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हिंदुस्तान नया बनाते हैं - राजेश गोसाईं

1......हिंदुस्तान नया बनाते हैं

है प्यार यहां का त्यौहार सदा
हम ईद दिवाली मनाते हैं
ऊंच नीच जात पात से उठ कर
हम हिंदुस्तान नया बनाते हैं

ऐसे कण कण सारी
दुनिया से उठा कर
हम हिंदुस्तान नया बनाते हैं

आशीष है ये भारत मां का
हर रीत में प्यार की भाषा है
हैं प्रीत यहां हर नर नारी में
अमन चैन भाईचारे की अभिलाषा है

सारी दुनिया में जिसका मान बने
उस पावन भूमि पे
हम हिंदुस्तान नया बनाते हैं

यहां हर दिल में हिंदुस्तान बना
यहां हर त्यौहार का मान बना
आया दुश्मन का झोंका कोई
यहां हर दिल इक चट्टान बना

टकरा के भंयकर तूफानों से
बदल के रुख हवाओं के
हम हिंदुस्तान नया बनाते हैं

आदर है मेहमान का बहुत यहां
वो भगवान से भी प्यारा होता है
यहां पूजा है पत्थर को हमने
इंसान भी ममता की धारा होता है

शिरोमणि विश्व का
विजयेता है हर दिल का
चरणों में भारत मां के हम
नित्य शीश झुकाते हैं
हम हिंदुस्तान नया बनाते हैं
राजेश गोसाईं
*******

2.....वीरान - बगिया

खिला ना फूल अभी तक
मेरी जिंदगी में कोई
कांटों ने मिल कर
उम्र सारी खून में डुबोई

सूनी सूनी सी हैं पतियां
चुप है हर डाली
हरियाली की गोद भी
अब तक है खाली

माली ने चमन की
सुध-बुध कहां खोई
सुख के कांटों में बहारें
आंसुओं में भिगोई

फूल तन्हाइयों में भी
खिल जाता है कोई
ना जाने क्यों मेरी
बगिया ये वीरान होई

अब तो खिला दे फूल
इस वीराने में
जमाने में मैं खूब रोई
या बता दे बगिया....ये....
.............वीरान क्यों होई
राजेश गोसाईं
******
3.....मैंने देखी है

मैंने देखी है
इन आंखों से महकती दुनिया
बागों में फूल
और वो खुशबू लुटाती कलियां
याद कर लो
उन्हें भी जो शहीद ए वतन होते हैं
आजादी के वो खिले सुमन होते हैं
मैंने देखी है
उनके मुरझाने से ये खिलती दुनिया

उनकी बलिदानी से
नूर चमन में होता है
इक तिरंगा ही तो
उनका आखिरी कफन होता है
गुलज़ार कर जाते हैं जो वतन
लुटा कर अपनी बगिया
मैंने देखी है
उन वीरों को नमन करती दुनिया

चांद सूरज की तरह
होते हैं देश के प्यारे
देश के लिए ही वो
अमर हो जाते हैं सारे
उनके छुप जाने पे सदा दीप जले
मैंने देखी है
उन सितारों से उजली
चमकती दुनिया
राजेश गोसाईं
******

4......चल चल रे

चल चल रे नौजवान चल चल रे
जरा उठ के तू चल
उस पथ पे तू चल
जहां देश रहा जल जल रे

तेरी रगों में है खून
तेरे दिल में जुनून
तेरा दृढ़ मनोबल
कर सेवा तू अटल चल चल रे

शत्रु कितने भी आये
कोई बचने ना पाये
तोड़ हर दल दल
कर अटल पटल हल चल रे
राजेश गोसाईं
*****

5......फर्ज.....

देश प्रेम के लिये हम
कितना फर्ज निभाते हैं
हम राष्ट्र गान भी गाते हैं
हम राष्ट्र गीत भी गाते हैं
हम त्यौहार आजादी के सब
मिल जुल कर खूब मनाते हैं
संकट जब भी देश पे आया
हम राष्ट्र धर्म भी खूब निभाते हैं
देश प्रेम के गीत गाकर
घर घर में तिरंगा फहराते हैं
लेकिन कुछ लोगों को छोड़ भी दें तो
कितने लोग अपने दिल में
यह तिरंगा लगाते हैं
देश प्रेम के डंके तो हम खूब बजाते हैं
बजता हो राष्ट्र गान जहाँ
वहाँ कितने लोग रुक जाते हैं
इस झण्डे को देख कर
कितने लोग शीश झुकाते हैं
देश प्रेम के लिये हम
कितना फर्ज निभाते हैं
हम गीत संविधान के भी गाते हैं
हम संसद में लड़ने जाते हैं
लोकतन्त्र के मंदिर में हम
स्वतंत्र कहाँ रह पाते हैं
कहाँ रह गया है
स्वतंत्र या गणतंत्र दिवस
अब तो गणतंत्र के साये में
जनतंत्र राष्ट्रीय त्यौहार मनाते हैं
घर घर में हम आपस में ही
लड़ लड़ के मर जाते हैं
पर देश प्रेम के लिये हम में से
कितने लोग देश के लिये मर जाते हैं
देश प्रेम के लिये हम
कितना फर्ज निभाते हैं
राजेश गोसाईं
*****


6....ज्योति क्लश.....

ओंस के मोतियों से सजाई हुई
भोर की लाली किसे पेश करूं......
ये स्वर्णिम धागों की पिरोई हुई
रेशमी सुबह मैं किसे पेश करूं......
ये मुस्काई हुई अरुण रश्मियां
ऊषा के ललट पे शरमाई हुई
नहाई हुई कलियों की लतायें
सौंधी सी सुबह किसे पेश करूं.....
गुनगुनाई हुई किरणों की कतारें
गुलाबी धूप में ये खिलती बहारें
ये सिंदूरी फलक के गिरे नजारे
ये ज्योति क्लश मैं किसे पेश करुं......
शुभ्र आँचल धरती का फैला
मंगल घट छलक के आया
उजाले ने दी सुख की छाया
ये अमृत गागर मैं किसे पेश करूं.....
राजेश गोसाईं
******

7...मेला....

मेला....मेला.....मेला....
ये जिन्दगी का मेला......
यहाँ सांसों की महफिल है
यहाँ मौत का उत्सव
यहाँ लाशों का व्यापार
है इंसानों का खेला
मेला...मेला...मेला.....
ये जिन्दगी.......
ना कोई अपना पराया है
रिश्तों की दुकानें हैं
स्वार्थ का तमाशा देखो...
है सुख दुख का ठेला
मेला....मेला....मेला....
ये.जिन्दगी.....
खाली हाथ आया था खाली ही जाना है
जरुरत से ज्यादा फिर क्या कमाना है
ना साथ आया कोई ना संग जायेगा
नेकी कर फिर तू चल अकेला...
मेला....मेला....मेला......
ये जिंदगी.......
कठपुतलियों की रौनक
बाजार कलाबाजों का है
झूठ बेईमानी के मंच पर
चल रहा सांसों का रेला
मेला....मेला....मेला....
ये जिंदगी.....
ये जिंदगी का मेला
ये रंज ओ गम का मेला
कभी कम ना होगा
ये गम और खुशी का झमेला
माटी के पुतलों से सजा
है दुनिया का ये मेला
जिन्दा लाशों से चलता
है ये मौत का मेला......
मेला...मेला...मेला...
ये जिंदगी.....
राजेश गोसाईं
*****

8....बगिया

ये झूमती हुई कलियां
ये महकी हुई कलियां
मुस्कायेंगी गायेंगी लायेंगी
खुशियों की बगिया.......
वो चहकता होगा
वो महकता होगा
सावन जीवन का बरसता होगा
झिलमिल सितारों में
रिमझिम बहारों में
मुस्कायेंगी गायेंगी लायेंगी
खुशियों की बगिया..........
हम तुम्हारे होंगे तुम हमारे
खिलेंगे फूल प्यारे प्यारे
आँगन हमारे होंगे चाँद सितारे
सिंदूरी किरणों का जादू धरती मिलन में
रातें हमारी जगमगायेंगी चमकायेंगी गुनगुनायेंगी.....
खुशियों की बगिया.........लायेंगी.......
राजेश गोसाईं
*******


9....सफर

जिस सफर पे चला.....
उस सफर पे मुझे...........
हमसफर अभी तो कोई ना मिला........
दर्द बहुत मेरे संग ही चले......
हमदर्द मुझे तो कोई ना मिला.........
हर मोड़ पे पत्थर मिले.....
हर राह में काँटों का किला......
जहाँ देखूं काँच के टुकड़े थे............
हम साया कोई ना मिला......
सिला गम का यहाँ बहुत ही चला........
हमदम मुझे तो कोई ना मिला.......
किस मोड़ पे किस को सदा दूं ......
कौन सुनेगा मैं किस को आवाज दूं......
साथी ना कोई यहाँ राही कोई ना मिला......
चला तो चला काफिला .....
काँटों का ही चला......
राह सारी मैं अकेला ही चला......
सहारा मुझे तो कोई ना मिला.....
दर्द मुझसे बोला मैं दर्द से बोला.....
बेदर्द जमाने में हमदर्द कोई ना मिला....
बर्फ की तरह हम सर्द हुये....
सिलसिला गर्द बेचैनियों का मिला....
चैन मुझे तो कोई भी कहीं ना मिला...
राजेश गोसाईं
*****

10....निशानी

देकर अपने गीत मैं .....
निशानी छोड़ जाऊंगा.....
दुनिया के होंठों पे .....
मैं बोल बन जाऊंगा.....
माटी का खिलौना हुँ
माटी के मोल बिक जाऊंगा......
किसी को हंसाया था.....
किसी को रुला के छोड़ जाऊंगा....
ये जीवन बहती धारा....कलल कल...
दूरी - बिरह- ये बिछड़ा किनारा......
कहाँ मिलन कहाँ होगा कोई सहारा......
कोई गीत -संगीत तराना बन जाऊंगा......
चार दिन की जिन्दगी . होनी अनहोनी ...
टूटे बन्धन जोड़े ये मन की सलोनी ....
होगा कोई ना पाँचवां दिन .....
डोरी ये सांसों की तोड़ जाऊंगा....
कोई झोंका हवा का गीत गाये.....
दरिया कोई - मेरा संगीत बन जाये...
यादों में, किस्सों में, मैं बन के ताने...
होंठों पे सबके रह जाऊंगा...
राजेश गोसाईं
*****

11...==नजर

जहाँ मुनियों की धरती है
हिन्दुस्तान नजर आता है
जहाँ धर्म की ज्योति है
इंसान नजर आता है
मुझे तो फख्र है कि मैं , पैदा यहाँ हुआ
जहाँ देखूं हर शख्स
मुझे भगवान नजर आता है
मुहब्बत है फूलों से
चाँद तारों से भी हम प्यार करते हैं
किसी के दामन में सागर
हर आँचल में दुलार मिलते है
जहाँ दिलों में ईमान नजर आता है
ऊंच- नीच ना कोई
हर आँख आसमान नजर आता है
तिरंगा एक फहरा है
अमन का जहान कहते हैं
जहाँ देखूं ये पहरा है
सिपाही हर दम तैयार रहते हैं
जहाँ एकता का त्यौहार
हिन्दुस्तान शक्तिमान नजर आता है
वहाँ देखूं गले मिलता
हिन्दु -मुसलमान नजर आता है
राजेश गोसाईं
****

12.....चुनरी

बांध लूं कमर पे......
या रख लुं सर पे इसे ......
गोरी तेरी चुनरी ...............
जो उड़ के गिरी मुझ पे ............
खता हवा की .....
या है तेरी रजा की ...............
ये बता दे जरा .......................
गोरी तू छत पे खड़ी .......................
रेशम के धागों में सजी......
तेरे इकरार की निशानी .........
गोरी तेरी चुनरी.......
जो चौबारे पड़ी
राजेश गोसाईं

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