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संजय शांडिल्य की प्रेम कविताएँ

संजय शांडिल्य की प्रेम कविताएँ

प्रेम

1.


प्रेम पहाड़ी रास्ता होता है
जो दीखता बेहद खूबसूरत है
पर चलना जिस पर
उतना ही खतरनाक होता है
हालाँकि जो चलते हैं
उन्हें अच्छा लगता है चलना
इतना अच्छा कि चलते हुए
वे जान तक दे देते हैं...

2.

प्रेम में चलना होता है
रुकना कभी नहीं होता
पहुँचना कहीं नहीं होता...

3.

प्रेम शरद का चाँद
हेमंत का चित्त होता है
शिशिर की आग
वसंत का पलाश होता है
ग्रीष्म का गुलमोहर
अमलतास होता है
प्रेम पहली बारिश का
सोंधापन होता है...

4.

प्रेम प्रतिकार है सबसे बड़ा
सबसे बड़ा समर्थन है
देवत्व के बंधन से
पलायन है प्रेम
मनुष्यता के समक्ष
सबसे बड़ा समर्पण है
सबसे बड़ी युक्ति है प्रेम
सबसे बड़ी उक्ति है
प्रेम सबसे बड़ी मुक्ति है...

जो प्रेम करता है

प्रेम आदमी को
नाजुक बनाना चाहता है
पर जो प्रेम करता है
नजाकत के बारे में नहीं सोचता

खुद को लेकर
एकदम कठोर हो जाता है

इस तरह एक प्रेमी
जिसे हम फूल समझते हैं
होता पहाड़ है...


वसंत रुकता नहीं

वसंत रुकता नहीं
आगे बढ़ता है
सभी ऋतुओं में
प्रकट करता है स्वयं को

इस कारण
पलाश के बाद
आता है गुलमोहर
छाता है अमलतास

शेष ऋतुएँ भी हो सकें वसंत
सो उनमें भी खिलते हैं फूल
और जगती है आस
गाती है नाच-नाच वातास...


प्रेम में झूठ

तुम कहती हो
तुम्हारा प्रेम सबके लिए है
उसकी छाया
सब पर समान पड़ती है

मैं जानता हूँ
तुम झूठ बोलती हो
मेरा प्रेम छुपाती हो सबसे

जानती हो
मैं भी जब महसूस करता हूँ
कि मेरे प्रेम पर
लगातार नजर है सबकी
मैं भी कहने लगता हूँ
मेरा प्रेम तो सबके लिए है
किसी एक के लिए बिलकुल नहीं है

जानती हो
मैं भी
तब झूठ बोलता हूँ...

प्रेम और प्रेमी

हर प्रेम
पूर्व प्रेम का
विकल्प होता है

हर प्रेमी
किसी और का
स्थानापन्न...


तुम्हें नहीं लगता

तुम्हें नहीं लगता
जो मैं लिखता हूँ
गाता हूँ-बनाता हूँ
उसमें किसी को पुकारता हूँ ?

विषय जो हो
मेरी हर कविता
प्रेम-कविता है
हर गीत
प्रेम-गीत है
हर निर्मिति
प्रेम ही के निमित्त है
तुम्हें नहीं लगता ?

सारे शब्द
सारी धुनें
सारे रंग
तुम्हीं को पुकारते हैं
तुम्हें नहीं लगता ?

आ जाओ
बहुत हुआ
अब आ जाओ

सुन रही हो,
आ जाओ !


तुम जब चाहो

हर शब्द के पहले और बाद
हर पंक्ति के ऊपर और नीचे
मैंने काफी जगह बचा रखी है

तुम जब चाहो
आ जाना...


तुम आ जाओ

तुम्हारे उजास में
जीवन का कोई जंगल
मैं पार कर जाऊँगा

बस,
तुम आ जाओ !


वस्तुतः

तुम्हारा जाना
वस्तुतः
तुम्हारा आना है...


हम मिलेंगे

पानी और फसल बनकर
किसी मेड़ पर हम मिलेंगे
और लहलहा उठेंगे

नमी और प्रकाश बनकर
मिलेंगे किसी शाख पर
और खिल उठेंगे बेसाख्ता

हम भूख और भोजन होकर
किसी देह में मिलेंगे
और तृप्त हो जाएँगे आत्मानंत में

एक दिन
समुद्र और नदी-रूप में
किसी छोर पर मिलेंगे
और परस्पर अछोर हो जाएँगे

हम मिलेंगे
किसी और जीवन में मिलेंगे
पर मिलेंगे जरूर
हम जरूर मिलेंगे, प्रिये!


                                 परिचय


जन्म : 15 अगस्त, 1970 |

स्थान : जढ़ुआ बाजार, हाजीपुर |

शिक्षा : स्नातकोत्तर (प्राणिशास्त्र) |

वृत्ति : अध्यापन | रंगकर्म से गहरा जुड़ाव | बचपन और किशोरावस्था में कई नाटकों में अभिनय |

प्रकाशन : कविताएँ हिंदी की प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित एवं ‘अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले‘ (सारांश प्रकाशन, दिल्ली) तथा ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली) में संकलित | कविता-संकलन ‘उदय-वेला’ के सह-कवि | दो कविता-संग्रह 'समय का पुल' और 'नदी मुस्कुराई’ शीघ्र प्रकाश्य |

संपादन : ‘संधि-वेला’ (वाणी प्रकाशन, दिल्ली), ‘पदचिह्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘जनपद : विशिष्ट कवि’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली), ‘प्रस्तुत प्रश्न’ (दानिश बुक्स, दिल्ली), ‘कसौटी’(विशेष संपादन सहयोगी के रूप में ), ‘जनपद’ (हिंदी कविता का अर्धवार्षिक बुलेटिन), ‘रंग-वर्ष’ एवं ‘रंग-पर्व’ (रंगकर्म पर आधारित स्मारिकाएँ) |
फिलहाल ‘उन्मेष’ का संपादन |

संपर्क : साकेतपुरी, आर. एन. कॉलेज फील्ड से पूरब, हाजीपुर (वैशाली), पिन : 844101 (बिहार) |

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