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लघुकथा - मुक्ति - अमिताभ कुमार "अकेला"

मुक्ति

सुबह से ही मोहल्ले में कानाफूसी तेज थी। कल रात से ही रज्जो का कहीं अता-पता नहीं था। उसके घरवाले काफी परेशान थे।
कोई पुलिस में रिपोर्ट करने की सलाह दे रहा था तो कोई कुछ और.......! कानाफूसीयों के बीच दबे स्वर में कोई यह भी बोल रहा था - " पच्चीस की हो गयी थी छोरी.....! अभी तक शादी भी नहीं हुयी थी। भाग गयी होगी किसी के साथ। "


इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी। थोड़ी देर ढाढ़स बंधाने के बाद धीरे-धीरे पड़ोसियों की भीड़ भी समाप्त हो गयी।
पाँच भाई-बहनों में वह सबसे बड़ी थी। पुत्र की चाहत में उसकी माँ ने चार पुत्रियों को जना था। पिता मेहनत-मजूरी करके जो थोड़ा-बहुत कमाता उससे सबका पेट पल रहा था। विवाह के लिये लड़के वाले दहेज की माँग करते - जिसे उसके माँ-बाप पूरा नहीं कर पा रहे थे और छोरी अब तक बिनब्याही थी।


साँझ होने को आयी। गाँव के ही किसी छोरे ने आकर बताया कि चौर में रज्जो की लाश पड़ी है। शायद उसने आत्महत्या कर ली है। घर में कोहराम मच गया। पूछने पर घरवालों ने बताया - " कल शाम लड़केवाले उसे देखने आये थे। दहेज की माँग न मानने के कारण एक बार फिर से रिश्ता टूट गया। "


समझते देर न लगी कि माँ-बाप को परेशानियों से मुक्ति दिलाने हेतु छोरी ने आत्महत्या कर ली.........


अमिताभ कुमार "अकेला"
जलालपुर, मोहनपुर, समस्तीपुर

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