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लोक संस्कृति को गुंजाते वाद्य यंत्र - अखिलेश सिंह श्रीवास्तव

लोक संस्कृति को गुंजाते वाद्य यंत्र

(आलेख)

पृथ्वी का परिवर्तन काल। मानव जीवन का प्रारंभ। साभ्यतिक विकास के विभिन्न चरण और इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण, प्राकृतिक प्रदत्त भावनाओं का अंकुरण। भावना के अंकुरण के साथ विकसित हुई भावनाओं के प्रगटीकरण की भावना और इन्हें आधार मिला संवादों का, सो बोली ने जन्म लिया इसके बाद भाषा का विकास हुआ। भावनाओं के इस सतरंगी संसार में हर्ष, दुख, क्रोध, हास्य, आदि भावों ने स्थान लिया, परिणाम स्वरूप रस, छंद, रागों के रूप में मानव सुकंठों-से काव्य ने स्वर-ताल छेड़े तथा इसकी पूर्णता के लिए धीरे-धीरे वाद्य यंत्रों की मधुर ध्वनियों ने स्थान लिया।

आदि काल से मानवीय भावाभिव्यक्ति में वाद्यों का विशेष स्थान रहा है। सनातन पंथावलंबी तो शिव को संगीत और वाद्य यंत्रों का जन्म केंद्र मानते हैं। राज प्रासादों-से लेकर ऋषि आश्रमों तक, गृहस्थ-से लेकर भिक्षुओं तक, पूजा-पाठ से केकर रण दुंदुभि तक वाद्य यंत्रों के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। आज के इस वैज्ञानिक युग में भी ये उक्तियाँ अक्षरशः सटीक हैं। वाद्य यंत्रों के प्रारंभ पर कोई निश्चित विचार धारा नहीं है परंतु विद्वानों ने बांसुरी और नगाड़े-नुमा यंत्रों को ही सर्वाधिक प्राचीन वाद्य यंत्रों के रूप में स्वीकारा है। यत्र-तत्र उपलब्ध प्रमाणों से पता चलता है कि आधुनिक काल में वाद्य यंत्रों को लगभग 67000 वर्ष पुराना माना जाता है। लेकिन विद्वानों में मतैक्य का अभाव है अतः यह स्वीकार करना चाहिए कि विकास के विभिन्न पद्सोपानों में इसका अलग-अलग रूप में विकास हुआ। सर्वप्रथम खुदाई से हड्डियों-से निर्मित वाद्य यंत्रों का पता चला, इसके बाद पोली लकड़ियों के बड़े-बड़े डूठों को नगाड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाने के सबूत मिले। थोड़ा हम इस विषय में और गंभीर चिंतन करें तो पाएंगे कि अपने शरीर पर हथेलियों से चपत मार कर निकालने वाली ध्वनि भी इसी श्रेणी की है, मुख-से निकाली ध्वनियाँ भी वाद्य सुर है, विदित है, बंगाली समाज में आज भी शुभ कार्यों में मुख-ध्वनि निकालने का चलन है।

वाद्य-यंत्रों का अध्ययन विषय पुरा-काल-से विद्या अर्जन का महत्वपूर्ण अंग रहा है। शिव के डमरू-से लेकर कृष्ण की बाँसुरी, ध्वनि महात्म्य के चिर प्रतिनिधि हैं। इतिहास के भी पृष्ठ बताते हैं कि राजा उदयन अपनी वीणा की ध्वनि-से गज समूहों को अपने वश में कर सकते थे। नरसिंह महता ने ताल-मंजीरे के साथ ऐसा भजन गया कि देवस्थान के पट स्वयं खुल गए। तानपूरे के तारों के साथ स्वर-संधि कर तानसेन ने रागों को जीवंत कर दिया था। वाद्यों का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि काला जगत में ध्वनि के प्रभाव से अलग-अलग भावों को अभिव्यक्त किया जाता है। बिना संगीत के गानों का आनंद शून्य है। आज तो एक-एक स्वर के लिए विशेष यांत्रिक पद्धतियों से स्वर-ध्वनि को प्रस्फुटित किया जाता है। भारत जैसे वैविध्य संपन्न देश में जहाँ बहुजन, ग्राम्य जीवन व्यतीत करते हैं वे लोक नृत्य के साथ-साथ लोक वाद्यों को भी जीवित रखे हैं। इन वाद्यों का इंद्रधनुषीय साम्राज्य इतना विशाल है कि हमें कई की जानकारी भी नहीं है। ढोलक, मृदंग, डुग-डुगी, सारंगी, बाँसुरी और न जाने कितने ही वाद्य ऐसे हैं जो भारतीय चतुर्दिक सीमाओं में सुर-संगम साथी हैं। जिस देश में प्रत्येक कोस पर बोली बदलती हो ; रीति-रिवाज़ों में भिन्नता दिखे ; खान-पान बदल जाए ऐसी जगह सांस्कृतिक परिवर्तन भी सहज संभाव्य है। इन्हीं परिवर्तनों के गर्भ-से वाद्य-यंत्रों की वैविध्यता का उदय हुआ है।

उत्तर भारत, पंजाब जैसे प्राचीन राज्यों में चमीटा, मटका, डफ़ली जिसे डपली भी कहा जाता है अत्यंत प्रसिद्ध वाद्य हैं। इधर, मध्य भारत, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में एकतारा, झेलम, मंजीरा लोक संगीत का अहम हिस्सा है। माणीपुर में पौना अथवा वैना जो सारंगी परिवार से संबन्धित हैं विशेष लोक वाद्य है। बंगाल की सभ्यता में एकतारा, डुगडुगी और रामचक्की लोक जीवन का अभिन्न अंग हैं। यहाँ शंख वादन भी विशेष स्थान रखता है,वैसे शंख पूरे भारत में एक रूप उपयोग में आने वाला ध्वनि वाद्य है। दक्षिण भारतीय संस्कृति में मृदंग परिवार के वाद्यों का लोक नृत्य इत्यादि में विशेष उपयोग होता है। घड़े को भी भाँति-भाँति से बजाने का चलन है। यहाँ तुरतुरी के जैसे स्वर निकालने वाले लंबे उपकरणों का भी खासा प्रयोग लोक जीवन में होता है। इसी के साथ देश में डंडों को, कौड़ी की मालाओं को, मुखौटों को भी लोक नृत्यों में मान्यता प्राप्त है।

अनेकता में एकता के दर्शन करने वाले देश भारत में ये वाद्य यंत्र किसी स्थान विशेष का प्रतिनिधित्व अवश्य करते हैं, पर अब इनका उपयोग सर्वस्व समान रूप-से दिखाई पड़ता है। ये वो कर्णप्रिय ध्वनि वाले वाद्य हैं जिनके बिना हमारे लोक संगीत अधूरे हैं। इन्हें सहेज के रखना यह हमारा दायित्व है जिसे हमें बिना तर्क के पूरा करना चाहिए।

अखिलेश सिंह श्रीवास्तव, दादू मोहल्ला, संजय वर्ड, सिवनी-480661 (म.प्र.)

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