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आधुनिक काल में रामकथा का महत्व - रमेश शर्मा

आधुनिक काल में रामकथा का महत्व

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आधुनिक काल में मनुष्य जीवन के चारों तरफ अंतः और बाह्य रूप में इस तरह की परिस्थितियां निर्मित हुई हैं कि यह समय एक तरह से मानसिक अशांति का समय घोषित हो गया है । जब मनुष्य मानसिक अशांति के दौर से गुजरता है तो वह अपने भीतर उत्पन्न अनेक परेशानियों से भी जूझने लगता है । सामाजिक जीवन -मूल्यों के पतन के इस दौर में चारों तरफ हिंसा और अशांति का एक शोर सा सुनाई देता है । यह हिंसा कहीं मानसिक रूप में बिल्कुल अमूर्त होकर मनुष्य को भीतर ही भीतर परेशान कर रही है तो कहीं मूर्त रूप में हमारी आंखों के सामने तांडव रच रही है । धार्मिक उन्माद , लूटपाट, हत्या ,बलात्कार ,आगजनी जैसी हिंसा से समाज जिस तरह जूझ रहा है वह जीवन-मूल्यों के खत्म हो जाने का संकेत है । आज मनुष्य जीवन में न कहीं त्याग की भावना नजर आती है न उदारता का कोई उदाहरण दिखता है। गुरु और बड़ों के प्रति सम्मान के भाव में जो गिरावट आई है उसे हम स्पष्ट रूप से घरों में और घर के बाहर भी महसूस करते हैं । मनुष्य-मनुष्य के बीच मैत्रीभाव का अभाव आज के समय को कंगाल बनाता है । उच्च और निम्न वर्ग के बीच आर्थिक , वर्गीय और जातिगत भेदभाव आज अधिक सघन हुआ है। दलित पीड़ित वर्ग को हेय की नजर से देखने का नजरिया पूंजीवादी व्यवस्था में अधिक सघन रूप में हमारे सामने विद्यमान है। ये सभी स्पष्ट संकेत देते हैं कि मनुष्य के जीवन में जिन बुनियादी मूल्यों की सर्वाधिक जरूरत है वही मूल्य उसके जीवन से एकदम से नदारद हो गए हैं । ये जीवन-मूल्य ही तो मनुष्य को मानवतावादी दृष्टिकोण प्रदान करते हैं। अगर यही हमारे जीवन से गायब हो जाएं तो मनुष्य के भीतर मनुष्य होने के जो गुण होने चाहिए, उन गुणों से ही मनुष्य विलग हो जाता है और वह फिर मनुष्य ना होकर किसी राक्षस या शैतान में बदल जाता है । यह आधुनिक समय मनुष्य को किसी राक्षस या शैतान में बदल देने का संक्रमण कालीन समय है।

यह आधुनिक समय उन विकल्पों पर भी विचार विमर्श करने का समय है जिनके माध्यम से मानवीय मूल्यों को मनुष्य जीवन में फिर से प्रतिस्थापित किया जा सके । अगर उन तमाम विकल्पों पर हम विचार विमर्श करते हैं तो रामकथा उन जीवन मूल्यों के पुनर प्रतिस्थापन का एक बेहतर विकल्प नजर आता है।

रामकथा और रामचरितमानस हमारे समाज में आस्था के प्रतीक माने गए हैं। यूं भी आस्था का सच्चा भाव मनुष्य को आत्म केंद्रित और शांतिप्रिय बनाता है । उसके मन मस्तिष्क में एकाग्रता उत्पन्न होती है । फलस्वरूप वह थोड़ा संयमित और मर्यादित भी होने लगता है । रामचरितमानस में निहित रामकथा के पठन-पाठन और श्रवण से आधुनिक समय में कोई परिवर्तन सघन रूप में भले ही मूर्तमान होता हुआ न प्रतीत होता हो पर इसका असर सामाजिक जीवन में अमूर्त रूप में अवश्य होता है । सोचिए कि कहीं पर अगर रामकथा का आयोजन हो रहा हो और वहां उसके श्रवण के लिए लोग जमा हुए हों तो उनमें किसी न किसी रूप में सामाजिक समरसता का भाव उत्पन्न तो होता ही है । लोग वहां जिस तरह शांति भाव से बैठते हैं और कथा श्रवण करते हैं वह दृश्य अपने आप में शांति का संदेश रचता है। कथा श्रवण के दौरान लोग आस्था के संचार से तनावमुक्त रहते हैं । तनावमुक्त व्यक्ति समाज के लिए उपयोगी हो सकता है। इस अर्थ में सोचें तो रामकथा का महत्व आधुनिक काल में बढ़ जाता है।

रामकथा में जीवन से जुड़ीं कुछ ऐसी घटनाएं और ऐसे प्रसंग आते हैं जो लोकजीवन को बहुत गहराई में जाकर प्रभावित करते हैं । रामकथा दरअसल समाज और लोकविमर्श का एक महाआख्यान है जो आधुनिक समय में सार्थक हस्तक्षेप करने का सामर्थ्य रखता है । इसके कुछ प्रसंगों को लेकर इस विमर्श को हम जान-समझ सकते हैं| निषादराज केवट और राम के प्रसंग पर हम आते हैं -

निषादराज केवट, रामायण का एक पात्र है। जिसने प्रभु श्रीराम को वनवास के दौरान माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपने नाव में बिठा कर गंगा पार करवाया था। इसका वर्णन रामायण के अयोध्याकाण्ड में किया गया है।

गंगा नदी के किनारे रामचौरा घाट पर भगवान राम केवट को आवाज देते हैं - नाव किनारे ले आओ, पार जाना है।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥

चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥

श्रीराम केवट से नाव मांगते हैं पर वह लाता नहीं है। वह कहता है - मैंने आपका मर्म जान लिया। आपके चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। वह कहता है कि पहले पांव धुलवाओ, फिर नाव पर चढ़ाऊंगा।

अयोध्या के राजकुमार केवट जैसे सामान्यजन का मैत्रीभाव से निहोरा कर रहे हैं यह समाज व्यवस्था की अद्भुत घटना है जो आज के समय में कहीं दिखाई नहीं पड़ती | यह प्रसंग इस विमर्श को आज के समय में भी स्थापित करता है कि राजा का व्यवहार सामान्यजन के साथ किस तरह का होना चाहिए । रामकथा का यह प्रसंग आज की राजनीतिक व्यवस्था में वीआईपी कल्चर पर जबरदस्त आघात करते हुए आधुनिक राजाओं को अपने आचरण में सुधार का संदेश देता है ।

केवट चाहता है कि वह अयोध्या के राजकुमार को छुए। उनका सान्निध्य प्राप्त करे। उनके साथ नाव में बैठकर अपना खोया हुआ सामाजिक अधिकार प्राप्त करे। अपने संपूर्ण जीवन की मजूरी का फल पा जाए। राम वह सब करते हैं, जैसा केवट चाहता है। उसके श्रम को पूरा मान-सम्मान देते हैं। उसके स्थान को समाज में ऊंचा करते हैं। राम की संघर्ष और विजय यात्रा में उसके योगदान को बड़प्पन देते हैं। त्रेता के संपूर्ण समाज में केवट की प्रतिष्ठा करते हैं। केवट भोईवंश का था तथा मल्लाह का काम करता था। केवट प्रभु श्रीराम का अनन्य भक्त था। केवट राम राज्य का प्रथम नागरिक बन जाता है। राम त्रेता युग की संपूर्ण समाज व्यवस्था के केंद्र में हैं, इसे सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। आज के राजनीतिक राजाओं को भी राम जैसा आदर्श स्थापित करने का संदेश इस प्रसंग में है जो आज अधिक महत्वपूर्ण है ।

अब हम रामकथा अंतर्गत अहिल्या प्रसंग के माध्यम से इस समाज विमर्श को समझने की कोशिश करेंगे ।अहल्या जो ब्रह्मा की मानस पुत्री थी और उसका विवाह गौतम ऋषि के साथ हुआ था । वह इंद्र द्वारा छली गई स्त्री थी । इंद्र ने गौतम ऋषि का वेश बदलकर अहिल्या से गलत संबंध बनाया, जिसकी जानकारी गौतम ऋषि को हो गई| इस प्रसंग में अहिल्या का कहीं भी कोई दोष नहीं है, सारा दोष इंद्र का है फिर भी गौतम ऋषि द्वारा वह श्रापित और परित्यक्त होकर एक पत्थर में तब्दील हो जाती है। आज भी समाज में हम ऐसी घटनाओं को रोज देख रहे हैं । जब किसी पुरुष द्वारा किसी महिला का बलात्कार होता है तो समाज की नजर में दोषी महिला ही होती है । वह चारों ओर से उत्पीड़न का शिकार होकर हाड़ मांस के पत्थर में बदल जाती है | राजतंत्र भी उसकी कोई ख़ास सहायता नहीं करता बल्कि कई बार वह दोषियों के पक्ष में आ खड़ा होता है | रामकथा में राम ने एक सताई हुई परित्यक्त स्त्री अहल्या का उद्धार कर समाज के इस गलत नजरिए पर हस्तक्षेप करके जो कड़ा संदेश दिया है वह आज अत्यंत प्रासंगिक है । इस नजरिए से भी आज रामकथा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

रामकथा के महत्व को सबरी प्रसंग के माध्यम से भी हम समझ सकते हैं । सबरी जो एक भीलनी स्त्री थी जन्म से ही उसके माता पिता की मृत्यु हो जाती है पर वह अपने भाग्य को कभी नहीं कोसती। अपनी काया से भी वह बहुत कुरूप होती है पर वह अपने ईष्ट राम को कभी दोष नहीं देती ।

वह जंगल में मतंग ऋषि की शिष्या थी । कहा जाता है कि पूर्वजन्म में वह एक राजकुमारी थी जिसकी शादी कर दी जा रही थी पर उसके जीवन का एकमात्र उद्देश्य राम से ही मिलना था। इसलिए अपनी जगह एक दासी को बिठाकर वह जंगल की तरफ भाग गयी ।

इस जन्म में वह सबरी के रूप में जंगल में रही । गुरू मतंग ऋषि के प्रयाण के बाद वह उनकी कुटिया में अकेली रहने लगी थी । मतंग ऋषि ने उससे कहा था कि उसकी कुटिया में एक दिन राम जरूर आएंगे। जो भी पहला व्यक्ति आएगा वही राम होगा । गुरू के कथन को अकाट्य मान कर सबरी आजीवन राम की प्रतीक्षा में रही | ऐसा अगाध विश्वास आज कहीं देखने को नहीं मिलता | देखा जाए तो सबरी सब्र की प्रतिमूर्ति है । रामकथा का यह सन्देश है कि हर मनुष्य को ऐसा ही सब्र वाला और विश्वासी होना चाहिए ।

इस प्रसंग में अपनी युवावस्था से ही सबरी पूरे उत्साह के साथ राम की बाट जोहती रहती है।वह हर दिन घर को बुहारती है , रास्ते पर फूल सजाती है और जंगल से बेर तोड़कर लाती है कि वह अपने राम को खिला सके । इस इंतजार में उसकी पूरी उम्र बीत जाती है पर वह कभी नहीं थकती ना उसका उत्साह कभी कम होता है| फिर एक दिन राम उसकी कुटिया में आते हैं । बड़े उत्साह के साथ सबरी उन्हें जूठे बेर खिलाती है । आसक्ति जब गहरा प्रेम का रूप ले ले तो किसी भी चीज की प्राप्ति जीवन में संभव है चाहे वह राम ही क्यों न हों । रामकथा का यह प्रसंग यह संदेश देता है कि मनुष्य को कभी भी अपना धैर्य और सब्र नहीं खोना चाहिए| जिस तरह सबरी के जीवन का प्रत्येक दिवस राम की प्राप्ति की संभावना से भरा हुआ था उसी तरह मनुष्य को तमाम असफलताओं के बावजूद हर दिन को उत्साह के साथ एक संभावना के रूप में देखना चाहिए , यह जरूरी संदेश रामकथा से ही हमें मिलता है ।

राम के वनवास वाले प्रसंग को भी आज राजनीतिक विमर्श से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है । राम गृह त्याग कर अगर वन गमन नहीं करते और एक साधारण मनुष्य का जीवन नहीं जीते तो उन्हें आमजन की पीड़ा का कभी भी अनुभव नहीं होता। वनवास के दौरान उन्होंने अहिल्या सहित सुग्रीव, निषादराज, जटायु जैसे पीड़ितों और आमजन का उद्धार किया और सम्मान पूर्वक जीने का हक दिया ।

राम जो कि सम्पूर्ण कथा के केंद्रीय पात्र हैं वे प्रजा के तारणहार हैं । उनके चरित्र में कहीं भी विचलन नजर नहीं आता । वे हर जगह मर्यादित, संयमित, धैर्यवान, त्यागी और बड़ों के प्रति आज्ञाकारिता का भाव लिए नजर आते हैं। उनके भीतर कहीं भी क्रोध का भाव नहीं है। वे एक जगह समुद्र पर जरूर क्रोधित होते हैं क्योंकि क्रोधित होना वहां जरूरी नजर आता है । यहां भी वे सचमुच में क्रोधित नहीं होते बल्कि क्रोधित होने का प्रदर्शन करते हैं । राजा को आज ऐसा ही होना चाहिए | कभी कभी उसे आमजनों जैसा जीवन जीते हुए लोगों के मध्य जाना चाहिए, तभी लोगों का दुखदर्द वह समझ सकता है | रामकथा का यह प्रसंग आज के आधुनिक राजाओं को भी ऐसा होने का संदेश देता है और इस अर्थ में आधुनिक समय में इसका महत्व और प्रासंगिकता बढ़ जाती है ।

रामकथा में इस तरह के अनेकानेक प्रसंग हैं जिनके माध्यम से आधुनिक समय में सामाजिक विमर्श का एक नया अध्याय खुलता है । सामाजिक विमर्श के माध्यम से ही अच्छाइयों की स्थापना और बुराइयों का विस्थापन संभव है| इन सारे प्रसंगों में निहित अर्थों की व्यापकता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक समय में रामकथा के महत्व की स्वीकार्यता अपने आप बढ़ जाती है |

रमेश शर्मा

92 श्रीकुंज , बोईरदादर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़)



परिचय

नाम- रमेश शर्मा

जन्म- 06 जून 1966

शिक्षा- एम.एस-सी. ( गणित )बी.एड.

सम्प्रति - ब्याख्याता

प्रकाशित किताबें

कहानी संग्रह- 1. मुक्ति 2 . एक मरती हुई आवाज

कविता संग्रह- "वे खोज रहे थे अपने हिस्से का प्रेम"

परिकथा, हंस, अक्षर पर्व, समावर्तन, इन्द्रप्रस्थ भारती, माटी,पाठ ,साहित्य अमृत, गंभीर समाचार सहित अन्य पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित .

हंस, बया ,परिकथा, कथन, ,अक्षर पर्व ,सर्वनाम,समावर्तन,आकंठ सहित अन्य पत्रिकाओं में कवितायेँ प्रकाशित

संपर्क . 92 श्रीकुंज , बोईरदादर , रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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