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वो श्याम वर्ण - कविताएँ - मिन्नी शर्मा

 

वो श्याम वर्ण
श्याम वर्ण आंखों में घने घन
सिहरा मन स्थिर तन
ताकती झांकती छुप के झुक के दर्पण
श्याम वर्ण ।
वो एक काले बादल सी
रूष्ट होती पागल सी
जब बात कोई खटक जाती
वो बिजली सी कड़क जाती
इतने पर भी बिगाड़ नहीं
कुछ वो पाती बस
फूट-फूट कर बरसाती
कोमल कली पावन सी
मेरी प्यारी सखी सावन सी
भर-भर कर करती अर्पण
श्याम वर्ण ।
वो बारिशों का सुंदर शोर
ख़ामोश गगन का अन्त:छोर
जब बात कोई अटक जाती
वो हवा सी भटक जाती
इतने पर भी बना जब
नहीं वो कुछ पाती
टूट-टूट कर छपछपाती
पानी से भरे आंगन सी
मेरी प्यारी सखी सावन सी
खाली कर करती समर्पण
श्याम वर्ण ।
वो सावन में नाचता मोर
दिल में बसा दिल का चोर
जब बात कोई समझ जाती
वो फव्वारे सी छिटक जाती
इतने पर भी दिखा नहीं
कुछ वो पाती तो
छूट-छूट कर गहराती
रजनी से भरे बादल सी
मेरी प्यारी सखी सावन सी
जड़-जड़ कर करती संस्करण
श्याम वर्ण ।
श्याम वर्ण आंखों में घने घन
लिए थर्राती;सुंदर
अति नहीं सुंदर
सुबह-शाम शाम-सुबह आती जाती

वो घटा चकराती सी
समुद्र को थाम कर
लटों को बांध कर
निकली शर्माती सी
मन में सोच तन में बोझ लिए
लचकती-पटकती रूक के खुल करती भ्रमण
श्याम वर्ण ।
         -मिन्नी शर्मा
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                ये महाभारत भूमि
  ये महाभारत भूमि
मृत्यु ने बड़ी खुशी से चूमी ।
अधिकार के वो रिश्ते थे,कर्तव्य से वो रिसते थे
विफल पितामह जिसकी न कोई संतान  थी
मोहग्रस्त इंसान की शौर्यता महान  थी
कथा अनोखी अपनों के संग्राम की ।
कर्म की थी गाथा,धर्म निज सुनाता
भगवान थे जिसके सारथी
अर्जुन वो साहसी
मनोभाव उसे दुर्बल बनाता
गीता से वो प्राण पाता
विडम्बना भाग्य की
लालसा साम्राज्य की
  प्रतिशोध और अपमान की
  अज्ञान से ज्ञान की
उदाहरण ये भगवान की
जीवन के हर अभ्यास की
जीवन्त पाठशाला, महत्तता बढ़ती दिन दिन दूनी
ये महाभारत - भूमि ।
वो वचनबद्धता अंधी समर्पणता
रिश्तों की निरार्थकता
लक्ष्य की सार्थकता
छल शय और मात
युद्ध के भीषण निनाद
बालक अभिमन्यु की वीरता का पाठ
पहिए के गिर्द घूमती क्रूरता का नाच
देख सुन गीली हुई हर आंख
और ह्रदय भरा अहलाद
हाय  न्याय का अभाव
देवों का मंत्र, वरदान और श्राप
प्रेम-द्वेष त्याग-तप ईर्ष्या-अभिमान संताप और वैराग की धूनी
ये महाभारत भूमि ।
अंधे होकर संस्कार क्या कर सकते थे
लपेट कर स्वाभिमान क्या भर सकते थे
इतिहास का सबसे बड़ा जुआ
स्वार्थ ने था खेला
एक लंगड़े ने शक्ति वालों को
नपुंसकता की और धकेला
विनाश काल था बुद्धि विपरीत
पर अंत में न्याय की ही हुई जीत
निर्दोषों का था रक्त बहा
कर्तव्य था अहा!
खोकर लगभग सब कुछ
मिला जो लगा तुच्छ,हार हुई जो पड़ी सूनी
ये महाभारत भूमि।
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काश कि तुम
दूर-दूर तक दिखते इन घरों में से
काश तुम भी किसी एक में होते
तो दूर से ही तुम मुझे पहचान लेते
मैं भी तुम्हें देख रही हूं ये जान लेते ।
ये जान लेते कि
चाहती हूं मैं तुम्हारे पास आना
तुम्हें अपने नज़दीक लाना
और उन घरों के पीछे दिखते
ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के झुंड के नीचे
बैठ कर तुमसे बतियाना ।
अगर होते तुम उनमें से
किसी एक घर की छत पे
तो देखते मेरे साथ आसमान में
उड़ते इन पंछियों को
सुनते साथ में इन मंदिर की घंटियों को
मेरी आंखों में गहराते अंधेरे को देखते ।
रात के चांद, सूरज फिर सवेरे को देखते
यूं ही तुम देखते जैसे
मैं देखती हूं दूर तक
फैले इन घरों को
और सोचती हूं इन्हें देख के
रहते होगे तुम भी शायद इनमें से किसी एक में ।
काश कि तुम हो यहीं कहीं
और देख रहे हो कि मैं लिख रही हूं
तुम्हें देख रही हूं पर तुम दिखे नहीं
तुम होते इन में से किसी एक घर में छुपे
तो मैं तुम्हें ढूंढ लेती,देर से ही सही मिल जाते कभी
काश कि तुम ।
                                         -मिन्नी शर्मा

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पैरों के नीचे क़दमों के     आसपास
पैरों के नीचे मिट्टी हमेशा ही चलती है
क़दमों के आसपास धूल हमेशा ही बनती है
मिट्टी उड़ने के डर से क़दमों को धीमा कर लूं
या करूं मिट्टी को साफ ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे परछाई हमेशा ही खिसकती है
पैरों के नीचे परछाई हमेशा ही दबती है
दबने के डर से खुद को परछाई के पीछे कर लूं
या पैरों के पीछे रखूं पांव ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे धूप हमेशा ही जलती है
क़दमों के आसपास धूप हमेशा ही धरती है
धूप लगने के डर से क़दमों को ऊंचा कर लूं

या करूं धूप पे घात ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे घास हमेशा पनपती है
पैरों के नीचे घास हमेशा ही मरती है
मरने के डर से खुद को घास सरीखे कर लूं
या पत्थर कर लूं आप ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
पैरों के नीचे दुनिया हमेशा ही चलती है
क़दमों के आसपास दुनिया हमेशा ही बदलती है
दुनिया बदलने के डर से अपने कदमों को बदल कर लूं
या बदलूं दुनिया मैं आज ?
क्या मुमकिन है ऐसी बात !
मिट्टी, परछाई, धूप और घास
ये तो बहुत कम है

और भी बहुत ग़म हैं
पैरों के नीचे क़दमों के आसपास ।
                                - मिन्नी शर्मा

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                 मैं जीऊंगी..
  तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
   मैं जीऊंगी
  अमृत निकलने तक जो भी
  मिले पियूंगी
  मेरे बोलने से तबाही आती है
  तो मैं दर्द सह कर होंठ सीयूंगी
  तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
  मैं जीऊंगी।
      मेरे हार मानने से तो तुम भी हार जाओगे
      मैं तो अटकूंगी; तुम भी ना पार पाओगे
      कोरी निकल जाऊंगी मैं लांछन तो तुम उठाओगे          
      तुमने मुझे बचना नहीं सिखाया
       मैं मिलूंगी
      तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
       मैं जीऊंगी।
       तुम्हारे आने तक जो भी आए
     उसे दिखूंगी
     तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
     मैं जीऊंगी।
     मेरे रोकने पर मनाही आती है
     तो मैं सब कुछ छोड़ कर वक्त के साथ बहूंगी
     तुमने मुझे मरना नहीं सिखाया
     मैं जीऊंगी।

                                              -मिन्नी शर्मा
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व्यथा
मन को मना करो, करे कुछ ग़लत
ये तो न क्षमा करो
मन को मना करो ।
मन है; मन तो करता है
रास्ते जाने बिना गाड़ी में चढ़ता है
जाने कहां कहां  उतरता है ।
रूकता नहीं बस चलता है
अरे! बस कहां चलता है
आवारा सा इधर-उधर टहलता है ।
टहलना मजबूरी है
पर आराम भी तो ज़रूरी है ।
ज़रूरी को माने या मनमानी ही पूरी है
दो आधी बातों के बीच की दूरी है ।
पूरी हो कैसे?एक दिशा में चलते नहीं
दोनों अजब पैर फितूरी हैं ।
फितूर दुनिया की उपज है
पर मन को तो आराम पसंद है ।
भटकने से हासिल कुछ हुआ नहीं
ढूंढा  बहुत पर कुछ मिला नहीं ।
हो जाएगा जो होना होगा
गलत जगह की मेहनत से
कुछ न पाना होगा ।
मिलेगा न कुछ बस आवारापन
रह जाएगा बन के आवारा मन ।
जानता है; इस कारण थमने को कहता है
अन्त में, मन ही भुगतता है
सब मन की ही व्यथा है ।
                                              -मिन्नी शर्मा
                                          

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कुछ अच्छे मौसमों में
कुछ अच्छे मौसमों में ज़िंदगी की चौखटों में
क़दम रख लूं दाखिला फिर मिले न मिले ।
खूबसूरत रंग टूटे हुए पंख
जैसे कि सीपियां और शंख
सदफ रख लूं मुज़ाहरा फिर मिले न मिले ।
इतनी मुश्किल से निकली हूं घर से
वापिस खाली हाथ जाना न लुत्फ उठाना
क्या ठीक है? ऐसे मुंह बनाना
नहीं! बिल्कुल भी नहीं
क्या कहेगा ज़माना,इस चक्कर से ।
हंसता हुआ चंद्र पेड़ों के सूखे पत्र
जैसे कि कैलाश और शंकर
कलश रखें लूं बाइना फिर मिले न मिले ।

इतने वक्त बाद चली हूं सफ़र पे
इतनी दूर आना फिर भी न कुछ पाना
क्या ठीक है ? ऐसे बहाना बनाना
नहीं! बिल्कुल भी नहीं
खुद को किसी और के हिसाब से जताना, जड़ से ।
धुंध का अंक धुंधला स्पर्श
जैसे कि आंख में छुपा हुआ अश्क
दर्द रख लूं आइना फिर मिले न मिले ।
कुछ अच्छे मौसमों में जिंदगी की चौखटों में
क़दम रख लूं दाखिला फिर मिले न मिले ।
                      -मिन्नी शर्मा


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ज़मीन आसमान
तुम आसमान में उड़ रहे हो
मैं ज़मीन पर चल रही हूं
तुम बादलों पर चढ़ रहे हो
मैं गढ्ढों से निकल रही हूं
न जाने तुम कैसे जीते हो
मैं भी न जाने क्यों जीने की
कोशिश कर रही हूं।
तुम हवाओं से जुड़ रहे हो
मैं मृदाओं में घुल रही हूं
तुम चादरों पे कढ़ रहे हो
मैं टांकों से फिसल रही हूं
न जाने तुम कैसे सीते हो
मैं भी न जाने क्यों सीने की
कोशिश कर रही  हूं।
तुम वर्षाओं में  तर रहे हो
मैं कीचड़ में फंस रही हो
तुम परागों में पड़ रहे हो
मैं कांटों से लड़ रही हूं
न जाने तुम कैसे पीते हो
मैं भी न जाने क्यों पीने की
कोशिश कर रही हूं ।
इतनी छोटी बूंद से बादल पकड़ रही हूं
बढ़ रहे हो जितना, छोटी पड़ रही हूं
तुम उपमान में विचर रहे हो
मैं तो बस दूर से तक रही हूं ।
                            - मिन्नी शर्मा

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                      ये कैसी आज़ादी?

गिनी चुनी तारीखों की आदी, ये कैसी आज़ादी?
दिनों रात बर्बादी
ये लाखों की बेबस आबादी, दिन भर सोए
                                                जागे ज़रा भी?
रात के अंधेरे में बुझा दे बाती, ये कैसी आज़ादी?
कितनों के खून से जवां की
मिलती है पल पल बुढ़ाती, बंधन खोए
                                                 तो झुर्रियां अड़ा दी!
रात के अंधेरे में आंखें गंवाती, ये कैसी आज़ादी?
अनमोल होके बिक जाती
तराज़ू में समाज बिठाती, बंदर भगाए
                                              बिल्लियां बढ़ा दी!
रात के अंधेरे में घात लगाती, ये कैसी आज़ादी?
सीधी-सादी नज़र आती
परिभाषा अपनी सबको रटाती, दांत दिखाए
                                          जो असलियत बता दी
रात के अंधेरे में और डराती, ये कैसी आज़ादी?
अपने बाप की हंसी उड़ाती
और कहती जय भारत माता की, झंडे लहराए
                            और जान गंवा दी!
रात के अंधेरे को सवेरा बताती, ये कैसी आज़ादी?
चीरफाड़ के खाती
अधिकार है!
धिक्कार है!
खुद की संघाती, ये कैसी आज़ादी?

                             मिन्नी शर्मा
                                                
                                          महाराज नगर गली नं 5,
                       मकान नं1883/1,
                                                 लुधियाना, पंजाब 
                                                पिनकोड 141001

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समरूपता
सर्दियों की शामें
जादूगरनी सी यादें
घरों पे उतरी धूप
जैसे किरणों की पूंछ
हवा के आंचल से लिपटती सरसरा के पतंगें
तेजी से आए झोंको से खड़खड़ा उठी मैं और ये पन्ने ।
खौलती हुई चाय से निकलता खुशबुदार धुंआ
और ढलते हुए सूरज की लालिमा का ये समां
धीरे धीरे मुझमें उतर जाता है
शाम का रंग मुझपे और मेरा शाम पे चढ़ जाता है ।
न जाने क्यों; है ये समरूपता
पर मन अब खुद को नहीं ढूंढता ।
आसमान के कंधे झुके हुए
पेड़ों के मुंह लटके हुए
सूरज रहा लड़खड़ाता
उदासी में शांत होकर कभी
आहों में पवन की सब कुछ उड़ जाता
कभी चुपके से बादल आंखें छलकाता
उदासीन मन की हालत का अंदाजा
जैसे इस शाम को लग जाता है
मेरा रंग शाम पे और इसका मुझपे चढ़ जाता है ।
ज्यों भी है; ये समरूपता
मन अब खुद को नहीं ढूंढता
पर ढूंढते हैं जो कुछ हम दोनों
वो शायद किसी को भी नहीं पता।
                                                  -  मिन्नी शर्मा

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