश में ही था। ब्रोकर से बात भी हो गयी थी। दरअसल सेवानिवृत्ति के बाद सरकारी आवास खाली करना था। फिलहाल छह महीने के लिए अनुमति मिल गई थी।

पत्नी बड़बड़ाती रही- क्या किया तुमने? न मकान, न बच्चों की अच्छी पढ़ार्इ-लिखार्इ, नौकरी। तुम्हारे साथ के लोगों के बच्चे इंजीनियर, एम0बी0ए0 कर लाखों के पैकेज पा रहे हैं। पूरी जिंदगी भार्इ-बहनों, रिश्तेदारों की चिंता रही। अब कोर्इ पूछने नहीं आता है। तुम्हारे लिए बस दफ्तर और किताबें।

‘‘समय आने पर सब हो जाएगा।’’ मैंने सांत्वना देने की कोशिश की।

‘‘कब आएगा वह समय। उम्र तो बीत गयी। अपने व्यास साहब को देखो, मास्टर रहे। लेकिन बेटा-बहू, दामाद सभी अमरीका में हैं। उनका घर तो देखा होगा। सामान से भर गया है, सब इम्पोर्टेड।’’

मैं उसकी व्यथा समझ रहा था। घर में बरसों पुराना फ्रिज, मिक्सी - जब चलती, घरघराहट से भूचाल सा आ जाता। बमुश्किल ब्लैक एंड व्हाइट की जगह रंगीन टी0वी0 ले सका था।

व्यास साहब के बेटे, दामाद, अक्सर किसी आने वाले से, कुछ न कुछ भेजते रहते। उनका आना तो कम होता, लेकिन मित्रों, परिचितों में कोर्इ तो आता ही रहता। कॉरोनेट का 35 एम एम कैमरा, डैकॉर का माइक्रोवेव अवन, मेटेक का स्टीम आइरन, इलेक्ट्रॅानिक कम्बल, पिता के लिए ब्रॉनक्रूज़ की इलेक्ट्रॅानिक शेविंग मशीन। दामाद और बहू कुछ ज्यादा जिन्दादिल थे। जाने के बाद शुरुआत के दिनों में दामाद ने पापा के लिए रंगीन, सुगंधित कॉंडोम भी कूरियर किए थे। माँ तो यहां अकेले में भी शर्म से लाल पड़ गयी। उसने उसे फोन पर झिड़की दी, ‘‘यह सब क्या है? बेटी हंसी, ‘माँ, अपने दामादजी को जानती ही हैं, कितने मजाकिया हैं। कह रहे थे, ‘‘पापा तो अभी जवानों को भी मात करते हैं। और मम्मी, यहां तो यह बहुत कॉमन है। माँ-बाप बच्चों को डेटिंग पर जाते समय याद दिलाने के साथ साथ, पूरे के पूरे महीने भर के लिए, एक साथ, उनके बैग या कमरे में, रख देते हैं। अपने बच्चों की लापरवाही से वाकिफ होते हैं। इस पर भी - - ।’’

बेटी की शादी बहुत पहले हो गयी थी। दामाद टेक्सास में एक आर्थिक विकास शोध संस्थान में वरिष्ठ अधिकारी। बेटा अविनाश उन दिनों बैंगलोर में ही था। इंजीनियरिंग के बाद सीधे कैम्पस चुनाव से नियुक्ति हुर्इ थी। सब्र माँ को ही करना पड़़ता। डॉ0 व्यास तो कॉलेज में ही नहीं नगर के प्रख्यात विद्वान प्रवक्ता के रूप में प्रसिद्ध थे। विद्यार्थी उनसे अनुप्रेरित रहते। प्रो0 व्यास का उनके लिए मूलमंत्र था- गो एहेड बियांड द स्कार्इ। पंख पसारो, आगे बढ़ो निरन्तर, तुम्हारे सामने निरभ्र आकाश का विस्तार है। वे अक्सर राबर्ट फ्रॉस्ट को उद्धृत करते- द वुड्स आर लवली, डार्क ऐण्ड डीप, बट आर्इ हैव प्रॉमिजेस टु कीप, ऐण्ड माइल्स टु गो बिफोर आर्इ स्लीप।

बहुआयामी प्रतिभा के धनी, शिक्षक संध के साथ साथ, तमाम सामाजिक कार्यो में सक्रिय थे। संस्थाएं उनकी उपस्थित से गुलजार हो उठतीं। क्लब में उच्च अघिकारी, प्रसिद्ध चिकित्सक, बड़े बड़े व्यवसायी आते। चर्चा उठती, ‘‘पिछले दिनों जब मैं मैसाचुसेट्स में था - -अपने बेटे के यहां।’’ या इसी तरह का कोर्इ प्रसंग, ऐसी लापरवाही से बताते, जैसे यह ज़िक्र यूं हीं बीच में आ गया है। डा0 व्यास मन मसोस कर रह जाते। गणित के विभागाध्यक्ष डा0 जायसवाल उनसे पूछते, ‘‘डा0 व्यास, आपके दामाद भी तो स्टेट्स में हैं? बेटा तो शायद यहीं कहीं बैंगलोर में - - -’’

व्यास साहब को लगता कि प्रो0 जायसवाल बेचारा कहते कहते रुक गए हैं। बैंगलोर, यूं कहते जैसे किसी कस्बे या गांव की बात कर रहे हैं।

बेटा-बहू, होली-दीवाली बैंगलोर से, आते ही। माँ को लगता कि दीयों की रोशनी बढ़ गर्इ हैं, होली के रंग कुछ ज्यादा ही चटख हो गए हैं। पिता को महसूस होता, आते हुए प्रौढ़त्व की दस्तक, ठहर गर्इ हैं। वे यदाकदा, पार्टियों वगैरह में एक-दो पैग ले लेते। बेटे के आने पर अल्मारी से बोतल निकलती। पत्नी आंखें तरेरती, ‘बच्चों को भी बिगाड़ रहे हैं। उसके बहाने खुद - -!’

वे कहते, ‘‘तुम्हें पुरानी कहावत नहीं मालूम! - -बच्चे जब बड़े हो जाएं, उन्हें दोस्त मानना चाहिए। बाहर नौकरी में है। पार्टियों में दोस्तों के साथ कभी लेता ही होगा। अब त्योहार पर लिहाज में घर को क्या ड्रार्इ एरिया घोषित कर दें।’’

बहू मुंह छिपा कर मुस्कराती।

अविनाश के आने पर, लगभग हर दिन, रवि की चर्चा चलती। बेटे को दामाद द्वारा लाए हुए उपहार दिखाते। अविनाश उकता जाता। प्रो0 व्यास समझते थे कि अन्तर्मुखी, सीघे-सादे से बेटे की महत्वाकांक्षाएं ज्यादा नहीं हैं। उसकी व्यवहारिकता पर उन्हें हमेशा संदेह रहा। वह तो सांइस भी नहीं पढ़ना चाहता था। वे आक्रामक हो जाते, ‘मैं क्या यह सब अपने लिए कह रहा हूं? क्या मिलता है यहां की नौकरी में? वहां के जीवन की यहां से क्या तुलना!’’ फिर धीरे से फुसफुसाते, ‘‘अच्छा है तुम्हारे अभी बच्चे नहीं हैं। वहां होंगे, तो जन्म से वहां की नागरिकता, पक्की हो जाएगी। लक्ष्मी भी तो डालर के रूप में बरसती है

बेटे-बहू को विदा करने जाते, ट्रेन छूटते छूटते उसे ताकीद करना न भूलते, ‘‘रवि को फोन पर याद दिला देना। मैंने तो कह ही रखा है। लेकिन जिसकी गर्ज है, उसका कहना और बात होती है। वह भी तो अपने साले के मुंह से सुनना चाहता होगा।’’

शुरुआत में मदद दामाद रवि ने ही की थी। अविनाश को गए कितने साल हो गए? प्रो0 व्यास जोड़ते - उनके रिटायरमेंट को तब 8-9 वर्ष बचे थे। अब तो अवकाश प्राप्ति के ही पंद्रह से ज्यादा हो गए हैं। अविनाश के जाने की पहली रात उन्होंने शानदार पार्टी आयोजित की थी। कॉलेज, विश्वविद्यालय, नगर के गण्यमान मित्रों से बधाइयों का ताता लग गया था। पहली बार अमेरिका से उसकी वापसी साल के अंदर ही हुर्इ थी। माँ को लगा था पुत्र वनवास से पूरे चौदह वर्षों बाद लौटा है। उसे सम्हलते सम्हलते देर लगी थी। पति सदा की भांति पत्नी की बेवकूफी का मजाक उड़ाने की जगह वाशरूम चले गए थे। चेहरा धो-पोंछ एकदम सामान्य निकले। पुत्र कम भावुक नहीं था। उपहारों की लंबी फेहरिस्त में गली-मोहल्ले के तमाम लोगों के नाम भी थे, जिनकी पहचान डा0 व्यास को याद करनी पड़ी थी। परफ्यूम, टाइयां, नाइटसूट, साड़ियां। माँ को अचरज हुआ- अरे अमरीका में साड़ियां भी मिलती हैं? प्रारंभ में अविनाश साल में कम से कम एक बार तो आता ही। यह अवसर उत्सव की तरह होता।

बेटे की वापसी की अवधि साल से दो, तीन, चार सालों तक खिंच जाती। बहू भी नौकरी करने लगी थी। दोनो को छुट्टियां एक साथ न मिल पातीं। पिछली बार वे पांच वर्षों के अंतराल पर लौटे थे। इस बात को भी सात-आठ वर्ष हो ही गए होंगे। कभी सोने के पहले, जब देर तक नींद न आती, वे सोचते रहते, जाने क्या क्या? उन्हें लगता पूरे जीवन वह गति के सिद्धांत पढ़ाते रहे हैं, उसके विपरीत, समय की गति अवरुद्ध हो गयी है।

तमाम नौकरियां बदल कर अविनाश इस समय सैन फ्रांसिको की एटर्निटी कार्पोरेशन में था। डा0 व्यास के प्रिय कवि राबर्ट फ्रॅास्ट के साथ उपन्यासकार जैक लन्दन, अभिनेता ब्रूस-ली का शहर। अविनाश और रवि में भी बहुत कम मुलाकातें होतीं, हजारों मील की दूरी थी उनके बीच। रवि बोस्टन में था। बेटी का फोन आता, वे टिकट भेजने को कहते। बेटी कहती पापा, ‘बहुत सुन्दर जगह है। दार्शनिक एमरसन, एडगर एलेन पो और बेंजामिन यहीं हुए हैं।

डा0 व्यास के अमेरिका जाते समय मैं उनसे नहीं मिल सका था। उन्हीं दिनों मेरा प्रमोशन हुआ था। स्थानान्तरण तो लाजिमी था। लंबे समय तक मैं मेरी तैनाती दूर दराज की शाखाओं में रही। लाभवत्ता, व्यवसाय की बढ़ोतरी, बजट, लक्ष्य हासिल करने की जद्दो-जहद। फरवरी पार होते तनाव बढ़ जाता। मुख्यालय से दिन में कर्इ बार फोन आते, प्रगति पूछी जाती। अगला प्रमोशन इसी के परिणामों पर निर्भर था। टाल्स्टॉय की कहानी ‘कितनी जमीन’ (हाऊ मच लैंड डज़ अ मैन नीड) याद आती। डूब रहा सूरज और निरन्तर आखिरी सांस तक भागता- पाहोम। क्या इसका कहीं अंत है?

इसके बाद व्यास साहब से एक-दो बार और मुलाकात हुर्इ होगी। लोग उनके संबंध में कहते- अमेरिका में रह रहे बेटे-बहू में तालमेल नहीं है। अविनाश ने नौकरी छोड़ दी है। लेकिन न तो कुछ प्रो0 व्यास ने बताया, न ही मैंने पूछा। प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन, उसके निजी दुख-सुख होते हैं।

तभी गांव से पिता की बीमारी की खबर मिली, इस बार जाना ही था। अभी तक तो नौकरी का बहाना रहता था। गांव में रिटायर्ड पिता, थोड़ी जमीन और दो भार्इ, उनका परिवार था। मेरा जाना बहुत कम होता। पत्नी कहती वहां से मिला ही क्या है, सब तो भाइयों को दे दिया है। गांव बहुत बदल गया था। स्टेशन से गांव तक जाने वाली सड़क पक्की हो गर्इ थी। सड़क चौड़ी करने के लिए पेड़ कट चुके थे। मुझे स्टेशन के बाहर, बचपन के दिनों का, घना-छतनार नीम याद आया, जिसकी छाया में हम, ट्रेन की प्रतीक्षा किया करते थे। सुबह शाम एक पैसेन्जर गाड़ी थी, वह भी घंटों लेट रहती। यात्रियों को यह मालूम ही था। वे चना-चबेना बांध कर आते। चादर बिछा कर, या यूं ही जमीन में बैठे, पहुड़े, घंटों बतियाते, ऊंघते समय काटते।

पेड़ के कट जाने से स्टेशन के बाहर का परिसर खुला-खुला, शाम उतर आने के बाद भी रोशनी फैली हुर्इ थी। पहले जहां एक गुमटीनुमा दुकान होती, अब कर्इ दुकानें खुल खुल गर्इ थीं। रोजमर्रा के सामान, मिठार्इ, मोबाइल रिपेयरिंग, स्त्रियों के प्रसाधन सामग्री, अंत:वस्त्रों की, झालर की तरह बाहर लटकती ब्रेजियर्स। भतीजा हमें लेने आया था। पिता के इलाज, उनकी मृत्यु, अंत्येष्टि, बाद की औपचारिकताओं, जमीन के हिसाब-किताब में दिन पता ही न चले। मोबाइल का नेटवर्क अक्सर न रहता। स्थानीय समाचार पत्र भी एक-दो दिन बाद आते।

इतने दिन दुनिया से कट सा गया लगता था। सोचता, कौन सी दुनिया? पुरानी जिसे बरसों पहले छोड़ आया, नयी जहां छत का ठिकाना नहीं। फिर वहीं वापसी, आवास की जद्दो-जहद, सब समस्याएं यथावत थीं। सरकारी मकान भी तो खाली करना था। अगले दिन कर्इ सूचनाएं थीं। ब्रोकर ने बताया था- सर जी आपके लिए एक बहुत अच्छा सौदा था। आप यहां थे नहीं। आपका नंबर मिल नहीं रहा था। बहुत अच्छा, आपका देखा हुआ फ्लैट, बहुत सस्ता, आपके प्रोफेसर साहब का। वे आपके संबंध में पूछ रहे थे।

मालूम हुआ, व्यास साहब बहुत बीमार हो गए थे। दिल का दौरा पड़ा था। अविनाश से संपर्क नहीं हो सका, या वह आया। उनके चेन्नर्इ वाले साले आए थे। काफी दिन रुके। उन्होंने ही इलाज वगैरह सब सम्हाला। तबीयत कुछ सम्हलने पर प्रोफेसर साहब ने घर का तमाम सामान, फ्लैट औने-पौने में निकाल दिया। यहां कौन देखभाल करता? पति पत्नी उन्हीं के साथ, शायद पनाक्कम, चले गए।

दिन बीतते गए। मैंने एक दूसरा मकान, जब तक कुछ और नहीं होता, किराए पर ले लिया था। एक दिन वही ब्रोकर आया था, ‘‘भार्इ साहब, आपके प्रोफेसर साहब का एक पत्र आया हुआ है, उनके पुराने पते पर। जिन्होंने ने उनका फ्लैट लिया है, उनके पास पड़ा था। मैं तो उनके किसी अन्य मिलने वाले को जानता नहीं। आप यदि इसे उन्हें भिजवा सकें।’’

पत्र मेरे पास बहुत दिनों तक पड़ा रहा। प्रेषक की जगह उनके विदेश में रहते पुत्र अविनाश का पता था। चेन्नर्इ का पता मेरे पास था नहीं। सोचता पत्र अविनाश को ही वापस कर दूं। परंतु आवश्यक होगा, यह सोच कर रुक जाता। मेरे मन में उत्कंठा होती। मन में आता पत्र खोल कर देखूं। परंतु यह तो अभद्रता होती। मैंने स्वयं को समझाया, तर्क दिए- प्रोफेसर साहब तो स्वयं मुझसे बहुत कुछ बताना चाहते थे, जाने के पहले मुझे पूछ भी रहे थे, पत्र में कुछ ऐसा हो सकता था, जिसे जानना व्यास साहब के लिए अति आवश्यक हो। किसी के निजी जीवन, परिवार के विवाद, व्यक्तिगत संबंध, यहां तक यदि मौका मिले तो उसके बेड रूम तक में झांकने से हम नहीं चूकते। अन्तत: मैंने पत्र खोल ही लिया था। पत्र अविनाश का ही था:

‘‘पापा, मैंने कितने पत्र लिखे आपको, कितने लिख कर फाड़ दिए। मुझे मालूम है आप नाराज हैं। इतनी जल्दी आप वापस चले गए। बाहरी कारण तो, अनुभा, समीरा की जीवनचर्या, वेशभूषा, दोस्त, देर रात लौटना, यदाकदा ड्रिंक लेना, वह भी सबके सामने घर में, और सब कुछ जो आपको नापसंद था। वे यहां की जीवन शैली में ढ़ल चुके हैं। समीरा का तो जन्म ही यहां हुआ है। मैंने आपके आने के पहले उन्हें समझाने की कोशिश की थी। परंतु वे क्या, यहां कोर्इ भी दोहरी जिंदगी नहीं जीना चाहता। सबका अपना जीवन है। अपने कमरे हैं, अपना टी0वी0, उन पर मनचाहे प्रोग्राम। ‘प्रार्इवेट प्रैक्टिस’, ‘द सोसल लाइफ ऑव अमेरिका’, ‘गॉसिप गर्ल’ इनके पसंदीदा कार्यक्रम हैं। मुमानियत करने पर वे चोरी से देखेंगे, दोस्तों के साथ घर से बाहर, और विद्रोह भी। ऐसा नहीं कि यहाँ पारम्परिक मूल्य और जीवन समाप्त हो गए है। लेकिन बाहर से आए हम लोगों और हमारी नई पीढ़ी में नकार का भाव कुछ ज्यादा ही है। शायद आधुनिक दिखने की होड में। यहां उनके कमरों में हम नहीं जाते, बहुत जरूरी होने पर नॉक करके जाना होता है। समीरा ने आप और माँ से इसी कारण कुछ कह दिया था, परंतु बाद में माफी भी मांग ली थी। परंतु वास्तविक कारण- क्या आपका अपने निर्णय पर क्षोभ तो नहीं? अनुभा को पसंद आपने किया था। संस्कारित परिवार की उच्च कुल की वधू। यहाँ भेजने का निर्णय भी आपका ही था।

मैंने कभी आपको नहीं बताया। मां समझ गयी थीं। हम पति पत्नी के बेड रूम भी अलग हैं। दाम्पत्य संबंध कब के खत्म हो चुके हैं। एक घर में रहना हमारी, उसकी विवशता मात्र रह गयी है। आर्थिक जरूरतें और यहां के भारतीय परिवारों में बदनामी की चिंता। माँ तो एडजेस्ट कर भी लेती, परंतु वह तो आप पर निर्भर, आपके चारों ओर घूमते उपग्रह के समान है, आपके प्रकाश से प्रकाशित। ऐसा ही कुछ कहा था न समीरा ने। मेरे पास भी आपसे कहने को बहुत कुछ था, जाने कब से अनकहा। मैं कब उस परिक्रमा पथ से छिटक कर अलग हो गया, पता भी नहीं चला। परंतु उपग्रह की नियति में स्वतंत्र होना नहीं होता। एक केन्द्र से विलग हो दूसरे केन्द्र के चतुर्दिक भ्रमण के लिए अभिशप्त। कितने रूप हैं इन केन्द्रों के- नौकरी, पराए देश की अपरिमित सुविधाएं, परिवार, महत्वाकांक्षाएं, एक असमाप्त दौड़।

मेरी भी यही नियति रही। जो पढना चाहता था, पढ़ नहीं सका, विवाह कावेरी से नहीं हो सका, उसको मैंने वचन दिया था। हमारे संबंध बहुत आगे बढ़ गए थे। परंतु यह आपकी प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं था। बचपन में बहुत पहले, गर्मी की छुट्टियों में, मामाजी के यहां पनक्कम में कुछ दिन और रुकना-रहना चाहता था। वहां चाय के बागीचे, नारियल, सुपाड़ी के पेड़़, किनारों से टकराती समुद्र की लहरें मुझे बांध लेतीं। परंतु आपकी मर्जी नहीं थी। रामेश्वरम मामा को तो आपने कभी पसंद ही नहीं किया। माँ के रिश्ते में भले ही दूर के भार्इ रहे हों, लेकिन माँ और आपकी जरूरत के वक्त सदा साथ रहे। उनका कुसूर इतना ही था कि उन्होंने एक दक्षिण भारतीय लड़की से शादी कर वहीं बस गए! कावेरी उन्हीं की तो बेटी थी। दक्षिण में तो इस तरह के रिश्ते बहुत प्रचलित हैं। आपको मालूम है कि जहां कावेरी का विवाह हुआ, छह माह के अंदर ही जल गयी या जला दी गयी। जिन लपटों को मैंने नहीं देखा उनके बीच उसकी चीखें मेरे कानों में गूंजती रहती हैं। उसका जीवन तो डाक्टरों ने बचा लिया, परंतु वह उस जले चेहरे के साथ गांव में माँ-बाप के पास बाकी जीवन बिताने को अभिशप्त है। मैं वापस लौटने का साहस नहीं जुटा पाता। उसकी मूक वेदना मेरे कानों में गूंजने लगती हैं। आपके पास एक तयशुदा भविष्य रहा। मेरे पास तो सपने भी चूक गए।

आपकी पसंद की बहू-बच्चे यहां के जीवन में इस तरह रच बस गए हैं कि उनका लौटना संभव नहीं। मेरी नियति है कि एक परिक्रमा पथ से निकल दूसरे वलय में भटकना मेरे नियति है। बदला केवल केन्द्र है। मैंने कोशिश की। यहां ‘रेनबो पुश’, ‘जैक एंड जिल’ जैसी अनेक संस्थाएं हैं जो सामाजिक भेदभाव, नस्लवाद के विरोध में काम कर रही हैं। मैंने बहुत दिनों तक सोचने के बाद निर्णय लिया। नौकरी छोड़ कर इनसे जुड़ना चाहा। जीवन यापन भर का तो यहां से भी मिल ही जाता। परंतु पत्नी के विरोध के चलते यह संभव नहीं हुआ। उसने बेटी से भी नोटिस भी दिलवा दी। यहां के कानून के अनुसार, संस्था किसी विवाद में नहीं उलझना चाहती थी। मुझे लगता है कि हमारा कभी भी उस वलय पथ में कभी लौटना संभव नहीं होता, जिससे एक बार निकल चुके हैं। मैं इस निरन्तर अंतहीन यात्रा के एक विकल्प के विषय में सोचता हूं। अनुभा से बात कर ली है। वह शायद तैयार हो जाएगी। मैं यहां सब कुछ उसे और समीरा को देने के बाद भारत लौट कर कावेरी के पास पनक्कम में बसना चाहता हूं। विवाह या बिना विवाह किए ही, लिव-इन में। आप, माँ, हम सब एक साथ रहेंगे। यद्यपि अभी कावेरी से पूछना बाकी है। परंतु यदि माँ और आप तैयार होंगे तो वह मान लेगी। आप लिखिएगा।’’

पत्र पढ़ने के बाद, किसी दूसरे के पत्र को पढ़ने के अपराध बोध की, मेरी ग्लानि खत्म हो गयी थी। चेन्नर्इ जाने का तत्काल में अगले दिन का आरक्षण कराया था। पानक्कम के लिए वहीं से बस जाती थी।

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प्रताप दीक्षित

एम0डी0एच0 2/33, सेक्टर एच,

जानकीपुरम, लखनऊ 226 021

Email dixitpratapnarain@gmail.com

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परिचय

नामः प्रताप दीक्षित

जन्मः 30 सितंबर 1952

शिक्षाः एम0ए0 (हिंदी)

रचनाएं: हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, कथादेश, वर्तमान साहित्य, पाखी, संचेतना, लमही, उत्तर प्रदेश, जनसत्ता, दैनिक जागरण, अमारउजाला, अक्षरा, शुक्रवार, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, नवभारत, पंजाबकेसरी जनसंदेश टाइम्स आदि में 150 से अधिक कहानियां, समीक्षाएँ, लघुकथाएं, आलेख, व्यंग्य प्रकाशित।

दो कहानी संग्रह (‘विवस्त्र एवं अन्य कहानियां‘ तथा ‘‘पिछली सदी की अंतिम प्रेमकथा’) प्रकाशित।

उत्तर प्रदेश हिन्दी प्रचारिणी सभा द्वारा आयोजित कविता प्रतियोगिता में तत्कालीन राज्यपाल उत्तर प्रदेश (श्री अकबर अली खान द्वारा पुरस्कृत 1973

प्रताप दीक्षित के रचनाओं पर रूहेलखंड विश्वविद्यालय में एक छात्रा द्वारा पी.एचडी हेतु शोध.

संप्रतिः भारतीय स्टेट बैंक में प्रबंधक पद से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन.

जानकीपुरम, लखनऊ 226 021

संपर्कः Email dixitpratapnarain@gmail.cpm

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