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भाग न बाँचे कोई - कहानी - उर्मिला पचीसिया

भाग न बाँचे कोई

“मीरा बाई….आपको.. माँ ने ..अभी बुलाया है”

“अभी..ईं बखत ..?” हाँफते हुए बंटी से मीरा ने पूछा।

“हाँ माँ ने कहा है ज़रूरी काम है, अपने साथ ही लेकर आना।”

“ठीक है तूँ दो घड़ी बैठ, मैं दो पराँठा और सेक लूँ।”

“इत्तो हाँफ क्यों रह्यो है बंटी, दौड़ता- दौड़ता आयो है के ?”

“हाँ मीरा बाई आपकी इस गोल घुमावदार सीढ़ी में चढ़ने में मुझे बहुत डर लगता है, इसलिए जल्दी जल्दी चढ़कर आया हूँ , और अकेले तो मैं उतर ही नहीं सकता, सिर घूमने लगता है।”

“मैं तो दिन में दस बार उतरूँ और चढ़ूँ हूँ भाया।” बड़ी गंभीरता से मीरा बाई बोली।

“मीरा बाई क्या कभी हँसती नहीं है?”, मन ही मन बंटी सोच रहा था।

मीरा बाई कोयले की कच्ची अँगूठी पर तवे के ऊपर पराँठे सेंक रही थी। उनके हाथ से बने पराँठों की ख़ुशबू उसके नाक से होती हुई उसके पेट में पहुँच कर हलचल मचा रही थी। मन कर रहा था कि मीरा बाई उसे पराँठे के लिए पूछे ,गरमा-गरम पराँठे की कल्पना मात्र से उसके मुँह में पानी आ गया। पर उसे पता था कि ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। उसके मन की बातों से बेख़बर मीरा फटाफट पराँठे बनाने में लगी थी और बंटी मंत्रमुग्ध हुआ उनकी पीठ के पीछे खड़ा मशीन की तरह चलते उनके हाथों के कौशल को निहारता रहा।

बंटी की मम्मी रंजना का मीरा के बिना कोई काम पूरा नहीं होता था। मंगोड़ी बनानी हो या पापड़ बिलवाने हो, मेहंदी लगवानी हो या साड़ी में फ़ॉल लगवाना हो, सब काम के लिए एक ही नाम रंजना की ज़ुबान पर आता था, मीरा बाई।

मीरा का क़द लंबा, नाक-नक़्श तीखे और रंग गेहुँआ था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें, झील की तरह गहरी थी, जिनमें उसके मन का अवसाद स्पष्ट नज़र आता था, जो नज़रों से फिसल कर उसके चेहरे को मलीन और शरीर को स्थूलकाय बनाने में भी सफल हुआ था। मलमल की बिना कलफ़ और इस्त्री करी हुई साड़ी और पैरों में पहनी सस्ती प्लास्टिक की चप्पल अपने व्यक्तित्व के प्रति उसकी उदासीनता को दर्शाती थी।

बंटी को याद है उसकी दीदी की शादी के अवसर पर रंजना ने मीरा को एक केसरिया रंग की साड़ी दी थी, जिसमें फालसाई रंग का ज़री का बॉर्डर लगा हुआ था और उसी रंग के गोल बूँटे पूरी साड़ी में थोड़ी -थोड़ी दूर पर बने हुए थे। उस दिन मीरा ने अपने बालों का जूड़ा बनाया था और उस पर गज़रा लगाया था। कानों में सोने की लटकन और गले में सोने की चिक पहनी थी। क्रीम- पाउडर के लेप से चेहरा भी दमक रहा था। सज-सँवर कर जब मीरा घर से निकली तो लोग उसको पहचान नहीं पा रहे थे और उसके प्रभावशाली व्यक्तित्व को पलट कर देखने के लिए मजबूर हो जाते थे। बंटी ने भी जब उसे दूर से आते देखा तो ठगा सा रह गया। उसे लगा किसी देश की राजकुमारी चली आ रही है….

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राजकुमारी ही तो थी वह अपने पिता की….

जीवनराम शर्मा कोलकता की विशालकाय एवम् सुप्रसिद्ध सूता मिल के अध्यक्ष थे। गाड़ी ,बंगला, नौकर- चाकर सब सुविधाओं से पूर्ण था उनका जीवन। उनकी सुंदर और सुशील पत्नी लता, उनके गृह की सुचारूता को बनाए रखने के कौशल में पारंगत थी। मितभाषी और मृदुभाषी होना उसकी लोकप्रियता का प्रमुख कारण था। बिन माँगे ही सबकी मदद करने को तत्पर रहने वाली हँसमुख लता की मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को सब समझते थे पर लाचार थे। विवाह के नौ साल बाद भी लता की गोद सूनी थी। कोई उपाय अछूता नहीं था, सभी कोशिशों ने उन्हें हतोत्साहित किया था ,अब तो बस ईश्वर कृपा की आस थी।

कहते है ना कि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है - एक दिन सुबह उठने में लता को बहुत कमज़ोरी महसूस हो रही थी, जी करता था थोड़ी देर और आराम कर लें, पर रोज़मर्रा के काम गृहलक्ष्मी को कहाँ आराम करने देते हैं ? जैसे- तैसे हिम्मत जुटा कर बाथरूम तक पहुँची तो इतनी ज़ोर से सिर घूमा कि वह दीवार का सहारा ले वहीं गीले फ़र्श पर बैठ गई। फिर जी मितलाने का ऐसा दौर शुरू हुआ कि अख़बार में डूबे जीवनरामजी को तुरंत घटनास्थल पर हाज़िर होना पड़ा । लता को बिस्तर पर सुला कर उन्होंने डॉक्टर रॉय को फ़ोन लगाया और तुरंत उनके घर पहुँचने का निवेदन किया।

डॉक्टर रॉय ने आते ही नए मेहमान के आगमन का शुभ समाचार सुनाया, जिसको सुनने को कान कब से तरस रहे थे। डॉक्टर रॉय ने लता को आराम करने की सख़्त हिदायत दी और जीवनरामजी के साथ बाहर वाली बैठक में आ गए।

“मैडम का बहुत ध्यान रखने की ज़रूरत है शर्माजी। लेट प्रेगनेंसी है, कॉम्पलिकेशन होने का चांस ज़्यादा रहता है। जहाँ तक पॉसिबल हो उतना बेडरेस्ट करवाइये ।”

“ठीक है डॉक्टर सा’ब मैं उचित प्रबंध करवा दूँगा, आप निश्चिंत रहें।”

गर्भावस्था का पूरा समय लता के लिए बहुत ही कष्टदायक रहा। सूता मिल के अस्पताल में ही डिलीवरी का सारा प्रबंध करवा दिया गया था, बस अब तो उस ख़ुशनुमा पल का इंतज़ार था। आधी रात के बाद भयंकर प्रसव पीड़ा के साथ लता को अस्पताल में दाख़िल किया गया। मरीज़ की नब्ज़ पकड़ते ही डॉक्टर का मुँह पीला पड़ गया। नार्मल डिलीवरी ऐसी हालत में हो पाना आकाश कुसुम सा प्रतीत हो रहा था। डॉक्टर ने शर्माजी को एक तरफ ले जाकर बताया,

“शर्माजी लगता है सिजर करना पड़ेगा, पर हम उसके लिए तैयार नहीं हैं।”

“क्या मतलब, तैयार नहीं हैं ?”

“ऑपरेशन के लिए बाक़ी सारा सामान है पर ऑक्सीजन नहीं है।”

“हाँ पर हर केस में ऑक्सीजन की ज़रूरत भी तो नहीं पड़ती है ?”

“एमरजेंसी के लिए पूरी तरह तैयार होना ज़रूरी है शर्माजी।”

“आप भगवान का नाम लेकर शुरू करें, सब ठीक ही होगा। अब इस समय और इस हालत में बड़े हॉस्पिटल ले जाना भी मुश्किल होगा।”

“एक बार फिर सोच लिजीए सर।”

“मुझे ईश्वर और आपकी क़ाबिलियत पर पूरा भरोसा है डॉक्टर रॉय।”

शीघ्रता से घटते रक्तचाप को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में संतुलित रख पाना डॉक्टरों के लिए टेढ़ी खीर साबित हुआ। प्रसव के अंतिम चरण में एक वेदनापूर्ण चीत्कार के साथ मीरा के पृथ्वी पर आगमन और लता के परलोक गमन की प्रक्रिया पूरी हुई।

बेहद इंतज़ार के बाद मिली अपूर्ण खुशी को पाकर जीवनराम दुविधा में पड़ गए थे। उस नन्ही सी जान को अपने सीने से लगाए वह गुमसुम से अपने कमरे में बैठे रहते। बूढ़ी माँ के लिए अपने लाड़ले की यह हालत असह्य हो गई थी। बारवें की रस्म पूरी होते ही उन्होंने एकत्रित जन-समुदाय के आगे अपने बेटे के दूसरे विवाह का प्रस्ताव रख दिया।उस ज़माने में ग़रीब बाप के लिए उसकी बेटी उस अनचाहे बोक्ष जैसी होती थी जिसे पहला मौक़ा मिलते ही वह अपने कंधों से उतार कर गंगा नहाना चाहता था। एक संतान का पिता उस पर दूजवर, फिर भी जीवनराम के लिए कई षोडसियों के रिश्ते तत्क्षण आ गए। सभी रिश्तों की जाँच- पड़ताल करने के बाद माताजी ने अपनी बहू के पद के लिए सरला का हाथ स्वीकार कर लिया। पहला शुभ मुहूर्त देख कर सप्ताह भर के अंदर जीवनराम का विवाह सरला के साथ कर दिया गया।

सरला बहुत ही साधारण परिवार से थी। जीवनराम की माताजी ने उसका चयन भी इस कारण विशेष रूप से किया था कि तंगी में रही हुई लड़की ,जिसकी ख़ुद की माँ उसके बचपन में ही गुजर गई थी, दूध पीती अबोध मीरा को छाती से लगा कर रखेगी। पर पति के घर की ठाटबाट देख कर सरला की आँखें चौंधिया गई थी। साल भर के अंदर ही बेटे की माँ बन कर तो मानो उसने गढ़ ही जीत लिया था। पैसे का ग़ुरूर अब उसके सिर पर चढ़ कर बोलने लगा था। सीधी- साधी बुढ़िया सास को उसने कोने के एक कमरे में उनकी नन्ही पोती के साथ मानो नज़रबंद सा कर दिया गया था। कमरे का रास्ता पिछले दरवाज़े के पास ही पड़ता था। पूरे परिवार से अलग दादी-पोती ने अपनी एक अलग सी दुनिया बना ली थी ,जिसमें मेहमान बनकर जीवनराम का प्रवेश अक्सर हो जाया करता था। मेहरी दोनों समय का खाना उनके कमरे में पहुँचा जाती थी।

सरला का बेटा मोहन मीरा से सिर्फ दस महीने छोटा था। दोनों को स्कूल भेजने का समय आया तो मीरा के स्कूल जाने पर सरला ने बहुत विरोध किया।

“छोरी नै पढ़ा कर के फ़ायदों मिलसी..? करनो तो चौको - चूल्हों ही पड़सी । घर-गृहस्थी का काम सीख लेसी तो सुख पासी..नहीं तो सास की बातां सुनसी और दुनिया कहसी सौतेला माँ थी ,कुछ कोनी सिखायो छोरी नै।”

पर फिर भी जीवनराम ने उसे पढ़ाने के लिए सूता मिल की स्कूल में भेजने का निश्चय किया। सरला की ज़िद पर मोहन पिता की गाड़ी में बैठकर बड़े स्कूल में जाने लगा।

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा और विधि का विधान घटित होता रहा। मीरा पंद्रह साल की थी तब उसके सिर पर से दादी का ममतापूर्ण साया उठ गया। माँ को तो उसने कभी देखा ही नहीं था, दादी में ही उसकी पूरी दुनिया समाई हुई थी। ज़िंदगी में पहली बार किसी अपने को खोने के ग़म में मीरा पूरी तरह से टूट गई। गुमसुम सी मुरझाई हुई अपनी बेटी को देख कर जीवनराम बहुत विचलित हुए। मीरा के भविष्य के बारे में उसे शीघ्र ही कुछ फ़ैसला करना पड़ेगा तब तक के लिए उसने मीरा को कुछ दिन उसकी मौसी के शहर लखनऊ भेजने का मन बनाया।

मौसी के घर आए हुए मीरा को महीना भी नहीं हुआ था कि हृदयघात से जीवनराम की मृत्यु की ख़बर ने उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली। वह जहाँ बैठी थी वहीं बैठी रह गई।

दो दिन बाद जब वह कोलकता पहुँची तो पिता की यादों के अलावा और वहाँ कुछ नहीं था। घर में प्रवेश करने में क़दम डगमगा रहे थे। उसे देख कर भी सब मूर्तिवत रहे। किंकर्तव्यविमूढ़ सी वह गृह-द्वार को पकड़ कर काफी देर तक खड़ी रही। फ़ूलमाला लगी पिता की तस्वीर पर नज़र पड़ते ही वह दहाड़ मार कर उसके सम्मुख गिर कर फफकफफक कर रोने लगी। पिता के अवसान से अनाथ हुई उस बाला को गले लगा कर ढाढ़स बँधाने कोई नहीं उठा। उसको अपने हृदय से लगा, जी भर कर रो कर अपने मन के ग़ुबार को निकाल, अपना मन हल्का कर पाने का मौक़ा देने वाला वहाँ कोई नहीं था। विक्षोभ के आवेश में वह अपना सिर दीवार पर पटक-पटक कर रोने लगी और अचेत हो गई।

होश आया तो उसने अपने आप को अस्पताल में पाया। माथे पर दर्द का अहसास होने पर जब उसने वहाँ हाथ लगाया तो सिर पर पट्टा बँधा हुआ पाया। उसी सूता मिल में काम करने वाले उसके पिता के एक सहकर्मी चौबेजी ने उसे बताया कि सरला देवी ने मनहूस मान कर उससे संबंध विच्छेद कर उसे घर नहीं लाने का निर्देश दिया है। फिर वह कहाँ जाए..

“माँ मुझसे इतनी नफ़रत क्यों करती है, मैंने उसका क्या बिगाड़ा है..?”

“बिगाड़ा तुमने नहीं बेटा, जीवनरामजी की वसीयत ने नफ़रत के बीज बोए हैं।”

“कौन सी वसीयत, कैसी वसीयत..?”

“बेटा पिछले दिनों तुम्हारे पिताजी ने वक़ील साहब को बुला कर अपनी वसीयत बनवाई थी”

“...फिर..?”

“उन्होने अपनी आधी संपत्ति तुम्हारे नाम और आधी मोहन के नाम की है। सरला देवी इस बात से बहुत नाराज़ हुई। जीवनरामजी के साथ उनकी बहुत बहस हुई, जिसके कारण तुम्हारे पिताजी को दिल का दौरा पड़ा और उनकी जान चली गई।”

“चाचाजी , आप मेरी मदद कीजिए। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है।”

“बेटा मेरी सलाह है कि तुम सेठजी (सूता मिल के मालिक) से एक बार मिल कर उन्हें अपनी समस्या बताओ। उनके हस्ताक्षर के बिना जीवनरामजी का पैसा कोई नहीं ले सकता है।”

“चाचाजी आप कृपा कर मेरे साथ चलें, मुझे अकेले जाने में डर लगता है”, सुबकते हुए मीरा बोली।

“हाँ बेटा, मुझसे जितना हो सकेगा, मैं ज़रूर करूँगा।”

सेठ नंदलाल तुकाराम के ऑफिस की विशालता और भव्यता देख कर मीरा सकुचा गई। सेठजी के केबिन में प्रवेश कर, वह एक कोने में सकुचा कर खड़ी हो गई। मीरा का परिचय करवाते हुए चौबेजी बोले,

“सा’ब ये बच्ची जीवनरामजी की पुत्री है।”

फिर आगे बढ़कर उन्होंने धीमे स्वर में सेठजी को सारी बातें विस्तार से समझाई। सेठजी बहुत ही नेक और दयालु इंसान थे। पूरी समस्या समझने के बाद उन्होने मीरा को अपने पास बुलाया। मीरा ने सेठजी के चरण-स्पर्श करके उन्हें प्रणाम किया। सेठजी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ रख कर कहा,

“बेटी, चिंता मत कर, मैं तेरे साथ नाइंसाफ़ी नहीं होने दूँगा। चौबे इस बच्ची को मेरे घर ले जाओ, सेठानीजी से मैं बात कर लेता हूँ, वे कुछ दिनों के लिए इसके रहने-खाने का प्रबंध कर देंगी जबतक कुछ और समाधान नहीं निकलता है।”

सेठानी धार्मिक प्रवृति की दयालु महिला थी। मीरा के दुख को आत्मसात करते हुए उन्होंने उसका अपने बच्चों के समान ध्यान रखा। मीरा के जीवन के ये सुनहरे पल थे, जो सपनों के सदृश अल्पसमय ही रहे। सेठजी ने अति शीघ्र ही ब्राह्मण परिवार के एक सुंदर सुशील नौजवान रंजीत के साथ मीरा का विवाह करवा दिया। उन्होंने अपनी उसी सूता मिल में रंजीत को नौकरी पर रख लिया। कंपनी के स्टाफ़ क्वाटर्स में एक छोटा कमरा उसे रहने के लिए भी दे दिया। मिल के कारख़ाने की छत पर बने उस एक कमरे के घर में मीरा को पिता के आलीशान बंगले जैसा आराम नहीं पर मान- सम्मान और सुकून हासिल हुआ, जिसकी हर किसी को चाह होती है।

समय अपने करतब दिखाता हुआ आगे बढ़ता रहा। सरला को अपने पुत्र मोहन के साथ कंपनी प्रदत्त बंगला छोड़कर किराए के मकान में जाना पड़ा। उसने जीवनराम की वसीयत के ख़िलाफ़ कोर्ट में अर्ज़ी दायर की थी कि पत्नी के रहते हुए पति की संपत्ति का बँटवारा नहीं हो सकता है क्योंकि किसी भी व्यक्ति की जायदाद पर उसके बाद उसकी भार्या का हक़ होता है। कोर्ट ने संपत्ति के बँटवारे पर रोक लगा रखी थी। सरला को मासिक भत्ता ख़र्चे के लिए मिलता था। फिर भी सरला फ़ायदे में ही रही। परिवार के सोने- चाँदी के गहनों और बर्तनों पर तो उसने पहले ही क़ब्ज़ा कर लिया था। मीरा के नसीब में तो उसकी माँ के गहने भी नहीं आए, जिन पर उसका हक़ था।

इस दौरान मीरा दो स्वस्थ बच्चों की माँ बनी। उसके पुत्र को सब टिल्लू और पुत्री को टिल्ली बुलाया करते थे। मीरा की कहानी से वहाँ रहने वाले सभी लोग भलीभाँति परिचित थे और सबको उनसे बेहद हमदर्दी भी थी। अपने घर के तीज- त्योहारों और विवाह आदि प्रसंगों में लोग मीरा को जरुर आमंत्रित करते थे। उसमें उनके स्नेह से अधिक उनका स्वार्थ निहित होता था। बचपन से दब कर रहने वाली मीरा कभी किसी को किसी भी काम के लिए ना नहीं कह पाती थी और लोग उसकी इस कमज़ोरी का ख़ूब लाभ उठाते थे। मीरा के इस परमार्थ के बदले लोग उसे कभी साड़ी या खाने-पीने की वस्तुएँ दे दिया करते थे। जिसके नाम लाखों रूपए बैंक में पड़े थे उसे सौ रूपए उधार देने में भी लोग कतराते थे। विधाता ने लक्ष्मी उसके खाते में तो लिख दी थी पर उसकी चाभी उसके हाथ से छीन ली थी।

मीरा के पति विशेष पढ़े- लिखे तो थे नहीं, इसलिए उनकी नौकरी भी सामान्य सी थी ,वो भी सेठजी की मेहरबानी पर बरक़रार थी। सेठजी के जीते जी तो कोई परेशानी नहीं हुई पर उनके स्वर्गवास के बाद जब से उनके बेटे ने काम संभाला था, तब से आए दिन वह रंजीत के लिए नई मुसीबत खड़ी कर देता था। वह रंजीत के काम से बहुत नाख़ुश था। स्वर्गीय पिता का सम्मान करते हुए वह रंजीत को नौकरी से बर्खास्त नहीं कर रहा था। मीरा के बच्चे मिल की सरकारी स्कूल में ही पढ़ रहे थे। अपने आस-पड़ोस के बच्चों को कॉनवेंट स्कूलों में जाते देख मीरा को अपने भाग्य पर बहुत अफ़सोस होता था कि जिन बच्चों को वह अच्छे स्कूल में पढ़ा सकती थी वे मज़दूर के बच्चों के साथ पढ़ रहे थे। रो-रो कर उसके आँसू भी अब सूख गए थे। नियति की निर्दयता को सहने की अब उसे आदत हो गई थी।

सरकारी स्कूल में पढ़कर भी मीरा का बेटा कंप्यूटर इंजीनियर बन गया था। बैंगलोर की एक बडी कंपनी में उसकी नौकरी लग गई थी। बेटी का विवाह भी अच्छे पढ़े- लिखे लड़के के साथ हो गया था और वह अपने संसार में सुखी थी। जीवन उबड़-खाबड़ पगडंडियों को पार कर अब समतल राह पर चल पड़ा था पर मीरा का शरीर अब उसके साथ चलने को राजी नहीं था। पति भी साथ छोड़ परलोक गमन कर चुके थे। बेटे की शादी कर के अब वह भी आराम करना चाहती थी। सौतेली माँ सरला देवी तो अब संसार में नहीं थी पर उनके द्वारा रचित षड्यंत्र से मीरा अब तक त्रस्त थी। माँ की मृत्यु के बाद मोहन ने पिता की वसीयत पर केस कर रखा था। जीवनराम का बेटी के भविष्य को सुखमय बनाने का सपना अब तक राहु-केतु के चुंगल में फँसा पड़ा था।

बेटे का विवाह करने के बाद से ही मीरा ने बिस्तर पकड़ लिया था मानो अपने कर्तव्यों से निवृत हो अब उसकी सहनशक्ति ने जवाब दे दिया हो। दिन पर दिन उसकी तबीयत बिगड़ती जा रही थी। स्थूल शरीर बेजान सा होने लगा था। खाना-पीना भी उसका कम होते जा रहा था। शरीर निर्जीव पड़ा था पर साँसें शरीर को छोड़ नहीं पा रही थी। फिर एक दिन उसका बेटा टिल्लू हाथ में कुछ काग़ज़ात लेकर मीरा के पास आया -

“ तुम केस जीत गई हो माँ। नानाजी की तुम्हारे हिस्से की संपत्ति अब तुम्हारे नाम हो गई है, उठो माँ आँखें खोल कर देखो , जिसकी तुमने जीवन भर प्रतीक्षा की वह आज तुम्हें हासिल हो गया है माँ, देखो न माँ”, कहते कहते टिल्लू रो पड़ा।

मीरा निस्तेज आँखें खोल कर अपने पिता की सौग़ात को देख रही थी…!

कहानीकार - उर्मिला पचीसिया

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