वो श्याम वर्ण - कविताएँ - मिन्नी शर्मा

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  वो श्याम वर्ण श्याम वर्ण आंखों में घने घन सिहरा मन स्थिर तन ताकती झांकती छुप के झुक के दर्पण श्याम वर्ण । वो एक काले बादल सी रूष्ट ह...

 

वो श्याम वर्ण
श्याम वर्ण आंखों में घने घन
सिहरा मन स्थिर तन
ताकती झांकती छुप के झुक के दर्पण
श्याम वर्ण ।
वो एक काले बादल सी
रूष्ट होती पागल सी
जब बात कोई खटक जाती
वो बिजली सी कड़क जाती
इतने पर भी बिगाड़ नहीं
कुछ वो पाती बस
फूट-फूट कर बरसाती
कोमल कली पावन सी
मेरी प्यारी सखी सावन सी
भर-भर कर करती अर्पण
श्याम वर्ण ।
वो बारिशों का सुंदर शोर
ख़ामोश गगन का अन्त:छोर
जब बात कोई अटक जाती
वो हवा सी भटक जाती
इतने पर भी बना जब
नहीं वो कुछ पाती
टूट-टूट कर छपछपाती
पानी से भरे आंगन सी
मेरी प्यारी सखी सावन सी
खाली कर करती समर्पण
श्याम वर्ण ।
वो सावन में नाचता मोर
दिल में बसा दिल का चोर
जब बात कोई समझ जाती
वो फव्वारे सी छिटक जाती
इतने पर भी दिखा नहीं
कुछ वो पाती तो
छूट-छूट कर गहराती
रजनी से भरे बादल सी
मेरी प्यारी सखी सावन सी
जड़-जड़ कर करती संस्करण
श्याम वर्ण ।
श्याम वर्ण आंखों में घने घन
लिए थर्राती;सुंदर
अति नहीं सुंदर
सुबह-शाम शाम-सुबह आती जाती

वो घटा चकराती सी
समुद्र को थाम कर
लटों को बांध कर
निकली शर्माती सी
मन में सोच तन में बोझ लिए
लचकती-पटकती रूक के खुल करती भ्रमण
श्याम वर्ण ।
         -मिन्नी शर्मा
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                ये महाभारत भूमि
  ये महाभारत भूमि
मृत्यु ने बड़ी खुशी से चूमी ।
अधिकार के वो रिश्ते थे,कर्तव्य से वो रिसते थे
विफल पितामह जिसकी न कोई संतान  थी
मोहग्रस्त इंसान की शौर्यता महान  थी
कथा अनोखी अपनों के संग्राम की ।
कर्म की थी गाथा,धर्म निज सुनाता
भगवान थे जिसके सारथी
अर्जुन वो साहसी
मनोभाव उसे दुर्बल बनाता
गीता से वो प्राण पाता
विडम्बना भाग्य की
लालसा साम्राज्य की
  प्रतिशोध और अपमान की
  अज्ञान से ज्ञान की
उदाहरण ये भगवान की
जीवन के हर अभ्यास की
जीवन्त पाठशाला, महत्तता बढ़ती दिन दिन दूनी
ये महाभारत - भूमि ।
वो वचनबद्धता अंधी समर्पणता
रिश्तों की निरार्थकता
लक्ष्य की सार्थकता
छल शय और मात
युद्ध के भीषण निनाद
बालक अभिमन्यु की वीरता का पाठ
पहिए के गिर्द घूमती क्रूरता का नाच
देख सुन गीली हुई हर आंख
और ह्रदय भरा अहलाद
हाय  न्याय का अभाव
देवों का मंत्र, वरदान और श्राप
प्रेम-द्वेष त्याग-तप ईर्ष्या-अभिमान संताप और वैराग की धूनी
ये महाभारत भूमि ।
अंधे होकर संस्कार क्या कर सकते थे
लपेट कर स्वाभिमान क्या भर सकते थे
इतिहास का सबसे बड़ा जुआ
स्वार्थ ने था खेला
एक लंगड़े ने शक्ति वालों को
नपुंसकता की और धकेला
विनाश काल था बुद्धि विपरीत
पर अंत में न्याय की ही हुई जीत
निर्दोषों का था रक्त बहा
कर्तव्य था अहा!
खोकर लगभग सब कुछ
मिला जो लगा तुच्छ,हार हुई जो पड़ी सूनी
ये महाभारत भूमि।
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काश कि तुम
दूर-दूर तक दिखते इन घरों में से
काश तुम भी किसी एक में होते
तो दूर से ही तुम मुझे पहचान लेते
मैं भी तुम्हें देख रही हूं ये जान लेते ।
ये जान लेते कि
चाहती हूं मैं तुम्हारे पास आना
तुम्हें अपने नज़दीक लाना
और उन घरों के पीछे दिखते
ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के झुंड के नीचे
बैठ कर तुमसे बतियाना ।
अगर होते तुम उनमें से
किसी एक घर की छत पे
तो देखते मेरे साथ आसमान में
उड़ते इन पंछियों को
सुनते साथ में इन मंदिर की घंटियों को
मेरी आंखों में गहराते अंधेरे को देखते ।
रात के चांद, सूरज फिर सवेरे को देखते
यूं ही तुम देखते जैसे
मैं देखती हूं दूर तक
फैले इन घरों को
और सोचती हूं इन्हें देख के
रहते होगे तुम भी शायद इनमें से किसी एक में ।
काश कि तुम हो यहीं कहीं
और देख रहे हो कि मैं लिख रही हूं
तुम्हें देख रही हूं पर तुम दिखे नहीं
तुम होते इन में से किसी एक घर में छुपे
तो मैं तुम्हें ढूंढ लेती,देर से ही सही मिल जाते कभी
काश कि तुम ।
                                         -मिन्नी शर्मा

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पैरों के नीचे क़दमों के     आसपास
पैरों के नीचे मिट्टी हमेशा ही चलती है
क़दमों के आसपास धूल हमेशा ही बनती है
मिट्टी उड़ने के डर से क़दमों को धीमा कर लूं
या करूं मिट्टी को साफ ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे परछाई हमेशा ही खिसकती है
पैरों के नीचे परछाई हमेशा ही दबती है
दबने के डर से खुद को परछाई के पीछे कर लूं
या पैरों के पीछे रखूं पांव ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे धूप हमेशा ही जलती है
क़दमों के आसपास धूप हमेशा ही धरती है
धूप लगने के डर से क़दमों को ऊंचा कर लूं

या करूं धूप पे घात ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे घास हमेशा पनपती है
पैरों के नीचे घास हमेशा ही मरती है
मरने के डर से खुद को घास सरीखे कर लूं
या पत्थर कर लूं आप ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे दुनिया हमेशा ही चलती है
क़दमों के आसपास दुनिया हमेशा ही बदलती है
दुनिया बदलने के डर से अपने कदमों को बदल कर लूं
या बदलूं दुनिया मैं आज ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
मिट्टी, परछाई, धूप और घास
ये तो बहुत कम है

और भी बहुत ग़म हैं
पैरों के नीचे क़दमों के आसपास ।
                                - मिन्नी शर्मा

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                 मैं जीऊंगी..
  तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
   मैं जीऊंगी
  अमृत निकलने तक जो भी
  मिले पियूंगी
  मेरे बोलने से तबाही आती है
  तो मैं दर्द सह कर होंठ सीयूंगी
  तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
  मैं जीऊंगी।
      मेरे हार मानने से तो तुम भी हार जाओगे
      मैं तो अटकूंगी; तुम भी ना पार पाओगे
      कोरी निकल जाऊंगी मैं लांछन तो तुम उठाओगे          
      तुमने मुझे बचना नहीं सिखाया
       मैं मिलूंगी
      तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
       मैं जीऊंगी।
       तुम्हारे आने तक जो भी आए
     उसे दिखूंगी
     तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
     मैं जीऊंगी।
     मेरे रोकने पर मनाही आती है
     तो मैं सब कुछ छोड़ कर वक्त के साथ बहूंगी
     तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
     मैं जीऊंगी।

                                              -मिन्नी शर्मा
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व्यथा
मन को मना करो, करे कुछ ग़लत
ये तो न क्षमा करो
मन को मना करो ।
मन है; मन तो करता है
रास्ते जाने बिना गाड़ी में चढ़ता है
जाने कहां कहां  उतरता है ।
रूकता नहीं बस चलता है
अरे! बस कहां चलता है
आवारा सा इधर-उधर टहलता है ।
टहलना मजबूरी है
पर आराम भी तो ज़रूरी है ।
ज़रूरी को माने या मनमानी ही पूरी है
दो आधी बातों के बीच की दूरी है ।
पूरी हो कैसे?एक दिशा में चलते नहीं
दोनों अजब पैर फितूरी हैं ।
फितूर दुनिया की उपज है
पर मन को तो आराम पसंद है ।
भटकने से हासिल कुछ हुआ नहीं
ढूंढा  बहुत पर कुछ मिला नहीं ।
हो जाएगा जो होना होगा
गलत जगह की मेहनत से
कुछ न पाना होगा ।
मिलेगा न कुछ बस आवारापन
रह जाएगा बन के आवारा मन ।
जानता है; इस कारण थमने को कहता है
अन्त में, मन ही भुगतता है
सब मन की ही व्यथा है ।
                                              -मिन्नी शर्मा
                                          

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कुछ अच्छे मौसमों में
कुछ अच्छे मौसमों में ज़िंदगी की चौखटों में
क़दम रख लूं दाखिला फिर मिले न मिले ।
खूबसूरत रंग टूटे हुए पंख
जैसे कि सीपियां और शंख
सदफ रख लूं मुज़ाहरा फिर मिले न मिले ।
इतनी मुश्किल से निकली हूं घर से
वापिस खाली हाथ जाना न लुत्फ उठाना
क्या ठीक है? ऐसे मुंह बनाना
नहीं! बिल्कुल भी नहीं
क्या कहेगा ज़माना,इस चक्कर से ।
हंसता हुआ चंद्र पेड़ों के सूखे पत्र
जैसे कि कैलाश और शंकर
कलश रखें लूं बाइना फिर मिले न मिले ।

इतने वक्त बाद चली हूं सफ़र पे
इतनी दूर आना फिर भी न कुछ पाना
क्या ठीक है ? ऐसे बहाना बनाना
नहीं! बिल्कुल भी नहीं
खुद को किसी और के हिसाब से जताना, जड़ से ।
धुंध का अंक धुंधला स्पर्श
जैसे कि आंख में छुपा हुआ अश्क
दर्द रख लूं आइना फिर मिले न मिले ।
कुछ अच्छे मौसमों में जिंदगी की चौखटों में
क़दम रख लूं दाखिला फिर मिले न मिले ।
                      -मिन्नी शर्मा


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ज़मीन आसमान
तुम आसमान में उड़ रहे हो
मैं ज़मीन पर चल रही हूं
तुम बादलों पर चढ़ रहे हो
मैं गढ्ढों से निकल रही हूं
न जाने तुम कैसे जीते हो
मैं भी न जाने क्यों जीने की
कोशिश कर रही हूं।
तुम हवाओं से जुड़ रहे हो
मैं मृदाओं में घुल रही हूं
तुम चादरों पे कढ़ रहे हो
मैं टांकों से फिसल रही हूं
न जाने तुम कैसे सीते हो
मैं भी न जाने क्यों सीने की
कोशिश कर रही  हूं।
तुम वर्षाओं में  तर रहे हो
मैं कीचड़ में फंस रही हो
तुम परागों में पड़ रहे हो
मैं कांटों से लड़ रही हूं
न जाने तुम कैसे पीते हो
मैं भी न जाने क्यों पीने की
कोशिश कर रही हूं ।
इतनी छोटी बूंद से बादल पकड़ रही हूं
बढ़ रहे हो जितना, छोटी पड़ रही हूं
तुम उपमान में विचर रहे हो
मैं तो बस दूर से तक रही हूं ।
                            - मिन्नी शर्मा

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                      ये कैसी आज़ादी?

गिनी चुनी तारीखों की आदी, ये कैसी आज़ादी?
दिनों रात बर्बादी
ये लाखों की बेबस आबादी, दिन भर सोए
                                                जागे ज़रा भी?
रात के अंधेरे में बुझा दे बाती, ये कैसी आज़ादी?
कितनों के खून से जवां की
मिलती है पल पल बुढ़ाती, बंधन खोए
                                                 तो झुर्रियां अड़ा दी!
रात के अंधेरे में आंखें गंवाती, ये कैसी आज़ादी?
अनमोल होके बिक जाती
तराज़ू में समाज बिठाती, बंदर भगाए
                                              बिल्लियां बढ़ा दी!
रात के अंधेरे में घात लगाती, ये कैसी आज़ादी?
सीधी-सादी नज़र आती
परिभाषा अपनी सबको रटाती, दांत दिखाए
                                          जो असलियत बता दी
रात के अंधेरे में और डराती, ये कैसी आज़ादी?
अपने बाप की हंसी उड़ाती
और कहती जय भारत माता की, झंडे लहराए
                            और जान गंवा दी!
रात के अंधेरे को सवेरा बताती, ये कैसी आज़ादी?
चीरफाड़ के खाती
अधिकार है!
धिक्कार है!
खुद की संघाती, ये कैसी आज़ादी?

                             मिन्नी शर्मा
                                                
                                          महाराज नगर गली नं 5,
                       मकान नं1883/1,
                                                 लुधियाना, पंजाब 
                                                पिनकोड 141001

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समरूपता
सर्दियों की शामें
जादूगरनी सी यादें
घरों पे उतरी धूप
जैसे किरणों की पूंछ
हवा के आंचल से लिपटती सरसरा के पतंगें
तेजी से आए झोंको से खड़खड़ा उठी मैं और ये पन्ने ।
खौलती हुई चाय से निकलता खुशबुदार धुंआ
और ढलते हुए सूरज की लालिमा का ये समां
धीरे धीरे मुझमें उतर जाता है
शाम का रंग मुझपे और मेरा शाम पे चढ़ जाता है ।
न जाने क्यों; है ये समरूपता
पर मन अब खुद को नहीं ढूंढता ।
आसमान के कंधे झुके हुए
पेड़ों के मुंह लटके हुए
सूरज रहा लड़खड़ाता
उदासी में शांत होकर कभी
आहों में पवन की सब कुछ उड़ जाता
कभी चुपके से बादल आंखें छलकाता
उदासीन मन की हालत का अंदाजा
जैसे इस शाम को लग जाता है
मेरा रंग शाम पे और इसका मुझपे चढ़ जाता है ।
ज्यों भी है; ये समरूपता
मन अब खुद को नहीं ढूंढता
पर ढूंढते हैं जो कुछ हम दोनों
वो शायद किसी को भी नहीं पता।
                                                  -  मिन्नी शर्मा

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: वो श्याम वर्ण - कविताएँ - मिन्नी शर्मा
वो श्याम वर्ण - कविताएँ - मिन्नी शर्मा
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